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एनडीटीवी मालिकों पर सीबीआई छापे: 'बोलने की आजादी' पर हमले की बात पचती नहीं

छापेमारी को देश-विदेश में मीडिया की आजादी पर हमला कह कर प्रचारित किया गया

Sreemoy Talukdar Updated On: Jun 09, 2017 09:16 AM IST

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एनडीटीवी मालिकों पर सीबीआई छापे: 'बोलने की आजादी' पर हमले की बात पचती नहीं

इस वक्त देश में एनडीटीवी के प्रमोटरों के यहां सीबीआई के छापे को लेकर काफी शोर-शराबा हो रहा है. बहुत से लोग इसे मीडिया की आजादी पर सरकारी हमला बता रहे हैं. इस शोरगुल में इस बात पर पर्दा पड़ गया है कि बोलने की आजादी के तराजू का पलड़ा कांग्रेस और लेफ्ट के पक्ष में झुका हुआ है. किसी और के सत्ता में होने का ये मतलब नहीं है कि सोच-विचार और बहस पर भी उस पक्ष का नियंत्रण हो गया हो.

मजे की बात ये है कि देश भर में कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियों की सियासी ताकत सिमट रही है. वहीं विचारधारा के तौर पर उनकी विरोधी बीजेपी देश के हर कोने में विस्तार कर रही है. लेकिन किसी भी विवाद में बहस हमेशा कांग्रेस-लेफ्ट की सोच के समर्थकों के हक में ही चली जाती है. एनडीटीवी के मालिकों के यहां छापे के विवाद में भी यही हुआ.

अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला?

छापेमारी को देश-विदेश में मीडिया की आजादी पर हमला कह कर प्रचारित किया गया. कई लोगों ने तो इसे अनकही इमरजेंसी तक करार दे दिया. सीबीआई के छापे चैनल के मालिकों पर लगे वित्तीय गड़बड़ियों के आरोप की वजह से पड़े थे. सीबीआई ने मीडिया में बयान जारी करके साफ कर दिया है कि उसने एनडीटीवी के मालिकों के यहां छापे क्यों मारे.

कई मीडिया संगठन जैसे एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और ऑल इंडिया न्यूजपेपर्स एडिटर्स कॉन्फ्रेंस ने एनडीटीवी के मालिकों के यहां सीबीआई के छापों पर कड़ा विरोध जताया. इसे फासीवाद और बोलने की आजादी के बीच की लड़ाई करार दिया गया. इस विवाद पर बोलने वाले ज्यादातर लोगों ने एनडीए सरकार पर आरोप लगाया कि वो एनडीटीवी के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है, क्योंकि चैनल सरकार के खिलाफ आवाज उठाता रहा है.

आप इस मुद्दे पर अखबारों में छपे लेख पढ़ें तो आपको इसका एहसास होता है. प्रताप भानु मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लेख लिखा कि एनडीटीवी पर सीबीआई के छापे किसी एक मीडिया हाउस पर छापेमारी से कहीं ज्यादा बड़ी खबर है. द वॉशिंगटन पोस्ट में विधि जोशी ने लिखा कि भारतीय न्यूज नेटवर्क पर छापेमारी से भारत में प्रेस की आजादी खतरे में पड़ने का डर है. द टेलीग्राफ ने अपने संपादकीय में लिखा कि खामोश रहें. कुछ लोगों ने तो ये भी कह डाला कि सीबीआई की छापेमारी से बैंकों में घबराहट फैलेगी. इन छापों का असर बैंकिग सेक्टर पर भी पड़ेगा.

cbi headquarter

सियासी दलों ने भी अपने-अपने हित के हिसाब से इस छापेमारी को राजनैतिक रंग दिया. तमाम विपक्षी दलों के गठजोड़ ने सरकार को चेताया कि वो मीडिया को न धमकाए. कुछ लोगों ने कांग्रेस के विरोध का मजाक भी बनाया. कांग्रेस को याद दिलाया गया कि जब वो सत्ता में थी तो उसने मीडिया से कैसा सलूक किया था.

द इकॉनमिक टाइम्स ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के यहां सीबीआई छापों के बारे में लिखा कि, 'सीबीआई ने नई दिल्ली टेलिविजन कंपनी के दफ्तरों पर छापे मारे. इसके संस्थापकों के घरों पर छापे मारे. आरोप है कि इन्होंने आईसीआईसीआई बैंक को 48 करोड़ की चपत लगाई थी'.

सरकार ने मीडिया में आ रही खबरों पर कहा कि एनडीटीवी के दफ्तरों पर छापेमारी नहीं हुई. केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू ने साफ किया कि, 'ये छापे एनडीटीवी पर नहीं पड़े. सीबीआई, एनडीटीवी चैनल के न्यूज़रूम, टीवी स्टूडियो या किसी और दफ्तर में नहीं गई. कंपनी के मैनेजमेंट और मालिकों को कानूनी जांच का सामना तो करना पड़ेगा. उन्हें अपने ऊपर लगे आरोपों की जांच में बाधा नहीं डालनी चाहिए'.

