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बजट 2017: किसानों की जमीन पर उतरेंगे पीएम के सपने?

कृषि ग्रोथ दर इस दरमियान पिछले तीस सालों के न्यूनतम पर है.

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: Jan 29, 2017 11:49 AM IST

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बजट 2017: किसानों की जमीन पर उतरेंगे पीएम के सपने?

मोदी सरकार का चौथा आम बजट आने में अब चंद दिन हैं. मोदी राज में आसमानी और सुल्तानी कारणों से खेती की हालत काफी पतली हो चुकी है.

कृषि ग्रोथ दर इस दरमियान पिछले तीस सालों के न्यूनतम पर है. प्रधानमंत्री मोदी के सपने को साकार करने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने किसानों की आय सुरक्षा बीड़ा उठाया है और 2022 तक 5 सालों में किसानों की आमदनी को दोगुना करने की मांगलिक घोषणा उन्होंने अपने पिछले बजट में की है.

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इसके लिए उन्होंने कृषि और किसान कल्याण के लिए 35984 करोड़ रुपए का बजट में आवंटन किया है. जिसे पिछले बजट 2015-16 से दोगुना आवंटन बताया गया है.

इसमें ही उन्होंने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य स्कीम और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना जैसे मोदी सरकार के अग्रणी और महती कार्यक्रमों के भारी भरकम लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बजटीय आवंटन बढ़ाया है. पर कृषि विशेषज्ञ इस कृषि बजट आवंटन को न केवल अपर्याप्त मानते हैं, बल्कि भ्रामक भी मानते हैं.

दोगुनी आय का चुनौती भरा लक्ष्य

असल में फरवरी,2016 में बरेली की किसान रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने की मंशा जतायी थी. इसे ही वित्त मंत्री ने बजट में अमली जामा पहनाया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस दिव्य लक्ष्य को हासिल करने के लिए सात सूत्री रणनीति भी तय की है. और कहा है कि मैंने इस लक्ष्य को एक चुनौती की तरह लिया है. बेहतर रणनीति, सुविचारित प्रोग्राम, पर्याप्त स्रोतों और सुशासन से लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है.

प्रधानमंत्री के सात सूत्र है

PM Modi

  1. पर ड्रॉप मोर क्रॉप के मद्देनजर सिंचाई प्रोग्राम पर फोकस, भारी बजट का प्रावधान
2. मिट्टी की उत्पादकता के हिसाब से हर खेत के लिए उन्नत बीज और पोषक तत्वों का प्रावधान

3. फसल पश्चात नुकसान की रोकथाम के लिए वेयर हाउसिंग (भंडार गृह) और कोल्ड स्टोरेज (शीत गृहों) में भारी निवेश

4. खाद्य प्रसंस्करण के माध्यम से मूल्यसंवर्धन

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5. खामियों को दूर कर राष्ट्रीय कृषि बाजार का निर्माण और 585 कृषि मंडियों को जोड़कर ई ट्रेडिंग प्लेटफार्म मुहैया कराना

6. फसल की सस्ती कीमत के जोखिम कम करने के लिए नई कृषि फसल कीमत स्कीम की शुरुआत

7. खेती से जुड़ी अन्य आर्थिक गतिविधियों जैसे मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन आदि को बढ़ावा

मोदी ने कहा कि मुझ विश्वास है कि किसानों की आय दोगुनी लक्ष्य करने का लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे. लेकिन इन सात सूत्रों में मिट्टी के उत्पादकता संबंधी कार्ड को छोड़ मोदी सरकार बाकी सूत्रों पर अपनी मंशा और नीति पर खरी नहीं उतरी है.

कौन सी आय दोगुनी?

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प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की घोषणाओं से यह अब तक साफ नहीं है कि 2022 तक किसानों की नॉमिनल आय (सामान्य आय जिससे महंगाई का समायोजन नहीं होता है) या वास्तवित आय (यह महंगाई के प्रभाव को घटा कर आय निकाली जाती है) को दोगुना करने का लक्ष्य है.

