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बजट 2017: सेना के आधुनिकीकरण पर हो खर्च, तभी बनेंगे सैन्य शक्ति

केवल रक्षा व्यय बढ़ाने से भारत एक महान सैन्य शक्ति नहीं बन सकता है.

Updated On: Jan 30, 2017 05:20 PM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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बजट 2017: सेना के आधुनिकीकरण पर हो खर्च, तभी बनेंगे सैन्य शक्ति

हर गणतंत्र दिवस हमें देश की सैन्य शक्ति, पराक्रम और शौर्य का प्रदर्शन देखने को मिलता है. हम भी उनके यशोगान में कोई कोताही नहीं करते हैं.

सेना के अत्याधुनिक हथियार, सेनाओं की रंग-बिरंगी मनभावन टुकड़ियां और हवा में कलाबाजी करते तिरंगे के रंग बिखरते हुए लड़ाकू विमानों को देख कर मन प्रसन्न हो जाता है.

देख कर भरोसा मजबूत होता है कि हमारी सेनाएं देश की सुरक्षा करने के लिए न केवल सक्षम हैं, बल्कि दुनिया में हमारा देश एक ताकतवर सैन्य शक्ति बन गया, पर बजट आते ही यह भरोसा धूमिल होने लगता है.

रक्षा बजट में सैन्य तैयारियों को लेकर व्याकुलता बढ़ जाती है. अब तो गणतंत्र से मिला भरोसा भी जल्द हिलने लगता है क्योंकि अब गणतंत्र दिवस और बजट पेश होने का फासला बहुत कम रह गया है. सेना की रिट्रीट परेड के दो दिन बाद इस बार बजट पेश होना है.

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सैन्य विशेषज्ञ बताते हैं कि सेनाओं के पास दुश्मनों से मुकाबला करने के लिए आवश्यक बुनियादी हथियारों का अभाव है. सेना के पास जंग के लिए पर्याप्त गोला बारूद नहीं है. सेना के जवान कितनी विषम परिस्थितियों में रहते हैं, उनके पास बुनियादी सुरक्षा और सुविधाओं के अभाव की खबरें सुनकर दिल बैठ जाता है.

New Delhi: Indian army's mechanised columns during the full dress rehearsal for the Republic Day parade, at Rajpath in New Delhi on Monday. PTI Photo by Kamal Singh(PTI1_23_2017_000105B)

गणतंत्र दिवस परेड अभ्यास. फोटो: पीटीआई

सरहद पर बढ़ती सैन्य चुनौतियों और खतरों को देख कर हर बार ऐसा लगता है कि रक्षा बजट में पर्याप्त बढ़ोतरी होगी, पर हर बार मायूसी ही हाथ लगती है. इस बार रक्षा बजट और सैन्य प्रशासन की व्यथा कथा बदलेगी, इसकी गुजाइंश कम ही लगती है.

पिछले तीन सालों में रक्षा बजट में औसत 10% बढ़ोतरी हुई है, पर पिछली बार यह बढ़ोतरी 10% से कम थी. रक्षा क्षेत्र के लिए वर्ष 2011-12 में 1.64 लाख करोड़, 2012-13 में 1.78 लाख करोड़, 2013-14 में दो लाख करोड़, और 2014-15 में 2.20 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में था.

वर्ष 2015-16 में रक्षा बजट 2.46 लाख करोड़ रुपए का था जो वर्ष 2016-17 में 9.3% बढ़ोतरी के साथ 2.56 लाख करोड़ रुपयए का हो गया. पर आश्चर्य की बात यह है कि इसमें रक्षा का पूंजी व्यय 2015-16 के 94588 करोड़ रुपए की तुलना में घट कर 86340 करोड़ रुपए रह गया.

रक्षा बजट के पूंजी व्यय पर ही सैन्य तैयारियां निर्भर करती हैं. सैन्य विशेषज्ञ के अनुसार अरसे से सेना को बुनियादी हथियारों समेत लड़ाकू विमान, पनडुब्बियाँ, एयर डिफेंस सिस्टम्स और हेलिकॉप्टर आदि महती आवश्यकता है.

चीन युद्द के बाद सबसे न्यूनतम रक्षा बजट 

दुनिया भर में देश का खर्च उसके सकल घरेलू के अनुपात (जीडीपी) में आंका जाता है. इस लिहाज से देश का सैन्य व्यय उत्साहवर्धक नहीं है. 2016-17 में पेंशन व्यय को निकाल दें, तो यह सैन्य व्यय जीडीपी का 1.72% है.

