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नए चीफ जस्टिस गोगोई के सामने आधार और एनआरसी जैसे मामलों की चुनौती

आम चुनावों के पहले राजनेताओं द्वारा एनआरसी के दंगल में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को तय करना, जस्टिस गोगोई के लिए सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है.

Updated On: Oct 03, 2018 08:23 AM IST

Virag Gupta Virag Gupta

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नए चीफ जस्टिस गोगोई के सामने आधार और एनआरसी जैसे मामलों की चुनौती

सुप्रीम कोर्ट के 46वें चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के 13 महीनों के कार्यकाल के दौर में अगले प्रधानमंत्री का फैसला होगा. कई महत्वपूर्ण फैसलों के जनक जस्टिस गोगोई को जनवरी 2018 की ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस के लिए ज्यादा जाना जाता हैं. रामनाथ गोयनका अवार्ड समारोह में व्याख्यान और पुराने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की विदाई के समय दिये गये भाषण के माध्यम से जस्टिस गोगोई ने नई कार्य संस्कृति और न्यायिक क्रांति के संकेत दिये हैं. संविधान के तहत न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र निर्धारित है तो फिर जस्टिस गोगोई इन बदलावों को कैसे लायेंगे? क्या होंगी उनके सम्मुख चुनौतियां?

कॉलेजियम में सुधार और नया एमओपी

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने 2015 में दिए गए ऐतिहासिक फैसले से मोदी सरकार द्वारा पारित एनजेएसी कानून को रद्द करते हुए कॉलेजियम सिस्टम को बहाल कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जज मिल कर देश भर में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की अनुशंसा करते हैं, जिसे कॉलेजियम प्रणाली कहा जाता है.

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कॉलेजियम की सामंती व्यवस्था में भाई-भतीजावाद से अंकल जजों को बढ़ावा मिलना, संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है. जस्टिस गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू के खिलाफ मानहानि का नोटिस जारी करके न्यायिक अनुशासन की महत्ता को स्थापित किया था.

कॉलेजियम में सुधार और पारदर्शिता के लिए मेमोरेन्डम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) में बदलाव पर पिछले तीन वर्षों से सरकार और सुप्रीम कोर्ट में रस्साकशी चल रही है. एमओपी में गतिरोध की वजह से देश भर के उच्च न्यायालयों में जजों के 40 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 20 फीसदी पदों पर नियुक्ति नहीं हो पा रही है. नए चीफ जस्टिस गोगोई इस बारे में सरकार के साथ सहमति का पुल कैसे बनाएंगे?

करोड़ों पेंडिंग मामले और लाखों विचाराधीन कैदी

देश भर की अदालतों में 3 करोड़ पेंडिंग मामलों की तुलना में सुप्रीम कोर्ट में लम्बित 55 हजार मामले नगण्य ही माने जाएंगे. नालसा के कार्यवाहक चेयरमैन के नाते जस्टिस गोगोई के प्रयासों की वजह से 43 लाख मामलों का निष्पादन हुआ है. लेकिन निचली अदालतों पर राज्यों की हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार होता है तो फिर पेंडिंग मामलों को जल्द निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रभावी प्रक्रिया कैसे निर्धारित होगी? जस्टिस गोगोई ने कहा है कि फौजदारी मामलों में तयशुदा सजा से ज्यादा अवधि के लिए निर्दोष लोगों को जेल में रहना पड़ता है.

सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेशों के बावजूद, देश की जेलों में लाखों विचाराधीन कैदियों की रिहाई का मामला जस्टिस गोगोई के लिए एक बड़ी चुनौती है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनेक फैसलों के माध्यम से समलैंगिकता और व्याभिचार जैसे मामलों में पुराने कानूनों को रद्द किया जा रहा है. दूसरी ओर 21वीं शताब्दी के डिजिटल इंडिया में अभी भी अंग्रेजों के दौर की थकाऊ अदालती प्रक्रिया चल रही है. सुप्रीम कोर्ट के नये चीफ जस्टिस अदालती प्रक्रिया और कानूनों को भी आधुनिक और सरल कैसे बनायेंगे?

एक देश एक चुनाव के दौर में नेताओं की चुनौती

जस्टिस गोगोई के पिता कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री थे, इसके बावजूद वे राजनेताओं के विरुद्ध कानून का सख्ती से पालन कराते हैं. जस्टिस गोगोई की बेंच ने नेताओं पर चल रहे आपराधिक मुकदमों की तेजी से सुनवाई के लिए विशेष अदालतें बनाने का निर्देश दिया था.

वे उस बेंच का भी हिस्सा थे जिसने 2013 में फैसला दिया था कि आपराधिक पृष्ठभूमि का पूरा ब्यौरा दिये बगैर नेता चुनाव नहीं लड़ सकते. सरकारी खर्च पर विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीर छापने से रोकने के लिए आदेश देने के अलावा उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्रियों को दिए गए सरकारी बंगलों के आवंटन को रद्द कर दिया था. उन्होंने लोकपाल की नियुक्ति में सरकार की कोताही पर गंभीर एतराज जताया था. आने वाले चुनावों के दौर में नेताओं की अनैतिकता और गैर कानूनी कामों पर अंकुश लगाना, नए चीफ जस्टिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.

आधार और एनआरसी की बड़ी चुनौती

NRC Draft

एनआरसी की प्रतीकात्मक तस्वीर

जस्टिस गोगोई के फैसले के अनुसार असम में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनआरसी) का नियम लागू हुआ. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में लंबी प्रक्रिया के बाद बनी लिस्ट के अनुसार असम में 40 लाख लोग अपनी नागरिकता के दावों को साबित नहीं कर पाए. जस्टिस गोगोई की बेंच ने दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए और अधिक समय देते हुए दस्तावेजों के बारे में नये दिशा-निर्देश जारी किए हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने आधार को यूनीक मानते हुए इसे घुसपैठियों को देने से इंकार किया है. फैसले के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने रोहिंग्या और अन्य शरणार्थियों के बायोमैट्रिक्स इकट्ठा करने के लिए राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं.

देश में 122 करोड़ लोगों को आधार नंबर मिल चुका है, जिनमें लाखों घुसपैठिए भी शामिल हो सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद घुसपैठियों से आधार नम्बर वापस लेने की प्रक्रिया यदि शुरू हुई तो देश भर में पिछले दरवाजे से एनआरसी लागू हो सकती है.

आधार के फैसले पर पुनर्विचार या एनआरसी संबंधित विवाद के मामले नए चीफ जस्टिस गोगोई के पास ही सुनवाई के लिए जा सकते हैं. आम चुनावों के पहले राजनेताओं द्वारा एनआरसी के दंगल में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को तय करना, जस्टिस गोगोई के लिए सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं )

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