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CVC की रिपोर्ट बना CBI डायरेक्टर को छुट्टी पर भेजने का आधार, अब नजर सुप्रीम कोर्ट पर

सीवीसी की तमाम दलीलों के बावजूद विपक्ष सीवीसी के अधिकार को लेकर सवाल खड़े कर रहा है

Updated On: Oct 25, 2018 12:33 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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CVC की रिपोर्ट बना CBI डायरेक्टर को छुट्टी पर भेजने का आधार, अब नजर सुप्रीम कोर्ट पर
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सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. सरकार के इस फैसले को लेकर वाद और विवाद चरम पर है. जैन हवाला केस में फैसले के बाद सीबीआई डायरेक्टर के कार्यकाल को 2 साल के लिए तय घोषित कर दिया गया था. इसलिए विपक्ष सहित कई कानून के जानकार आलोक वर्मा को दो साल के कार्यकाल से पहले छुट्टी पर भेजे जाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं. विपक्ष इसे पूरी तरह असंवैधानिक करार दे रहा है. वहीं पार्टी सरकार के फैसले को पूरी तरह संवैधानिक बता रही है.

वैसे खुद विनीत नारायण सीबीआई डायरेक्टर के कार्यकाल को लेकर चल रही बहस पर अपना पक्ष मीडिया के सामने रख रहे हैं. विनीत नारायण कहते हैं कि वो जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पीटीशन डालने वाले हैं, जिसमें सीबीआई में आमूल-चूल परिवर्तन की मांग करेंगे. उनका कहना है 25 साल बाद भी सीबीआई के क्रिया-कलाप में कोई परिवर्तन नहीं आया है और राजनीतिक पार्टियां इसे अपने मनमाफिक इस्तेमाल कर रही हैं. 1993 में हवाला फंडिंग मामले में विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. ये मामला विनीत नारायण बनाम भारत सरकार जजमेंट के नाम से जाना गया. इसी मामले में फैसले के बाद सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल किया गया था.

सरकार ने सीवीसी को किया आगे

लेकिन सरकार के तरफ से उसके वरिष्ठ मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि सरकार ने जो भी फैसले लिए वो केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीबीसी) की अनुशंसा के बाद लिए हैं. उन्होंने कहा कि संस्थान की ईमानदारी और विश्वसनियता को कायम रखने के लिए दोनों शीर्ष अधिकारियों को छुट्टी पर भेजा गया है. आरोपों की जांच एसआईटी करेगा और तब तक दोनों अधिकारी अंतरिम अवकाश पर रहेंगे.

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अरुण जेटली ने कहा कि भ्रष्टाचार की जांच करने की जिम्मेदारी संस्थान करेगी या फिर उस पर निगरानी रखने वाली संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग करेगी. जेटली ने कहा कि सीवीसी को आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना द्वारा लगाए गए आरोपों की जानकारी थी. उसके बाद सीवीसी ने सिफारिश की कि दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया जाए.

जेटली ने माना कि दो शीर्ष अधिकारियों के आरोप-प्रत्यारोप के बाद सीबीआई जैसी संस्थान की हालत अभूतपूर्व और दुर्भाग्यपूर्ण हो गई थी. इसलिए संस्थान की ईमानदारी और निष्पक्षता कायम रखने के लिए इस तरह के फैसले लेना बेहद आवश्यक हो गया था. विपक्ष पर पलटवार करते हुए अरुण जेटली ने पूछा कि आरोपों का सामना कर रहे दोनों अधिकारी अपने ही खिलाफ जांच की निगरानी कैसे कर सकते हैं?

लेकिन सरकार के इस जवाब से विपक्ष पूरी तरह असंतुष्ट दिखा. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे राफेल डील से जोड़ते हुए सीधा हमला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर किया. ममता बनर्जी समेत कई दिग्गज नेताओं ने सरकार पर सीबीआई जैसी संस्थान का बेजा इस्तेमाल करने का आरोप मढ़ दिया.

केंद्रीय सतर्कता आयोग ने दी हैं ये वजहें

वहीं इस सब आरोप-प्रत्यारोप के बीच केंद्रीय सर्तकता आयोग के हवाले से वो प्रमुख वजह सामने रखे गए, जिसके तहत सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने के लिए उन्हें अनुशंसा करनी पड़ी.

केंद्रीय सतर्कता आयोग यानी सीवीसी ने जिन तथ्यों का हवाला दिया है वो इस प्रकार हैं-

1. 24 अगस्त, 2018 को केंद्रीय सतर्कता आयोग को सीबीआई में कार्यरत अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र मिले, जिसके बाद सेक्शन 11 सीवीसी एक्ट 2003 के तहत 11 सितंबर, 2018 को सीबीआई डायरेक्टर को नोटिस भेजा गया और 14 सितंबर, 2018 को उनके सामने संबंधित फाइल और दस्तावेज रखने का निर्देश दिया गया. सीबीआई को इसे पेश करने के कई मौके दिए गए और फिर 24 सितंबर को सीबीआई ने तीन सप्ताह के अंदर फाइल को सीवीसी के सामने रखने का भरोसा भी दिया.

सीवीसी के मुताबिक कई रिमाइंडर के बावजूद सीबीआई ने आरोप संबंधित फाइल और दस्तावेज सीवीसी के सामने नहीं रखे. इसलिए सीवीसी ने बाध्य होकर अपने ऑब्जरवेशन में लिखा कि सीबीआई डायरेक्टर संबंधित मामलों में लगाए गए आरोपों की जांच में नॉनकॉपरेटिव दिखे.

2. सीवीसी ने सीबीआई डायरेक्टर पर केंद्रीय सतर्कता आयोग जो कि एक संवैधानिक संस्था है, उसके कामकाज में जानबूझकर रुकावट पैदा करने सहित असहयोग करने का आरोप लगाया.

3. सीवीसी ने इसे असाधारण और अभूतपूर्व परिस्थिति करार देते हुए सेक्शन 8 सीवीसी एक्ट 2003 के तहत कार्रवाई करते हुए अगले आदेश तक डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना से सारे पावर और फंक्शन वापस ले लिए, जो बतौर अधिकारी कानून के तहत उनके पद पर उन्हें निर्गत किए गए थे.

4. सरकार इसे असाधारण और अभूतपूर्व परिस्थिति मानते हुए सीवीसी के द्वारा रखे गए रिपोर्ट को जांचा और परखा. फिर सेक्शन 4(2) दिल्ली पुलिस स्पेशल एक्ट के तहत असाधारण और अभूतपूर्व परिस्थितियां पैदा होने की वजह से डायरेक्टर और स्पेशल डायरेक्टर को उनके पावर, फंक्शन और सुपरवाइजरी रोल से मुक्त किया जिससे न्याय के सिद्धांत का पालन हो सके.

5. सीवीसी ने इसे अंतरिम उपाय के तौर पर लिया गया फैसला बताया ताकि सीवीसी तमाम आरोपों की जांच पूरा कर सके ओर सीवीसी/ भारत सरकार कानूनसम्मत कार्रवाई कर सके.

विपक्ष की अलग दलील है

लेकिन सीवीसी की तमाम दलीलों के बावजूद विपक्ष सीवीसी के अधिकार को लेकर सवाल खड़े कर रहा है. विपक्ष की तरफ से कांग्रेस के नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि सीबीआई डायरेक्टर को हटाया गया है और ये पावर न तो सरकार के पास है और न ही सीवीसी के पास. सीबीआई डायरेक्टर को बहाल करने में जो कमेटी होती है, उसके सदस्य प्रधानमंत्री सहित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश होते हैं और उस कमेटी में तीसरे सदस्य के तौर पर विपक्ष के नेता भी होते हैं. लेकिन कमेटी में हटाने के प्रस्ताव को रखे बगैर डायरेक्टर को हटाया जाना असंवैधानिक है और लोकपाल एक्ट का उल्लंघन भी.

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जाहिर तौर पर निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर जा टिकी हैं. सरकार सीवीसी के अनुशंसा को ढाल बना रही है. वहीं विपक्ष साल 1993 के विनीत नारायण मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को.

सीबीआई में आमूल-चूल परिवर्तन की मांग

दोनों पक्षों की अपनी दलील है लेकिन सीबीआई के इतिहास में रातों-रात डायरेक्टर सहित 14 लोगों को हटाए जाने के बाद देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की साख भी सवालों के घेरे में है. कई सेवानिवृत अधिकारी इसके काम करने के तरीके को लेकर आमूल-चूल परिवर्तन की मांग करने लगे हैं. वहीं कुछ सीबीआई की चयन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाने लगे हैं.

एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर फ़र्स्टपोस्ट से कहा, 'सीबीआई डायरेक्टर का चुनाव उसकी दक्षता, निपुणता और ईमानदारी के आधार पर नहीं होती है. सत्ताधारी पार्टी अपने कंफर्ट लेवल के आधार पर ही डायरेक्टर का पद अधिकारी को सौंपती है, जिससे एजेंसी का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सके.'

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जाहिर तौर पर पिछले दो निदेशकों पर तो सीबीआई खुद भ्रष्टाचार की जांच कर रही है. ऐसे में दो शीर्ष अधिकारियों का एक दूसरे पर लगाए भ्रष्टाचार के आरोप संस्थान की असली सूरत बखूबी बयां करता है.

वहीं कभी सीबीआई में संयुक्त निदेशक पद पर काम कर चुके एक डीजी रैंक के अधिकारी ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा, 'सिस्टम कैसा काम करता है, ये निर्भर इस बात पर करता है कि उसको चलाने वाले उसे किस नियत से चला रहे हैं. सरकार ने सख्त कार्रवाई कर बेहतरीन कदम उठाया है. लेकिन ऐसे हालात क्यों बने इस पर ध्यान देना जरूरी होगा.'

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