किसानों की सामान्य आय को पांच या छह सालों में दोगुना करना अपने आप में कोई चुनौती भरा लक्ष्य नहीं है. पिछले तीस सालों में गिरती पड़ती और ‘अकर्मण्य’ केंद्र सरकारों के राज में यह करिश्मा दो बार हो चुका है.

नीति आयोग के कृषि विशेषज्ञ और सदस्य रमेश चंद के अनुसार 1987-88 से 1992-93 और 2004-05 से 2009-10 के पांच सालों में किसानों की सामान्य आय दोगुनी हो चुकी है.

सबको मालूम है कि 1990-91 में देश की आर्थिक हालत बेहद नाजुक थी और तब लंदन में टनों सोना गिरवी रख कर आवश्यक आयातों के लिए विदेश मुद्रा का प्रबंध करना पड़ा था.

दूसरी बार यह करिश्मा मनमोहन सिंह के राज में हुआ जिनको प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा का अदना कार्यकर्त्ता भी अकर्मण्य मानता है.

चमत्कारों का चमत्कार

कृषि मूल्य और लागत आयोग के पूर्व मुखिया डॉ. अशोक गुलाटी कहते हैं कि यदि मोदी सरकार पांच सालों में किसानों की वास्तविक आय को दोगुना करने में सक्षम रहती है, तो यह चमत्कारों का चमत्कार होगा और इसके अर्थव्यवस्था पर चौतरफा सकारात्क प्रभाव पड़ेंगे.

भूमंडलीकरण, उदारवाद और विदेशी पूंजी के आसरे विकास के मॉडल को अपनाए आज देश को बीस साल से ऊपर हो गए. पर सच यही है कि कृषि अब भी अर्थव्यवस्था की धुरी बनी हुई है.

हालांकि इस दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि की हिस्सेदारी में लगातार गिरावट आयी है और यह हिस्सेदारी महज घट कर 13-14 फीसदी रह गई है.

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लेकिन देश की 59 फीसदी आबादी आज भी रोजीरोटी के लिए कृषि पर ही आश्रित है. मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के कई उद्योगों की खुशहाली और तरक्की कृषि पर ही मुख्यत: टिकी हुई है.

पिछले तीन सालों से किसानों की आय पस्त है, तो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ भी धराशायी हो गई है. मोदी राज के 2014-15 और 2015-16 में कृषि ग्रोथ दर महज 0.2 और 1.4 फीसदी रही है.

2016-17 में 4.1 फीसदी ग्रोथ दर का अनुमान है यानी इन तीन सालों में औसत कृषि ग्रोथ दर 1.8% ही रहेगी जो मनमोहन सिंह राज की औसत कृषि ग्रोथ दर से बहुत पीछे है.

सिंचाई को चाहिए भीमकाय बजट आवंटन

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किसानों की कुल आय में आज भी सर्वाधिक आय कृषि से होती है. इसके अलावा किसानों को बागवानी, पशु पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन और मजदूरी से आय होती है.

प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों ही कृषि आय में बढ़ोतरी के लिए सिंचाई को सबसे अहम मानते हैं. डॉ. गुलाटी का कहना है कि बेहतर सिंचाई सुविधाओं और जल प्रबंधन से खेती की पैदावार 70-80 फीसदी बढ़ जाती है जो किसानों की आय का सबसे प्रमुख स्रोत है. पर इसके लिए भारी भरकम बजटीय आवंटन की आवश्यकता होगी.

प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के लिए 2015 में आगामी पांच सालों में 50 हजार करोड़ रुपए आवंटन की घोषणा की गयी थी. अब इस योजना में कई  सिंचाई प्रोग्रामों का समावेश हो गया है. पर कृषि विशेषज्ञ इस आवंटन की पर्याप्त नहीं मानते हैं.

कृषि विशेषज्ञ पी के जोशी के अनुसार 1991-2007 के बीच केवल सार्वजानिक नहर योजनाओं पर 2.55 लाख करोड़ रुपए खर्च किये गए. इसके सामने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का पांच सालों में 50 हजार करोड़ रुपए का आवंटन कुछ भी नहीं है.

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डॉ. गुलाटी का साफ कहना है कि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए आगामी पांच सालों में तकरीबन तीन लाख करोड़ रुपए आवश्यकता सिंचाई को होगी यानी तकरीबन हर साल 40-50 हजार करोड़ रुपए.

जाहिर है कि सिंचाई के लिए 10 हजार करोड़ रुपए औसत प्रति साल आवंटन बहुत कम है. पर क्या वित्त मंत्री सिंचाई के लिए 40-50 हजार करोड़ का आवंटन हर साल बजट में कर पायेंगे.

फसल बीमा अब भी पटवारी के भरोसे

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किसानों की आय को दोगुना करने के लिए जरूरी है कि कुदरती मार से फसलों के नुकसान की भरपाई समय से और पर्याप्त हो. प्रधानमंत्री ने सात सूत्रों में फसल बीमा पर जोर दिया है.

इस वजह से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को काफी संवारा और सक्षम किया गया है. जो अब पहले से लाख गुना बेहतर है. इसमें कृषि बीमा प्रीमियम में भारी कमी की गयी है और नुकसान की भरपाई का दायरा भी बढ़ाया गया है.

पिछले बजट में इसके लिए 5 हजार करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन किया गया है, जो काबिले तारीफ है. पर इसके सरकारी क्रियान्वयन में कोई बदलाव नहीं आया है. वित्त मंत्री ने बजट में बताया था कि सरकार के दखल को दोबारा से पारिभाषित किया जायेगा.

लेकिन अब भी सिंचाई योजना पटवारी के भरोसे  ही है, जो किसानों के लिए शैतान से कम नहीं है. पटवारी इस महती योजना के पवित्र उद्देश्यों पर पानी ही फेर सकता है. बाढ़, सूखे और बेमौसम बारिश से प्रभावित खेतों के नुकसान का आकलन और मूल्यांकन पटवारी के जिम्मे हैं.

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इस काम में काफी समय लगता है और पटवारी को मिले चढ़ावे के अनुसार ही नुकसान की भरपाई तय होती है. इस योजना का पूरा और तुरंत लाभ किसानों को तभी हो सकता है कि जब फसल के नुकसान और क्षति पूर्ति का आधार विज्ञान सम्मत हो और सूचना तकनीक को उसका आधार बनाया जाये.

चीन यह काम कर चुका है और इससे वहां खेती को असीम लाभ हुआ है. इसके लिए नीति आयोग ने विस्तृत सुझाव दिये हैं, पर होता कुछ नहीं है. डॉ. गुलाटी ने चीन की फसल बीमा प्रणाली का गहन अध्ययन किया है. उनका कहना है कि 6-8 महीनों में चीन की प्रणाली को देश में बखूबी लागू किया जा सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी का लक्ष्य 50 फीसदी किसानों को फसल बीमा योजना के दायरे में लाना है. इसका सीधा मतलब है कि 10 करोड़ हेक्टेयर उपज क्षेत्र (क्रोप्ड एरिया) को फसल बीमा योजना के दायरे में लाने पड़ेगा. देश में कुल 19.50 करोड़ हेक्टेयर उपज क्षेत्र है. वैसे अभी बमुश्किल 15 फीसदी किसान ही इन योजनाओं का लाभ उठा पाए हैं. जाहिर है कि कछुआ चाल से यह निर्धारित समय में यह लक्ष्य पाना असंभव है.

9 लाख करोड़ रुपए का मिथक

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किसानों की पांच साल में दोगुनी आय करने के लिए कई स्तरों पर काम करना पड़ेगा. खेती को लाभप्रद बनाना पड़ेगा, उसकी लागत घटाने पड़ेगी और आसमानी मार के नुकसान की भरपाई करनी पड़ेगी.

