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बुलंदशहर हिंसा: जब हिंदुवादी शहर जला रहे थे...मुसलमान धर्म के नाम पर करोड़ों बहा रहे थे

मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा मानता है कि तब्लीग़ी जमात मुसलमानों को इस्लामी तरीके से जिंदगी गुजारना तो सिखाती है लेकिन उसका सारा जोर मरने के बाद की दुनिया पर होता है.

Updated On: Dec 05, 2018 04:10 PM IST

Yusuf Ansari

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बुलंदशहर हिंसा: जब हिंदुवादी शहर जला रहे थे...मुसलमान धर्म के नाम पर करोड़ों बहा रहे थे

उत्तर प्रदेश का बुलंदशहर करीब हफ्ते भर से देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है. पहले यह शहर यहां हुए तब्लीग़ जमात के अंतर-राष्ट्रीय इज़्तिमा को लेकर चर्चा में रहा. इज़्तिमा से ज्यादा चर्चा इसमें शिरकत करने पाकिस्तान को छोड़ दुनिया भर से लाखों की तादाद में आने वाले मुसलमानों को लेकर रही. इज़्तिमा में शिरकत करने वाले मुसलमानों की तादाद 10 लाख से लेकर 30 लाख तक बताई जा रही है. इतनी बड़ी तादाद में मुसलमानों का किसी एक जगह इकठ्ठा होना कौतुहल और चर्चा का विषय बनना तो लाजिमी है.

खास कर ऐसे समय में यह कौतुहल और बढ़ जाता है जब संघ परिवार और अन्य हिंदू संगठन देश भर में राम मंदिर के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हों. शिवसेना अध्यक्ष खुद अयोध्या जाकर राम मंदिर के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे हों. राम मंदिर बनाने को लेकर हिंदू समाज को उकसाने की कोशिशें हो रही हों. किसी राज्य में विधान सभा चुनाव हो रहे हों और वहां बीजेपी की सरकार और साख दोनों ही दांव पर लगीं हों. ऐसे में हर कोई खासकर हिंदू समाज जानना चाहता है कि आख़िर इतनी बड़ी तादाद में मुसलमान एक जगह एकत्र होकर क्या करेंगे.?

सफेद लंबा कुर्ता, ऊंचा पाजामा, सिर पर टोपी और लंबी दाढ़ी वाले लाखों मुसलमान तब्लीग़ जमात के इज़्तिमा में अक्सर शिरकत करते हैं. इसी साल कुछ महीने पहले महाराष्ट्र के औरंगाबाद और पिछले साल नवंबर में भोपाल में भी इसी तरह का बड़ा इज़्तिमा हुआ था. मुसलमानों को बड़ी तादाद में एक जगह इकठ्ठा होते देख अनजानी आशंका पहली बार पैदा हुई है. हर कोई यह जानने को उत्सुक था कि कहीं मुसलमानों का यह जमघट संतो की धर्म संसद की तरह तो नहीं हैं जिसमें अयोध्या पर तो कोई फैसला हो.

2016 में गुजरात के अहमदाबाद में हुई इज़्तिमा की तस्वीर. ( रॉयटर्स )

2016 में गुजरात के अहमदाबाद में हुई इज़्तिमा की तस्वीर. ( रॉयटर्स )

बुलंदशहर में हुए तब्लीग़ जमात के तीन दिवसीय इज़्तिमा को लेकर हिंदू समाज में पहली बार अजीब सी बेचैनी दिखी. कई सवाल उठे. कई दोस्तों ने मुझसे भी फोन करके पूछा कि भाई यह क्या बवाल है. क्यों जमा हो रहे हैं लाखों मुसलमान? क्या करेंगे? किन मुद्दों पर चर्चा होगी? अयोध्या को लेकर भी कोई प्रस्ताव आएगा क्या? मुसलमानों का यह मजमा संतों की धर्म संसद का जवाब तो नहीं है? अगर लाखों की यह भीड़ बेकाबू हो गई तो क्या होगा? मैंने उन्हें समझाया कि डरने की कोई बात नहीं है. इज़्तिमा में जमीन के नीचे और आसमान से ऊपर की बातें होंगी. मौलवी हजरात मुसलमानों को कब्र के अजाब से डराएंगे और जन्नत में हूरों के ख्वाब दिखाएंगे.

