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26 सालों में 28 फीसदी की दर से बढ़े हैं कैंसर पीड़ित, खर्च भी हुआ दोगुना

साल 1990 में ये संख्या 5 लाख 48 हजार थी जो साल 2016 में बढ़कर 11 लाख तक पहुंच गई है

Updated On: Sep 15, 2018 04:15 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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26 सालों में 28 फीसदी की दर से बढ़े हैं कैंसर पीड़ित, खर्च भी हुआ दोगुना

भारत में कैंसर से सबसे ज्यादा नुकसान होता है. स्वास्थ के क्षेत्र में देश में किए जा रहे कुल खर्च में कैंसर की वजह से अनुपातिक योगदान 1990 की तुलना में 2016 में दोगुना हो गया है. पिछले 26 सालों में कैंसर से पीड़ित लोगों की संख्या 28 फीसदी की दर से बढ़ी है. साल 1990 में ये संख्या 5 लाख 48 हजार थी जो साल 2016 में बढ़कर 11 लाख तक पहुंच गई है.

दरअसल कैंसर की बीमारी को लेकर देश की प्रतिष्ठित संस्थान आईसीएमआर,पीएचएफआई और एम्स सहित कई संस्थानो ने मिलकर संयुक्त अध्ययन किया है. जिसे भारत सरकार की दूरदर्शी योजना आयुष्मान भारत के लिए बेहद मददगार बताया जा रहा है. इस अध्ययन को पांच रिसर्च पेपर द लांसेट ग्लोबल हेल्थ, द लांसेट पबलिक हेल्थ, द लांसेट ऑलकोलॉजी और द लांसेट में छापा गया है.

पुरुषों में फेफड़े और महिलाओं में स्तन का कैंसर सबसे घातक

रिपोर्ट में छपे लेख के मुताबिक औरतों में कैंसर से हुई मौत में स्तन कैंसर पहला या दूसरा बड़ा कारण है. जबकि देश के आधे राज्यों में पुरूषों में हुई कैंसर से मौत की वजह फेफड़े का कैंसर पहली या दूसरी बड़ी वजह है. मतलब साफ है कि कैंसर में स्तन कैंसर महिलाओं में और फेफड़े का कैंसर पुरुषों में सबसे घातक है.

राज्यों के हिसाब से साल 2016 में देश के उत्तरी पूर्व राज्यों में सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं. इनमें मिजोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और असम सबसे ज्यादा पीड़ित हैं. जहां कैंसर से मौत अन्य राज्यों की अपेक्षा कहीं ज्यादा हुई हैं.

रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि तंबाकू कैंसर की सबसे बड़ी वजह है. और अन्य वजहों के अलावा तंबाकु की वजह से 10.9 फीसदी लोगों को कैंसर की बीमारी झेलनी पड़ी है. रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि देश के अन्य राज्यों में कैंसर होने की वजहों को समग्र रूप से समझने के लिए और भी गहन रिसर्च की आवश्यकता है. क्योंकि तीन से चार तरह के कैंसर के प्रकार को लेकर लोगों में जागरुकता बढ़ी है लेकिन कैंसर के 24 और प्रकार भी हैं. जिनको लेकर व्यापक पैमाने पर जागरुकता बढ़ाने की जरूरत है.

CancerResearch

अध्ययन के मुताबिक स्तन, सर्विकल और ऑरल कैंसर की जांच शुरूआती दौर में देश में की जा रही है. लेकिन बाकी के अन्य प्रकार के लिए भी प्रारंभिक जांच की सुविधा बढ़ाए जाने की जरूरत है.

महिलाओं और पुरूषों में विभीन्न प्रकार के कैंसर इस प्रकार हैं. पेट नौ फीसदी, स्तन का कैंसर आठ फीसदी, फेफड़ा सात फीसदी, ऑरल कैविटी सात फीसदी, फैरिंक्स नॉशोफेंरिक्स को छोड़कर सात फीसदी, कॉलोन और रेक्टम कैंसर छह फीसदी, ल्यूकेमिया पांच फीसदी, सर्विकल कैंसर पांच फीसदी और ऑसोफेगल चार फीसदी है.

महिलाओं में स्तन कैंसर की आयु मानकीकृत दर में 41 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. जबकि प्रॉस्ट्रेट और लीवर कैंसर में 30 और 32 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वहीं पेट में 40 फीसदी और लिप और ऑरल कैविटी में छह फीसदी सर्विकल कैंसर में 40 फीसदी, ऑसोफेगल मे 31 फीसदी और ल्यूकेमिया में 16 फीसदी कमी दर्ज की गई है. ये बढ़ोत्तरी और गिरावट साल 1990 और साल 2016 के बीच का आंकड़ा है.

हृदयरोग के बाद सबसे ज्यादा मौतें कैंसर से

ध्यान देने योग्य बात यह है कि कैंसर दुनिया में हृदयरोग के बाद दूसरा बड़ा कारण है जिससे लोगों की मौत सबसे ज्यादा होती है. अध्ययन में इस बात का जिक्र है कि भारत जैसे देश में लो इनकम और मिडिल इनकम ग्रुप में हाई इनकम ग्रुप की तुलना में कैंसर को लेकर काफी कम जागरुकता है और उन्हें सस्ती उपचार सेवा मिल पाना भी काफी मुश्किल है.

भारत के तमाम हिस्सों में पहले भी कैंसर के प्रकार और कहां इसका कहर किन कारणों से ज्यादा है जानने की कोशिश की गई हैं. लेकिन हर राज्य में कैंसर के प्रकार का आंकड़ा मिल पाना मुश्किल हो रहा था. रिपोर्ट में इस बात का हवाला दिया गया है कि कैंसर से निपटने के लिए राज्यों की रिपोर्ट ली जानी जरूरी थी. जिससे उसके आकार प्रकार को जानकर उसके इलाज में काफी मदद मिलती. अब इन आंकड़ों की मदद से राज्य को कैंसर से लड़ने में मदद की जा सकेगी क्योंकि स्वास्थ भारत में राज्यों के अधीन का मामला माना जाता रहा है.

लक्ष्य है एक तिहाई गिरावट का

वैसे 1981 में नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम शुरू किया गया था. लेकिन उसके बावजूद भी कई राज्यो में इसे शुरू भी नहीं किया जा सका और कैंसर के पीड़ित का रजिस्ट्रेशन गांव की तुलना में शहरों में बेहतर किया गया है. यूनाइटेड नेशन सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल के तहत नॉन कम्यूनिकेबल डीजीज से मौत की संख्या में एक तिहाई गिरावट का लक्ष्य रखा गया है.

इस लक्ष्य के तहत ही गलोबल बर्डन ऑफ डीजीज,रिस्क फेक्टर स्टडी और इंडिया स्टेट लेवल डीजीज बर्डन इनिसियेटिव का ये संयुक्त प्रयास है. जिससे देश के कोने-कोने का आंकड़ा इकट्ठा कर इसको समझने और नियंत्रित करने के प्रयास पर चर्चा की गई है. इस आंकड़े से भारत सरकार को राज्य दर राज्य अन्य रोगों से सिलसिलेवार तरीके से लड़ने में मदद मिलेगी.

आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ बलराम भार्गव ने कहा कि 'सौ से ज्यादा संस्थानों द्वारा तैयार किया गया ये आंकड़ा कैंसर से लड़ने में और आयुष्मान भारत के तहत देश के विभीन्न राज्यों में कैंसर की रोकथाम और नियंत्रण के लिए समुचित संसाधन के इस्तेमाल में काफी मददगार होगा.'

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