S M L

CBI Vs CBI: आलोक वर्मा संस्थान का मान रखने में नाकाम रहे, वो इस पद के लायक नहीं थे

आलोक वर्मा ने सीबीआई को चलाने का नैतिक अधिकार खो दिया है. उन्होंने अपने कर्तव्यों के विपरीत काम करते हुए संस्थान की छवि पर और कीचड़ उछालने का काम किया है

Updated On: Jan 10, 2019 08:00 PM IST

BV Rao BV Rao
एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट

0
CBI Vs CBI: आलोक वर्मा संस्थान का मान रखने में नाकाम रहे, वो इस पद के लायक नहीं थे

एडिटर नोट-यह लेख पहली बार 20 नवंबर 2018 को पब्लिश किया गया था. इस लेख में ये दलील दी गई है कि क्यों आलोक वर्मा को दोबारा सीबीआई दफ्तर में घुसने नहीं देना चाहिए. आज यानी 10 जनवरी 2019 को सेलेक्शन कमिटी ने आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर पद से हटा दिया. 

आलोक वर्मा के केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक पद पर दोबारा बहाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 29 नवंबर तक टल गया है. सरकार ने 23 अक्टूबर की आधी रात को आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेज दिया था. उनके डिप्टी और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के साथ भी ऐसा ही किया गया था.

वर्मा के भविष्य को लेकर लगाई जा रही ज्यादातर अटकलें अदालत के केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को जांच के दिए आदेश के निष्कर्षों पर केंद्रित है, जो अस्थाना के वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर हैं.

12 नवंबर से पहले और बाद के कुछ दिनों में मीडिया रिपोर्ट्स वर्मा के सीवीसी से क्लीन चिट मिलने की खबरों से भरी पड़ी थीं. समझा गया कि वर्मा कोर्ट में सरकार को खून के आंसू रुला देंगे और अपनी ड्यूटी पर वापस लौट आएंगे.

रिपोर्ट में सामने आई कुछ बातें आलोक वर्मा के लिए 'काफी असामान्य' हैं

16 नवंबर के बाद यह कहानी नाटकीय तरीके से तब बदल गई जब सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी की रिपोर्ट की समीक्षा की, उसने खुलासा किया कि रिपोर्ट में सामने आई कुछ बातें वर्मा के लिए 'काफी असामान्य' हैं. इसके बाद सबके सुर बदल गए और कहा जाने लगा कि कैसे आलोक वर्मा की किस्मत का फैसला हो गया है.

ऊपर कही बातों से यह स्पष्ट है कि वर्मा का भविष्य सीवीसी जांच रिपोर्ट से जुड़ा हुआ है और इससे भी कि उस जांच  रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट क्या निष्कर्ष निकालता है.

कोर्ट क्या निर्णय लेता है इसका अनुमान लगाना मूर्खता है. मैं इस राह पर नहीं चलूंगा. बल्कि मैं यह बहस कर रहा हूं कि आलोक वर्मा को फिर कभी अब सीबीआई हेडक्वार्टर में नहीं घुसने देना चाहिए, चाहे सुप्रीम कोर्ट का उनपर लगाए गए आरोपों पर फैसला जो भी आए.

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया

ऐसा इसलिए, क्योंकि वर्मा ने सीबीआई, जो सार्वजनिक भरोसे वाली एक संस्था है, उसे चलाने का नैतिक अधिकार खो दिया है. देश की संघीय जांच एजेंसी के प्रमुख के रूप में यह उनकी जिम्मेदारी थी कि संस्था की अखंडता सुरक्षित रहे. मगर इसकी जगह उन्होंने अपने कर्तव्यों के विपरीत काम करते हुए संस्थान की छवि पर और कीचड़ उछालने का काम किया है.