देश में फिर से राम मंदिर आंदोलन शुरू करने के बीच हुए तब्लीग़ जमात के इस इज़्तमा ने हिंदू समाज में अनजाना डर पैदा किया. हिंदू संगठनों ने इसी डर को भुनाने की कोशिश की. इज़्तिमा ख़त्म होने के कुछ ही घंटों बाद वहां से क़रीब 45 किलोमीटर दूर स्याना में पहले गौहत्या की अफवाह उड़ाई गई. फिर उस पर बवाल मचाया गया. कई वाहन फूंक डाले गए. थाने को आग के हवाले कर दिया गया. इस बवाल में दो साल पहले दादरी के बिस्हाड़ा गांव में मॉब लिचिंग के पहले शिकार बने अख़्लाक की हत्या की जांच कर चुके पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की गोली मार कर हत्या कर दी गई. आम नागरिक सुमित कुमार की भी गोली लगने से मौत हुई है.

स्थानीय पुलिस ने सूझबूझ दिखाते हुए तेजी से कार्रवाई की और सांप्रदायिक माहौल खराब करने की बड़ी साजिश को नाकाम कर दिया. पुलिस को शक है कि गौहत्या के बाद उसके टुकड़े खेतों में पेड़ों पर लटकाने का कारनामा इज़्तिमा से लौट रहे मुसलमानों और स्थानीय लोगों के बीच हिंसा कराने के मकसद से किया गया गया था.

पुलिस ने साजिश नाकाम कर दी. पहली बार पुलिस ने हिंदूवादी संगठनों के बड़े स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार करके जेल भेजा है. इसके लिए पुलिस की तारीफ हो रही है. पुलिस को शक है कि इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या साजिश के तहत की गई है और बलवाइयों का मकसद जिले के एक और बड़े पुलिस अधिकारी की हत्या करना भी था लेकिन खुशकिस्मती से वो बच गया.

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उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने साफ कर दिया है कि बुलंदशहर में इज़्तिमा के आखिरी दिन ही हिंदू संगठनों का बवाल मचाना एक साजिश का हिस्सा है. इसे बेनकाब करने पुलिस जुटी है. इज़्तिमा और इस बवाल से सूबे ही नहीं बल्कि देश की सियासत का पारा चढ़ा हुआ है.

दोनों के बीच तार जोड़ने की की कोशिशें हो रही हैं. हालांकि पुलिस ने साफ कर दिया है कि स्याना के बवाल से बुलंदशहर के इज़्तिमा का कोई लेना-देना नहीं है. दोनों के बीच किसी तरह को कोई तार नहीं जुड़े हैं. ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर यह तब्लीग जमात क्या है? इसका मकसद क्या है? यह कैसे काम करती है? और साल में दो तीन बार देश के अलग-अलग हिस्सों में इसके बड़े इज़्तिमा क्यों होते हैं और इनमें क्या और कैसी बातें होती हैं?

क्या है तब्लीग़ जमात

जयपुर के ईदगाह में नमाज अदा करते मुस्लिम बंधु. (पीटीआई)

प्रतीकात्मक तस्वीर

तब्लीग़ी जमात दुनिया भर में सुन्नी इस्लामी धर्म प्रचार का आंदोलन है. यह मुसलमानों को इस्लाम की बुनियादी शिक्षा देता है और इस्लाम के बुनियादी उसूलों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने की तरबियत यानि ट्रेनिंग देता है. इस आंदोलन की शुरुआत 1927 में मौलवी मुहम्मद इलियास कांधलवी ने की थी. उस वक्त आर्य समाज और अन्य कई हिंदू संस्थाएं मुसलमानों और ईसाइयों के बीच घर वापसी कार्यक्रम चला रहे थे.

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ऐसे में मौलवी इलियास ने महसूस किया कि अगर मुसलमान दीन-ए-इस्लाम से गाफिल रहे तो बड़े पैमाने पर वो फिर से हिंदू बन सकते हैं. इसलिए उन्होंने मुसलमानों को नमाज, रोजे और अलग पहचान के लिए कुर्ता पाजामा टोपी और दाढ़ी रखने पर जोर देने के लिए आंदोलन चलाया गया. आज दुनिया के 200 से ज्यादा देशों में करोड़ों मुसलमान तब्लीग़ी जमात से जुड़े हैं.

