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बजट 2017: शिक्षा पर खर्च बढ़ने से खत्म होगी टेंशन

जीडीपी का 6 फीसदी खर्च किए बिना देश में शिक्षा का उद्धार नहीं

Updated On: Jan 31, 2017 10:37 PM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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बजट 2017: शिक्षा पर खर्च बढ़ने से खत्म होगी टेंशन

शिक्षा की भी देश के विकास के बुनियादी नींव तैयार करती है. चाहे वह प्राइमरी शिक्षा हो या उच्च शिक्षा, दोनों का उद्देश्य देश और समाज के लिए बेहतर नागरिक तैयार करना होता है. इस वजह से शिक्षा को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है.

सभी के लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था करना देश के सरकारों की मुख्य जिम्मेदारी है. लेकिन आंकड़ों और तथ्यों से यह साफ है कि चाहे वह केंद्र की सरकारें रही हों या राज्य की सरकारें, अधिकांश ने इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का ही काम किया है.

कमिटियों और कानूनों के बावजूद खस्ता हालत 

कई आयोगों और आरटीई जैसे कानून के बावजूद आज भी देश में 28.7 करोड़ लोग अशिक्षित हैं. 10 वीं तक आते-आते 62 फीसदी छात्र स्कूल छोड़ देते हैं. दलित और आदिवासी छात्रों के संदर्भ में यह आंकड़ा 70 से 80 फीसदी तक है. उच्च शिक्षा में भी हालात बहुत ठीक नहीं हैं.

अब जबकि आम बजट 2017 आ रहा है, तब इन आंकड़ों को देखते हुए अपेक्षाओं का बढ़ जाना स्वाभाविक है. बजट में शिक्षा के ऊपर कितना खर्च किया जाए इस पर खुद सरकारों द्वारा बनाई गई कमिटियों ने भी दिशानिर्देश दिए हैं.

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देश की आजादी के बाद शिक्षा में सुधारों के लिए बनी खेर कमिटी ने 1949 में सिफारिश की थी कि केंद्र को अपनी आय का 10 फीसदी खर्च शिक्षा पर करना चाहिए था.

1966 में कोठारी आयोग ने कहा कि शिक्षा पर जीडीपी का 6 फीसदी खर्च होना चाहिए. 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी कहा गया कि सरकार को अपनी राष्ट्रीय आय का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए.

1996 में सैकिया कमिटी ने भी कहा कि सरकार को जीडीपी का 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए. जिसमें से 50 फीसदी धन प्राइमरी शिक्षा पर खर्च किए जाएं.

शिक्षा पर खर्च करने में हमारी सरकार काफी पीछे

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लेकिन आंकड़ों की कहानी कुछ और ही कहती है. अभी तक किसी भी आम बजट में शिक्षा पर किया जाने वाला खर्च जीडीपी का 4 फीसदी के कम ही रहा है. जबकि औसत वैश्विक आंकड़ा 4.9 फीसदी है. ब्रिक्स के अन्य विकासशील देश भी अपनी जीडीपी का करीब 5 फीसदी शिक्षा पर खर्च करते हैं.

आम बजट 2016-17 में शिक्षा के लिए कुल 72,394 करोड़ दिए गए जो पिछले साल के आम बजट से 4.9 फीसदी अधिक था. 2015-16 के आम बजट की तुलना में 2016-17 के बजट में उच्च शिक्षा के लिए आवंटित किए गए धन में 7.3 फीसदी और स्कूली शिक्षा के लिए 3 फीसदी की वृद्धि की गई थी.

लेकिन जीडीपी के फीसदी के लिहाज से शिक्षा पर किए जाने वाला कुल खर्च पिछले बजट की तुलना में कम था. यानी शिक्षा पर खर्च में कुल मिलाकर कटौती ही की गई थी. बजट 2016-17 में जीडीपी का कुल 3.3 फीसदी की शिक्षा के लिए आवंटित किया गया था. यह तय लक्ष्य जीडीपी के 6 फीसदी से काफी कम है.

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'स्किल इंडिया' और 'मेक इन इंडिया' जैसे प्रोग्राम के तहत एनडीए सरकार ने पिछले दो वर्षों में तकनीकी संस्थानों को खोलने की बात कही है. लेकिन इन पर किया जाने वाला खर्च पर्याप्त नहीं है.

अभी तक इन योजनाओं की दिशा में सरकार को कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है. भारत में उच्च शिक्षा की हालत और भी खराब है. यहां करीब 10 फीसदी छात्र ही उच्च शिक्षा में दाखिला लेते हैं जबकि वैश्विक आंकड़ा 26 फीसदी है.

उच्च शिक्षा पर जीडीपी का केवल 1.2 फीसदी ही खर्च किया जाता है. सरकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना पल्ला झाड़कर इसे एजुकेशन लोन, निजी और विदेशी यूनिवर्सिटियों के हवाले कर रही है. इन यूनिवर्सिटियों में काफी ऊंची फीस होती है.

एजुकेशन लोन नहीं है समाधान 

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इनमें पढ़ने के लिए छात्र एजुकेशन लोन लेते हैं और फिर उनकी आधी जिंदगी और कमाई इस लोन को चुकाने में ही जाया होती है. कर्ज की वजह से किसानों की आत्महत्या की खबरों के बाद अब कई जगह एजुकेशन लोन के कारण छात्रों के आत्महत्या की भी खबरें आने लगी है.

ऐसी स्थिति में सस्ते एजुकेशन लोन इस समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि पढ़ाई खत्म होते ही लिए गए लोन पर ब्याज लगना शुरू हो जाता है. यह छात्रों पर मानसिक दबाब बनाता है.

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शिक्षा का उद्देश्य कहा गया है- ‘या विद्या सा विमुक्तये’. यानी शिक्षा वही है जो मुक्त करे, आजाद करे. ऐसे में एजुकेशन लोन वाली शिक्षा का हमारी भारतीय शिक्षा परंपरा से कोई मेल नहीं है.

दूसरी तरफ निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता भी संदेहास्पद है. सरकार और ऐसे विश्व विश्वविद्यालयों के समर्थकों का कहना है कि जो उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं देंगे, वे बाजार से बाहर हो जाएंगे.

लेकिन शिक्षा कोई आम उत्पाद नहीं. एक निम्न गुणवत्ता वाली डिग्री तो जीवनभर के लिए गले पड़ जाती है. जब तक ऐसे विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता की परख होगी और ये बाजार से बाहर होंगे तब तक तो कई पीढ़ियों का कैरियर और जीवन बर्बाद हो चुका होगा.

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