जनता के विश्वास को धोखा देने के लिए अस्थाना भी उतने ही जिम्मेदार हैं. यह बात संस्था में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी के लिए कही जा सकती है कि वो जिस संस्था के लिए काम करता है, उसकी प्रामाणिकता बनाकर रखे. लेकिन किसी भी संस्था के निदेशक और बाकी के कर्मचारियों में फर्क होता है.

सीबीआई के निदेशक को 2 वर्ष का तय कार्यकाल मिलता है. सुप्रीम कोर्ट सीबीआई के निदेशक को ही यह 'सुरक्षा कवच' प्रदान करता है, संस्था के हर अफसर को नहीं.

निदेशक की ही जिम्मेदारी है कि वो CBI के सम्मान और निष्ठा को बनाए रखे

सुप्रीम कोर्ट ने बस निदेशक की हो घेरे में लिया क्योंकि वह संस्थान में जनता के विश्वास का संरक्षक है. यह निदेशक की ही जिम्मेदारी है कि वो सीबीआई के सम्मान और निष्ठा को बनाए रखे. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी से अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में पेश करने के आदेश को साफ करते हुए यही बात कही. कोर्ट ने कहा था, 'संबंधित संस्थान की पवित्रता और उसमें जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए अदालत को यह कदम उठाना आवश्यक लगा.'

वर्मा ने दावा किया था कि उनके डिप्टी अफसर (अस्थाना) बेईमान हो गए थे. अगर यह बात सही भी थी तो भी इसका समाधान खुद भी बेईमान बन जाना नहीं था. इसके पहले कभी भी किसी भी सीबीआई डायरेक्टर ने अपने ही डिप्टी के खिलाफ इतनी छिछली और कमजोर एफआईआर दर्ज कराने में ऐसी भूमिका नहीं निभाई थी. इस इशारे से यह भी साफ होता है कि अस्थाना की ओर से वर्मा पर लगाए गए कुछ आरोप कानूनी जांच में असफल रहे हैं.

आलोक वर्मा-राकेश अस्थाना.

आलोक वर्मा-राकेश अस्थाना.

अगर सीबीआई का स्पेशल निदेशक कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर अपने ही बॉस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा सकता है, जिनमें से कुछ अप्रामाणिक से लगते हैं और इसके बदले में अगर निदेशक अपने ही डिप्टी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा सकता है, जिनके मनगढ़ंत होने की आशंकाएं हों, तो इससे अहम सवाल पैदा होते हैं...

- सीबीआई में कुशलता की आखिर कितनी कमी है, जो निदेशक और स्पेशल निदेशक एक दूसरे को 'सबक सिखाने' पर तुले हुए हैं, लेकिन कायदे के आरोप तक नहीं लगा पा रहे. और

- अगर निदेशक और स्पेशल निदेशक आपसी लड़ाई में इस हद तक जा सकते हैं, तो वो एक आम आदमी के साथ क्या करेंगे?

CBI को अपनी जागीर बनाने में व्यस्त थे दोनों मुखिया

यह सोचकर ही सिहरन पैदा होती है कि दो-दो सम्मानित अधिकारियों के इशारे पर एक अपमानित सीबीआई अफसर क्या-क्या कर सकता है. इस घिनौने नाटक से यह सामने आ गया है कि निदेशक और विशेष निदेशक दोनों ही सीबीआई को अपनी जागीर बनाने और अपने साथ काम करने वालों को इस गंदी गुटबाजी में हिस्सा लेने पर मजबूर करने में व्यस्त रहे हैं.

वर्मा को कुर्सी दोबारा देने की बजाय अब इस अपमान के साथ विदा देने के लिए यह वजह ही काफी होनी चाहिए. दरअसल, लगे हाथ कॉलेजियम बुलाकर वर्मा को बस इसी तथ्य के चलते निलंबित कर देना चाहिए कि, जब उन्हें एक संस्थान का नेतृत्व करना था, तब वो एक भ्रष्ट गुट के मुखिया की भूमिका निभा रहे थे.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi