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CBI विवाद: सबूतों में हेरफेर के नए दावे, एजेंसी की इज्जत बचाने के लिए सरकार को उतरना होगा

किसी केस की पूरी न्यायिक प्रक्रिया में एक कमजोर पहलू भी होता है. यानी अगर सबूतों से छेड़छाड़ की जाए, तो पूरा मामला बड़ी उथल-पुथल की वजह बन सकता है

Updated On: Nov 01, 2018 07:07 PM IST

Yatish Yadav

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CBI विवाद: सबूतों में हेरफेर के नए दावे, एजेंसी की इज्जत बचाने के लिए सरकार को उतरना होगा
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किसी आपराधिक मामले की जांच में खोजबीन और जब्ती (सर्च एंड सीजर) से ज्यादा वास्तविक, मूर्त और अहम कोई और बात नहीं होती है. अगर किसी केस में इकट्ठा किए गए सभी सबूतों से किसी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और उन सबूतों की मुकम्मल जांच भी की जा चुकी हो, तो भी न्यायिक प्रक्रिया उस केस के भाग्य या फैसले को बदल सकती है.

मतलब साफ है कि, किसी केस की पूरी न्यायिक प्रक्रिया में एक कमजोर पहलू भी होता है. यानी अगर सबूतों से छेड़छाड़ की जाए, तो पूरा मामला बड़ी उथल-पुथल की वजह बन सकता है. फिलहाल सीबीआई के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है. सीबीआई के दो सबसे बड़े अफसर आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना आमने-सामने हैं. जिसके चलते देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी यानी सीबीआई दो गुटों में बंटी हुई नजर आ रही है. आलोक वर्मा गुट और राकेश अस्थाना गुट के समर्थक एक-दूसरे पर डेटा में हेरफेर करने, सबूतों से छेड़छाड़ करने और अहम रिकॉर्ड्स को नष्ट करने के आरोप लगा रहे हैं.

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राकेश अस्थाना के बेहद करीबी और विश्वासी सीबीआई डीएसपी देवेंद्र कुमार ने आलोक वर्मा पर सबूतों से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया है. देवेंद्र कुमार का कहना है कि, आलोक वर्मा के करीबी सीबीआई अफसरों ने 20 अक्टूबर को जब उनके दफ्तर और घर पर छापा मारा था, तब उनके कुल 8 मोबाइल फोन जब्त किए गए थे. लेकिन जब्ती के कागजों (सीजर मेमो) में दो दिनों तक उनके पास से महज एक ही मोबाइल फोन की जब्ती दिखाई गई. देवेंद्र कुमार ने अपने मोबाइल फोनों के साथ छेड़छाड़ की आशंका जताई है. देवेंद्र कुमार का आरोप है कि, आलोक वर्मा के करीबी सीबीआई अफसरों ने दो दिनों तक उनके 7 मोबाइल सर्च लिस्ट से इसलिए गायब रखे, ताकि उनसे मनचाही छेड़छाड़ की जा सके और उनमें झूठे सबूत डाले जा सकें.

डीएसपी देवेंद्र कुमार

डीएसपी देवेंद्र कुमार

देवेंद्र कुमार द्वारा लगाए गए सबूत से छेड़छाड़ के आरोपों पर नजर डालते हैं

देवेंद्र कुमार के बाकी के यह 7 मोबाइल फोन जांच अफसरों ने 22 अक्टूबर को सीबीआई की टेक्निकल यूनिट को सौंपे. बता दें कि, सीबीआई के डीएसपी देवेंद्र कुमार को मोइन कुरैशी मामले में रिश्वतखोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. गिरफ्तारी के बाद एजेंसी ने उन्हें पद से निलंबित भी कर दिया था. फिलहाल देवेंद्र कुमार 14 दिन की न्यायिक हिरासत पर थे. लेकिन बुधवार को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ देवेंद्र कुमार को जमानत दे दी. साथ ही कोर्ट ने यह भी हिदायत दी कि वे जांच में पूरा सहयोग करेंगे.

