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ब्रिक्स सम्मेलन 2017: चीन की नरमी का गलत अर्थ ना लगाए भारत

शी जिनपिंग को इस पल खूब पता है कि भारत को ब्रिक्स की उतनी जरुरत नहीं जितनी कि ब्रिक्स को भारत की है.

Sreemoy Talukdar Updated On: Sep 05, 2017 12:31 PM IST

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ब्रिक्स सम्मेलन 2017: चीन की नरमी का गलत अर्थ ना लगाए भारत

ब्रिक्स सम्मेलन के शियामेन संयुक्त घोषणा पत्र में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नाम का शामिल होना भारत के लिए एक रणनीतिक और कूटनतिक जीत है.

पाकिस्तानी सरजमीं पर कायम आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा दोनों का खास निशाना भारत होता है और ऐसा पहली बार हुआ है कि चीन ने इन दोनों संगठनों का नाम संयुक्त बयान में शामिल होने दिया. अब से पहले भारत ने जब भी ऐसा करने की कोशिश की, बीजिंग ने अकेले अपने दम पर इस कोशिश की काट की, जैसे कि गोवा में.

सम्मेलन के इस साल के संस्करण की शुरुआत के तुरंत पहले मेजबान चीन ने अपनी मीडिया बीफ्रिंग में जता दिया था कि आतंकवाद में पाकिस्तान की भूमिका का मुद्दा ब्रिक्स के मंच से सदस्य देशों का उठाना चीन को पसंद नहीं. भारत को इस बहाने ढंके-छुपे एक संदेश देने की कोशिश की गई थी. और अगर इस संदर्भ को सामने रखें तो जान पड़ेगा कि भारत ने शियामेन में तो मानो तख्तापलट कर दिखाया.

चीन को अपने नफे-नुकसान से मतलब

लेकिन सोमवार के दिन घटनाक्रम ने जो मोड़ लिया उसके आधार पर गलत अनुमान ना लगाना भी उतना ही अहम है. जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के बारे में जैसे ही समाचार आया, भारत के कुछ टीवी चैनल पूरे जोशो-खरोश से अपनी व्याख्या में बताने लगे कि चीन ने तो पाकिस्तान को गड्ढ़े में ढकेल दिया.

कुछ टीवी चैनलों ने कहा कि डोका ला के बाद यह भारत की बड़ी कामयाबी है. ब्रिक्स के मंच पर भारत को जो कामयाबी हासिल हुई है वह महत्वपूर्ण है. इससे पता चलता है कि चीन ने पाकिस्तान-प्रायोजित आतंक को लेकर अपना रुख नरम किया है. लेकिन यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि भारत को बहुत बड़ी कामयाबी हासिल हो गई या फिर पाकिस्तान को लेकर चीन की नीति में कोई नाटकीय बदलाव हो गया.

चीन बहुत सोच-विचारकर कदम उठाता है. उसका हर कदम नफा-नुकसान के सख्त आकलन के बाद ही उठता है. तर्क के तराजू पर तौलकर कदम उठाने वाले बाकी देशों की तरह चीन वैसा एक भी कदम नहीं उठायेगा जो उसके मुख्य हितों के खिलाफ जाए. अभी अमेरिका पाकिस्तान के ऊपर अपनी नजरें टेढ़ी कर रहा है और पाकिस्तान कमजोर नजर आ रहा है. यह बात चीन के मुख्य हित के खिलाफ है. चीन के सामने अभी समस्या दो परस्पर विरोधी स्थितियों के बीच संतुलन बैठाने की है. इस बारे में चर्चा आगे बढ़ाने से पहले आइए, यह देखते हैं कि संयुक्त घोषणा-पत्र के खास हिस्से में दरअसल कहा क्या गया है.

चीन ने क्यों करने दिया इन आतंकी संगठनों के नाम का एलान?

शियामेन घोषणा-पत्र 43 पन्नों का है और इसके 48 वें अनुच्छेद में लिखा है- 'हम, इस संदर्भ में, इलाके की सुरक्षा सबंधी स्थितियों और तालिबान, आइएसआइएल/दाएश, अल-कायदा और इससे जुड़े इस्टर्न तुर्कीस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, द हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, टीटीपी और हिज्ब-उल-तहरीर के हाथों पैदा हिंसा को लेकर अपनी चिंता का इजहार करते हैं.'

यह बात तो बिल्कुल ठीक कही जा रही है कि पहली बार ब्रिक्स के सदस्य देशों (व्यवहारिक रुप से देखें तो चीन) में ऐसे आतंकवादी जमातों के नाम शामिल करने पर सहमति बनी है जो पाकिस्तान या पाकिस्तान की दावेदारी वाली जमीन से अपनी गतिविधियां चलाते हैं और इन जमातों के खास निशाने पर भारत होता है.

यहां याद किया जा सकता है कि गोवा घोषणापत्र में इस्लामिक स्टेट, अल-कायदा और सीरिया के जुबहत अल-नुसरा का जिक्र तो आया था लेकिन उसमें जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा या फिर सीमा-पार से होने वाली आतंकी गतिविधि जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ था. भारत पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद को इंगित करने के लिए ‘सीमा-पार से होने वाली आतंकी गतिविधि’ जैसे जुमले का इस्तेमाल करता है.

उस वक्त इंडियन एक्सप्रेस ने ध्यान दिलाया था कि पाकिस्तान का नाम उछालने और उसपर तोहमत लगाने की नरेंद्र मोदी की कोशिशों पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने यह कहते हुए पानी फेर दिया कि ‘समस्याग्रस्त इलाकों के लिए राजनीतिक समाधान’ तलाशा जाए. गौर कीजिए कि ‘समस्याग्रस्त इलाका’ जैसा शब्द यहां कश्मीर के लिए इस्तेमाल हुआ है.

उस वक्त टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा था कि आतंकवाद के सवाल पर पाकिस्तान को एक किनारे करने की भारत की कोशिशों में ना सिर्फ चीन ने अड़ंगा लगाया बल्कि रुस भी भारत की मुख्य चिंता को अपना समर्थन नहीं दे सका. लेकिन इस बार ना सिर्फ जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा का नाम संयुक्त घोषणापत्र में शामिल हुआ है बल्कि इसमें आतंकवाद को लेकर सख्त शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कार्रवाई करने की मंशा का भी इजहार झलकता है.

घोषणापत्र के अनुच्छेद 49 में लिखा है- 'हम ब्रिक्स के देशों सहित विश्व में कहीं भी होने वाले आतंकवादी हमले की निंदा करते हैं और आतंकवाद के हर रुप और अभिव्यक्ति को निंदनीय समझते हैं, चाहे उसे जिसने और जहां अंजाम दिया हो. और इस बात पर जोर देना चाहते हैं कि आतंकवाद की किसी भी घटना को किसी भी सूरत में जायज करार नहीं दिया जा सकता.'

ब्रिक्स सम्मेलन में ब्राजील के राष्ट्रपति माइकल टेमर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

ब्रिक्स सम्मेलन में ब्राजील के राष्ट्रपति माइकल टेमर, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है घोषणा पत्र में

इसके बाद के अनुच्छेद में आतंकवाद को लेकर विश्वस्तर पर व्यापक नजरिया अपनाने की बात कही गई है. इसके अंतर्गत आतंकवाद की ओर प्रेरित करने वाले विचारों से लोगों को दूर हटाने के तरीके अपनाने और इसके लिए विशेष नियुक्तियों की बात कही गयी है. साथ ही आतंकी जमात के लड़ाके की आवा-जाही पर रोक के तरीके और उन्हें हासिल धन के स्रोत पर पाबंदी लगाने की भी बात कही गई है. साथ ही, घोषणापत्र में आतंकवाद का प्रसार करने वाले विचारों की काट करने और आंतकी जमातों को धन, तकनीक और अन्य सहायता मुहैया कराने वाले हर तरह के स्रोत से निपटने की तरफ ध्यान दिलाया गया है.

एक दिलचस्प बात यह भी है कि 2015 में उफा में हुए सम्मेलन में 'कंप्रेहेन्सिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेररिज्म' के दस्तावेज को अंतिम रुप देने तथा अपनाने का मसला छोड़ दिया गया था लेकिन इस बार उसे फिर से नये सिरे से उठाया गया. ऐसे में, कुल मिलाकर जान पड़ता है कि मोदी और कूटनयिकों की उनकी टीम ने ब्रिक्स के मंच पर अपनी कुछ बातों को मनवाने में कामयाबी हासिल की है और ये बातें भारत की सुरक्षा संबंधी मुख्य जरुरतों से मेल खाती हैं.

बहरहाल,जैसा कि मैंने ऊपर इशारा किया है, इसे एकतरफा जीत नहीं कहा जा सकता. बेशक लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का जिक्र आने से पाकिस्तान के खिलाफ भारत का पक्ष मजबूत हुआ है और संयुक्त राष्ट्रसंघ में इसे चीन के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का नाम आने से एक बड़ी बाधा आ खड़ी हुई है क्योंकि इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि चीन पाकिस्तान को आंतकवाद को शह देने वाला ही नहीं बल्कि आतंकवाद का शिकार देश भी मानता रहेगा और इस कारण उसकी मदद करेगा.

लेकिन भारत के लिए है एक मुसीबत

कूटनीति की दुनिया में इस हाथ से ले और उस हाथ से दे का नियम चलता है और इस खेल में यह तो माना ही जा सकता है कि भारत को कुछ खोकर ही कुछ हासिल होना था लेकिन संयुक्त घोषणापत्र में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का नाम शामिल होने से भारत का पक्ष कमजोर हुआ है. भारत पाकिस्तान को आतंकवाद पैदा करने वाला देश कहता आया है जबकि घोषणापत्र में तहरीक-ए-तालिबान का नाम आने से वह आतंकवाद का शिकार देश भी कहला सकता है. इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कांफ्लिक्ट स्टडीज के विशेषज्ञ अभिजीत अय्यर-मित्रा ने अपने ट्वीट में इस तरफ ध्यान दिलाया है.

