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टाटा की प्रतिष्ठा कायम रखना होगी चंद्रा की सबसे बड़ी चुनौती

टाटा ग्रुप में गुड गवर्नेंस पर बार-बार सवालिया निशान लग रहा है.

Updated On: Jan 14, 2017 09:21 AM IST

Sindhu Bhattacharya

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टाटा की प्रतिष्ठा कायम रखना होगी चंद्रा की सबसे बड़ी चुनौती

एन चंद्रशेखरन को टाटा संस के चेयरमैन की जिम्मेदारी ऐसे वक्त पर दी गई है जब यह कारोबारी साम्राज्य शायद अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. 100 अरब डॉलर के टाटा ग्रुप की कमान हाथ में आने से पहले चंद्रशेखरन ग्रुप की आईटी कंपनी टीसीएस के सीईओ और एमडी थे.

शेयरहोल्डर्स का ग्रुप में भरोसा कायम करना होगा

उनका सबसे पहला और सबसे बड़ा काम स्टेकहोल्डर्स को यह भरोसा दिलाना होगा कि टाटा ग्रुप की वैल्यूज और मानदंड कायम रखे जाएंगे. इसके लिए उन्हें टाटा कंपनियों के हजारों-लाखों इनवेस्टर्स को गुड गवर्नेंस के बारे में भरोसा दिलाना होगा.

टाटा ग्रुप में गुड गवर्नेंस पर 24 अक्टूबर के बाद से बार-बार सवालिया निशान लग रहा है. इसी दिन टाटा संस के पिछले चेयरमैन सायरस मिस्त्री को बोर्ड ने बहुमत से निकालने का फैसला लिया था. तब से मिस्त्री कई अहम गवर्नेंस के मसले उठा चुके हैं. उन्होंने टाटा संस में बहुमत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स पर कामकाज में दखलंदाजी के गंभीर आरोप लगाए हैं. टाटा ट्रस्ट की अगुवाई रतन टाटा करते हैं.

Tata Chandrasekharan

एन चंद्रशेखरन

चंद्रशेखरन (चंद्रा) को टाटा ग्रुप में कॉरपोरेट गवर्नेंस पर उठ रहे संदेह के बादलों को दूर करना होगा. टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर चंद्रा की यात्रा मुश्किल भरी रहने वाली है. उन्हें न सिर्फ टाटा की वैल्यूज बरकरार रखनी बल्कि उन्हें ग्रुप को मिस्त्री के साये से भी सफलतापूर्वक आगे खींचकर ले जाना है.

निकाले जाने के बाद से मिस्त्री ने कई आरोप लगाए हैं. कई दस्तावेज पेश किए हैं, जिनके जरिए ये आरोप लगाए गए हैं कि देश के सबसे प्रतिष्ठित और विशालकाय कारोबारी समूह में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

चंद्रा को टाटा ग्रुप को लेकर लोगों की सोच के मसले को बारीकी से सुलझाना होगा. साथ ही अगर वह ग्रुप कंपनियों को प्रॉफिट में लाना चाहते हैं तो उन्हें कुछ बेहद कड़े कारोबारी फैसले भी करने पड़ सकते हैं.

क्या फिर तो नहीं दोहराया जाएगा मिस्त्री प्रकरण?

सवाल यह नहीं है कि चंद्रशेखरन इस पद के लिए योग्य हैं या नहीं? सवाल यह है कि क्या मिस्त्री जैसा प्रकरण कहीं दोबारा तो नहीं दोहराया जा सकता? अगर निकट भविष्य में टाटा ट्रस्ट अपनी बातें मनवाना चाहता है और चंद्रा अपने अलग फैसले लेते हैं तो दोनों के बीच में टकराव पैदा हो सकता है. ऐसे में किसकी बात मानी जाएगी?