दूसरी तरफ आलोक वर्मा के करीबी और विश्वासी डीएसपी अजय कुमार बस्सी ने भी सबूतों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया है. बस्सी का कहना है कि, जांच के लिए एजेंसी द्वारा नियुक्त नए अफसर पुख्ता सबूतों और अहम रिकॉर्ड्स को नष्ट कर सकते हैं, ताकि सतीश बाबू सना के रिश्वतखोरी के आरोपों से राकेश अस्थाना को बचाया जा सके. बता दें कि, सरकार के आदेश पर आधी रात को एम नागेश्वर राव की बतौर सीबीआई अंतरिम निदेशक पद पर नियुक्ति के बाद अजय कुमार बस्सी का पोर्ट ब्लेयर में ट्रांसफर कर दिया गया था. जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की है.

आइए अब देवेंद्र कुमार द्वारा लगाए गए सबूत से छेड़छाड़ के आरोपों पर नजर डालते हैं. फ़र्स्टपोस्ट ने सीबीआई की AC III यूनिट द्वारा 20 अक्टूबर की खोजबीन और जब्ती की सूची की समीक्षा की है. इस सर्च एंड सीजर लिस्ट में उल्लेख किया गया है कि, देवेंद्र कुमार के 'एक' मोबाइल फोन को जब्त किया गया था और इसे एक सीलबंद लिफाफे में रखा गया था.

देवेंद्र कुमार के दफ्तर और घर से सीबीआई द्वारा जब्त की गईं सभी चीजों का विवरण देने के लिए 26 अक्टूबर को एक और मेमो तैयार किया गया था. इस मेमो में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि जब्त किया गया एक मोबाइल फोन इंस्पेक्टर एसके झा को 20 अक्टूबर को रात लगभग 8 बजे सौंप दिया गया था, जबकि आईपैड समेत जब्त की गईं अन्य चीजें 22 अक्टूबर को सौंपी गईं थीं.

सर्च एंड सीजर मेमो के मुताबिक, ‘लिस्ट में क्रम संख्या 1 पर लिखित मोबाइल फोन (मोटोरोला, मॉडल XT1068, डुअल सिम मोबाइल) को सीबीआई की AC III यूनिट के इंस्पेक्टर दिनेश कुमार ने 20 अक्टूबर, 2018 को रात लगभग 8 बजे मुझे सौंपा था. जबकि बाकी की चीजें इंस्पेक्टर दिनेश कुमार ने मुझे 22 अक्टूबर, 2018 को शाम करीब 5 बजे सौंपी थी. बाकी की चीजों की सुपुर्दगी में दो दिन की देरी की वजह उनसे जरूरी डेटा निकालने में लगा वक्त बताया गया था. मुझे जो भी चीजें सौंपी गई थी वे कागज के लिफाफे में रखी थीं, लेकिन वे सीलबंद नहीं थीं.

हालांकि सभी लिफाफों को सेलो टेप के जरिए बंद किया गया था. क्रम संख्या 2 और 4 पर लिखी हुई सामग्री को मैंने लिफाफे से निकाला था. ऐसा मैंने उन चीजों में सुरक्षित डेटा को बचाने और उसे वापस पाने के लिए किया था. बाकी चीजों के लिफाफे भी इसलिए खोले गए थे, ताकि उन चीजों के विशेष ब्यौरे का मिलान किया जा सके. ऐसा इसलिए क्योंकि सुपुर्दगी के वक्त इन चीजों को तत्काल शामिल किया गया था.’

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि, यह मेमो 23 अक्टूबर को सीबीआई मुख्यालय में आधी रात को हुई उथल-पुथल के बाद तैयार किया गया था. दो पन्नों के इस मेमो में 26 अक्टूबर की तारीख दर्ज है. यह मेमो देवेंद्र कुमार के उन मोबाइल फोनों का रहस्य उजागर करता है, जो 48 घंटों से अधिक समय तक गायब रहे थे और फिर अचानक कागज के लिफाफे में नजर आए थे. सीबीआई की सर्च एंड सीजर लिस्ट में दो आईफोन, 16 जीबी मेमोरी कार्ड वाला मोटोरोला का एक और मोबाइल फोन, दो एक्सटर्नल यूएसबी हार्ड ड्राइव, एक सैमसंग का मोबाइल फोन, एक जी फाइव मोबाइल फोन, एक नोकिया का मोबाइल फोन और एक आईपैड शामिल हैं.

