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बृजेश सिंह: पूर्वांचल के इस खौफ का नाम तो जरूर सुना होगा

तीन दशक के आपराधिक करियर में बृजेश का देशव्यापी सिंडिकेट सुनने में किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है लेकिन यथार्थ के कड़वे सच के रूप में आज बिलकुल साफ दिखता है

Utpal Pathak Updated On: Oct 15, 2017 04:48 PM IST

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बृजेश सिंह: पूर्वांचल के इस खौफ का नाम तो जरूर सुना होगा

बृजेश सिंह ने जरायम की दुनिया में कदम भले ही अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए रखा हो लेकिन ताकत का नशा उसके सिर चढ़ के बोलने लगा. बड़े ही कम समय में बृजेश ने रंगदारी के रास्ते कोयला, रेशम, रेलवे आदि के ठेकेदारी में हाथ डालना शुरू कर दिया.

इन ठेकों के कारण वर्चस्व की लड़ाई भी शुरू हुई जिसमें सैकड़ों व्यापारी, पुलिसकर्मी और अपराधी मारे गए. तीन दशक के इस जरायम के सफर में 27 से ज्यादा मुकदमे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल समेत गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और बंगाल में बृजेश के खिलाफ दर्ज हुए.

तीन दशक के आपराधिक करियर में बृजेश का देशव्यापी सिंडिकेट सुनने में किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है लेकिन यथार्थ के कड़वे सच के रूप में आज बिलकुल साफ दिखता है. जनवरी 2008 में जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बृजेश को भुवनेश्वर (ओडिशा) में गिरफ्तार किया, उस वक्त उत्तर प्रदेश पुलिस ने बृजेश पर पांच लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.

गिरफ्तारी के तीन साल पहले से ही बृजेश भुवनेश्वर में अरुण सिंह के नाम से रह रहा था तथा उसने वहां विंध्याचल रियल स्टेट डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से एक कंपनी भी खोल रखी थी. जरायम की दुनिया में इस बात की चर्चा कई दिन तक होती रही कि दिल्ली पुलिस का 'ऑपरेशन बृजेश' अत्यंत नाटकीय था.

गिरफ्तारी के समय बृजेश पर दर्जन भर से अधिक मामले दर्ज थे लेकिन धीरे-धीरे सभी मामलों का आसानी से निस्तारण होता गया और राजनीतिक गलियारों के फाटक खुलते गए.

कैसे बना बृजेश 

बृजेश सिंह ने 27 अगस्त 1984 में पिता की हत्‍या के बाद बदला लेने की नीयत से अपराध की दुनिया में कदम रखा और साल भर में ही 27 मई 1985 को दिनदहाड़े अपने पिता के हत्यारे हरिहर सिंह को मौत के घाट उतार दिया. यह पहला मौका था जब बृजेश के खिलाफ पुलिस थाने में मामला दर्ज हुआ.

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इस वारदात के बाद फरार रहते हुए बृजेश ने पिता के अन्‍य हत्‍यारोपियों की तलाश शुरू कर दी. इसी कड़ी में 9 अप्रैल 1986 को सिकरौरा गांव में पिता की हत्या में शामिल रहे रघुनाथ यादव, लुल्लुर सिंह, पांचू और राजेश आदि को एक साथ गोलियों से भून डाला. इस घटना को अंजाम देने के बाद बृजेश को पहली बार गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया.

इसी दौरान उनकी मुलाकात गाजीपुर के मुडियार गांव में त्रिभुवन सिंह से हुई. बृजेश और त्रिभुवन के बीच दोस्ती बढ़ी और दोनों मिलकर साथ काम करने लगे और धीरे-धीरे इनका गैंग पूर्वांचल समेत बिहार में सक्रिय होने लगा. दोनों मिलकर शराब, रेशम और कोयले के धंधे में उतर आए लेकिन असली खेल तब शुरू हुआ, जब बृजेश सिंह और माफिया डॉन मुख्तार अंसारी ठेकेदारी को लेकर आमने-सामने आ गए.