छापा मीडिया पर या लोगों पर

अगर सच ये है तो फिर ये कहना सरासर गलत है कि एनडीटीवी के दफ्तरों पर छापे मारे गए. हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने लिखा कि सीबीआई ने प्रणय रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और एनडीटीवी से जुड़ी निजी कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ केस दर्ज किया है. इन सबके ऊपर आपराधिक साजिश रचकर आईसीआईसीआई बैंक से धोखाधड़ी करने का आरोप है.

कहने का मतलब ये है कि किसी मीडिया हाउस के मालिकों ने अगर वित्तीय गड़बड़ी की है, तो उसकी जांच को मीडिया की आजादी पर हमला नहीं बताया जा सकता. ऐसा कहकर तो ये जाहिर किया जा रहा है कि मीडिया कानून से ऊपर है. बल्कि मीडिया जो सच दिखाने का दावा करता है, उसे तो हर जांच के लिए इसलिए और तैयार रहना चाहिए क्योंकि वो सच्चा होने का दावा करता है. उसके पास छुपाने के लिए कुछ नहीं.

सच्चाई ही मीडिया का नैतिक बल है. ऐसे में जांच से घबराना कैसा? पत्रकारिता में बोलने की आजादी अलग चीज है. वहीं कोई वित्तीय गड़बड़ी करने की आजादी अलग चीज है. हम ये नहीं कह रहे कि एनडीटीवी के मालिकों ने गड़बड़ी की है. हम बस ये कह रहे हैं कि उन पर आरोप लगे हैं और उनकी जांच हो रही है. इसे मीडिया की आजादी पर हमला नहीं कहना चाहिए.

इस बात को मीडिया से जुड़े बहुत कम लोगों ने ही उठाया है. ज्यादातर तो एनडीटीवी के मालिकों के यहां छापे को मीडिया की आजादी पर हमला ही बताते रहे.

द हिंदू अखबार की पूर्व संपादक मालिनी पार्थसारथी, इसे मीडिया की आजादी पर हमला कहने का विरोध करने वाले चुनिंदा लोगों में से एक हैं. मालिनी ने ट्विटर पर लिखा कि, 'मीडिया संस्थानों को पारदर्शी होना चाहिए. उन्हें किसी भी जांच के लिए तैयार रहना चाहिए. एनडीटीवी को चाहिए कि वो जांच होने दे. मीडिया की आजादी पर हमले की आड़ में खुद को जांच से बचाने की कोशिश न करे. क्योंकि प्रेस की आजादी बहुत बड़ा मसला है, इसे निजी हित साधने के लिए नहीं उठाया जाना चाहिए.'

हम इस लेख में न तो सीबीआई के छापों को जायज ठहरा रहे हैं. न ही ये कह रहे हैं कि एनडीटीवी के मालिकों के खिलाफ केस तो बनता है. हमारा मकसद तो बस ये बताना है सरकार पर मीडिया की आवाज को दबाने का आरोप लगाना ठीक नहीं.

ओपइंडिया की कहानी और फेसबुक का मामला

अगर हम मीडिया की आजादी पर हमले की मिसालें तलाशें तो कई मिल जाएंगी. यहां तो संगठित होकर शोर मचाया जा रहा है. इस शोर में कई ऐसे मामले दब जाते हैं, जहां वाकई मीडिया की आजादी पर हमला किया गया. इससे भारत में मुख्यधारा की मीडिया का दोहरा चरित्र भी उजागर होता है. कई लोगों ने तो बोलने की, मीडिया की आजादी को सियासी हथियार बना लिया है, ताकि अपनी विरोधी विचारधारा को दबा सकें.

बहुत लोगों को नहीं मालूम होगा कि इसी मंगलवार को फेसबुक ने लोगों को ओपइंडिया.कॉम के लिंक को पोस्ट करने से रोका. ये लेख फेक न्यूज से संबंधित था. इसमें न तो किसी के खिलाफ कोई आरोप था और न ही इसमें गाली-गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल हुआ था. ओपइंडिया.कॉम का लेख साध्वी प्रज्ञा के वकील का इंटरव्यू था. इसे वेबसाइट के संपादक ने किया था. इसमें वकील ने कहा था कि साध्वी प्रज्ञा को तो आधे घंटे में जमानत मिल जानी चाहिए थी क्योंकि उनके खिलाफ आरोप बहुत कमजोर थे.

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साध्वी प्रज्ञा 2008 के मालेगांव धमाकों की आरोपी हैं. उन्हें इस साल 25 अप्रैल को बॉम्बे हाई कोर्ट से जमानत मिली. वो आठ साल तक जेल में रहीं. ओपइंडिया के लेख में साध्वी के वकील ने बताया, 'जब मैं केस को देखता हूं तो समझ नहीं पाता कि उन्हें इतने साल तक जमानत क्यों नहीं मिली? उन्हें तो पहली ही अर्जी पर आधे घंटे के अंदर जमानत मिल जानी चाहिए थी.'