Cyrus Mistri

साइरस मिस्त्री

टाटा समूह के एक अंदरूनी शख्स के मुताबिक, मिस्त्री प्रकरण फिर से दोहराए जाने के आसार नहीं हैं. इसकी वजह यह है कि चंद्रा किसी कारोबारी घराने से नहीं आते. दूसरी ओर, सायरस मिस्त्री का शापूरजी पल्लोनजी ग्रुप एक बेहद ताकतवर कारोबारी समूह है. इस ग्रुप की टाटा संस में 18 फीसदी हिस्सेदारी है. कई बिंदुओं पर मिस्त्री और टाटा ट्रस्ट्स में मतभेद पैदा हुए. कई लोगों का कहना है कि यह टाटा और मिस्त्री के हितों के टकराव का मसला था.

लेकिन, यह मानना कि चूंकि चंद्रा किसी कारोबारी घराने से नहीं आते, इस वजह से उनके लिए आगे की राह आसान होगी, जल्दबाजी होगी. टाटा संस के एक पहले के बयान के मुताबिक, टाटा ग्रुप का करीब 90 फीसदी प्रॉफिट केवल दो कंपनियों से आता है. ये कंपनियां हैं- टीसीएस और जगुआर लैंड रोवर (जेएलआर). ग्रुप के कुल टर्नओवर में इन दोनों कंपनियों की हिस्सेदारी तकरीबन 50 फीसदी है.

मैन्युफैक्चरिंग और ऑटो जैसे कारोबार चलाने का अनुभव नहीं

इसके अलावा, चंद्रा के पास मैन्युफैक्चरिंग या ऑटो और स्टील जैसे कारोबारों को चलाने का तकरीबन कोई अनुभव नहीं है. ईटी में छपी एक खबर के मुताबिक, यह पूछे जाने पर कि बिना किसी पूर्व अनुभव के वह मैन्युफैक्चरिंग और इससे जुड़े कारोबार किस तरह हैंडल करेंगे, चंद्रा ने कहा, ‘मैं खुद में सबकुछ नहीं हूं. मुझे एक टीम चाहिए जो मुझे गाइड करे.’

इससे पता चलता है कि एक सही टीम खड़ी करना और ग्रुप में कॉरपोरेट गवर्नेंस के मुद्दों को हल करना नए चेयरमैन की सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है.

कंपनियों को प्रॉफिट में लाना बड़ी चुनौती

टाटा ग्रुप पर करीब 30 अरब डॉलर का भारी-भरकम कर्ज है. अगर हम टीसीएस से मिलने वाले डिविडेंड को हटा दें तो टाटा संस पिछले तीन साल से ऑपरेटिंग लॉस में चल रहा है. याद रखिए कि इसमें प्रोविजनिंग के लिए रखी गई रकम शामिल नहीं है. बीच में हो सकता है कि मामूली फायदा भी रहा हो.

इसका मतलब यह है कि अगर आने वाले सालों में टीसीएस के परफॉर्मेंस में कुछ गड़बड़ी हो जाए तो ग्रुप की हालत डांवाडोल हो सकती है. चंद्रा के टीसीएस से हटने के बाद क्या यह कंपनी ग्रुप के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बनी रहेगी?

MUMBAI, INDIA - MARCH 23:  (R-L) Ravi Kant Managing Director of Tata Motors and Ratan Naval Tata Chairman of Tata Group attend the launch of the Tata Nano on March 23, 2009 in Mumbai, India. Tata Motors today launched the world's cheapest car which will initially go on sale in India and cost roughly 2000 USD.  (Photo by Ritam Banerjee/Getty Images)

रतन टाटा के ड्रीम प्रोजेक्ट नैनो पर भी सवाल उठे हैं.

टाटा के एक और स्टेटमेंट में कहा गया है कि पिछले तीन साल में ग्रुप ने लॉस के लिए हजारों करोड़ रुपये की प्रोविजनिंग की है या इन्हें बट्टेखाते में डाल दिया है. टाटा स्टील ने ही यूके/यूरोपीय संपत्तियों में अपने निवेश के बड़े हिस्से को बट्टेखाते में डाल दिया है. टाटा स्टील एक ऐसी अहम कंपनी है जिसका टर्नअराउंड करना चंद्रशेखरन के लिए बेहद अहम होगा.

