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सरकार का फोकस गांव, गरीब और किसान पर है: नरेंद्र सिंह तोमर

केंद्रीय पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से फ़र्स्टपोस्ट की खास बातचीत.

Updated On: Jan 16, 2017 04:53 PM IST

Amitesh Amitesh

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सरकार का फोकस गांव, गरीब और किसान पर है: नरेंद्र सिंह तोमर

भारत की लगभग 70 फीसदी आबादी आज भी गांवों में ही रहती है. पिछले दो दशकों में गांव से शहर की और पलायन बढ़ा है लेकिन ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी खेतीबाड़ी पर ही निर्भर है.

नोटबंदी का भी सबसे ज्यादा प्रभाव ग्रामीण इलाकों पर पड़ा. फल-सब्जियों और अनाजों की कीमतें आसमान छू रही हैं लेकिन इन बढ़ती कीमतों का लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है.

इस वजह से ग्रामीण भारत और खेती के विकास के लिए केंद्र सरकार इस बार के बजट में क्या खास करने जा रही है, इस पर केंद्रीय पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने बातचीत की.

इस बार बजट में ग्रामीण भारत के लिए क्या व्यवस्था हो सकती है?

हमारी सरकार का फोकस हमेशा गांव, गरीब और किसान के लिए रहता है. पिछली बार के बजट में भी यह देखने को मिला और इस बार भी ऐसा ही रहने वाला है.

पिछली बार मनरेगा के लिए बजट में भारी बढ़ोत्तरी हुई थी. इस बार मनरेगा को लेकर क्या योजना है, किस तरह की उम्मीद कर रहे हैं आप?

पिछली बार बजट में 38,500 करोड़ रुपए का प्रावधान मनरेगा के लिए था, जो कि अबतक का सबसे ज्यादा था बजट. फिर बाद में सप्लिमेंट्री बजट में भी 8000 करोड़ रूपए दिया गया.

इसके बाद हमलोग मान रहे हैं कि मनरेगा में जो काम हो रहा है, उससे एसेट्स क्रिएशन का काम हो रहा है. प्रधानमंत्री जी ने भी इस पर संज्ञान लिया है. उसके बाद मनरेगा के लिए हम उम्मीद करते हैं कि और भी बजट मिलेगा.

पिछले नवंबर के मुकाबले दिसंबर में मनरेगा में काम ज्यादा हुआ. माना जा रहा है कि शहरी क्षेत्र में नोटबंदी के बाद जो काम के अवसर कम हुए हैं, छोटे-छोटे उद्दोग-धंधों पर मार पड़ी है. उसके बाद लोगों का शहर से गांव की ओर लौटना हुआ, जिससे मनरेगा में काम ज्यादा हुआ.

इसे नोटबंदी से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा. मनरेगा एक ऐसी योजना है, जिससे मांग में उतार-चढ़ाव आता रहता है. खेती जब चलता रहता है तो मांग कम होती है. बरसात होती है तो मांग कम होती है. सर्दी का मौसम आता है तो मांग बढ़ती है. इस वजह से यह एक सामान्य प्रक्रिया है जिसमें उतार-चढ़ाव आता रहता है.

हर घर में शौचालय बनाने पर सरकार का जोर रहता है. लेकिन, शौचालय बनने के बाद उसके रख रखाव को लेकर भी सवाल खडे होते हैं. कई बार देखने को मिलता है कि शौचालयों की हालत रखरखाव की कमी के चलते खराब रहती है. तो क्या सरकार इसके लिए भी कुछ अलग से फंड करने की सोच रही है?

मैं समझता हूं कि अब तक सरकार के प्रयत्न और प्रधानमंत्री जी की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण इस वक्त देश के 1,42,580 गांव ओडीएफ(खुले में शौच से मुक्त) हो गए हैं. जबकि, देश के 77 जिले, 818 ब्लॉक,63617 ग्राम-पंचायत को भी ओडीएफ घोषित किया गया है.

इसका मेंटेनेंस कैसे होगा इसकी अपेक्षा किसी ग्रामवासी की नहीं है. शौचालय व्यक्ति की आवश्यकता है, जब वह इस बात को समझ जाएगा तो उसे न ही किसी मेंटेनेंस की आवश्यकता होगी और न ही उसे किसी की सहायता की आवश्यकता होगी.