देवेंद्र कुमार ने आरोप लगाया है कि, सर्च एंड सीजर मेमो में अन्य चीजों का दो दिन तक इसलिए उल्लेख नहीं किया गया था, ताकि नजर बचाकर उनके साथ छेड़छाड़ की जा सके और उनमें झूठे सबूत डाले जा सकें. देवेंद्र कुमार का मानना है कि, ऐसा उन्हें रिश्वतखोरी के केस में फंसाने की साजिश के तहत किया गया. दिलचस्प बात यह है कि, मेमो में उन दो रहस्यमय दिनों का कोई जिक्र तक नहीं है. साथ ही मेमो में उन अफसरों का भी कोई उल्लेख नहीं किया गया है, जिनके पास दो दिन तक जब्ती वाली चीजें रहीं.

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दूसरी तरफ, बस्सी ने अपने ट्रांसफर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. बस्सी ने न सिर्फ अपना ट्रांसफर रुकवाने की मांग की है, बल्कि रिश्वतखोरी मामले की निष्पक्ष जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन की भी सुप्रीम कोर्ट से गुजारिश की है. बस्सी का दावा है कि, उन्हें 28 सितंबर 2018 को अस्थाना और देवेंद्र के खिलाफ रिश्वतखोरी के आरोपों की जांच करने वाली यूनिट में शामिल किया गया था.

उन्होंने वहां महज तीन हफ्ते ही बिताए थे. फिर भी, बस्सी ने बहुत कम वक्त में अस्थाना और उनकी टीम के सदस्यों की मोइन कुरैशी और अन्य आरोपियों के साथ मिलीभगत और रिश्वतखोरी के सबूत बड़ी तादाद में इकट्ठा कर लिए थे. बता दें कि, 1999 में सीबीआई में शामिल होने से पहले बस्सी करीब एक दशक तक घरेलू खुफिया एजेंसी यानी इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) में काम कर चुके थे.

हालांकि, बस्सी ने दावा किया है कि, इस मामले से संबंधित सभी अहम सबूत उन्होंने नव नियुक्त डीएसपी सतीश डागर को सौंप दिए हैं. लेकिन बस्सी ने सतीश डागर की विश्वसनीयता पर भी शक जताया है. बस्सी ने आरोप लगाया है कि, अस्थाना को क्लीन चिट देने के लिए डागर को निर्देश दिए गए हैं, जबकि ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले उनके जैसे बेदाग अफसर को फंसाया जा रहा है.

AK Bassi

सीबीआई स्कैंडल में बस्सी का ट्विस्ट

बस्सी साल 2006 में स्थाई रूप से सीबीआई में शामिल हुए थे. वह देश के कई अहम मामलों की जांच का जिम्मा संभाल चुके हैं. इनमें तेलगी फर्जी स्टाम्प पेपर केस, रायन इंटरनेशनल स्कूल केस और कुख्यात वन्यजीव शिकारी (पोचर) संसार चंद का केस भी शामिल है. बस्सी ने आरोप लगाया है कि, मामले की पूर्ववर्ती जांच से पता चलता है कि, शिकायतकर्ता सतीश बाबू सना द्वारा राकेश अस्थाना को 2.95 करोड़ रुपए बतौर रिश्वत दिए गए. सतीश बाबू ने यह रकम पांच किस्तों में अपने मध्यस्थ मनोज प्रसाद और सोमेश प्रसाद के जरिए अस्थाना को पहुंचाई. बस्सी का दावा है कि, उन्होंने 15 अक्टूबर को अस्थाना, देवेंद्र और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद केस अपने हाथों में लिया था. जिसके बाद आगे की जांच में रॉ (RAW) के विशेष सचिव सामंत गोयल का नाम इस मामले में उजागर हुआ था.

बस्सी और उनकी टीम ने इस मामले में कथित मध्यस्थ मनोज को 17 अक्टूबर को गिरफ्तार कर लिया था. बस्सी ने दावा किया कि, मनोज ने दुबई निवासी अपने भाई सोमेश के साथ हुए व्हाट्सऐप मैसेज के आदान-प्रदान को डिलीट नहीं किया था. दोनों भाइयों की उसी व्हाट्सऐप चैट से सीबीआई में तूफान खड़ा करने वाले कथित भ्रष्टाचार की पोल खुली थी. मनोज और सोमेश के बीच हुई व्हाट्सऐप चैट में 3 जनवरी 2018 का एक संदेश है, जिसमें सोमेश कथित रूप से मनोज से सना पर पेमेंट का दबाव डालने के लिए कह रहा है. मैसेज में सोमेश ने लिखा है कि, सना को बता दो कि वह 'उनके साथ पंगा न ले... वे बहुत शक्तिशाली लोग हैं.'

