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छत्तीसगढ़ः 'फर्जी एनकाउंटर' की वो कहानी जो आपको सन्न कर देगी

गांव के तालाब में नहा रही महिलाओं को नंगा कर, पूरे गांव में परेड करवाती है. पुलिस के गांव घुसने पर घर छोड़ जंगल भाग जाते हैं. वहां साल के पत्तों को ओढ़ रात बिताते हैं

Anand Dutta Updated On: Jan 11, 2018 08:49 PM IST

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छत्तीसगढ़ः 'फर्जी एनकाउंटर' की वो कहानी जो आपको सन्न कर देगी

ये सिपाही आदिवासी लड़कों को स्कूल से उठाकर गोली मार देते हैं. दहशत इस कदर है कि परिजन कारण तक नहीं पूछते कि क्यों मारा. वह शव मांगने जाते हैं, और तो और उन्हें दो साल तक शव भी नहीं मिल पाता. इनकी गोलियों का शिकार आठ साल के बच्चों से लेकर 50 साल के पुरूष तक लगातार हो रहे हैं. एक 15 साल के लड़के को माओवादी करार दे गोली मारा, गोली लगने के बाद जब देखा कि वह मरा नहीं, तड़प रहा है, तो पास के पेड़ में उसे पटक मारा, फिर देखते ही देखते वह दम तोड़ देता है.

गांव के तालाब में नहा रही महिलाओं को नंगा करवा, पूरे गांव में परेड करवाती है. माओवादियों के सफाए के नाम पर 500 की संख्या में पुलिस बिजापुर के गांवों में पहुंचती है. देखते ही देखते चार गांव के 1000 से अधिक लोग जैसे-तैसे हाल में घर छोड़ जंगल भाग जाते हैं. वहां साल के पत्तों को ओढ़ रात बिताते हैं, वह भी बिना कुछ खाए और पिए. कभी दो दिन तो कभी चार दिनों तक बुलेट ट्रेन वाले इस देश में खुद को जिंदा रखने की जद्दोजहद करते हैं.

9 जनवरी को दोपहर के तीन बज रहे थे. संसद भवन मार्ग पर दलित नेता और मीडिया के ताजा-ताजा डार्लिंग बने जिग्नेश मेवाणी, कन्हैया कुमार, खालिद कोरेगांव हिंसा पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. दलित नेता चंद्रशेखर रावण को रिहा कराने की अपील कर रहे थे. 50 से अधिक मीडिया संस्थानों के 150 से अधिक रिपोर्टर और कैमरामैन इसे कवर करने सुबह 11 बजे से पहुंच चुके थे.

इधर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में दिल्ली से 1576 किमी दूर बिजापुर जिले की दो आदिवासी लड़कियां सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस की वीरगाथा सुनाने पहुंची थी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में नमस्कार करने से पहले सुनीता पोट्टम (18 साल) ने कहा, 'मैं अचे से हिन्दी नै बोलती. आपको मेरी बात समज नै आए तो पिर से पूछिएगा.'

सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ के अत्याचार से तंग आकर दोनों लड़कियों ने बिलासपुर हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर चुकी हैं. कोर्ट सरकार को उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दे चुकी है. सरकार कहती है कि बहुत ज्यादा काबिल मत बनो. जब तुम्हारे गांव में कोई हिन्दी बोलता नहीं है, पढ़ा लिखा नहीं है, तब तुम्हारे अंदर इतनी हिम्मत कहां से आती है कि तुम लड़ने पहुंच रही हो. इससे ज्यादा करोगी तो और दो एफआईआर कर अंदर करवा देगी. ऐसी स्थिति में दोनों लड़कियों ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया है.

पूरी कहानी सुनीता की जुबानी (ये दास्तान साल 2015 से 2017 तक की है)

बीते 21 दिसंबर को बिजापुर के कोटचोली गांव में सुबह 10 बजे पुरुष धान काटने निकले थे. बच्चे गाय और बकरी चराने. महिलाएं घर के काम में व्यस्त थीं. उसी वक्त गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई पड़ी. आवाज की तरफ सभी भागें. वहां उनके गांव के एक युवक के शरीर से खून निकल रहा था. उसे सीआरपीएफ के जवान माओवादी करार दे, गोली मार चुके थे.

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मुन्नी पोट्टम और सुनीता पोट्टम

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गांववालों ने जब कारण पूछा तो एक तरफ से महिलाओं, बच्चों को पीटने लगे. इस पिटाई में पांच साल का एक बच्चा भी, जिसके सर में भारी चोट आई और खून निकलने लगा.