पीडब्लूडी समेत अन्य सरकारी ठेकों और कोयले के कारोबार को लेकर दोनों गैंग के बीच कई बार गोलीबारी हुई. दोनों तरफ से जान-माल का नुकसान भी हुआ.

नब्बे के दशक में बृजेश सिंह को पुलिस और मुख्‍तार के गैंग से बचने के लिए मुंबई जाना पड़ा, जहां पहुंचने के बाद दाउद के करीबी और पूर्वांचल के ही एक अन्य माफिया सुभाष ठाकुर से उनकी मुलाकात हुई और फिर सुभाष के माध्‍यम से दाउद से भी मुलाकात हुई.

दाउद के बहनोई इब्राहिम कास्कर की हत्या का बदला लेने के लिए बृजेश ने डॉक्टर का भेष बदलकर जे जे अस्पताल में 4 लोगों को पुलिस के पहरे के बीच मार दिया.

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12 सितंबर 1992 में मुंबई के जे जे अस्पताल में दाउद इब्राहिम के विरोधी अरुण गवली गैंग के शैलेश हलदनकर और मुंबई पुलिस के तीन जवानों की हत्या के 30 आरोपियों में भी बृजेश का नाम मुख्य आरोपितों में सामने आया.

इस शातिराना अंदाज के बाद दाउद और बृजेश की नजदीकियां और बढ़ गईं हालांकि, 1993 में हुए मुंबई ब्लास्ट के बाद दोनों में मतभेद हो गया.

बृजेश के खिलाफ वाराणसी के बलुआ समेत कैंट, धानापुर, सकलडीहा, चेतगंज में मामले दर्ज होते चले गए. इसके अलावा गाजीपुर के सैदपुर, भांवरकोल, अहमदाबाद, महाराष्ट्र के साथ पश्चिम बंगाल तक बृजेश के खिलाफ मुकदमे दर्ज होते गए. जुलाई 2001 में गाजीपुर के उसरीचट्टी में बृजेश की अपने चिर प्रतिद्वंदी मुख्तार अंसारी से सीधी मुठभेड़ हुई जिसमे मुख्तार घायल हुए.

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उसरीचट्टी के बाद बृजेश को गोली लगने और मौत की चर्चाएं आम हो चुकी थीं. इस घटना के बाद 2004 की सर्दियों में लखनऊ के कैंट इलाके रेलवे लाइन के समीप दोनों गिरोहों का फिर आमना-सामना हुआ लेकिन दोनों ही बच गए.

24 जनवरी 2008 को भुवनेश्वर से बृजेश सिंह को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार किया. गिरफ्तारी के बाद पुराने मामलों की बंद फाइलें खुलने लगीं और फरवरी 2008 में बृजेश को वाराणसी तलब कर सेंट्रल जेल में रखा गया. साल भर बाद मुंबई में जे जे शूटआउट की सुनवाई में बृजेश का तीन साल का समय महाराष्ट्र और गुजरात की जेलों में कटा.

2012 में वाराणसी सेंट्रल जेल लौट कर आने के बाद बृजेश के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने मकोका के तहत कार्रवाई की और उसे रिमांड पर तिहाड़ जेल ले गई. साल भर के बाद लौटे बृजेश के खिलाफ वाराणसी जिला जज की अदालत में सिकरौरा नरसंहार कांड और गाजीपुर में उसरीचट्टी कांड में सुनवाई चलने लगी.

माफिया से माननीय तक

सत्ता पक्ष की तमाम हनक और हथकंडों के बावजूद जरायम की दुनिया का बेताज बादशाह बृजेश सिंह जेल के सलाखों में रहते हुए आसानी से राजनेता बन गया. बृजेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपने धुर-विरोधी मुख्तार अंसारी के विधायक बनने के बाद और बलवती हुई थी लेकिन पिछले कई साल से फरार होने के कारण इस इच्छा पर विराम लगा हुआ था.

