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कैशलेस इंडिया में 35 करोड़ अनपढ़ भी तो होंगे!

सरकार पेड़ की जड़ों में पानी देने की जगह पत्तियों पर छींटें मार रही है

Updated On: Dec 20, 2016 10:40 PM IST

Krishna Kant

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कैशलेस इंडिया में 35 करोड़ अनपढ़ भी तो होंगे!

नोटबंदी के परिणामस्वरूप मची अफरा-तफरी के बीच सरकार बहुत तेजी से डिजिटल इकॉनॉमी की तरफ बढ़ रही है. विकास की गति को तकनीक के सहारे आगे बढ़ाना अच्छा कदम हो सकता है, लेकिन सरकार पेड़ की जड़ों में पानी देने की जगह पत्तियों पर छींटें मार रही है.

क्या एक पढ़े लिखे को व्यक्ति को आॅनलाइन पेमेंट या कार्ड पेमेंट के लिए सरकारी अभियान की जरूरत है? सरकार देश की 35 करोड़ निरक्षर जनता को पढ़ाने लिखाने की जगह समूचे भारत को पहले हाईटेक बनाने की जिद पर अड़ी है. सरकार पहले तो कैंसर के रोग को हार्टअटैक मानती है, उसके बाद दवा भी हार्टअटैक की दे रही है.

नोटबंदी के बाद बैंक और एटीएम के बाहर रात में लोग कतारों में लग कर पैसे निकालने का प्रयास कर रहे हैं.

नोटबंदी के बाद बैंक और एटीएम के बाहर रात में लोग कतारों में लग कर पैसे निकालने का प्रयास कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैशलेस सोसाइटी को लेकर लगातार बयान दे रहे हैं. उन्होंने छात्रों को भी डिजिटल इकोनॉमी और कैशलेस लेनदेन में शामिल होने और दूसरे लोगों को इस बारे में बताने की अपील की है. केंद्रीय मंत्री की ताजा घोषणा इससे आगे का कदम है कि सरकार डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए 100 डिजिटल गांवों को विकसित करेगी जहां विश्वस्तरीय डिजिटल संरचना का निर्माण किया जाएगा.

इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि डिजिटल इकोनॉमी, कैशलेस अर्थव्यवस्था या ई-गवर्नेंस बेहतर व्यवस्थाएं मानी जा रही हैं. लेकिन विकास की निर्धारित प्रक्रियाएं हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो लोग अपने बच्चों को तमाम निचली कक्षाओं में पढ़ाने की बजाय सीधे रिसर्च करने के लिए दाखिला दिलवाते. सरकारें पढ़ाई लिखाई, साधन सुविधा और बुनियादी ढांचों और सुविधाओं पर मोटे मोटे बजट न बनातीं.

निरक्षर लोगों की संख्या बढ़ रही है

ऐसा नहीं है कि आॅनलाइन लेनदेन या कार्ड पेमेंट अचानक शुरू किया जा रहा है. इसे और प्रोत्साहित किया जा सकता था, लेकिन सरकार अचानक नोटों की कमी को पूरा करने के लिए कैशलेस की तरफ जाने को कह रही है. यह नोटबंदी वाली गलती दोहराने जैसा है. अभी उच्च-मध्य का भी बहुत छोटा तबका कैशलेस लेनदेन के साथ सहज है.

कैशलेस इकोनॉमी को अगर सरकार तेजी से आगे बढ़ाती भी है तो भी लोगों को फिलहाल जीवनचर्या के लिए नोटों की ही जरूरत है. जैसे देश के तमाम लोगों ने दो ढाई दशक में कम्प्यूटर सीखा, जैसे मोबाइल चलाना सीखा, जैसे एटीएम से पैसे निकालना सीखा, जैसे आॅनलाइन खरीदारी करना सीखा, वैसे ही ज्यादा से ज्यादा कैशलेस लेनदेन पर भी अमल कर सकते हैं.

यूनीसेफ के मुताबिक, भारत में 60 लाख से ज्यादा बच्चे काम पर लगे हैं.