स्वच्छता अभियान सरकार के एजेंडे में सबसे उपर रहा है. लेकिन, लगता है इस अभियान में अभी थोड़ी सुस्ती आ गई है.

राज्यों द्वारा 2012-13 में एक बेसलाइन सर्वे कराया गया था, जिससे पता चला कि स्वच्छता कवरेज 38.76 फीसदी थी. 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत के वक्त स्वच्छता कवरेज 42 फीसदी थी जो 9 जनवरी 2017 की स्थिति के मुताबिक बढ़कर 59.17 फीसदी हो गई है. लगातार स्वच्छता अभियान जोर पकड़ रहा है. इसमें सबकी भागीदारी की जरूरत होती है और ऐसा हो भी रहा है.

कैशलेस इकॉनोमी से गांवों को कैसे जोड़ेंगे, क्योंकि गांवों में अशिक्षित लोगों की तादाद ज्यादा है. उन्हें कई तरह की तकनीकी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा.

A farm worker looks for dried plants to remove in a paddy field on the outskirts of Ahmedabad, India

कैशलेस इकॉनोमी की तरफ पूरा देश बढ़ रहा है. साल भर बाद आप देखेंगे कि शहर की तुलना में गांव आगे बढ़ गया है. हमलोग मनरेगा के मजदूरों पर भी इसे दिशा में कोशिश कर रहे हैं. करीब 95 फीसदी मनरेगा के मजदूरों की सैलरी है वो सीधे उनके एकाउंट में जाती है.

सेल्फ हेल्प ग्रुप भी कैशलेस ट्रांजैक्शन की दिशा में काम कर रहे हैं. अब तो धीरे-धीरे ऐसी परिस्थिति आ रही है कि और कैशलेस ट्रांजैक्शन और आसान होता जा रहा है. प्रधानमंत्री ने कहा है कि अब लोगों का अंगूठा ही उनका बटुआ होगा. मैं समझता हूं कि जिस कैशलेस ट्रांजैक्शन को लोग संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं, गांव वाले भी इसमें पीछे नहीं रहने वाले हैं.

किसानों का विस्थापन रोकने के लिए सरकार की क्या योजना है. सरकार दावा कर रही है कि 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुनी कर देंगे, लेकिन, गांवों से पलायन जारी है.

बीजेपी की सरकार किसानों की बात को जानती भी है और समझती है. पिछले दिनों सरकार ने कई कदम उठाए हैं. किसान को दो चीजों की आवश्यकता होती है. पहली कि किसानी में उसे लागत कम आये और समय पर उसे गुणवत्ता वाला फर्टिलाइजर मिल जाए और तीसरा प्राकृतिक आपदा से उसका जो नुकसान होता था, उसकी भरपाई हो जाए.

प्रधानमंत्री जी ने तीनों पर काम किया है. पहली बार इतिहास में फर्टिलाइजर के दाम कम हुए हैं. यूरिया पहले नहीं मिलता था, अब उसे नीमकोटेड कर दिया है. इससे यूरिया की कालाबाजारी पर रोक लग गई है.

प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना से प्राकृतिक आपदा से किसानों की फसल की बर्बादी होने पर उसकी भरपाई हो सकती है. पिछले दिनों मैं मध्यप्रदेश में था तो वहां की सरकार ने ओलावृष्टि से हुए नुकसान के लिए 4400 करोड़ रूपए की आर्थिक सहायता किसानों के बीच बांटी थी.

प्रधानमंत्री के इन कदमों से किसान की माली हालत में काफी सुधार हो रहा है. इसके अलावा कई और सारी चीजें करने की जरूरत है, जिस पर भारत सरकार ने बल देना शुरु किया है. जैसे बागवानी का मामला हो, पशुपालन का मामला हो, मछली पालन का मामला हो इस पर जोर दिया जा रहा है. इसके अलावा टपक सिंचाई या पर ड्राप मोर क्राप के माध्यम से कम पानी में बेहतर सिंचाई पर सरकार जोर दे रही है.

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