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CBI Vs CBI: सुप्रीम कोर्ट में विनीत नारायण जजमेंट CBI डायरेक्टर आलोक वर्मा को कितना फायदा पहुंचाएगा?

विनीत नारायण की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए कई सुझाव दिए. विनीत नारायण जजमेंट के बाद ही साल 2003 में सीबीआई को सीवीसी के दायरे में लाया गया.

Updated On: Nov 29, 2018 10:14 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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CBI Vs CBI: सुप्रीम कोर्ट में विनीत नारायण जजमेंट CBI डायरेक्टर आलोक वर्मा को कितना फायदा पहुंचाएगा?

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की याचिका पर सुनवाई की. तीन जजों की पीठ ने पहली बार इस केस के लिए पूरे दिन का वक्त निकाला. पिछली तीन सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सभी पक्षों को सिर्फ फटकार ही लगाती रही थी, लेकिन गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के तीनों जजों ने सभी पक्षों की दलीलों को बहुत ही ध्यान से सुना.

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में अपने अधिकार छीनने और जबरन छुट्टी पर भेजने के सरकार के फैसले को चुनौती दे रखी है. देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है.

गुरुवार को सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा के वकील फली एस नरीमन ने बहस की शुरुआत करते हुए कहा, ‘आलोक वर्मा की नियुक्ति एक फरवरी 2017 को हुई थी और कानून के अनुसार सीबीआई का कार्यकाल दो साल का निश्चित होता है. इस दो साल में सीबीआई डायरेक्टर का तबादला नहीं किया जा सकता है और न ही छुट्टी पर भेजा जा सकता है?’

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

नरीमन ने कहा कि केंद्रीय सतर्कता आयोग(सीवीसी) के पास सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को अवकाश पर भेजने की सिफारिश करने का आदेश देने का कोई अधिकार ही नहीं है. नरीमन ने विनीत नारायण फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने वर्मा के अधिकारों और कर्तव्यों से वंचित किया जा रहा है.’

बता दें कि जैन हवाला केस के बाद ही सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल के लिए निश्चित किया गया था. इसलिए कानून के जानकार आलोक वर्मा को दो साल के कार्यकाल से पहले ही छुट्टी पर भेजने के फैसले पर सवाल खड़े कर रहे हैं. 1993 में हवाला फंडिंग मामले में विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी. ये मामला विनीत नारायण बनाम भारत सरकार के जजमेंट के नाम से जाना जाता है.

विनीत नारायण की याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की कार्यप्रणाली में सुधार करने के लिए कई सुझाव दिए. विनीत नारायण जजमेंट के बाद ही साल 2003 में सीबीआई को सीवीसी के दायरे में लाया गया. सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बाद ही सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल के लिए निश्चित किया गया.

cvc

गुरुवार को आलोक वर्मा के वकील फली एस नरीमन ने कहा कि सीबीआई निदेशक को अपने पद पर कम से कम तय सीमा तक रहने देना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि जिस चयन समिति ने उनकी नियुक्ति की है, उसी के जरिए ही आलोक वर्मा के ट्रांसफर को तय करना चाहिए.

सुनवाई के दौरान फली एस नरीमन ने कहा कि 2014 से ही सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की कमिटी बनी है. उन्होंने कहा कि इस कमिटी की सहमति के बगैर सीबीआई चीफ का ट्रांसफर नहीं किया जा सकता.

फली एस नरीमन ने कोर्ट में कहा कि छुट्टी पर भेजने का फैसला भी कमिटी के सहमति के बगैर नहीं लिया जा सकता. उन्होंने कहा कि यूपीएससी चीफ को हटाने के लिए एक व्यवस्था है लेकिन सीबीआई डायरेक्टर के लिए यह नहीं है. कोर्ट की नजर भी इस मामले पर नहीं गई है.

ये सब सुनने के बाद जस्टिस केएम जोसेफ ने नरीमन से पूछा कि मान लीजिए, सीबीआई चीफ रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़े गए तो क्या होगा, उन पर कैसे कार्रवाई होगी? आपने कहा कि कमिटी से पहले सहमति लेनी होगी लेकिन क्या इस स्थिति में वह व्यक्ति अपने पद पर एक मिनट के लिए भी बना रह सकता है?

Alok Verma CBI

बता दें कि गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को बारी-बारी से मौका देते हुए सवाल-जवाब भी खूब की.आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह सुनवाई अगले बुधवार तक के लिए स्थगित कर दी.

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई के कई मसलों पर एक साथ सुनवाई हुई. देश के जाने माने वकील प्रशांत भूषण के एनजीओ कॉमन कॉज के लिए अपना पक्ष रख रहे दुष्यंत दवे जैसे ही राकेश अस्थाना के खिलाफ कुछ बोलने गए, लेकिन सीजेआई रंजन गोगोई ने उन्हें रोक दिया. इसके बाद मामले की सुनवाई कर रही बेंच लंच ब्रेक पर चली गई.

लंच के बाद एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. मल्लिकार्जुन खड़गे की तरफ से जिरह करते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि नियुक्ति की शक्ति के साथ बर्खास्तगती और निलंबन की शक्ति भी समिति को होगी. उन्होंने पूछा कि जो भी आलोक वर्मा के साथ हुआ, वो सेलेक्शन कमिटी के पास जाना चाहिए था. कपिल सिब्बल ने कहा कि यह कल को कैग और सीवीसी के साथ भी हो सकता है, क्योंकि ऐसा ही प्रोविजन उनके साथ भी है.

kapil sibbal

कपिल सिब्बल का जवाब देते हुए देश के अटॉर्नी जनरल ने कहा, 'प्राथमिकता सीबीआई में लोगों के विश्वास को जिंदा रखना है. इसके दोनों वरिष्ठ अधिकारी आपस में लड़ रहे हैं. लोगों में सीबीआई की छवि नकारात्मक हुई है और इसलिए सरकार ने बड़े सार्वजनिक हित में हस्तक्षेप करने का फैसला किया ताकि सीबीआई में लोगों का विश्वास न खो सके.'

बता दें कि पिछले दिनों ही सीबीआई के दो टॉप लेवल के अधिकारियों की बीच लड़ाई में चौंका देने वाला खुलासा सामने आया था. केंद्र सरकार को आशंका है कि गैरकानूनी तरीके से कई संवेदनशील नंबरों को सर्विलांस पर रखा गया था. यहां तक कि उनके कागजातों के आधार पर सिम कार्ड हासिल करने और मोबाइल नंबरों की क्लोनिंग की भी आशंका जताई गई थी.

इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात है कि जिन नंबरों को सर्विलांस पर रखे जाने का अंदेशा है, उनमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोवाल और सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के नाम भी शामिल हैं.

केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर कहा था किसी को फंसाने के लिए यह एक सुनियोजित साजिश है. आप किसी को भी फोन कॉल के आधार पर गिरफ्तार कर सकते हैं. जब तक ट्रायल शुरू नहीं होता, तब तक वो खुद को निर्दोष भी साबित नहीं कर सकता है.

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