बृजेश के इस सुनियोजित आत्मसमर्पण जिसको गिरफ्तारी का नाम दिया गया था उसके बाद से ही कयास लगने लगे थे कि बृजेश का अब सियासी सफर जल्द शुरू होगा. और इस राजनीतिक गतिविधि के लिए चंदौली, वाराणसी, भदोही, मिर्जापुर को मुफीद माना जा रहा था, इसी कड़ी में बृजेश ने भारतीय समाज पार्टी से 2012 में विधान सभा चुनाव लड़ा लेकिन चंदौली की सैयदराजा विधानसभा सीट पर मिली हार ने बृजेश को बड़ा झटका दिया.

बृजेश की हार के बाद उनके समर्थकों द्वारा पारिवारिक दिक्कतों की दलील दी जाती रही लेकिन बाद में बृजेश ने अपनी पत्नी अन्नपूर्णा को एमएलसी बनवाकर साफ संदेश दे दिया.

गौरतलब है कि वाराणसी विधान परिषद सीट पर सबसे पहले बृजेश के बड़े भाई उदयनाथ सिंह उर्फ चुलबुल सिंह ने बीजेपी के समर्थन से जीत हासिल की थी. कहना गलत न होगा कि उनकी जीत के पीछे बृजेश के नाम और खौफ का भी योगदान था. कालांतर में चुलबुल राजनाथ सिंह के खास लोगों में गिने जाने लगे लेकिन बाद में उनके पुत्र सुशील ने विधानसभा चुनावों में बीएसपी का दामन थाम कर जीत दर्ज की थी. सुशील पिछले दिनों बीजेपी में आ चुके हैं और वर्तमान में विधायक हैं.

लगातार दो बार एमएलसी होने के बाद चुलबुल को बृजेश की पत्नी अन्नपूर्णा के लिए सीट छोड़नी पड़ी थी और उस चुनाव में अन्नपूर्णा सिंह ने बीएसपी प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की थी. 2016 एमएलसी चुनावों में बीजेपी द्वारा प्रत्याशी न उतारे जाने के बाद यह साफ हो चला था कि अब बृजेश का रास्ता साफ है.

2016 में बृजेश ने बीजेपी के अपरोक्ष समर्थन के बाद निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 3038 वोट पाकर जीत हासिल की और अपनी प्रतिद्वंद्वी एसपी की मीना सिंह को 1986 वोट से हराकर 2012 के विधानसभा चुनावों में मिली हार का बदला भी ले लिया था. 2012 में मनोज सिंह उर्फ डब्लू ने बृजेश को चंदौली की सैयदराजा सीट से हराया था. मीना सिंह मनोज की बहन हैं और उन्हें जिताने के लिये समाजवादी पार्टी ने काफी जोर आजमाइश की थी लेकिन बीजेपी के अप्रत्यक्ष समर्थन और बृजेश के चुनावी मैनेजमेंट ने मामला पलट दिया.

दो बड़े मामले बने बृजेश के लिये सरदर्द

बीजेपी के समर्थन से विधान परिषद चुनाव जीतने के बाद बृजेश का राजनीति में औपचारिक प्रवेश उनके समर्थकों द्वारा उनका एक नये जीवन में प्रवेश कहकर प्रचारित किया गया. उनकी छवि एक समाजसेवी और जनसेवक के रूप में दर्शाने की कोशिश मीडिया में पेड खबरों और विज्ञापनों के जरिए पिछले कई सालों से हो रही थी. बीते चार सालों में बृजेश दो दर्जन से ज्यादा मुकदमों में आरोप मुक्त होने में कामयाब भी हो गए, लेकिन दो मामले ऐसे हैं जिन्होंने बृजेश को परेशान कर रखा है.

बृजेश सिंह के लिए फिलहाल कुंडेसर चट्टी और सिकरौरा कांड गले की हड्डी बन चुका है. दोनों ही मामलों में लगतार सुनवाई भी चल रही है. कुंडेसर चट्टी कांड में बृजेश की पेशी गाजीपुर में चल रही है और सिकरौरा नरसंहार में पेशी  वाराणसी अदालत में चल रही है.

उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित सिकरारा नरसंहार कांड में बृजेश सिंह को कोर्ट के आदेश के बाद तगड़ा झटका लगा. वाराणसी में एडीजे (प्रथम) पीके शर्मा की कोर्ट ने कई महीनों तक चली सुनवाई के बाद बृजेश की उस अर्जी को गुरुवार को खारिज कर दिया जिसमें घटना के समय उनके नाबालिग होने की बात कही गई थी.

