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CBI VS CBI: आलोक वर्मा के लिए बढ़ सकती है मुश्किल, आगे और जांच की संभावना

सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को अपने ऊपर लगाए गए गंभीर आरोपों में आगे और जांच का सामना करना पड़ सकता है

Updated On: Nov 17, 2018 03:15 PM IST

Yatish Yadav

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CBI VS CBI: आलोक वर्मा के लिए बढ़ सकती है मुश्किल, आगे और जांच की संभावना

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक आलोक वर्मा को अपने ऊपर लगाए गए गंभीर आरोपों में आगे और जांच का सामना करना पड़ सकता है. वर्मा पर ये आरोप उनके डिप्टी और सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने लगाए हैं. फ़र्स्टपोस्ट ने इस बाबत 12 नवंबर को अपनी रिपोर्ट में लिखा था.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार के अपने आदेश में कहा कि आरोपों के मद्देनजर कुछ बिंदुओं पर मसला पलड़ा वर्मा के पक्ष में झुका दिखता है, जबकि कुछ नुक्तों पर नहीं और जैसा कि केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की रिपोर्ट से जाहिर होता है कुछ आरोपों के पेशेनजर मसला वर्मा के बहुत विपरीत जान पड़ता है. वर्मा के बारे में कोई भी फैसला लेने से पहले, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग के रिपोर्ट की एक कॉपी उनके (वर्मा) वकील को दी जाए और याची (वर्मा) सोमवार को दोपहर 1 बजे तक अपने जवाब सीलबंद करके अदालत को सौंप दें.

कुछ सवालों के अलग से विस्तृत जांच की जरूरत

फ़र्स्टपोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि केंद्रीय सतर्कता आयोग ने अपनी जांच में वर्मा को क्लीन चिट नहीं दी है और कुछ सवाल उठाए हैं, जिनके लिए अलग से विस्तृत जांच की जरूरत है.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि 'कोई भी फैसला लेने से पहले हमारी राय यह बनी है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट याची आलोक वर्मा को देखने के लिए दी जाए. आलोक वर्मा के लिए यह विकल्प खुला रखा गया है कि वो चाहें तो अपने सीलबंद जवाब अदालत को सौंपें.'

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इससे पहले, 23 अक्टूबर के रोज आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजते हुए केंद्रीय सतर्कता आयोग ने 8 पन्ने के एक नोट (018/DPT/013-Vig-IX) में कहा था कि कुछ आरोपों के पेशेनजर जिनमें दो अपनी प्रकृति में गंभीर किस्म के हैं- जांच की तत्काल जरूरत है-

1. एक आरोप यह है कि मोईन कुरैशी मामले में आगे और ज्यादा जांच/कार्रवाई से बचने के लिए सतीश बाबू ने सीबीआई डायरेक्टर को 2 करोड़ की रिश्वत दी.

2. आरोप है कि आईआरसीटीसी मामले में मुख्य संदिग्ध राकेश सक्सेना को बाहर रखने के लिए सीबीआई के डायरेक्टर ने अनुचित दखल दी और कोशिश की. यह भी आरोप है कि सीबीआई के डायरेक्टर ने ज्वायंट डायरेक्टर विनीत विनायक को लालू यादव के आवास की तलाशी ना लेने के बाबत निर्देश दिए थे. कहा गया है कि बाद में मामले से जुड़े अधिकारियों ने अदालत के एक आदेश की याद दिलाकर निदेशक वर्मा को राजी किया. फिर आलोक वर्मा ने एकदम आखिरी लम्हे में विनीत विनायक को अनुमति दी कि वो प्राइवेट एयरलाइन की सेवा लेकर जाएं और लालू यादव के आवास पर तलाशी लें.

14 सितंबर तक मिला था वक्त

आरोप के स्रोत और गंभीरता को देखते हुए आयोग ने सीवीसी एक्ट 2003 की धारा 11 के तहत 11 सितंबर 2018 को डायरेक्टर वर्मा को तीन अलग-अलग नोटिस जारी किए, जिसमें कहा गया कि वो 14 सितंबर 2018 तक जरूरी दस्तावेज और फाइल समर्थ अधिकारियों के मार्फत सीवीसी में जमा करवाएं.

सीबीआई ने 14 सितंबर 2018 को केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को चिट्ठी लिखकर अनुरोध किया कि आयोग में फाइल जमा करवाने के लिए कुछ और समय दिया जाए. सीवीसी ने अनुरोध पर विचार करते हुए मामले में 18 सितंबर 2018 तक का वक्त दिया. सीबीआई ने 18 सितंबर को सीवीसी को चिट्ठी लिखकर बताया कि आलोक वर्मा के खिलाफ स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना ने जो आरोप लगाए हैं उन्हें सीवीसी गंभीरता से ना ले क्योंकि अस्थाना की ईमानदारी खुद ही शक के घेरे में है.

सीवीसी की चिट्ठी के मुताबिक, कहा गया था कि 'सीबीआई को कम से कम दर्जन भर मामले में उनके (अस्थाना) आपराधिक कृत्य के सबूत हाथ लगे हैं और अधिकारी (अस्थाना) को पता है कि ब्यूरो के पास उसके आपराधिक दुराचार के सबूत हैं. सीबीआई ने अनुरोध किया कि अस्थाना के आरोपों को एक दागी अधिकारी की बेचैनी के आलम में हाथ-पांव मारने की ऐसी कोशिश के रूप में देखा जाए जिसके जरिए वो सीबीआई में अलग-अलग ओहदों पर बैठे अधिकारियों पर धौंस जमाना चाहता है. ब्यूरो ने आयोग से एक निवेदन यह भी किया कि ऐसे आरोपों पर ध्यान ना दिया जाए. सीबीआई ने यह भी कहा था कि इन तथ्यों के बावजूद सीवीसी अगर मामले में कदम आगे बढ़ाना चाहती है या फिर फाइलों की जांच करने की बात कहती है तो सीबीआई बिना किसी पूर्वाग्रह के आयोग को फाइलें यथासंभव जल्दी से जल्दी सौंपने की कोशिश करेगी. सीबीआई ने शिकायत करने वाले व्यक्ति की पहचान भी जानना चाहा था.'

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सीबीसी की पहचान नहीं आरोपों के सत्यापन की बात मानी थी सीवीसी ने

इसके बाद आयोग ने एक दफे फिर से सीबीआई के अनुरोध पर विचार किया और स्पष्ट किया कि शिकायत करने वाले की पहचान नहीं बताई जा सकती. आयोग ने यह भी कहा कि सभी पहलुओं पर गौर करने के बाद यही लगता है कि मामले में जो बातें कही गई हैं उनका सत्यापन करना शिकायत करने वाले की पहचान बताने की तुलना में कहीं ज्यादा अहम है. आयोग ने आखिरकार पहले जारी की गई नोटिस की बातों को दोहराया और कहा कि सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा संबंधित दस्तावेज और फाइलें 20 सितंबर 2018 को दोपहर 2 बजे तक जमा कर दें.

सीवीसी ने 23 अक्टूबर 2018 के आदेश में कहा कि 'सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ लगाए गए आरोप एक गोपनीय अभिलेख (नोट) के रूप में चयन समिति की बैठक में सौंपे गए. चयन समिति की बैठक 21 अक्टूबर, 2017 को हुई थी. सीबीआई डायरेक्टर से इस नोट का हवाला देते हुए 9 सितंबर 2017 को आयोग ने रिपोर्ट मांगी. कई रिमाइंडर भेजने के बावजूद आयोग को अभी तक रिपोर्ट नहीं मिली है. सीबीआई से रिपोर्ट मिलने के बाद ही मामले में किसी तार्किक अंजाम तक पहुंचना संभव है. इसके अतिरिक्त, आयोग ने 25 सितंबर 2018 की चिट्ठी में इच्छा जाहिर की थी कि 21 सितंबर 2017 के गोपनीय अभिलेख के सिलसिले में अभी तक हुई जांच और उससे निकलने वाले निष्कर्षों के बाबत सीबीआई के डायरेक्टर एक अंतरिम रिपोर्ट पेश करें.'

सीबीआई ने 19 सितंबर को सीवीसी को सूचना दी कि मोईन कुरैशी से बावस्ता दस्तावेज संबंधित शाखाओं से जुटा लिए गए हैं और उन्हें कालक्रम में सुपुर्द कर दिया जाएगा. इसके बाद सीवीसी ने सीबीआई से कहा कि वो 24 सितंबर 2018 को मूल नोट शीट और रिकार्ड्स सौंप दे. एजेंसी ने सीवीसी को 24 सितंबर को सूचना दी कि रिकार्ड्स कई हजार पन्नों में हैं और फाइल कई जगहों मसलन शाखाओं, मालखाना और अदालतों में रखे हुए हैं. इन जगहों से फाइल्स मांगे गए हैं और उन्हें 3 हफ्ते के दरम्यान आयोग को सौंप दिया जाएगा. सीवीसी ने अनुरोध पर विचार किया और सीबीआई से कहा कि वो अपने हेडक्वार्टर्स (मुख्यालय) में रखे गए नोट शीट फाइल्स आयोग को 29 सितंबर 2018 तक पेश करे.

इस दरम्यान आगे-पीछे के कई संवाद में स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना ने कई बार मौखिक और लिखित रूप से आरोप लगाया कि आलोक वर्मा उनके प्रति पूर्वाग्रह से भरे हुए हैं और उन्हें कुछ मामलों में फंसाना चाहते हैं. सीवीसी ने 25 सितंबर, 2018 को वर्मा को एक और चिट्ठी भेजी कि अस्थाना के खिलाफ हुई जांच की रिपोर्ट दस माह बीत जाने के बावजूद अभी तक सौंपी नहीं गई है और कहा कि अभी तक हुई जांच के आधार पर तैयार की गई अंतरिम रिपोर्ट 3 अक्टूबर तक जमा की जाए. इसके बाद जवाब ना मिलने पर आलोक वर्मा को एक और चिट्ठी 3 अक्टूबर को भेजी गई. इसमें अनुरोध किया गया कि वो 4 अक्टूबर को केंद्रीय सतर्कता आयोग के साथ बैठक में भाग लें जिसमें अस्थाना के बाबत चर्चा की जानी है. लेकिन सीबीआई के डायरेक्टर बैठक में नहीं आए.

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इसके बाद सीवीसी ने 15 अक्टूबर को फिर एक चिट्ठी लिखी. अस्थाना ने जो आशंका जताई थी उसका इस चिट्ठी में जिक्र किया गया. इसी बीच वर्मा और अस्थाना के बीच विवाद ने तूल पकड़ लिया और सीबीआई ने अस्थाना और अन्य के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज किया. आरोप लगा कि अधिकारी ने मोइन कुरैशी मामले में जांच को नाकाम करने के लिए रिश्वत ली है. अस्थाना की टोली के लोगों ने 22 अक्टूबर को जवाबी हमला बोला और आरोप लगाया कि सीबीआई के डायरेक्टर को 2 करोड़ रुपए की रिश्वत दी गई है. सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी ने सीवीसी को एक अभिलेख (नोट) सौंपा और इसके तुरंत बाद आधी रात को हुए हंगामे में वर्मा और अस्थाना को सरकार ने छुट्टी पर भेज दिया.

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