पिछले कुछ सालों से खेती केवल नुकसान का सौदा रह गया है. कृषि लागत बेहिसाब बढ़ी है और कृषि आय गहरे दबाव में है. कई फसलों की लागत न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा है.

इस लक्ष्य को पाने के लिए उन्नत बीज का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए किसानों को आर्थिक सहायता की दरकार है. उर्वरक भी महंगे हैं, पर किसानों की उर्वरक सब्सिडी घटायी जा रही है.

सिंचाई के लिए बिजली भी चाहिए. पर कुछ सालों में बिजली भी महंगी हो गयी है. सस्ती दरों पर बिजली मुहैया कराने की जरूरत है. लेकिन मोदी सरकार के योजनाकार, सलाहकार सैद्धांतिक रूप से आर्थिक सहायता के खिलाफ हैं.

जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी ही आर्थिक मदद बढ़ाने का रास्ता निकाल सकते हैं.

खेती को लाभप्रद बनाना है, तो फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को काफी अधिक बढ़ाना अनिवार्य है.

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प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में किसानों से लागत से 50 फीसदी लाभप्रद मूल्य देने का वादा किया था, पर वे इससे साफ मुकर गए हैं.

मोदी राज में न्यूनतम समर्थन मूल्य में नाम मात्र की बढ़ोतरी हुई है. मनमोहन सिंह राज में यह बढ़ोतरी औसतन 17 फीसदी थी. तब किसानों की आय में इसका सबसे अहम योगदान था. इन सब कामों को अंजाम देने के लिए बजट में बड़े आवंटन की दरकार होगी.

हर साल बजट में किसानों को लाखों-करोड़ों रुपए का कर्ज देने की बात की जाती है. चालू वित्त वर्ष के लिए यह लक्ष्य 9 लाख करोड़ रुपए का है.

लेकिन कृषि के जानकार देविंदर शर्मा कई बार कह चुके हैं कि इस कर्ज का बमुश्किल 15 फीसदी हिस्सा ही किसानों को मिल पाता है. शेष 85 फीसदी हिस्सा एग्री बिजनेस की कंपनियां ले उड़ती हैं.

हकीकत यह है कि करोड़ों की संख्या में छोटे और सीमांत किसान इस कर्ज का लाभ उठाने से वंचित हैं और कर्ज के लिए सूदखोंरों पर आश्रित हैं. पूरी उम्मीद करनी चाहिए कि वित्त मंत्री सीमांत किसानों की इस समस्या का कोई उपाय अवश्य निकालेंगे.

बाजीगरी से हासिल नहीं होगा चमत्कारी लक्ष्य

सरकार के ऊपर से नीचे तक हर नुमाइंदे ने कहा कि पिछले बजट में किसानों का बजट आवंटन दोगुना कर दिया गया है. कृषि मंत्री कहते हैं कि कृषि क्षेत्र और कल्याण आवंटन 15809 करोड़ रुपए से बढ़ाकर 35,984 करोड़ रुपए कर दिया गया है और यह बढ़ोतरी दोगुने से अधिक है.

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पर यह केवल वित्त मंत्री की हाथ की सफाई का कमाल था. 15 हजार करोड़ रुपये की ब्याज आर्थिक सहायता मद को वित्त मंत्रालय से उठा कर कृषि मंत्रालय के खातों में डाल दिया गया.

इस राशि को घटा देने से यह आवंटन रह जाता है तकरीबन 20 हजार करोड़ रुपए यानी महज 4 हजार करोड़ रुपए बढ़ोतरी ही कृषि मंत्रालय को मिली थी, जो कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है.

इस प्रकार की बाजीगरी से आप भरमा सकते हैं लेकिन जमीनी हकीकत नहीं बदल सकते हैं. किसानों की दोगुनी आय के लक्ष्य को पाने के लिए जमीन पर काम पर करना पड़ेगा, वह भी मिशन मोड में. तभी प्रधानमंत्री का यह दिव्य सपना पूरा हो पायेगा. अन्यथा यह भी जुमलों की जमात में शामिल हो जायेगा.

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