सैन्य विशेषज्ञ और  सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर गुरमीत कंवल बताते हैं कि जीडीपी का 1.72 फीसदी सैन्य व्यय 1962 यानी चीन युद्द के बाद सबसे न्यूनतम है. यह हैरानी की बात है.

भारत के सामने जो चुनौतियां और खतरे हैं, उन्हें देखते हुए सैन्य क्षमताओं को अपग्रेड करने के लिए यह आवंटन बेहद कम है. एक अरसे से सैन्य विशेषज्ञ, रक्षा मामलों की संसदीय समिति के सदस्य और अब खुद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर मानते है कि रक्षा बजट को जीडीपी का 3% होना चाहिए.

बुनियादी हथियारों की तंगी

Jammu: Security personnel keeping vigil outside Maulana Azad Stadium ahead of Republic Day in Jammu on Wednesday. PTI Photo (PTI1_25_2017_000133B)

उरी अटैक के बाद जो रिर्पोटें मीडिया में आई हैं, उससे झलकता है कि युद्ध के हालात में भारत की सैन्य तैयारी जरूरत से कम है.

सितंबर, 2016 की इकोनॉमिक्स टाइम्स एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर सैन्य विशेषज्ञ जिनमें रिटायर सेना के अफसर भी हैं, साफ कहते हैं कि सेना को असॉल्ट राइफल, कार्बाइन, आर्टिलरी जैसे बेसिक सैन्य सामानों की जरूरत है. इसके साथ ही एयर डिफेंस गन और एंटी मिसाइल सिस्टम्स जैसे हथियारों और उपकरणों की भारी जरूरत है.

सेना को लगभग 1.8 लाख नई असॉल्ट राइफलों की आवश्यकता है. रक्षा मंत्रालय ने 2015 में राइफल खरीदने के 2011 के सौदे की प्रक्रिया को रद्द कर दिया था. अब फिर से इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू की गयी है, पर इसके आने में अभी वक्त लगेगा.

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सेना के पास कार्बाइन का अभाव है, जिनकी जरूरत आमने-समाने की जंग में होती है. कार्बाइन खरीद भी चुनाव प्रक्रिया 2010 में शुरू हुई, 2013 में प्रोसेस ट्रायल हो पाया. लेकिन डील किसी अंजाम तक नहीं पहुंच पायी क्योंकि सप्लायर का चुनाव ही नहीं हो पाया. इससे सेना के अधिकारियों में चिंता व्याप्त है.

1980 के दशक में बोफोर्स घोटाले के बाद नई जनरेशन की आर्टिलरी गन की खरीद नहीं हो पायी है. इसके लिए दो एक्विजिशन प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है.

1960 में खरीदी गयी एंटी एयर क्राफ्ट गन बेहद पुरानी हो चुकी है, नई टेक्नोलॉजी के सामने ये  ठहर नहीं पाती है. इन्हें बदलना अब सेना की जरूरत है, पर नई एयर क्राफ्ट गन खरीदने की प्रक्रिया 2012 से अटकी पड़ी है क्योंकि सप्लायर पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और उसे सैन्य प्रशासन ने ब्लैक लिस्ट कर दिया है.

असल में हथियार खरीद की कुल प्रक्रिया काफी लंबी और दुखद है. हथियारों का मूल्यांकन करने वाले विशेषज्ञों की भी कमी है. फाइलें सेना मुख्यालय, रक्षा मंत्रालय, विशेषज्ञ समितियों और वित्त मंत्रालय के बीच चक्कर और धूल खाती रहती हैं.

मोदी राज में हथियारों की खरीद को बेहतर और पारदर्शी बनाने के लिए कई कोशिशें हुईं हैं, लेकिन जमीन पर स्थितियों में कोई ज्यादा कारगर बदलाव नहीं हो पाया है. इस कारण समय से खरीद नहीं हो पाती है और रक्षा मंत्रालय आवंटित बजट को पूरा खर्च नहीं कर पाता है.

पूर्व सैन्य अधिकारी मानते हैं कि हथियारों की खरीद में असहनीय विलंब से सेना के मनोबल पर गहरा असर पड़ता है. सैलरी और पेंशन में हुए टकराव और खींचतान से भी सेना में गहरी नाराजगी बताई जा रही है.

