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संजीव चतुर्वेदी को क्यों दिया निगेटिव अप्रेजल, CAT के सामने बताएंगे कैबिनेट सचिव

एम्स के पूर्व चीफ विजिलेंस ऑफिसर(सीवीओ) संजीव चतुर्वेदी के कामकाज का मूल्यांकन करते हुए उन्हें ‘जीरो परफार्मेंस अप्रेजल’ दिया गया था.

Yatish Yadav Updated On: Apr 20, 2018 08:39 PM IST

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संजीव चतुर्वेदी को क्यों दिया निगेटिव अप्रेजल, CAT के सामने बताएंगे कैबिनेट सचिव

एम्स के पूर्व चीफ विजिलेंस ऑफिसर(सीवीओ) संजीव चतुर्वेदी के कामकाज का मूल्यांकन करते हुए उन्हें ‘जीरो परफार्मेंस अप्रेजल’ दिया गया था. ऐसा अप्रेजल देने की पीछे क्या वजहें रहीं इसके बारे में जवाब तलब करने के लिए कैबिनेट सचिव पी.के.सिन्हा को केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल(सीएटी) बुलाया गया है.

हालांकि सरकार को इस बात पर सख्त एतराज है कि कैबिनेट सचिव को मामले में एक पक्ष के रूप में देखा जा रहा है लेकिन गोकुलचंद्र पति तथा जयेश भैरविया वाली सीएटी की बेंच (खंडपीठ) ने 16 अप्रैल 2018 को कैबिनेट सचिव को मामले से जुड़े पक्षों से अलग मानने से इनकार कर दिया.

दरअसल संजीव चतुर्वेदी ने बेंच का ध्यान इस तरफ दिलाया था कि उनका मामला तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निर्देश पर सीधे कैबिनेट सचिव के दफ्तर के जरिए देखा जा रहा था.

सीएटी के नैनीताल स्थित सर्किट बेंच का मानना है कि फिलहाल कैबिनेट सचिव का नाम मामले से जुड़े पक्षों की सूची से हटाने की स्थिति नहीं है. बहरहाल, कैबिनेट सचिव इस बात के लिए आजाद हैं कि अगर मामले में उनकी कोई भूमिका नहीं है तो वे सुनवाई के दौरान इस बारे में अपने तर्क रख सकें.

भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी, मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय(पीएमओ) ने एक चिट्ठी में कैबिनेट सचिव को निर्देश दिया था कि मामले में लिए जा रहे हर फैसले की जानकारी उसे दी जाय.

साल 2012 के 23 नवंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय से जारी की गई चिट्ठी में कहा गया है, 'हिदायत के मुताबिक इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वाले अधिकारी कैबिनेट सचिव से निवेदन करते हैं कि वे सिविल सर्विस बोर्ड से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले मसले को पूरी तरह देख-परख लें और इस कार्यालय को सूचित करें.'

संजीव चतुर्वेदी ने खंडपीठ से यह भी कहा कि उनकी नियुक्ति कैबिनेट सचिव की सिफारिश/मंजूरी से हुई थी और उन्होंने 2015 के दिसंबर महीने में कैबिनेट सचिव से निजी तौर पर मुलाकात करके निवेदन किया था कि उन्हें उचित कार्यभार सौंपा जाय. इसके अलावे संजीव चतुर्वेदी ने अपने मूल आवेदन-पत्र में कैबिनेट सचिव से विशेष निर्देश देने की भी प्रार्थना की थी.

सरकारी पक्ष के वकील का तर्क है कि संजीव चतुर्वेदी के सालाना परफार्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट की तैयारी और उससे जुड़ी जानकारी को साझा करने में कैबिनेट सचिव की कोई भूमिका नहीं है और इस वजह से मामले में कबिनेट सचिव को एक पक्ष नहीं करार दिया जा सकता.

लेकिन खंडपीठ का मानना है कि आवेदक ने अपने आवेदन-पत्र में कैबिनेट सचिव से विशेष रूप से निर्देश मांगा था इसलिए कैबिनेट सचिव का नाम मामले की सुनवाई के मौजूदा हालत में सूची से नहीं हटाया जा सकता.

साल 2015 में संजीव चतुर्वेदी के कामकाज का मूल्यांकन (अप्रेजल) करते हुए उसे ‘शून्य’ बताया गया था. इसी साल संजीव चतुर्वेदी को रमन मैग्सेसे अवार्ड से नवाजा गया. अवार्ड के प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि यह अवार्ड संजीव चतुर्वेदी को उनकी, 'बेमिसाल ईमानदारी, साहस तथा कर्तव्यनिष्ठा के लिए दिया जाता है. उन्होंने निजी लाभ-हानि की कोई चिंता किए बगैर सरकारी दफ्तरों में जारी भ्रष्टाचार को सामने लाने और ऐसे भ्रष्टाचार की जांच करने का अथक प्रयास किया है. उन्होंने कार्यक्रमों तथा व्यवस्था में ऐसे सुधार लाने के प्रयास किए हैं जिससे सरकार को देश की जनता की सेवा सम्मानपूर्वक करने में मदद मिली है.'

साल 2012-13 तथा 2013-14 में संजीव चतुर्वेदी के कामकाज को ‘अति-उत्कृष्ट’(आउटस्टैडिंग) बताया गया था. तत्कालीन स्वास्थ्य-मंत्री ने लिखा था कि संजीव चतुर्वेदी बहुत 'ईमानदार, कर्तव्यपरायण और लगनशील हैं और उन्हें जो काम सौंपा जाता है उसे बिना किसी भय या पक्षपात के अपनी जानकारी तथा काबिलियत के दायरे के भीतर सबसे अच्छे तरीके से पूरा करने की कोशिश करते हैं.'

संजीव चतुर्वेदी ने सीएटी की बेंच के सामने ये दलील भी पेश की है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से मिले निर्देश का कैबिनेट सचिव ने पालन नहीं किया और उन्हें 2014 के अगस्त में एम्स के सीवीओ के पद से अचानक ही हटा दिया गया. संजीव चतुर्वेदी ने 25 जनवरी 2016 को कैबिनेट सचिव को चिट्ठी लिखी थी कि साल 2015-15 के लिए उनकी अप्रेजल रिपोर्ट किसी निष्पक्ष एजेंसी से लिखवाई जाय क्योंकि अप्रेजल रिपोर्ट लिखने में भेदभाव बरता गया है.

संजीव चतुर्वेदी ने अपनी चिट्ठी में लिखा था कि विभाग के नियमों के मुताबिक उन्हें मुख्य रूप से तीन तरह के काम संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी. इसमें एक था बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं का प्रबंधन करना और उनके बीच तालमेल कायम करते हुए काम को समय पर पूरा करना. दूसरा था संस्थान(एम्स) का प्रबंधन तथा देखरेख का काम संभालना और तीसरा काम था एक से ज्यादा विषयों के विशेषज्ञों के बीच समन्वय कायम करना.

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संजीव चतुर्वेदी ने कैबिनेट सचिव को लिखी चिट्ठी में कहा है कि कामकाज से जुड़े निर्देश के अंतर्गत, 'मैंने अपना नया पदभार संभाला, मुझे संस्थान का सीवीओ बनाया गया लेकिन ऊपर बताये गये तीनों कामों में से कोई भी काम मुझे नहीं सौंपा गया. सीवीओ के रूप में काम करने के अतिरिक्त जेनरल सेक्शन, इस्टेट सेक्शन तथा पेंशन से जुड़े कुछ छोटे-मोटे काम भी सौंपे गये थे लेकिन जेनरल सेक्शन का काम 2012 के नवंबर में वापस ले लिया गया. सीवीओ का काम 2014 के अगस्त में, शिकायत निवारण से जुड़ा काम 2015 में तथा इस्टेट सेक्शन का काम 2015 के दिसंबर महीने में वापस ले लिया गया और इस तरह से मेरे जिम्मे कोई भी काम नहीं रह गया था.

'इस बीच साल 2015 की मई में संस्थान से एक आदेश जारी हुआ. इसमें हर तरह की फाईल की सुपुर्दगी पर रोक लगा दी गई और डिप्टी सेक्रेटरी के पद के गठन से पहले की स्थिति को बहाल कर दिया गया. इस कारण मेरे पद का कोई अर्थ ही नहीं रह गया. मुझसे काम वापस लेने के पीछे कोई वजह भी नहीं बतायी गई. साल 2014 के अगस्त में सीवीओ के पद से जुड़ी जिम्मेवारी को वापस ले लिए जाने के बाद मेरे पास करने के नाम पर कोई भी काम नहीं बचा था. पेंशन-पेपर पर दस्तखत करना तथा गेस्ट-हाउस की बुकिंग के बारे में फैसले लेने भर काम अखिल भारतीय सेवा से जुड़े एक ऐसे अधिकारी से तो अपेक्षित नहीं ही है जिसका वेतनमान पीबी-4 स्केल का हो और जिसे केंद्र सरकार ने प्रतिनियुक्ति पर रखा हो.'

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