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पॉलिसी रिव्यू: क्या सरकार से पंगा लेने के मूड में हैं उर्जित पटेल?

आरबीआई की आजादी के मामले में रघुराम राजन के नक्शे कदम पर नए आरबीआई गवर्नर भी

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jun 29, 2017 01:41 PM IST

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पॉलिसी रिव्यू: क्या सरकार से पंगा लेने के मूड में हैं उर्जित पटेल?

2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तब यह माना जा रहा था कि रघुराम राजन को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. रघुराम राजन ने अपना कार्यकाल पूरा किया. हालांकि, बीच-बीच में ऐसी खबरें भी आती थीं कि पॉलिसी रेट घटाने के लिए सरकार लगातार रघुराम राजन पर दबाव बना रही है.

सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद राजन झुके नहीं. वो लगातार कहते रहे कि रेट घटाकर ग्रोथ को बढ़ावा देने से ज्यादा जरूरी महंगाई पर काबू पाना है. राजन की दूरदर्शिता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता क्योंकि यही वो शख्स थे जिन्होंने इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के चीफ इकॉनमिस्ट रहते हुए पहले ही 2008 की आर्थिक मंदी का एलान कर दिया था.

क्या सरकार से बिगड़ रही है बात? 

आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल का जोर भी ग्रोथ के बजाय महंगाई घटाने पर है. राजन के बाद जब पटेल को गवर्नर बनाया गया था तो ऐसा लगा कि अब सरकार और आरबीआई गवर्नर के बीच सब ठीक-ठाक है. लेकिन अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि दोनों के बीच सब ठीक-ठाक नहीं है.

क्या आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी अपनी स्वायत्ता छोड़ने को तैयार नहीं है? REUTERS

क्या आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी अपनी स्वायत्ता छोड़ने को तैयार नहीं है? REUTERS

7 जून 2017 को पॉलिसी रिव्यू में आरबीआई गवर्नर ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया. जबकि सरकार चाहती थी कि रेपो रेट को घटाया जाए ताकि बैंक सस्ते लोन दे सके.

वित्त मंत्रालय के पैनल ने अपनी राय मनवाने की पूरी कोशिश की और पॉलिसी रिव्यू से एक हफ्ते पहले आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) से मीटिंग करना चाहा था. लेकिन एमपीसी के सभी छह सदस्यों ने एक सुर में वित्त मंत्रालय के पैनल के साथ बैठक करने से मना कर दिया था. यह बात आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने बताई, जो एमपीसी के हेड हैं. पटेल से जब यह पूछा गया कि क्या यह बैठक एमपीसी की स्वायत्तता से समझौता होती तो पटेल ने कहा, 'बैठक नहीं हुई. एमपीसी के सभी अधिकारियों ने बैठक से इनकार कर दिया.'

क्या है मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी?

पॉलिसी रिव्यू हर दो महीने पर होती है. रघुराम राजन के समय तक पॉलिसी रिव्यू का फैसला आरबीआई गवर्नर अपनी टीम के साथ मिलकर करता था. इस टीम के सभी सदस्य आरबीआई के अधिकारी ही होते थे.

महंगाई और ग्रोथ को लेकर मिंट रोड और नॉर्थ ब्लॉक के बीच खींचतान हमेशा बनी रहती है. इस समस्या को खत्म करने के लिए ही नरेंद्र मोदी सरकार ने मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) बनाई. इसमें आधे सदस्य सरकार के प्रतिनिधि और आधे आरबीआई के अधिकारी होते हैं. इससे सरकार यह पक्का करना चाहती है कि देश की मॉनेटरी पॉलिसी उसके मुताबिक हो. यह सब आरबाआई एक्ट में बदलाव कर किया गया.

क्या है पॉलिसी रेट? 

आरबीआई रेपो रेट, सीआरआर (कैश रिजर्व रेशियो) और एसएलआर की जो दरें तय करती है उसे पॉलिसी रेट कहते हैं. इन दरों के आधार पर ही बैंक अपनी लोन, रिटर्न आदि की दरें तय करते हैं.

क्या है ग्रोथ रेट और महंगाई का संबंध?

आरबीआई अगर पॉलिसी रेट घटाता है तो बैंकिंग सिस्टम में नकदी बढ़ जाती है. इससे लोगों को सस्ता कर्ज मिलता है. लिहाजा ग्राहकों के हाथ में ज्यादा पैसा रहता है और वे खर्च ज्यादा करते हैं. खर्च बढ़ने से मैनुफैक्चरिंग बढ़ती है, जिससे ग्रोथ को बढ़ावा मिलता है.

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लेकिन दूसरी तरफ खर्च बढ़ने के अपने साइडइफेक्ट्स हैं. सिस्टम में नकदी बढ़ने पर पैसे से इससे महंगाई को बढ़ावा मिलता है. महंगाई बढ़ने पर रुपए का अवमूल्यन होता है, जिससे अर्थव्यवस्था कमजोर होती है. ऐसे में एक तरफ सरकार पॉलिसी रेट में कटौती पर जोर डालती है दूसरी तरफ आरबीआई महंगाई पर काबू पाने की हर मुमकिन कोशिश करता है.

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