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हम कर्ज लेने में हिचकते हैं जबकि अमेरिका का प्रेसिडेंट भी कर्जदार है: मिलिंद देवड़ा

हमें समाज में ऐसी जागरूकता पैदा करनी होगी, जो जान-बूझ कर कर्ज न चुकाने वालों और ईमानदार कारोबारियों में फर्क करना सीखे

Updated On: Aug 05, 2017 05:19 PM IST

Milind Deora Milind Deora

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हम कर्ज लेने में हिचकते हैं जबकि अमेरिका का प्रेसिडेंट भी कर्जदार है: मिलिंद देवड़ा

बीते बुधवार को रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति कमेटी ने रेपो रेट में चौथाई फीसद की कटौती का ऐलान किया. अब रिजर्व बैंक की रेपो रेट घटकर 6 फीसद हो गई है. ये पिछले सात सालों में सबसे कम दर है.

रिजर्व बैंक के इस फैसले के पीछे की वजह को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है. कोई कह रहा है कि महंगाई दर कम होने की वजह ये कदम उठाया गया. तो कुछ लोगों का ये मानना है कि कर्ज की मांग कम होने और निवेश कम होने की वजह से रिजर्व बैंक ब्याज दर घटाने को मजबूर हुआ.

वजह कोई भी हो, ब्याज दर घटाने का फैसला अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर है. ये विकास दर और निवेश बढ़ाने में अहम रोल निभा सकता है. ये शेयर बाजार के लिए भी अच्छी खबर है. ब्याज दर कम होने से लोग बाजार में निवेश करते हैं. इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों पर निर्भरता कम होती है. ये उन लोगों को भी बाजार में निवेश के लिए प्रोत्साहित करता है, जो बाजार का जोखिम उठाने से बचते हैं. इससे बाजार में पैसा भी आता है और लोगों की आमदनी भी बढ़ती है.

रिजर्व बैंक के रेपो रेट घटाने से इस बात की उम्मीद है कि कर्ज लेने की रफ्तार बढ़ेगी. लेकिन खुद रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि इस साल अप्रैल में कर्ज लेने की दर में पांच फीसद की दर से बढ़ोतरी हुई. ये पिछले कई दशकों की सबसे कम दर है. सवाल ये है कि आखिर कारोबारी कर्ज क्यों नहीं ले रहे हैं? इसकी कई वजहें हो सकती हैं.

सबसे बड़ी वजह तो ये है कि बुनियादी ढांचे के विकास का कोई बड़ा और नया प्रोजेक्ट नहीं शुरू किया गया है. न ही संचार के क्षेत्र में न ही बिजली के क्षेत्र में. इसीलिए बैंकों से कर्ज की मांग नहीं बढ़ रही है.

दूसरी वजह कर्ज को लेकर परंपरागत भारतीय सोच है. आम तौर पर भारतीय कर्ज लेने को बुरी बात मानते हैं. बचत करने में ज्यादा यकीन रखते हैं. इसी वजह से बैंकों के कर्ज बांटने की दर बहुत कम होती है. कारोबारी कम से कम कर्ज लेना चाहते हैं. क्योंकि अगर वो कर्ज नहीं चुका पाते, तो, उन्हें भ्रष्ट और धोखेबाज करार दिया जाता है. इसी तरह बैंक भी कर्ज बांटने में एहतियात बरतते हैं. क्योंकि जिसको उन्होंने कर्ज दिया अगर वो नाकाम रहा, तो उनके ऊपर भ्रष्ट होने का आरोप लगेगा.

वहीं, अगर आप अमेरिका में दिवालियापन को देखें तो वहां कर्ज लेना बुरा नहीं माना जाता. डोनाल्ड ट्रंप जो आज वहां के राष्ट्रपति हैं, वो खुद ही ऐलान किया करते थे कि उन्होंने कर्ज लेकर कारोबार में कामयाबी हासिल की. हम भारत में ऐसा होने की उम्मीद भी नहीं कर सकते.

President Donald Trump

अमेरिका में कर्ज लेकर नया उद्योग लगाने वाला अगर नाकाम भी होता है, तो, उसकी इमेज पर कोई असर नहीं पड़ता. लेकिन भारत में हालात इसके उलट हैं. अमेरिका में लोग बैंकों से कर्ज लेने को आसान समझते हैं. इसमें जोखिम भी कम होता है और ब्याज दर भी कम होती है. मगर भारत में कारोबारी, बाजार से पैसा लेने को आसान जरिया समझते हैं. इसमें बदनामी का डर जो नहीं रहता.

हालांकि ये कर्ज लेना कोई बहुत अच्छी बात नहीं. मैं खुद क्रेडिट कार्ड के बजाय डेबिट कार्ड के इस्तेमाल को बेहतर समझता हूं. लेकिन आज की तारीख में हमें, कर्ज को लेकर जो गलत राय है, उससे उबरने की जरूरत है. वरना जिस वजह से कर्ज लिया जाता है, वो वजह ही खत्म हो जाएगी. इसमें जोखिम तो है, लेकिन तरक्की के लिए कर्ज का बढ़ना भी जरूरी है. आज जरूरत ये है कि हम कर्ज लेने के बाद उसे चुकाने में जो जोखिम हैं, उन्हें कम करें.

इस काम में सरकार का रोल अहम हो जाता है. सरकार को कर्ज लेकर चुका पाने में नाकाम लोगों को बदनाम करने से बचना चाहिए. साथ ही ऐसे कर्ज बांटने वाले बैंकरों के खिलाफ भी कोई अभियान चलाने से बचने की जरूरत है. जब तक कर्ज बांटने और इसके इस्तेमाल में भ्रष्टाचार के ठोस सबूत न हों, तब तक हमें कर्ज देने-लेने के लिए अच्छा माहौल बनाने की जरूरत है.

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हमें समाज में ऐसी जागरूकता पैदा करनी होगी, जो जानबूझ कर कर्ज न चुकाने वालों और ईमानदार कारोबारियों में फर्क करना सीखे. 2016 का इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी यानी दिवालिया घोषित किए जाने का कोड इस दिशा में बिल्कुल सही कदम है. इसके जरिए वो कंपनियां खुद से अपनी बुरी हालत का ऐलान कर सकती हैं. जिससे देनदार उनसे अपनी रकम वसूल सकें. कई बार ऐसा होता है कि लोगों का कारोबार नाकाम हो जाता है. वो कर्ज नहीं चुका पाते. ऐसे लोगों को लेकर हमें राय बदलने की जरूरत है. ताकि वो बदनामी न झेलें. तभी हम बैंक लोन के जरिए विकास की रफ्तार बढ़ा सकेंगे.

(लेखक पूर्व सांसद हैं और केंद्रीय संचार व आईटी और जहाजरानी व बंदरगाह मंत्री भी रह चुके हैं)

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