पाकिस्तान यह बात कहता आया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे जमातों के खिलाफ सैन्य-कार्रवाई में उसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है. इसी बहाने पाकिस्तान अपने को आतंकवाद का शिकार देश भी बताता है. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ने भारी कीमत चुकाई है, इस बात को साबित करने के लिए पाकिस्तान ने दावा किया कि उत्तरी वजीरिस्तान के कबीलाई इलाके में 2014 में उसने जब तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य-कार्रवाई की तो उसके 580 सैनिकों की शहादत हुई.

पाक के साथ खड़ा है चीन 

जाहिर है, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा का नाम शामिल कराने की भारत की मुराद तो पूरी हुई लेकिन चीन ने इसकी काट में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का नाम भी शामिल करा दिया ताकि पाकिस्तान के पक्ष को वह मजबूती से उठा सके. शियामेन के सम्मेलन से तुरंत पहले चीन के विदेश मंत्री ने जो बयान दिया था वह गौर करने लायक है.

चीनी विदेशमंत्री ने कहा था कि 'पाकिस्तान आतंकवाद विरोधी गतिविधि के मामले में आगे के मोर्चे पर खड़ा है और उसने इसकी कीमत चुकाई है. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को पाकिस्तान के योगदान और बलिदान को स्वीकार करना चाहिए.'

पाकिस्तान को खुला समर्थन देता है चीन. फिर भारत के लिए टेरर फंडिंग को रोकना इतना आसान नहीं होगा.

पाकिस्तान को खुला समर्थन देता है चीन. फिर भारत के लिए टेरर फंडिंग को रोकना इतना आसान नहीं होगा.ॊ

इसलिए, यह अनुमान लगाना कि चीन ने पाकिस्तान को गड्ढ़े में ढकेल दिया, एकदम ही गलत है. चीन ने बस इतना भर किया है कि दांव बचाने के ख्याल से अपना एक कदम पीछे खींचा है. उसने डोका ला मुद्दे पर भी यही किया था. और चीन ने यह कदम नफा-नुकसान के व्यावहारिक तकाजे से उठाया है ना कि हिंदी-चीनी भाई-भाई जैसे भावनाओं के अतिरेक में.

चीन जानता है कि भारत इस मसले को संयुक्त राष्ट्रसंघ में उठाकर मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर सकता है और ऐसे में जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की काट में चीन ने जो तकनीकी अडंगा लगा रखा है वह कमजोर पड़ जायेगा. जाहिर है, चीन ने खूब देखभालकर यह जोखिम उठाया है और इससे पता चलता है कि विदेश नीति के मामले में चीन वास्तविकता के अनुरुप कदम उठाता है.

ब्रिक्स को है भारत की जरूरत

शी जिनपिंग को इस पल खूब पता है कि भारत को ब्रिक्स की उतनी जरुरत नहीं जितनी कि ब्रिक्स को भारत की है. इसके कुछ पहलू पर मैंने अपने पहले के लेख में चर्चा की है जिसे यहां क्लिक करके पढ़ा जा सकता है. पिछले लेख में यह तर्क दिया गया है कि बहुध्रुवीय विश्व बनाने की सोच से जो आर्थिक गोलबंदी कायम की गई थी वह चीन को केंद्र में रखकर एकध्रुवायी विश्व कायम करने के एक साधन मे बदल गई है.

साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत के पास विशाल बाजार है, उसकी अर्थव्यवस्था बढ़वार पर है. दक्षिण एशिया में स्थिरता कायम रखने में भारत की भूमिका अहम है और विश्व में भारत की साख एक उदारवादी लोकतंत्र की है. इस रुप में भारत चीन और रुस के प्रभाव को एकतरफा ना होने देने के ख्याल से एक संतुलनकारी ताकत के रुप में अहम है. साथ ही भारत ऐसी किसी भी गोलबंदी के लिए अहम हो सकता है जो पश्चिमी देशों के दबदबे वाली विश्व-व्यवस्था में एक वैकल्पिक मॉडल के साथ आ खड़ा हो. ऐसी गोलबंदी भारत को दरकिनार कर कायम नहीं की जा सकती. डोका ला के मुद्दे पर हुई तनातनी की जड़ में यह इलाकाई सच्चाई भी काम कर रही थी.

अच्छा होगा कि मोदी चीन के नरम बरताव को सहज ना मानें. पाकिस्तान और चीन जैसे देश अपनी बात से मुकरने के लिए जाने जाते हैं. ऐसे देशों को किसी समझौते में लिखी बात और मंशा को झुठलाने में देर नहीं लगती. अगर जवाबदेही भरी कोई नीति नहीं बनती तो फिर लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को आतंकी जमातों की सूची में शामिल कर लेने भर से कुछ ठोस हासिल नहीं होने वाला. जब तक ऐसा नहीं होता, भारत को चाहिए कि वह ब्रिक्स के दायरे में अपनी भूमिका कठोर सच्चाइयों को सामने रखकर तय करे जैसा कि उसने डोका ला विवाद के मामले में किया था.

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