जवान लाश लेकर निकल गए. काफी खोज करने के बाद दूर जंगल में उस युवक के कपड़े टंगे मिले. जब गांववाले लाश लेने थाना पहुंचे तो उसके बदन पर खाकी वर्दी डाल दी गई थी. इस घटना के बाद सुनीता पोट्टम एसपी से मिलने गई. एसपी का जवाब था कि ज्यादा शिकायत लेकर इधर-उधर गई तो उसके ऊपर भी एफआईआर करा दिया जाएगा. इस दौरान वह पत्रकारों से भी गुहार लगाती रही कि उसकी मदद करे, लेकिन पुलिसिया एफआईआर के डर से स्थानीय पत्रकार सामने नहीं आते.

मामला हाईकोर्ट पहुंचा. जांच टीम बैठी. फैक्ट फाइंडिंग टीम ने फर्जी एनकाउंटर की बात कही. उसपर कार्रवाई के बदले उलटे फैक्ट फाइंडिंग टीम पर भी एफआईर करा दिया गया. उन्हें कई अन्य तरीकों से परेशान किया जा रहा है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों पर हो रहे हैं मुकदमें 

पिछले कुछ सालों से वहां काम कर रही ईशा खंडेलवाल बताती हैं कि पहले तो वह जगदलपुर में रहकर जगदलपुर लीगल एड ग्रुप के माध्यम से पीड़ित आदिवासियों के लिए मुकदमें लड़ रही थी. पुलिस ने उन्हें भी परेशान करना शुरू कर दिया. यहां तक कि उनके मकान मालिक को भी नहीं छोड़ा. अब वह रायपुर और दिल्ली में रहकर इन आदिवासियों के इंसाफ की लड़ाई लड़ रही हैं.

सुनीता पोट्टम और मुन्नी पोट्टम ने बीते साल राज्य में हुई छह कथित मुठभेड़ों को चुनौती देते हुए याचिका डाली है. शुरुआत में यह याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दी गई लेकिन अदालत ने उन्हें बताया कि ऐसा ही एक और मामला (नंदिनी सुंदर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य) सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. जिसके बाद दोनों ने मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की याचिका दे दी.

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तांती नाम के युवक को गोली मारी दी गई. लाश नहीं मिली, अगले दिन उसके कपड़े जंगलों में लटके मिले. कुआंबी गंग को गोली मारी गई, अगले दिन उसकी लाश जंगल में मिली. आंडरी गांव के 8 साल के बच्चे को माओवादी कह गोली मारी, अभी तक उसकी लाश नहीं मिली.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

पालनार गांव के सीटू हेमला धान खेत में उत्पात मचाने आए बंदरों को भगाने गए थे. सीआरपीएफ ने यहां भी एक युवक को वहां से उठाकर ले गई. दूसरे जगह ले जाकर गोली मार दी. इसे मुठभेड़ का नाम दे दिया गया. कोरचोली में सुक्कु कुंजम को इसी तरह उस वक्त मार दिया गया जब वह अपने रिश्तेदार के घर आए थे.

जान बचाने के लिए हजारों लोग गांव छोड़ भाग जाते हैं जंगल 

सुनीता और मुन्नी बमुश्किल हिन्दी बोल और समझ पाती हैं. दोनों चाहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट उनके मामले को शीर्ष अदालत में ट्रांसफर करने की अर्जी पर मुहर लगा दे. इस मामले में वृंदा ग्रोवर और प्रशांत भूषण वकील हैं.

मुन्नी पोट्टम (18 साल) बताती हैं कि जब पुलिसवाले आते हैं तो गांव के गांव खाली हो जाते हैं. चार-चार दिन तक पुलिस गांव में डेरा जमाए रहती है. जान बचाने के लिए लोग जंगलों में भाग जाते हैं. केंदू पत्ता ओढ़कर रात गुजारते हैं. इन इलाकों से मुख्य सड़क पर पहुंचने के लिए तीन घंटे पैदल चलने पड़ते हैं. सलवा जुडूम के बाद से यहां के स्कूल बंद हो चुके हैं. आंगनबाड़ी केंद्र बंद हैं. आसपास कहीं अस्पताल नहीं है. अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी है.

यह पूछने पर कि आपके गांव में मतदान होता है? सुनीता पोट्टम चौंकती है. वह समझ नहीं पाती कि उनसे क्या पूछा जा रहा है.  मतलब साफ है इन इलाकों में अभी तक मतदान नहीं हो सका है. इन इलाकों में गोंडी, हल्बी, माड़िया भाषा चलन में है. इन भाषाओं में चुनाव को चुनई बोला जाता है. जिसे इन लड़कियों ने कभी देखा नहीं.