कोर्ट ने साक्ष्यों और सबूतों के आधार पर बृजेश सिंह को घटना के समय बालिग माना और कोर्ट के इस फैसले के बाद इस जघन्य नरसंहार मामले की आगे की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया.

सिकरारा काण्ड

चंदौली जिले (तत्कालीन वाराणसी) के थाना बलुआ अन्तर्गत सिकरारा गांव में 9 अप्रैल 1986 की रात ग्यारह बजे हथियारबंद लोगों ने पूर्व ग्राम प्रधान रामचंदर यादव और उनके छह परिजनों की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी गई थी. माना जाता है कि बृजेश ने यह नरसंहार अपने पिता की हत्या का बदला लेने के क्रम में किया था. घटना की रात ही बृजेश को घायल अवस्था में पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया था. लेकिन ट्रायल के दौरान जमानत पर छूटने के बाद बृजेश फरार हो गया और इसके बाद कभी इस मामले में पेश नहीं हुआ.

2008 में उड़ीसा से बृजेश सिंह की गिरफ्तारी होने के बाद बृजेश को लगातार अन्य मामलों में पेशी के लिये वाराणसी ले आया जाने लगा. हाई कोर्ट के आदेश के बाद वाराणसी सेशन कोर्ट में सुनवाई शुरू होने पर 6 अगस्त 2015 को बृजेश सिंह की ओर से घटना के समय नाबालिग होने की अर्जी दी गई. उक्त अर्जी में बृजेश के वकीलों की ओर से ये दलील दी गयी कि घटना के समय वह नाबालिग था और हाईस्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार उसकी उम्र 1 जुलाई 1968 है. इसके बाद दूसरे पक्ष की तरफ से बृजेश पर दर्ज मुकदमों में आर्म्स लाइसेंस, ड्रायविंग लाइसेंस, पासपोर्ट और कंपनी रजिस्ट्रार के यहां दिए गए कागजातों में दी गयी जन्मतिथि 9 नवम्बर 1964 से सबंधित सबूत पेश किये गये. कोर्ट ने 1964 को ही सही जन्मतिथि माना.

रंग लाई हीरावती देवी की मुहिम

इस पूरे मामले में स्व रामचंद्र यादव की पत्नी हीरावती देवी ने लगातार कोशिश करके अंततः ट्रायल शुरू करवा ही लिया. हीरावती ने कई बार अपने गांव की सैंकड़ों महिलाओं के साथ कई वर्षों तक जिला मुख्यालय पर बच्चों समेत धरना दिया. इसके साथ ही उन्होंने मीडिया और सबंधित अधिकारियों को बार बार बताया कि बृजेश सिंह को गैंगस्टर मामले में कोर्ट से जमानत मिल गई है लेकिन इसके साथ सिकरौरा हत्याकांड की फाइल रिकॉर्ड से गुम हो गई है. इस केस में बृजेश सिंह की रिमांड भी नहीं बनी और ट्रायल भी नहीं हुआ. धरना प्रदर्शन से बात न बनते देख हीरावती देवी ने अपने विधिक पैरोकार राकेश न्यायिक के माध्यम से उच्च न्यायलय में अनुरोध किया.

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आरोप है कि ग्रामप्रधानी के वर्चस्व और जमीन विवाद के चलते उनके पति समेत परिवार के सात सदस्यों को हीरावती की आंखों सामने बृजेश सिंह ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था. इस काण्ड में तीन महीने के एक बच्चे को भी नहीं बख्शा था और उसे भी गोली मार दी गयी थी.

मृतकों में रामचंद्र और उनके दो भाइयों के अलावा बच्चे भी शामिल थे. हीरावती वाराणसी की अदालत में लगातार अपने गांव की महिलाओं के साथ आती रहीं और उन्होंने हर संभव प्रयास किये कि इस केस का ट्रायल जल्द शुरू हो. हीरावती देवी को आज भी इस मामले में न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है.

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