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1 लाख करोड़ रुपए वापस

अजीब त्रासदी है. एक तरफ सेना में हथियारों और गोला बारुद की भारी कमी है, तो दूसरी तरफ अरसे से रक्षा मंत्रालय अपने पूरे बजट के इस्तेमाल करने में नाकाम रहा है.

2015-16 में  रक्षा मंत्रालय आवंटित पूंजी व्यय खर्च नहीं कर पाया और तकरीबन 11 हजार करोड़ रुपए उसे लौटाने पड़े. रक्षा विशेषज्ञ सी.उदय के अनुसार पिछले तकरीबन 16-17 सालों के दरमियान रक्षा मंत्रालय को 10 खरब रुपए खर्च न हो पाने के कारण लौटाने पड़े हैं.

जाहिर है कि इससे देश का हथियार खरीदने और सेना को अपग्रेड करने का काम बहुत पिछड़ गया है. सैन्य विशेषज्ञ रक्षा बजट को बढ़ाने की मांग करते हैं, पर रक्षा मंत्रालय आवंटित बजट को ही खर्च करने में विफल रहा है.

असल में देश का सैन्य प्रशासन अरसे से काहिली से जकड़ा हुआ है. देश की सरकार सैन्य कार्य शैली बदलने में नाकाम रही है, इसकी मुख्य वजह नौकरशाही बतायी जाती है. नतीजन सेना को आवंटित धन वापस करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

आंख में भर लो पानी

भारतीय सेनाओं के पास हथियारों की कमी दुनिया को जग जाहिर हो चुकी है, तो सेना के जवानों की दुर्दशा भी अब किसी से छुपी नहीं है. मीडिया में हाल में जो रिपोर्ट आयी हैं उनसे जाहिर है कि जवानों की स्थिति बंधुआ मजदूर से कोई खास अलग नहीं है.

सेना के आला अफसरों की चाकरी, खराब खाने की खबरों से हर भारतीय का कलेजा फटना स्वाभाविक है. जवानों को अच्छे जूते, वर्दी, बुलैटप्रूफ जैकेटों जैसी बुनियादी जरूरतों का अभाव अब कोई रहस्य नहीं रहा गया है.

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उरी हमले से देश को ही नहीं दुनिया को पता चल गया है कि भारतीय जवान कितनी विषम परिस्थितियों और अभावों के बीच देश की रक्षा में कुर्बान हो रहे हैं. हाल ही में बर्फीले तूफान से 22 जवान शहीद हो गये.

इस बेहद पीड़ादायक हादसे ने देश के गणतंत्र दिवस को इस बार बदरंग कर दिया. जवानों की हालत देख कर हर भारतीय की आंखों में आंसू आ जाते हैं, पर देश के हुक्मरानों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है.

चीन से कोई सबक नहीं

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मोदी सरकार में प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री से लेकर तकरीबन हर मंत्री और आला अफसर देश को दुनिया की सबसे तेज विकास दर से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था का अलाप करने से नहीं चूकता है. विकास दर में भारत ने चीन को पछाड़ दिया है.

इस उद्घोषणा से सरकार अभिभूत रहती है. पर चीन की सैन्य शक्ति और रक्षा बजट के आगे भारत टिक नहीं पाता है. भारत और चीन के बजट में एक अरसे से 1 खबर डॉलर से अधिक विकराल अंतर है. पिछले 20-25 सालों से चीन अपने रक्षा बजट को बहुत समझदारी और योजनाबद्ध तरीके से खर्च कर रहा है. आज उसका सैन्य औद्योगिक आधार बहुत बड़ा है.

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स्वदेशी सैन्य निर्माण में उसकी क्षमताओं और कौशल से दुनिया दंग है. चीन का रक्षा बजट तकरीबन 140 अरब डॉलर का है और भारत का 40 अरब डॉलर का. चीन ने अनेक विकसित देशों को सैन्य शक्ति में पछाड़ दिया है.

आज अमेरिका के बाद चीन की सैन्य ताकत को हर लिहाज से सबसे बड़ा माना जाता है. जहाज निर्माण में चीन पिछले 10-12 सालों से पहले स्थान पर बना हुआ है. भारत और चीन की सैन्य शक्ति का फासला दिन-प्रतिदन बढ़ता जा रहा है.

भारत चीन से कोई सबक नहीं लेना चाहता है. भारतीय नेतृत्व को आज रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए चीन जैसी दूरदर्शिता, दृढ़ता और राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत है. केवल रक्षा व्यय बढ़ाने से भारत एक महान सैन्य शक्ति नहीं बन सकता है.

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