तब्लीग़ जमात के छह उसूल

तब्लीग़ जमात मुख्य रूप से छह उसूलों पर काम करती है. जमात का असली मकसद इन छह उसूलों को हर मुसलमान की जिंदगी का अभिन्न अंग बनाना है. इसके लिए जमात से जुड़े लोग मस्जिदों में चर्चा करके और घर-घर जाकर इन उसूलों पर चलने को प्रेरित करते हैं. ये छह उसूल इस तरह हैं.

ईमान: अल्लाह एक है. उसके सिवाय कोई दूसरा माबूद (पूजने लायक) नहीं. हजरत मुहम्मद सल्लाहु अलैयहि वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं. इसका यकीन ही ईमान है. उलेमा के मुताबिक ये यकीन बन गया तो लोग खुद ही बुराइयों से बचने लगेंगे और भलाई के कामों की तरफ बढ़ेंगे.

सलात यानी नमाज: अपने तमाम काम करते हुए भी अल्लाह को याद करना. उलेमा के मुताबिक दिन में पांच वक्त की नमाज हर एक मुसलमान पर फर्ज है, इसलिए तय समय पर नमाज अदा करनी चाहिए. उलेमा बताते हैं कि जब अजान होने लगे तो दुनिया के सभी काम छोड़कर नमाज अदा की जानी चाहिए ताकि अल्लाह की इबादत हो सके.

इल्म और जिक्र: अच्छाई और बुराई में फर्क कर सकें, इतना इल्म हर एक के लिए जरूरी है. महिलाओं और पुरुषों के लिए इसकी कोई सीमा नहीं है. जितना हो सके, ज्ञान हासिल करना चाहिए. जिक्र यानी अल्लाह को याद करना, हमेशा अल्लाह को याद करो, ऐसा करने से दिलों से बुरे खयाल निकलेंगे.

इखलास-ए-नियम: कोई भी भलाई का काम करने में दिखावे या अहंकार की भावना नहीं होनी चाहिए. मुसलमान को हर काम अल्लाह तो खुश करने के मकसद से करना चाहिए. काम चाहे दीनी हो या दुनियावी. उलेमा के मुताबिक मदद के दौरान अगर दिखावे की भावना आ गई तो वो मदद फिजूल हो जाती है.

इकरामे मुस्लिम: बड़ों का अदब, छोटों से प्यार. अपनों से बड़ों के साथ अदब और लिहाज से पेश आएं, उनका ऐहतराम करें, वहीं अपने से छोटों से प्यार से पेश आएं. उन्हें भलाई की सीख दें और बुराई की तरफ जाने से रोकें. अगर किसी का पड़ोसी दुखी है तो उसकी इबादत कुबूल नहीं होगी. मुसलमानों का व्यवहार किसी को दुख पहुंचाने वाला न हो.

तब्लीगी का वक्त: रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने सभी दिन-रात काम में जुटे रहते हैं. इसके बीच कुछ समय ऐसा हो, जिसमें कुछ नया सीख सकें या जिन्हें नहीं आता उन्हें सिखा सकें. समय के साथ इंसानों में कुछ बुराइयां आ जाती हैं. हर मुसलमान को कुछ वक़्त कुरआन, नमाज और जिक्र सीखने और सिखाने के लिए निकालना चाहिए.

कैसे काम करती है तब्लीग़ी जमात

तब्लीग़ी जमात के काम करने का तरीका बड़ा ही साधारण है. तब्लीग़ से जुड़े लोग अपना वक़्त और अपना पैसा खर्च करके मुसलमानों के बीच काम करते हैं. ये लोग मुख्य रूप से मस्जिदों में तब्लीग़ का काम करते हैं. नमाज के बाद इस बात पर चर्चा करते हैं कि इस्लामी उसूलों को जिंदगी में उतारने से कैसे सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है. जो लोग मस्जिदों में नहीं आते उन्हें घर-घर जाकर समझाया जाता है. इसी तरह लोग 10-20 लोगों को ग्रुप बनाकर गांव, क़स्बों, शहरों और देश विदेश में जमात लेकर जाते हैं. जमात में तीन दिन, दस दिन, चालीस दिन, चार महीना के लिए जाते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

साल में दो या तीन बार इज़्तिमा होते है. ये इज़्तिमा, जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय स्तरीय और अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर होते हैं. इज़्तिमा के स्तर के हिसाब से उसमें अलग-अलग जगहों से लोग आते हैं. इज़्तिमा पर होने वाले तमाम खर्च लोग आपस में मिलकर उठाते हैं. इसमें किसी भी तरह किसी राज्य सरकार या केंद्र सरकार से आर्थिक मदद नहीं ली जाती.

