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चोटी काटने की घटनाओं से दहल रही है कश्मीर घाटी

लेकिन आजकल घाटी की फिजा बिल्कुल बदली हुई है. लोगों के दिल में दहशत 90 के दशक से भी ज्यादा है. गांव के लोग दिन में भी बाहर निकलने से डर रहे हैं

Updated On: Oct 30, 2017 06:50 PM IST

David Devadas

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चोटी काटने की घटनाओं से दहल रही है कश्मीर घाटी

बीते हफ्ते मैं कश्मीर के ग्रामीण इलाके में करीब 3 किलोमीटर तक पैदल घूमा. इस दौरान हर जगह मुझे स्थानीय निवासियों की शक भरी निगाहों का सामना करना पड़ा.

कश्मीर में आमतौर पर सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ और बम धमाकों का खौफ रहता है. लेकिन इनदिनों घाटी में अलग ही तरह का उन्माद दिखाई दे रहा है. ये उन्माद है चोटी काटने की रहस्यमयी घटनाओं का, जिससे घाटी में हर कोई खौफजदा है.

जिन लोगों का पाला भीड़ के उन्माद और पागलपन से पड़ चुका है, वे लोग इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ होंगे कि, उन्माद किसी युद्धक्षेत्र से ज्यादा भयावह होता है. ऐसे ही कुछ हालात इनदिनों कश्मीर में नजर आ रहे हैं.

ये उन्माद 90 के दशक के दौर से भी ज्यादा खतरनाक है. बीते हफ्ते जब मैं पैदल घाटी के एक गांव से गुजर रहा था, तब मुझे दिन दहाड़े वैसी ही बेचैनी महसूस हुई जैसी कि 90 के दशक में होती थी. हर जगह खतरनाक सन्नाटा पसरा हुआ है, लोग सहमे हुए हैं. ऐसे हालात सिर्फ ग्रामीण इलाकों में ही नहीं हैं, बल्कि शहरी इलाकों में भी लोगों के बीच अजीब सी बेचैनी और घबराहट है.

सड़कों, मोहल्लों और गलियों का माहौल ऐसा नजर आ रहा है, जैसे कि पत्थरबाजी के दौरान या किसी के जनाजे (शवयात्रा) के वक्त दिखाई देता है. कश्मीर घाटी में छाए इस उन्माद की वजह बीते एक महीने से हो रही चोटी काटने की रहस्यमयी घटनाएं हैं. बड़ी तादाद में महिलाओं ने दावा किया है कि किसी अज्ञात शख्स ने उनकी चोटी काट दी है.

खास बात ये है कि चोटी काटने की ये घटनाएं या तो पीड़ित महिलाओं के घर में ही हुई हैं, या उनके घर के नजदीक. एक आंकड़े के मुताबिक कश्मीर घाटी में अबतक 100 से ज्यादा महिलाएं चोटी कटने की शिकायत कर चुकी हैं.

कौन काट रहा है चोटी बना हुआ है रहस्य 

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महिलाओं की चोटी कौन काट रहा है, ये बात अबतक रहस्य बनी हुई है. कुछ महिलाओं का दावा है कि चोटी काटने वाले शख्स ने काले कपड़े पहन रखे थे, वहीं कुछ महिलाओं ने किसी भी संदिग्ध को नहीं देखा है. इसके अलावा ऐसी भी चर्चाएं हैं कि, चोटी काटने वाला संदिग्ध शख्स कोई स्प्रे छिड़क देता है, जिससे महिलाएं कुछ देर के लिए बेहोश हो जाती हैं. महिलाओं के बेहोश होने के बाद संदिग्ध शख्स उनकी चोटी काट कर फरार हो जाता है.

कश्मीर में इनदिनों हर किसी की जुबान पर सिर्फ चोटी काटने की घटनाओं का जिक्र है. चोटी काटने की घटनाओं की जितनी चर्चा हो रही है, उतना ही लोगों के दिलों में खौफ पैदा हो रहा है. यही वजह है कि चोटी काटने के शक में घाटी में अबतक कई लोगों पर हमले हो चुके हैं.

कश्मीर में इनदिनों खबरें और अफवाहें बहुत तेजी से फैल रही हैं. जरा सी हलचल होने पर लोग फौरन चौंकन्ने हो जाते हैं. चोटी काटने की घटना की खबर मिलते ही जगह-जगह लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है. और फिर ये भीड़ वहां से गुजर रहे हर राहगीर को शक भरी निगाहों से देखने लगती है.

चोटी काटने वाले की दहशत लोगों में इस कदर है कि, भीड़ अबतक कई राहगीरों को पीट-पीटकर अधमरा कर चुकी है. एक जगह लोगों ने चोटी कटवा समझ कर एक शख्स को जिंदा जलाने की कोशिश की, वहीं एक जगह एक शख्स को पानी में डुबो कर मारने का प्रयास किया गया.

भीड़ की इन हरकतों को पुलिस पागलपन करार दे रही है. वहीं ऐसे भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि, चोटी काटने की घटनाएं कुछ महिलाओं की निराशा का नतीजा हैं. यानी महिलाओं ने निराशा और उत्पीड़न से परेशान होकर खुद ही अपनी चोटी काट ली, और फिर बाद में हल्ला मचा दिया कि किसी संदिग्ध शख्स ने उनकी चोटी काट दी है.