इन पीड़ितों को कानूनी मदद मुहैया करा रही ईशा बताती हैं कि छत्तीसगढ़ में साल 2016 में फर्जी मुठभेड़ों में कुल 134 लोगों की हत्या की गई. वह बताती हैं कि साल 2016 में 15 साल के अर्जुन पर मुकदमा चल रहा था. निचली अदालत से वह जमानत पा, हर सुनवाई पर कोर्ट में हाजिरी लगा रहा था. उसी साल 15 अगस्त को पुलिस उसे माओवादी कह, उठाकर ले गई. 16 अगस्त को उसकी लाश मिली. पुलिस उसे जनमिलिशिया दस्ते का कमांडर बताती रही.

झारखंड में भी चल रहा फर्जी मुठभेड़ का दौर

माओवादियों के खात्मे की आखिरी चरण की लड़ाई के नाम पर लाल गलियारों में फर्जी मुठभेड़ का दौर जारी है. कहीं राज्य पुलिस तो कहीं सीआरपीएफ इस काम को अंजाम दे रही है. पलामू के सतबरवा इलाके के बकोरिया में 8 जून 2015 को पुलिस और नक्सलियों के बीच कथित मुठभेड़ हुआ था. पुलिस ने मुठभेड़ में 12 नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया था, जिसमे लातेहार में चर्चित मृत जवान के पेट में बम प्लांट करनेवाले नक्सली को मार गिराने की बात कही गई थी.

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हंगामा हुआ, जांच टीम बनी. दो साल बाद पता चला कि उसमें केवल एक युवक पर थाने में शिकायत पहुंची थी. पुलिस रिकॉर्ड में बाकियों का दूर दूर तक नाम नहीं था. पुलिस ये बताने में नाकाम रही कि ये माओवादी ही थे. इस एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों को गैलेंट्री अवार्ड भी मिले हैं. तब तक एक और खुलासा हुआ कि पुलिस तो इस तथाकथित मुठभेड़ में शामिल भी नहीं थी.

जेजेएमपी नामक उग्रवादी संगठन के उग्रवादियों से इन मासूमों का शिकार किया गया था. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सीआईडी को दिए बयान में क्षेत्र के डीआईजी हेमंत टोप्पो ने साफ कहा कि उन्हें इस घटना की कोई जानकारी नहीं है.

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वहीं ग्रामीणों के मुताबिक जेजेएमपी ने सभी को गोली मारी है. इससे बाद पुलिस ने इसे मुठभेड़ का नाम दे दिया. मारे गए लोगों को कमर के ऊपर गोली मारी गई थी. यहां तक इस पूरे कांड के बारे में पुलिस के मुखिया एके पांडेय तक को जानकारी नहीं थी. डीजीपी ही नहीं, जिले के एसपी और उस इलाके के थानेदार तक को इसकी जानकारी नहीं थी.

झारखंड के जेलों में बंद है 10 हजार से अधिक लोग 

पिछले कई सालों से ऐसे पीड़ितों की लड़ाई लड़ रहे रांची के फादर स्टेन स्वामी ने साल 2015 में आरटीआई के जरिए जुटाए आंकड़ों के माध्यम से बताते हैं कि फिलहाल 10 हजार से अधिक बेगुनाह राज्यभर के जेलों में बंद हैं. कई तो मरने के कगार पर पहुंच चुके हैं. सभी को माओवादी गतिविधि में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था.

द हिन्दू की एक खबर की मानें तो साल 2011 से 15 तक में देशभर में कुल 555 फर्जी एनकाउंटर के केस दर्ज किए गए थे. 11 जुलाई 2016 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक केवल मणिपुर में पिछले 20 सालों में 1500 से ज्यादा फर्जी एनकाउंटर किए गए हैं.

बस्तर में हिन्दुस्तान टाइम्स के सीनियर रिपोर्टर रितेश मिश्रा कहते हैं कि मानवाधिकार हनन इस साल घटा है. हालांकि नक्सल ऑपरेशन ज्यादा हुए हैं.  सरकार के अनुसार इंटेलिजेंस बेस ऑपरेशन हुए हैं. मानवाधिकार का उल्लंघन पिछली साल की तुलना में कम सुनाई पड़े हैं. ऐसा नहीं है मानवाधिकार उल्लंघन खत्म हुए हैं. एनएचआरसी के हस्तक्षेप के बाद सरकार सक्रिय हुई है. कह सकते हैं कि सरकार ज्यादा सचेत हो गई है.

चिंतागुफा, दंतेवाड़ा, बिजापुर में मानवाधिकार उल्लंघऩ हुआ है, लेकिन 2017 में कम. फ्रंट पर लड़नेवालों में लोकल युवा या सरेंडर करनेवाले लड़के हैं. वहीं सलवा जुडूम के सक्रिय होने के अफवाह पर रितेश कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि सलवा जुडूम का कहीं कोई स्थान है.

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