यूनीसेफ के मुताबिक, भारत में 60 लाख से ज्यादा बच्चे काम पर लगे हैं.

बेहतर होता कि केंद्र सरकार अपनी ज्यादा ऊर्जा पत्ते पर पानी छिड़कने की जगह जड़ों को सींचती. आखिर क्या कारण है कि अशिक्षा, खराब स्वास्थ्य सुविधाओं और भुखमरी के डराने वाले आंकड़ों पर कोई बात ही नहीं छिड़ती?

सोशियो इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस (एसईसीसी-2015) में कहा गया कि भारत में निरक्षर लोगों की संख्या बढ़ रही है. सोशियो इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस में कहा गया कि '2011 की जनगणना के मुकाबले भारतीय गांवों में निरक्षरों की संख्या में 8.6 करोड़ की बढ़ोत्तरी हुई. इन आंकड़ों के लिहाज से देखें तो भारत में पाकिस्तान की दोगुनी आबादी के बराबर और इंडोनेशिया की आबादी से भी ज्यादा भारतीय ग्रामीण निरक्षर हैं.'

विश्व के सबसे ज्यादा निरक्षर वयस्क भारत में

संयुक्त राष्ट्र की 'एजुकेशन फॉर ऑल ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट' (2014) में कहा गया कि विश्व में सबसे ज्यादा निरक्षर वयस्क भारत में हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 28.7 करोड़ वयस्क पढ़ना लिखना नहीं जानते हैं. यह संख्या दुनिया भर की निरक्षर आबादी का 37 फीसदी है.

इस निरक्षरता के कारण भारतीयों को न सिर्फ गरिमापूर्ण जीवन से वंचित रहना पड़ता है बल्कि इसके कारण ही भारत को हर साल 53 अरब डॉलर यानी करीब 27 खरब रुपए का नुकसान सहना पड़ता है.

AFP illiteracy and cashless india

भारत में 28.7 करोड़ वयस्क पढ़ना लिखना नहीं जानते हैं. (फोटो: एएफपी)

भारत में साक्षरता 2011 में 74.4 फीसदी तक दर्ज की गई. इसके मुताबिक, भारत में 82.16 फीसदी पुरुष और 65.46 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं, लेकिन 'यह अब भी विश्व की औसत साक्षरता दर चौरासी फीसद से काफी कम है.'

भारत में फिलहाल स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति दर सत्तर प्रतिशत है, लेकिन स्कूल छोड़ने की दर भी चालीस प्रतिशत है. इसलिए यह आंकड़ा बहुत उत्साहजनक नहीं है.

शिक्षा अधिकार कानून का क्या हुआ?

भारतीय संसद ने 4 अगस्त, 2009 को बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून पास किया था0. 1 अप्रैल, 2010 से इसे लागू कर दिया गया. इसके तहत छह से 14 साल तक के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना हर राज्य की जिम्मेदारी है, क्योंकि इस कानून के तहत शिक्षा बच्चे का मूल अधिकार माना गया. यह कानून भारत की अनपढ़ आबादी के लिहाज से एक बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन कानूनी उपलब्धि जमीन पर कोई परिवर्तन नहीं ला सकती.

अगर साक्षरता दर बढ़ाने की कोशिश की जाए, तो पढ़ी लिखी आबादी को भाषण देकर यह नहीं बताना पड़ता कि वह आॅनलाइन पेमेंट करे या कार्ड पेमेंट का इस्तेमाल करे.

सरकार जिस कैशलेस इंडिया की बात कर रही है, उसमें 35 करोड़ से अधिक अनपढ़ भी तो होंगे! क्या निरक्षरता दूर करने का कोई निश्चित लक्ष्य रखा गया है, या सरकार निरक्षरता को शाश्वत मानकर उस पर बात नहीं करना चाहती? जो नागरिक सक्षम हैं उनके लिए वैकल्पिक आधुनिकतम सुविधाएं देना बुरा नहीं है, लेकिन सरकार को पहले सभी नागरिकों के लिए जीवन जीने की  जरूरी सुविधाएं देनी चाहिए. विकसित होने की पहली शर्त ही पढ़े लिखे होना है.

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