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रोजगार के मसले पर हमें पकौड़ा बेचने और भीख मांगने के तर्कों से बाहर आना होगा

मोदी सरकार के लिए यह बजट शायद एक मौका है कि वह देश में नौकरियों के माहौल पर स्पष्टता पैदा करे और इस बारे में आधिकारिक आंकड़े प्रस्तुत करे

Dinesh Unnikrishnan Updated On: Jan 29, 2018 01:10 PM IST

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रोजगार के मसले पर हमें पकौड़ा बेचने और भीख मांगने के तर्कों से बाहर आना होगा

जॉब क्रिएशन को लेकर क्वॉलिटी डेटा का भारत में भारी अभाव है. लेबर ब्यूरो के आंकड़े काफी अंतराल के बाद आते हैं और इन नतीजों से कई सवाल पैदा होते हैं. हालांकि, प्राइवेट सर्वेयर्स भी मौजूद हैं, लेकिन इनकी खोजें हमेशा अच्छे सैंपल की तलाश में ऊंट के मुंह में जीरे जैसी होती हैं.

यही हाल निजी अर्थशास्त्रियों की सैद्धांतिक खोजों का भी है जो कि नए तरीकों को अपनाने की मांग करते हैं. इसका एक उदाहरण एसबीआई के अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष के ईपीएफओ आंकड़ों के आधार पर जॉब डेटा की स्टडी करने की वकालत है. शुद्धतावादी इन तरीकों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं. इनका कहना है कि इन तरीकों में डुप्लिकेशन की आशंका रहती है और गलत मेथेडोलॉजी से कई बार पेचीदे और गुमराह करने वाले नतीजे सामने आते हैं.

ईपीएफओ बेस्ड जॉब क्रिएशन स्टडी

मिसाल के तौर पर आईआईएम बेंगलौर के पुलक घोष और एसबीआई के सौम्य कांति घोष की एक संयुक्त स्टडी को देखा जा सकता है. यह स्टडी एंप्लॉईज प्रॉविडेंट फंड ऑर्गनाइजेशन (ईपीएफओ), एंप्लॉईज स्टेट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (ईएसआईसी), जनरल प्रॉविडेंट फंड और नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) के आंकड़ों के आधार पर भारत में पैदा हुई नई नौकरियों पर की गई थी. इसमें दावा किया गया कि फिस्कल ईयर 2017-18 में नवंबर तक 36.8 लाख नौकरियां पैदा हुईं. इसका मतलब है कि पूरे साल के लिए यह आंकड़ा 55 लाख नौकरियों का होगा. यह हमारी अब तक की समझ को तोड़ता है.

इस तरीके का प्रतिवाद

लेकिन, इन आंकड़ों का प्रतिवाद सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी प्राइवेट लिमिटेड के एमडी और सीईओ महेश व्यास ने किया है. एक कॉलम में उन्होंने तर्क दिया है कि नौकरियों का आकलन करने का यह तरीका गड़बड़ियों से भरा है.

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व्यास ने लिखा है, ‘रोजगार का अनुमान लगाने के लिए ईपीएफओ के आंकड़ों का इस्तेमाल करना हमेशा जोखिम भरा होता है. ईपीएफओ की 2015-16 की एनुअल रिपोर्ट में 17.14 करोड़ मेंबर्स बताए गए हैं. 2014-15 में ईपीएफओ की मेंबरशिप में 4.1 करोड़ का और 2015-16 में 1.3 करोड़ सदस्यों का इजाफा हुआ. रोजगार का हिसाब लगाने के लिहाज से यह अविश्वसनीय तरीका है.’ व्यास ने ईपीएफओ-बेस्ड जॉब डेटा असेसमेंट की वकालत करने वालों पर सवाल उठाए हैं. आर्थिक विश्लेषण की एक सम्मानित संस्था सीएमआईई ने भी जो सवाल उठाए हैं उन पर भी गौर करना वाजिब है.

सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी बढ़ी

सरकार के खुद के आंकड़ों के मुताबिक, नरेंद्र मोदी सरकार के तीन सालों में बेरोजगारी में इजाफा हुआ है. 2015-16 में बेरोजगारी बढ़कर 5 पर्सेंट पर पहुंच गई जो कि 2013-14 में 4.9 पर्सेंट थी. इस हिसाब से रिफॉर्म्स पर फोकस बढ़ाने से नौकरियां पैदा नहीं हुईं. साफतौर पर ईपीएफओ-बेस्ड स्टडी इस के उलट आंकड़े देती है.

