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जकरबर्ग को धमकी दे रहे कानून मंत्री पहले डेटा प्रोटेक्शन कानून क्यों नहीं बनाते?

रविशंकर प्रसाद को गुस्सा आया तो है लेकिन उनके इस गुस्से की विडंबना भी समझी जानी चाहिए. उन्होंने ही कोर्ट तर्क दिया था कि निजता का ऐसा कोई अधिकार नहीं होता जिसे ‘परम’ मान लिया जाए

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Mar 23, 2018 11:43 AM IST

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जकरबर्ग को धमकी दे रहे कानून मंत्री पहले डेटा प्रोटेक्शन कानून क्यों नहीं बनाते?

मुंह खुला- मैने देखा

कि मुंह से पूरा एक सर्कस निकला !

हमेशा की तरह तुम्हारे मुंह से दुनिया का राज बयां हुआ!

अब तुम्हारी आंखों में झांकने की जरुरत ही नहीं

मुझे तुम्हारे एक भी लफ्ज पर यकीन ही नहीं

(बेन हार्पर 'आई डोन्ट बिलीव ए वर्ड यू से' शीर्षक गीत में)

रविशंकर प्रसाद को ये बात समझ लेनी चाहिए कि किसी पर अंगुली उठाकर बात करने के बड़े खतरे हैं. नीयत नेक होनी चाहिए और साहस भरपूर. ये दोनों ना हों और फिर भी आपने किसी पर अंगुली उठाई तो पूरा मामला एक मजाक में तब्दील हो जाता है, अंगुली उठाने वाले की अक्सर किरकिरी होती है.

मार्क जकरबर्ग को धमकी दे रहे हैं कानून मंत्री

बुधवार को केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने मार्क जकरबर्ग को चेतावनी दी कि अगर फेसबुक के जरिए गैरकानूनी तरीके से डेटा शेयर करके भारत के चुनावों में हस्तक्षेप करने की कोशिश हुई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी.

रविशंकर प्रसाद ने चेतावनी के लहजे में कहा कि 'मिस्टर मार्क जकरबर्ग, अच्छा होगा कि आप सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री की बात की गांठ बांध लें. हम भारत में फेसबुक प्रोफाइल का स्वागत करते हैं लेकिन फेसबुक की सूचना-प्रणाली की मिलीभगत से भारतीयों के डेटा चुराने की कोई भी कोशिश हुई तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हमारे आईटी एक्ट में कठोर कार्रवाई के प्रावधान हैं और हम इनका इस्तेमाल करेंगे, आपको समन जारी कर भारत आने पर मजबूर किया जा सकता है.'

तो, यहां दिख रहा है कि एक मुंह खुला और मुंह से पूरा एक सर्कस निकला. और शायद मार्क जकरबर्ग धरती के किसी कोने में अब डर से थर-थर कांप रहा होगा. डॉन क्विहोते, मुंगेरीलाल, शेखचिल्ली और वे सारे के सारे लोग जो सोचते हैं कि उन्होंने मुंह खोल दिया तो जलजला आ जाएगा, अब गर्व कर रहे होंगे.

लेकिन खींचकर लाएंगे कैसे?

जी, आप एकदम से गांठ बांध लें जनाब जकरबर्ग, कि रविशंकर साहब बिल्कुल कार्रवाई करेंगे और पूरा दम लगाकर कार्रवाई होगी, जो लोग डेटा एनालिटिक के जरिए हिंदुस्तानी भाइयों को बर्बाद करने की कोशिश करेंगे उनसे एक-एक गुनाह का हिसाब लिया जाएगा. यकीन कीजिए कि रविशंकर प्रसाद सचमुच जुकरबर्ग को समन भिजवाएंगे और भारत खींच लाएंगे, डेटा की सेंधमारी की कोई हरकत हुई है तो इसके लिए जकरबर्ग पर हमारी सरकार का कहर एकदम से टूट पड़ेगा. आखिर नीरव मोदी, विजय माल्या, ललित मोदी, दाऊद इब्राहिम, हफीज सईद तथा कई और लोगों को उनके पिछलग्गुओं के साथ रविशंकर प्रसाद और उनके सहयोगी भारत की धरती पर खींच लाए कि नहीं? खींच लाए ना?

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रविशंकर प्रसाद का अंगुली उठाना दरअसल बेमानी है. एक खोखला क्रोध एक जमाने से दिल ही दिल में खलबला रहा है और उनका अंगुली उठाना इस क्रोध का इजहार भर है. लेकिन जहां तक चेतावनी को अमली जामा पहनाने की बात है, अगर यह मान भी लें कि जकरबर्ग और उनकी कंपनी पर भविष्य में निजता के अधिकार के उल्लंघन का आरोप लगते हैं, तो ऐसा कोई तरीका नहीं कि इसके लिए समन जारी कर उन्हें भारत खींच लाया जाएगा.

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इसकी वजह सिर्फ यही नहीं कि जकरबर्ग भारतीय नागरिक नहीं है और उन्हें कई कानूनों तथा संधियों के तहत सुरक्षा हासिल है बल्कि एक कारण यह भी है कि भारत में डेटा की हिफाजत का कोई कानून ही नहीं है. अगर कोई खरीदने को तैयार है तो कोई बिचौलिया अपने ग्राहकों की प्रोफाइल को बेच सकता है, उसे ऐसा करने से रोकने के लिए भारत में कोई कानून नहीं है. यह एक बिल्कुल जाहिर सी बात है और बैंक, फोन ऑपरेटर तथा कई और अन्य एजेंसियों के पास मौजूद डेटा का खुले आम दुरुपयोग होता है, इसके लिए किसी को कोई सजा नहीं मिलती. जाहिर है, भारत को प्राइवेट डेटा की हिफाजत के लिए चाक-चौबंद व्यवस्था तैयार करने और कानून बनाने की जरुरत है, खोखली धमकी से इस मोर्चे पर कुछ हासिल नहीं होने वाला.

निजता के अधिकार पर खुद कानून मंत्री ने रखी थी दलील

निजता के अधिकार के उल्लंघन को लेकर रविशंकर प्रसाद को गुस्सा आया तो है लेकिन उनके इस गुस्से की विडंबना भी समझी जानी चाहिए. आखिर देश की अदालत में यह तर्क उन्हीं ने दिया था कि निजता का ऐसा कोई अधिकार नहीं होता जिसे ‘परम’ मान लिया जाए. सरकार की तरफ से बोलते हुए रविशंकर प्रसाद ने तर्क रखा था कि निजता के अधिकार पर कुछ वाजिब जान पड़ती हदबंदियां आयद होनी चाहिए. उनका तर्क था कि व्यक्ति के निजता के अधिकार के ऊपर राजसत्ता की चिंताओं को तरजीह दी जानी चाहिए.

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मौजूदा सरकार और इसके पहले का निजाम भी यही तर्क देता रहा है कि भारतीयों नागरिकों की पहचान की सूचनाएं एक खास-संख्या (आधार नंबर) के तहत दर्ज की जाएंगी. इस कदम का विरोध हुआ, अदालत में चुनौती दी गई लेकिन सरकार ने भारतीय नागरिकों के डेटा एक ही एजेंसी के तहखाने में तालाबंद कर दिए. फिलहाल डेटा एनालिटिक्स पर बवाल मचा है. आरोप है कि अमेरिका के चुनाव में हेराफेरी के लिए गैरकानूनी तौर पर फेसबुक के डेटा का इस्तेमाल हुआ. इस बवाल से निकलने वाला एक संकेत यह भी है कि किसी एक एजेंसी के हाथ में सारा का सारा डेटा-संग्रह थमा देने के बड़े जाहिर से खतरे हैं.

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आधार कितना सुरक्षित है, सब जानते हैं

कुछ हफ्ते पहले ट्रिब्यून अखबार ने साबित कर दिखाया कि संवेदनशील सूचनाएं लीक हो सकती हैं, उनका दुरुपयोग हो सकता है. लेकिन सरकार ने इसे डेटा की सेंधमारी का मामला मानने की जगह खुलासा करने वाले अखबारनवीस पर ही कानून का शिकंजा कस दिया. अब बात बिल्कुल समझी जा सकती है कि अगर कल को अगर फेसबुक का डेटा लीक होता है, उसका दुरुपयोग होता है तो सरकार असली गुनाहगारों पर नहीं बल्कि अपना गुस्सा उनलोगों पर निकालेगी जिन्होंने डेटा की सेंधमारी के मसले का खुलासा किया है.

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भारत सरकार के लिए यह वक्त निजता के अधिकार पर विचार करने और कानून बनाने का है- ऐसे कानून कि सर्विस प्रोवाइडर के लिए ग्राहकों के डेटा का दुरुपयोग करना नामुमकिन हो जाए. सरकार को एक रुपरेखा तैयार करनी चाहिए कि डेटा की सेंधमारी करने वालों को सख्त सजा दी जाएगी, उनपर भारी जुर्माना आयद किया जाएगा.

शुरुआती तौर पर सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि बीजेपी, कांग्रेस और जनता दल (यूनाइटेड) डेटा एनालिटिक्स फर्म की सूची में भारतीय ग्राहक के रुप में क्यों दर्ज किए गए? इसके एक डायरेक्टर ने तो सार्वजनिक तौर पर यह भी कहा है कि फर्म ने चार चुनावों में बीजेपी के साथ मिलकर काम किया.

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