दिलचस्प बात यह है कि, इनमें से किसी भी व्हाट्सऐप मैसेज में अस्थाना या देवेंद्र के नाम का जिक्र नहीं किया गया है. हालांकि, बस्सी का दावा है कि जांच के दौरान सोमेश का मोबाइल फोन निगरानी (सर्विलांस) पर रखा गया था, जिससे जांचकर्ताओं को और सबूत इकट्ठा करने में खासी मदद मिली. बस्सी ने कहा कि, उन्होंने संदिग्धों की कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड्स (सीडीआर) का विश्लेषण किया था. जिससे पता चला कि, 16 अक्टूबर 2018 को देर रात रात मनोज की गिरफ्तारी की खबर फैलने के तुरंत बाद सोमेश ने सामंत गोयल को फोन किया था. जिसके बदले में सामंत गोयल ने राकेश अस्थाना को कॉल की थी.

राकेश अस्थाना

राकेश अस्थाना

देवेंद्र कुमार ने सीआरपीसी के सेक्शन 161 के तहत सतीश बाबू सना का झूठा बयान दर्ज किया

बस्सी का आरोप है कि, 16 अक्टूबर को सोमेश और गोयल ने एक दूसरे को कॉल की थी. दोनों के बीच लगभग 10 मिनट तक फोन पर बातचीत हुई थी. बस्सी का यह भी आरोप है कि, 17 अक्टूबर की सुबह गोयल ने अस्थाना को दो बार कॉल की थी.

बस्सी के मुताबिक, 'गोयल और अस्थाना के दरम्यान दोनों कॉल्स के बीच सोमेश ने भी गोयल को एक बार फोन किया था और उनके बीच लगभग एक मिनट तक बातचीत हुई थी.'

बस्सी ने आरोप लगाया है कि, सर्विलांस के दौरान सोमेश ने अपने ससुर सुनील मित्तल से भी कई बार फोन पर बात की थी. सोमेश के साथ फोन पर बातचीत के दौरान सुनील मित्तल ने उसे किसी भी कीमत पर भारत न आने के लिए आगाह किया था. बस्सी का यह भी आरोप है कि, सोमेश और सामंत गोयल के बीच फोन पर हुई बातचीत में 'हमारे आदमी' के तौर पर जिस शख्स का जिक्र किया गया है, वह राकेश अस्थाना ही हैं.

बस्सी ने आरोप लगाते हुए दावा किया है कि, देवेंद्र कुमार ने सीआरपीसी के सेक्शन 161 के तहत सतीश बाबू सना का झूठा बयान दर्ज किया. बस्सी को डर है कि, अब नव नियुक्त अफसर केस की जांच करने वाली पुरानी टीम को झूठे आरोपों में फंसा सकता है. बस्सी के मुताबिक, ‘ये प्रतिलेख (ट्रांसक्रिप्ट्स) सीबीआई के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि, वे इसे जांच के रिकॉर्ड में शामिल नहीं करेंगे.’

फिलहाल, कोई भी जांच सीबीआई मुख्यालय पर लगे काले दाग के रहस्य को सुलझाने का दावा नहीं कर सकती है. हर गुजरने वाला दिन देश की प्रमुख जांच एजेंसी में पनपने वाली जहरीली और भ्रष्ट संस्कृति की बानगी पेश कर रहा है. इससे 400 से अधिक भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली एजेंसी की विश्वसनीयता और साख पर बट्टा लग गया है. यह समय सीबीआई के मौजूदा आंतरिक संकट के प्रभाव को मापने का नहीं हो सकता है, लेकिन सरकार के लिए निश्चित रूप से एक संकेत जरूर है. सरकार को चाहिए कि, वह हालात की गंभीरता को समझे और एजेंसी की विधिवत जांच-परख और मरम्मत के लिए एक कारगर तंत्र को तैनात करे.

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