तब्लीग जमात और पाकिस्तान

तब्लीग जमात पाकिस्तान में भी है. लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच तब्लीग़ जमाअत का आन जाना नहीं है. भारत से पाकिस्तान में न तो तब्लीग़ जमाअत जाती है और न ही वहां से भारत में जमाअत आती है. भारत से हर साल हज़ारों लोग पाकिस्तान को छोड़कर दुनिया भर में तब्लीग़ जमाअत में जाते हैं.

सवालों के घरे में तब्लीग़ जमात

पिछले कुछ साल से तबलीग़ जमात सवालों के घेरे में है. तब्लीग़ जमात के सदर मौलवी साद और उनके दूसरे सहयोगियों के बीच इसकी रहनुमाई को लेकर झगड़ा है. जबरदस्त गुटबाजी है. हज़रत निज़ामुद्दीन स्थित इसके मरकज (मुख्यालय) पर दो साल पहले बड़ा झगड़ा हुआ था. गोली तक चली थी. पुलिस में रिपोर्ट तक दर्ज हुई. बाद में तब्लीग़ जमात दो गुटों में भी बंट गई.

साल भर पहले दारुल उलूम देवबंद ने तब्लीग जमात के सदर मौलाना साद पर गुमराही, इस्लामिक शरियत के गलत मायने बताने और अल्लाह के पैगम्बरों का अपमान करने का आरोप लगाते हुए फतवा जारी किया था. उसके बाद दारुल उलूम देवबंद मे तब्लीग़ जमात की तमाम गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी गई.

दरअसल मौलवी साद ने पिछले साल भोपाल इज़्तिमा में हज़रत निजामुद्दीन स्थित तब्लीग़ जमात के मरकज़ (मुख्यालय) को मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र समझे जाने वाले मक्का और मदीना के बाद सबसे पवित्र जगह बताया था.

इस बयान के बाद दारुल उलूम देवबंद ने मौलवी साद के कुछ और बयानों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने पैगम्बरों की शान में गुस्ताखी की है और अपने कैपंस में उनके नेतृत्व वाली जमात की गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी.

तब्लीग जमात के इज़्तिमा से क्या हासिल हुआ

यह सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि दुनिया भर में चल रही जमात की गतिविधियों और साल में दो-तीन बार होने वाले इज़्तिमा का हासिल क्या है? इसमे कोई शक नहीं है पिछले 90 साल से चल रही तब्लीग़ जमात की गतिविधियों से मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा नमाज रोज़ों से जुड़ा है. मुसलमानों के बीच किसी भी दूसरे संगठन का इतना जनाधार नहीं है जितना तब्लीग जमात का है. यह पूरी तरह गैर राजनीतक है. इसकी यही सबसे बड़ी खूबी है और यही सबसे बड़ी खामी भी मानी जाती है.

मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा मानता है कि तब्लीग़ी जमात मुसलमानों को इस्लामी तरीके से जिंदगी गुजारना तो सिखाती है लेकिन उसका सारा जोर मरने के बाद की दुनिया पर होता है. जिंदगी को बेहतर बनाने और समाज की बुराइयां दूर करने पर उतना जोर नहीं होता. लोग यह भी सवाल उठाते हैं कि साल में दो-तीन जगहों पर बड़ा इज़्तिमा करके अरबों रुपए खर्च करने की बजाए अगर यही रकम मुस्लिम समाज को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए स्कूल कालेज खोलने, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने केलिए अस्पताल खोलने पर खर्च की जाए तो मुस्लिम समाज का ज्यादा भला होगा. अभी तो ये बाते तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों के बुरी लगती हैं लेकिन आने वाले वक्त में उन्हें इसकी अहमियत जरूर समझ में आएंगी.

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