विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

बजट 2017: किसानों को सूखे वादे नहीं, कमाई की हरियाली चाहिए

बजट पेश होगा तो किसान उसमें सबसे पहले यह देखना चाहेगा कि उसकी आमदनी बढ़ाने के क्या उपाय हुए

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa Updated On: Jan 24, 2017 11:38 AM IST

0
बजट 2017: किसानों को सूखे वादे नहीं, कमाई की हरियाली चाहिए

आने वाले बजट में किसानों के लिए क्या होगा? जवाब बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि किसानी के बारे में सरकार की सोच क्या है.

तो आइए, पहले यही पता करें कि नोटबंदी के बाद के दिनों में किसानों को लेकर सरकार के मन में क्या चल रहा है?

किसान बेहतर कर रहे हैं

सरकार सोचती है कि किसान बेहतर कर रहे हैं. वे और ज्यादा बेहतर कर के दिखायें इसके लिए उन्हें खूब सारी मदद दी जा रही है. मिसाल के लिए याद करें 31 दिसंबर की रात को दिया गया प्रधानमंत्री का भाषण.

नोटबंदी के आलोचक कह रहे थे कि लगातार दो साल सूखे की मार झेलने के बाद इस साल बदले मौसम में किसानों को बेहतर फसल की उम्मीद थी. लेकिन नोटबंदी के फैसले ने सब चौपट कर दिया.

फैसला खरीफ फसल की कटाई और रबी फसल की बुआई के वक्त में हुआ. एक तरफ किसान के लिए उपज बेचना मुश्किल हुआ तो दूसरी तरफ नई फसल के लिए सामान जुटाना भी. किसान ना जरुरत भर खाद बीज खरीद सका न ही उम्मीद भर रबी फसलों की बुआई हो पायी.

बजट की तमाम खबरों के लिए यहां क्लिक करें

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की इस आलोचना को अपने भाषण में आंकड़ों के दम पर झुठला दिया. 31 दिसंबर वाले भाषण में उन्होंने कहा, 'दोस्तों...बीते दिनों चारों तरफ ऐसा माहौल बना दिया गया था कि देश की कृषि बर्बाद हो गई है.'

ऐसा वातावरण बनाने वालों को जवाब मेरे देश के किसानों ने ही दे दिया है. पिछले साल की तुलना में इस वर्ष रबी की बुआई 6 प्रतिशत ज्यादा हुई है.

फर्टिलाइजर भी 9 प्रतिशत ज्यादा उठाया गया है. सरकार ने इस बात का लगातार ध्यान रखा कि किसानों को बीज की दिक्कत न हो, खाद की दिक्कत ना हो, कर्ज लेने में परेशानी ना आए.

ज्यादा का इरादा

A farm worker looks for dried plants to remove in a paddy field on the outskirts of Ahmedabad, India

प्रधानमंत्री ने किसानों को खूब और सस्ता कर्ज देने की बात कही है

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में किसानों के फायदे के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी. लोगों ने प्रधानमंत्री को कहते सुना कि डिस्ट्रिक्ट कॉपरेटिव सेंट्रल बैंक और प्राइमेरी सोसायटी के कर्जदार किसानों के 60 दिन का ब्याज सरकार चुकाएगी.

ऐसे इंतजाम किए गए हैं कि किसानों को खूब कर्ज मिले और सस्ते में मिले. इसके लिए नाबार्ड को दी जाने वाली रकम दोगुनी कर दी गई है. प्रधानमंत्री ने वादा किया कि अगले तीन महीने में 3 करोड़ किसान क्रेडिट कार्डों को RUPAY कार्ड में बदला जाएगा जिससे किसान को आसानी होगी.

क्रेडिट से पैसे निकालने के लिए उसे बैंक जाना पड़ता था लेकिन RUPAY कार्ड के सहारे वह कहीं पर भी अपने कार्ड से खरीद-बिक्री कर पाएगा।

यह भी पढ़ें: बजट 2017: शेयर बाजार निवेशकों को क्या मिलेगी सौगात?

खाद-बीज की खपत ज्यादा, रबी फसल की बुआई का रकबा ज्यादा, सस्ते दर पर कर्ज और कर्ज की रकम ज्यादा, फिर RUPAY कार्ड के दम पर खरीद-बिक्री में आसानी ज्यादा- प्रधानमंत्री का भाषण मुख्य रूप से 'किसानों' से ज्यादा का वादा कर रहा था.

भाषण पर वाह-वाही

भाषण सुनकर कुछ लोगों को लगा- अरे वाह, बजट से पहले ही किसानों के लिए बजट पेश हो गया. सरकार सच कह रही है, खरीफ फसल की कटाई और रबी फसल की बुआई के आंकड़े खेती-किसानी की बेहतरी के इशारे कर रहे हैं.

2015-16 में खरीफ का अनाज उत्पादन 124 मिलियन टन था, 2016-17 में यह बढ़कर 135 मिलियन टन हो गया. साल भर में कुल 9 फीसद की बढ़ोत्तरी हुई. दलहन के उत्पादन में तो जैसे कमाल ही हो गया. महज एक साल के भीतर दालों के उत्पादन में 57 फीसद का इजाफा हुआ है.

बेहतरी की यही सूरत रबी फसल के मामले में नजर आ रही है. बीते 23 दिसंबर को आये नये आकलन के मुताबिक रबी की बुआई लक्ष्य के 87 फीसद रकबे में पूरी हो चुकी है.

यह भी पढ़ें: वेतन भोगियों को फिर मिलेगा स्टैंडर्ड डिडक्शन?