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ईपीएफओ-बेस्ड की दिक्कतें

जैसा कि इस लेखक ने अपने पिछले लेख में जिक्र किया था, ईपीएफओ बेस्ड जॉब स्टडी में दो मुख्य समस्याएं हैं. पहली समस्या यह है कि यह इनफॉर्मल या अनौपचारिक सेक्टर के आंकड़ों को शामिल नहीं करती क्योंकि ईपीएफओ में यह सेक्टर कवर नहीं किया जाता. इनफॉर्मल सेक्टर में भारत में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है, इनमें से ज्यादातर अनस्किल्ड मजदूर होते हैं.

2016 के अंत में नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार इसी सेक्टर पर पड़ी थी. इस फैसले से छह महीने तक पूरा सिस्टम बेकार हो गया था. सरकार की एंप्लॉयमेंट गारंटी स्कीम के तहत फैक्टरी जॉब्स से रोजनदारी या दिहाड़ी मजदूरी के कामों में बड़ा शिफ्ट हुआ. इससे भी पता चलता है कि नोटबंदी के इनफॉर्मल सेक्टर पर कितने भारी दुष्परिणाम हुए हैं. इस सेगमेंट में रियल टाइम एंप्लॉयमेंट ट्रेंड को हम किस तरह से जान सकते हैं? सरकार को इस बारे में गहनता से सोचने की जरूरत है.

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आंकड़ों में अंतर

दूसरा, प्रमुख मैक्रो-इकनॉमिक आंकड़ों और घोष द्वय की रोजगार स्टडी के बीच में अंतर दिखाई देता है. यह अंतर खपत, इनवेस्टमेंट ट्रेंड्स में भी जाहिर होता है. इकनॉमी से अलग-अलग विरोधाभासी सिग्नल कैसे मिल सकते हैं? संक्षेप में, फिलहाल हमारे पास दावों और प्रति-दावों के बाहर जॉब क्रिएशन को लेकर कोई सही तस्वीर नहीं है. सरकार और उसके समर्थकों का दावा है कि जॉब क्रिएशन की तस्वीर में सुधार हुआ है. ये लोग सरकार की मुद्रा योजना, स्टैंडअप इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसी स्कीमों की सफलता को इसका साक्ष्य मान रहे हैं, लेकिन विपक्ष इन दावों को स्वीकार करने के लिए राजी नहीं है.

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चिदंबरम का हमला

रविवार को कांग्रेस लीडर और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दफ्तर के बाहर पकौड़ा बेचने को जॉब क्रिएशन बताने वाले बयान की आलोचना करते हुए कहा कि इस मानक से भीख मांगने को भी नौकरी कहा जा सकता है.

चिदंबरम ने कहा कि नौकरी और सेल्फ-एंप्लॉयमेंट दो अलग-अलग चीजें हैं और सरकार को नई नौकरियों की बात करते वक्त इसे समझना चाहिए. चिदंबरम ने एक ट्वीट में कहा, ‘नौकरियों पर बहस में, यह अहम है कि नौकरी और सेल्फ-एंप्लॉयमेंट में अंतर समझा जाए. जॉब एक निश्चित, रेगुलर और अपेक्षाकृत सुरक्षित होती है. हम यह जानना चाहते हैं कि ऐसी कितनी नौकरियां पैदा हुई हैं.’

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बेकार की बहस छोड़कर सार्थक चर्चा हो

आरोप-प्रत्यारोप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से नौकरियों के आंकड़ों की बहस आगे नहीं बढ़ेगी. कांग्रेस और बीजेपी को गलत तरीके से निजी हमले करने से बचना चाहिए और सकारात्मक बहस करनी चाहिए. मोदी सरकार के लिए यह बजट शायद एक मौका है कि वह देश में नौकरियों के माहौल पर स्पष्टता पैदा करे और इस बारे में आधिकारिक आंकड़े प्रस्तुत करे. शायद सरकार को नई नौकरियां पैदा होने के आकलन का एक नया तरीका और रोडमैप बताना चाहिए. यह भारत जैसी बड़ी इकनॉमी के लिए यह जरूरी है. इस पर पकौड़ा विक्रेता बनाम भीख मांगने वाले जैसे हमलों के बाहर जाकर चर्चा करनी होगी.

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