भीड़ इकट्ठा करनेवाले भी कर रहे हैं समर्थन 

विडंबना ये है कि, इस बात का समर्थन वे लोग भी कर रहे हैं, जिन्होंने अतीत में सरकार के खिलाफ भीड़ को इकट्ठा करके भड़काने का काम किया है. वहीं कुछ लोग इस मामले में सरकार की लाचारी का मजाक भी उड़ा रहे हैं. जबकि कई कश्मीरियों का आरोप है कि चोटी काटने की घटनाओं के पीछे सेना का हाथ है. दलील दी जा रही है कि, सेना ने चोटी काटने की घटनाओं को इसलिए अंजाम दिया, ताकि लोगों के बीच खौफ पैदा हो, और वो किसी भी अजनबी को अपने घर में पनाह न दें.

हालांकि ज्यादातर लोग चोटी काटने की घटनाओं में सेना का हाथ होने की बात पर यकीन नहीं करते हैं. इनका मानना है कि, चोटी काटने की घटनाएं तो उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और जम्मू डिवीजन के कुछ इलाकों जैसे डोडा, सांबा और कठुआ में भी हो चुकी हैं. वहां तो सेना का ज्यादा दखल नहीं है, तब वहां किसने महिलाओं की चोटी काटी?

अफवाहों का कश्मीर से पुराना नाता है. जरा सी बात अफवाह बनकर पूरी कश्मीर घाटी में आग की तरह फैल जाती है, और भीड़ पागल हो उठती है. साल 1960 में जब कश्मीर में पहली बार जर्सी गाय लाई गई, तब ये अफवाह उड़ी कि, जर्सी गाय, सामान्य गाय और सुअर के मिलन से पैदा हुई है. इस अफवाह के चलते तब लोगों ने जर्सी गाय को छूने तक से इनकार कर दिया था. क्योंकि इस्लाम में सुअर को अछूत और हराम करार दिया गया है.

यहां तक कि, 90 के दशक में आतंकवाद के चरम पर कश्मीर घाटी में भूतों को लेकर भी अफवाहों की लहर उठी थी. उन अफवाहों के लिए भी सेना को जिम्मेदार ठहराया गया था. तब ये दलील दी गई थी कि, सेना लोगों के दिलों में भूतों का डर बैठाना चाहती है, ताकि लोग शाम ढलने से पहले ही अपने-अपने घर में पहुंच जाएं.

90 के दशक से अधिक खौफनाक है मंजर 

The Wider Image: Kashmir's stone-pelters face off against pellet guns

चोटी काटने की घटनाओं को लेकर लोगों के उन्माद के तरह-तरह के रूप देखने को मिल रहे हैं. इस उन्माद के चलते अजनबियों के प्रति न सिर्फ हिंसा बढ़ी है, बल्कि इससे समाज में एक-दूसरे प्रति विश्वास भी कम हुआ है. हर कोई एक-दूसरे को शक की निगाह से देख रहा है. वहीं सरकार पर भी लोगों का भरोसा कम हुआ है.

कश्मीर में बीते तीन दशकों से जारी उत्पात, हिंसा और दहशत के बावजूद ग्रामीण इलाकों के लोगों की जिंदगी दिन में सामान्य रहती आ रही है. 90 के दशक के खौफनाक दौर में भी लोग दिन में बेखौफ होकर कहीं भी आते-जाते थे. तब लोग सूरज डूबने से एक-दो घंटे पहले अपने-अपने घर में चले जाते थे.

लेकिन आजकल घाटी की फिजा बिल्कुल बदली हुई है. लोगों के दिल में दहशत 90 के दशक से भी ज्यादा है. गांव के लोग दिन में भी बाहर निकलने से डर रहे हैं. शाम होते ही लोग घरों में दुबक जाते हैं, और बाजारों, सड़कों और गलियों में सन्नाटा पसर जाता है. किसी भी अजनबी को देखर लोग उसपर हमला बोल देते हैं.

लोगों को अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों तक पर भरोसा नहीं रहा है. बताया जा रहा है कि, एक शख्स अपने चचेरे भाई को शाम के वक्त अपने घर के नजदीक देखकर भड़क उठा, और उसने अपने चचेरे भाई से पूछा कि वो इस वक्त वहां क्या कर रहा है. जाहिर है उस शख्स के दिलो-दिमाग पर चोटी काटने वाले का खौफ बुरी तरह हावी था. ऐसे हालात तो 90 के दशक के दौर में भी नहीं थे. तब कोई भी अपने परिवार या परिजनों को ऐसे शक की नजर से नहीं देखता था.

तब लोगों को अपने परिवार और पड़ोसियों पर भरोसा हुआ करता था. क्योंकि कश्मीर में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है, और लोग अपने परिजनों को खास महत्व देते आए हैं. लेकिन अब चोटी कटवा के खौफ ने कश्मीर की विशेषताओं और परंपराओं तक को चुनौती दे दी है.

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