यह बीते साल के मुकाबले 6 फीसद ज्यादा है. गेहूं की बुआई के रकबे में 7 फीसद का इजाफा हुआ है. दलहन की बुआई का रकबा 10 फीसद बढ़ा है तिलहन का 11 फीसद.

सरकार फसल की बुआई-रोपाई के आंकड़ों में सोचती है. उपज पहले से ज्यादा हो तो मान लेती है किसान पहले से कहीं ज्यादा खुश हैं, उसकी खूब कमाई हो रही है. दिक्कत इसी सोच में है, उपज बेशक बढ़ रही है लेकिन क्या किसान की कमाई भी बढ़ रही है?

किसान की कमाई का सवाल

खेती-किसानी की मौजूदा हालत बयान करती सरकारी रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर'(2015-16) के तथ्य दो अहम बातों की ओर इशारा करते हैं.

पहला यह कि सीमांत आकार के जोतों की संख्या बढ़ती जा रही है. दूसरा ये कि सीमांत आकार के जोत किसान-परिवारों को पर्याप्त उपज और आमदनी नहीं दे पा रहे.

देश में 1 हेक्टेयर या इससे कम आकार के जोतों की तादाद में एक दशक के भीतर 23 फीसद का इजाफा हुआ है. 2000-2001 में ऐसे जोतों की संख्या 75.41 मिलियन थी जो 2010-11 में बढ़कर 92.83 मिलियन हो गई.

देश के ज्यादातर किसान इन्हीं सीमांत जोत के मालिक हैं. इनकी आमदनी और खर्च के हिसाब से पता चल सकता है कि अन्नदाता कहलाने वाला किसान खुशहाल या बदहाल है.

खेतिहर परिवारों की आमदनी और खर्च का एक हिसाब नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट में दर्ज है. 2014 के दिसंबर महीने में आई इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के कुल 9 करोड़ किसान परिवारों में तकरीबन सवा छह करोड़ किसान-परिवारों के पास 1 हेक्टेयर या इससे कम जमीन है.

इन परिवारों का कुल मासिक खर्च उनके मासिक उपभोग-खर्च से ज्यादा है.

किसानों की आमदनी बस इतनी 

WinterFarmer

खेतिहर किसानों के महीने में लगभग 2000 रुपये मजदूरी मिलती है

मिसाल के लिए देश में 0.41 हैक्टेयर से 1 हेक्टेयर तक की जोत वाले किसान परिवारों की संख्या तकरीबन 3 करोड़ 15 लाख है. खेती से ऐसा हर परिवार महीने भर में कुल 2145 रुपये की ही कमाई कर पाता है.

खेतिहर मजदूरी से ऐसे परिवार को महीने में 2011 रुपये की आमदनी होती है, पशुधन से 629 रुपये की और गैर-खेतिहर काम से ऐसा परिवार महीने के 462 रुपये जुटा लेता है.

खेती, मेहनत-मजदूरी और पशुधन से हुई इस पूरी कमाई को एक साथ जोड़ दें तो कुल रकम 5247 रुपये की आती है. सभी स्रोतों से हासिल कुल 5247 रुपये के बरक्स सीमांत कृषक-परिवारों का महीने का खर्च 6020 रुपये है.

याद रहे कि सरकारी दफ्तर में काम करने वाला सबसे अदना कर्मचारी भी महीने में 10 हजार रुपये से ऊपर की तनख्वाह पाता है. मतलब बड़ा साफ है कि ज्यादातर अन्नदाताओं की माली हालत सरकारी दफ्तर के चपरासी जितनी भी नहीं है.

यह भी पढ़ें : नोटबंदी से उबारने, सामाजिक विकास पर होगा जोर

आप खुद ही सोचिए कि जब आधे से एक हेक्टेयर खेती की जमीन वाले किसान-परिवारों की कमाई की हालत इतनी खास्ता है तो, उन 2 करोड़ 87 लाख किसान परिवारों की हालत क्या होगी जिनके पास खेती की 0.40 हैक्टेयर या इससे भी कम जमीन है?

किसान क्या उम्मीद करे

पैदावार तो खूब बढ़ रही है लेकिन देश के दो-तिहाई से ज्यादा (सवा छह करोड़) किसान परिवारों की आमदनी इस बढ़वार में भी ठहरी हुई है. खेती इन परिवारों के लिए मजबूरी का धंधा है..साल दर साल किया जाने वाला घाटे का सौदा.

आमदनी अठन्नी- खर्चा रुपैया की हालत में पड़े किसान-परिवारों का धीरज तब टूटता है, जब बाजार में उपज का वाजिब दाम नहीं मिलता. धीरज तब भी टूटता है जब बाढ़, पाला, सूखा में फसल मारी जाती है.

आश्चर्य नहीं है कि आगे अपना कोई भविष्य न देखकर धीरज छोड़ चुका यह किसान आत्महत्या का रास्ता चुन ले.

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्या की. आत्महत्या का रास्ता चुनने वाले इन किसानों में 5873 यानी 72 फीसद किसान छोटी और सीमांत जोत वाले थे.

कृषिमंत्री राधामोहन सिंह कहते हैं कि किसान ड्रग्स और नामर्दी के कारण आत्महत्या करते हैं, लेकिन नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है किसान-आत्महत्याओं की बड़ी वजह आर्थिक तंगहाली है.

इसलिए, बजट पेश होगा तो किसान उसमें सबसे पहले यह देखना चाहेगा कि उसकी आमदनी बढ़ाने के क्या उपाय हुए. यह नहीं कि खेती की पैदावार बढ़ाने के क्या इंतजाम किए गए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi