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Casting Couch: रेणुका चौधरी और नगमा! कम से कम खुलकर तो बोलिए

सरोज खान के बयान पर रेणुका चौधरी और नगमा ने भी अपनी बात रखी लेकिन क्या उन्हें खुलकर नहीं बोलना चाहिए?

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Apr 24, 2018 09:31 PM IST

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Casting Couch: रेणुका चौधरी और नगमा! कम से कम खुलकर तो बोलिए

रागिनी (बदला हुआ नाम) क्योंकि, असली नाम लिखने से उस लड़की के अलावा किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. रागिनी दिल्ली की एक इंटीरियर डिजाइनिंग कंपनी में काम करती थी. छोटी कंपनी थी लिहाजा, बॉस के साथ सबकी बातचीत होती थी.

झारखंड से दिल्ली आई रागिनी अपनी नई नौकरी को 100 पर्सेंट दे रही थी. रंग और डिजाइन की समझ भी बेहतर थी. सबकुछ सही चल रहा था. लेकिन कंपनी के मालिक यानी उसके बॉस को काम के 100 पर्सेंट से कुछ ज्यादा चाहिए था. इसी 100 पर्सेंट से ज्यादा की उम्मीद में उसका बॉस उसे देर शाम तक काम के बहाने रोके रखता था.10 से 6 बजे की नौकरी में बाकी सहयोगी 6.30 बजे तक चले जाते थे लेकिन रागिनी को 9-9 बजे तक रुकना पड़ता था. रागिनी के पास दो ही रास्ते थे. या तो जो जैसा चल रहा है चलने दे क्योंकि रोजी रोटी का मामला था. या फिर मुंह खोले और नौकरी को लात मार दे. रागिनी ने दूसरा रास्ता चुना.

प्रतिनिधि चुप रहेंगे तो हमारा क्या होगा?

यह किसी एक लड़की की कहानी नहीं है. अपने आसपास ऐसी कई कहानियां आपको मिल जाएंगी. लेकिन कांग्रेस की बड़ी नेता रेणुका चौधरी और नगमा के #metoo और कास्टिंग काउच की लाइन में खड़े होने के बाद यह कहना पड़ेगा कि आपका स्टेटस, काबिलियत, शिक्षा, समाज या रूतबा...ऐसी कोई चीज नहीं है जिससे सामाजिक सुरक्षा पक्की हो सके. करियर और नौकरी से लड़कियों को आर्थिक सुरक्षा तो मिलती है लेकिन सामाजिक सुरक्षा का वादा कोई नहीं करता.

संसद में भी कास्टिंग काउच. यह सिर्फ एक बयान नहीं, संसद के प्रतिनिधियों के मुंह पर करारा तमाचा है. जब किसी महिला से छेड़छाड़ होती है तो उसे उम्मीद होती है कि कोई नहीं तो कम से कम नेता उसकी बात संसद में रखेंगे. जरूरी कानून बनेंगे. उन्हें सुरक्षा मिलेगी. लेकिन जब हमारे प्रतिनिधि दबी छिपी जबान में #metoo और कास्टिंग काउच की बात करेंगे तो बाकी महिलाओं को खुलकर बोलने की हिम्मत कैसे आएगी.

असल मुद्दा या सिर्फ राजनीति!

सवाल यह है कि क्या रेणुका चौधरी का यह बयान सिर्फ राजनीति के लिए था? या वो किसी खास के लिए आवाज उठा रही हैं. किसी भी महिला के साथ जब कोई अन्याय होता है तो ये नेता हाथ में मोमबत्ती लेकर सड़कों पर भीड़ लगा देते हैं. ऐसे में अगर उन्हें खुद उसी तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है तब वो तुरंत आवाज क्यों नहीं उठा पाती हैं.

वैसे राजनीति धर्म निभाते हुए रेणुका चौधरी ने अपनी बात का निशाना नरेंद्र मोदी को बनाया. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने उनपर कमेंट करके उनका चरित्र हनन किया है.

चरित्र हनन क्या होता है क्या यह रेणुका चौधरी समझ पाई हैं. उन्हें बयान देना था इसलिए बयान दे दिया या इसके पीछे उनका कोई मकसद भी था. रागिनी जैसी देश भर में हजारों ऐसी लड़कियां हैं जो रोजीरोटी का एक विकल्प होने के बावजूद नौकरी छोड़ देती हैं. अपनी बात सबके सामने रखती हैं. लेकिन रेणुका चौधरी और नगमा जैसी नेता सिर्फ बहती गंगा में हाथ धोने का काम करती हैं. नगमा पहले एक्टर फिर नेता बनीं. उनके राजनीतिक सफर में क्या किसी ने उनका नाजायज फायदा उठाया. अगर नहीं तो उन्होंने यह बयान क्यों दिया. अगर हां. तो वह अब तक चुप क्यों थीं.

खुलकर तो बोलिए!

रेणुका और नगमा या तो खुलकर अपनी बात रखें या कास्टिंग काउच जैसे गंभीर मसले पर राजनीति करना बंद करें. राजनीति में नगमा का करियर भले ही छोटा हो लेकिन रेणुका चौधरी का करियर 1984 से है. 1984 से लेकर 2018..अगर इस बीच रेणुका चौधरी को कभी ऐसा लगा कि संसद में कोई पुरुष उनका या किसी महिला का बेजा फायदा उठा रहा है तो उन्होंने आवाज क्यों नहीं उठाई.

मैं देशभर की महिलाओं की तरफ से रेणुका चौधरी को यह भरोसा दिलाना चाहती हूं कि रागिनी ने जितनी हिम्मत दिखाई. आप भी दिखाइए... जनता आपका साथ जरूर देगी.

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