इसके अलावा, जापानी टेलीकॉम कंपनी डोकोमो के साथ चल रहे विवाद भी सुलझने का नाम नहीं ले रहे. टेलीकॉम बिजनेस अब तक टाटा के लिए पैसा खाने वाली मशीन रहा है.

टीसीएस, जेएलआर को छोड़कर बाकी ग्रुप कंपनियों की हालत खस्ता

टीसीएस के बाद जगुआर लैंड रोवर ही ग्रुप की दूसरी ऐसी कंपनी है जो कि अच्छा कारोबार कर रही है. लेकिन, टाटा मोटर्स के तहत ग्रुप का घरेलू ऑटोमोबाइल कारोबार संकट में पड़ा हुआ है. चंद्रा को टाटा संस के बोर्ड को कड़े और मुश्किल फैसले लेने के लिए राजी करना पड़ेगा. उन्हें ग्रुप की कई कंपनियों को प्रॉफिट में लाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के लिए विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है.

टाटा संस के बोर्ड मेंबर्स को लिखे एक पत्र में मिस्त्री ने कई आरोप लगाए हैं. मिसाल के तौर पर, उन्होंने नैनो प्रोजेक्ट के साथ जुड़े हुए इमोशनल अटैचमेंट पर सवाल उठाए हैं. टाटा मोटर्स का यह प्रोजेक्ट तगड़े घाटे में है. उन्होंने आरोप लगाया कि नैनो को मजबूरी में चलाना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि नैनो पर 1,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. इस प्रोजेक्ट को बंद करने की कोशिशों में मिस्त्री सफल नहीं हो सके.

मिस्त्री ने लगाए गंभीर आरोप

मिस्त्री के पत्र में एयर एशिया इंडिया ज्वॉइंट वेंचर में हुई वित्तीय गड़बड़ियों के भी वाकये बताए गए हैं. अब इस मामले की जांच सरकारी एजेंसियां कर रही हैं. मिस्त्री ने आरोप लगाया कि टाटा की विरासती मजबूरियों के चलते ग्रुप को 1,18,000 करोड़ रुपये की पूंजी बट्टेखाते में डालनी पड़ सकती है. इन कंपनियों में इंडियन होटल्स, टाटा मोटर्स का व्हीकल बिजनेस, टाटा स्टील यूरोप, टाटा पावर मुंद्रा और टाटा टेलीसर्विसेज शामिल हैं.

इन कंपनियों में 2015 तक 1,96,000 करोड़ रुपये की पूंजी लगाई जा चुकी थी. ऑपरेशनल लॉस, केपेक्स और इंटरेस्ट के चलते 4 साल की अवधि में इस रकम में 64,000 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है.

ratan tata

साइरस मिस्त्री ने रतन टाटा पर लगाए कई आरोप.

मिस्त्री ने यह भी आरोप लगाया कि टाटा संस के डायरेक्टर्स अब भी रतन टाटा से निर्देश लेते हैं.

2012 के उनके इंटरव्यू से पता चलता है कि चंद्रशेखरन छह भाई-बहनों में एक हैं. दसवीं तक वह एक तमिल-मीडियम स्कूल में पढ़े. गणित में बेजोड़ चंद्रा को पढ़ाई के लिए दूसरे शहर जाने पर होटल में रहना पड़ा. अपनी अब तक की संरक्षित जिंदगी के लिहाज से यह एक बड़ा बदलाव था.

टाटा संस की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पर पहुंचने के बाद उन्हें टाटा ट्रस्ट और ग्रुप की अन्य कंपनियों के बीच अस्पष्ट रिश्तों को भी संभालना पड़ेगा. साथ ही उन्हें घाटे में चल रही कई कंपनियों और वेंचरों पर भी फैसले लेने होंगे.

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