इंटरव्यू के दौरान इस वकील ने विस्तार से बताया कि कैसे साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ एनआईए का केस बेहद कमजोर है. उनके खिलाफ जो सबसे बड़ा सबूत बताया जा रहा है, उसमें ही दो बड़ी खामियां हैं. इस वकील के दावों पर कोर्ट में बहस की जा सकती है. जब मुकदमा होगा तो दूध का दूध और पानी का पानी खुद ब खुद सामने आ जाएगा. लेकिन इस लेख में कहीं भी ऐसी बात नहीं थी जो फेसबुक की नीतियों के खिलाफ थी. लेकिन जब भी फेसबुक के यूजर्स ने इस लेख के लिंक को पोस्ट करना चाहा, तो फेसबुक पेज पर चेतावनी लिखी आती थी: इस मैसेज में जो कंटेंट है उसे ब्लॉक किया गया है. आपका संदेश इसलिए नहीं भेजा जा सकता क्योंकि इसमें ऐसा कंटेट है जिसे फेसबुक के दूसरे यूजर्स ने गाली-गलौज वाला बताया है.

साफ है कि फेसबुक ने 'अब्यूजिव कंटेंट' साझा करने से रोकने के लिए अपनी साइट पर जो सुरक्षा इंतजाम किए हैं. उन्हें कुछ लोगों ने धता बता दी. तभी तो ओपइंडिया का लेख लोग शेयर नहीं कर पा रहे थे. यानी कुछ लोगों के संगठित गिरोह ने फेसबुक को ये संदेश भेजा कि ओपइंडिया के लेख में 'अब्यूजिव कंटेंट' है, इसलिए उसे साझा करने से रोका जाए.

लेकिन जब लोगों ने इस पर एतराज जताना शुरू किया तो फेसबुक ने इस लेख को साझा करने पर लगी पाबंदी हटा ली. यानी अगर एक लेख ने साध्वी प्रज्ञा के मामले में नया नजरिया पेश करने की कोशिश की. मालेगांव धमाकों की आरोपी से जुड़ी नई जानकारी देने की कोशिश की, तो उसे रोकने के लिए संगठित गिरोह सक्रिय हो गया. ये भी तो अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला था. मगर इसके लिए किसी ने शोर नहीं मचाया.

ओपइंडिया को दक्षिणपंथी सोच वाला माना जाता है. अगर किसी वामपंथ समर्थक मीडिया को ऐसे निशाना बनाया जाता, तो यकीन जानिए इस पर लोग आसमान सिर पर उठा लेते.

मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा आठ साल जेल में रहीं. जब वो जमानत पर रिहा हुईं, तो, उनसे जुड़ी खबर को मुख्यधारा की मीडिया ने बहुत तवज्जो नहीं दी. जबकि इसी केस के दूसरे आरोपियों को लेकर काफी कवरेज हुई. यहां तक कि कांग्रेस समर्थक वकील शहजाद पूनावाला ने डेलीओ में लिखा कि अगर साध्वी प्रज्ञा जेल से बाहर आती हैं तो भारत के मुसलमानों का लोकतंत्र पर से यकीन उठ जाएगा.

बोलने की आजादी सिलेक्टिव है?

मैं बोलने की आजादी पर लोगों के दोगलेपन की एक और मिसाल देना चाहूंगा. बीजेपी सांसद और अभिनेता परेश रावल को अपना एक विवादित ट्वीट हटाना पड़ा था. ये ट्वीट उन्होंने कश्मीर में मानव ढाल बनाए जाने को लेकर किया था. परेश रावल ने लिखा था कि लेखिका अरुंधती राय को सेना की जीप के आगे बांधकर घुमाना चाहिए था, ताकि पत्थरबाजों को रोका जा सके. एक बयान में परेश रावल ने कहा कि 'इस खत से मैं अपने सभी समर्थकों और देश के नागरिकों को बताना चाहता हूं कि मुझे 21 मई के अपने ट्वीट को डिलीट करने को मजबूर किया जा रहा है, वरना ट्विटर मेरा अकाउंट ब्लॉक कर देगा'.

वहीं, जेएनयू की छात्र नेता शेहला राशिद ने इसी तरह का एक ट्वीट पोस्ट किया था, जिसमें शेहला ने क्रिकेटर गौतम गंभीर की तस्वीर को तोड़-मरोड़कर सेना की जीप से बंधा हुआ दिखाया था.

कुछ लोगों ने ट्विटर इंडिया की नीतियों के दोहरेपन पर सवाल उठाया. इसमें कोई शक नहीं कि मीडिया की आजादी पर हमला नहीं होना चाहिए. किसी भी लोकतंत्र में आजाद मीडिया का होना बेहद जरूरी है. लेकिन सरकार पर मीडिया का गला घोंटने या विपक्ष की आवाज दबाने के आरोप, सोच समझकर लगाए जाने चाहिए.

कई बार ऐसे आरोप लगाकर असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश होती है. ऐसा करने वाले अक्सर अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं.

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