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मनमोहन सिंह को वामपंथी दलों संग बैठक की जानकारी देना ‘भूल’ जाते थे प्रणब दा

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मनमोहन प्रणव मुखर्जी को सर कहकर ही बुलाते रहे

Aparna Dwivedi Updated On: Oct 14, 2017 03:43 PM IST

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मनमोहन सिंह को वामपंथी दलों संग बैठक की जानकारी देना ‘भूल’ जाते थे प्रणब दा

मेरे प्रधानमंत्री बनने पर प्रणब मुखर्जी की नाराजगी जायज थी, पर मैं क्या करता, बोले  मनमोहन सिंह मौका था पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नई किताब 'द कोएलिशन इयर्स 1996-2012' के विमोचन का. इस मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेबाकी से अपने दिल की बात कही.

उन्होंने कहा कि जब वो प्रधानमंत्री बने तो प्रणब मुखर्जी दुखी थे. लेकिन वो भी जानते थे कि मेरे पास और विकल्प नहीं था. मनमोहन सिंह के ये कहते ही वहां पर मौजूद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मुस्कराने लगी और प्रणब मुखर्जी समेत दर्शकों ने जम कर ठहाका लगाया.

मनमोहन सिंह ने मुखर्जी को प्रधानमंत्री के लिए ज्यादा बेहतर विकल्प बोला

मनमोहन सिंह ने कहा, 'सोनिया गांधी ने मुझे प्रधानमंत्री बनने के लिए चुना था. प्रणब मुखर्जी इस पद के लिए हर लिहाज से मुझसे बेहतर थे. प्रणब मुखर्जी राजनीति में मुझसे हर लिहाज से सीनियर थे, लेकिन मुझे चुना गया. इसके बावजूद हमारे रिश्तों में कभी कोई अंतर नहीं आया.' गौरतलब है कि यूपीए के सत्ता में आने के बाद गठबंधन की अध्यक्ष होने के नाते सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना था.

उस समय मनमोहन को प्रधानमंत्री बनना सोनिया गांधी की बेहतरीन पसंद थी

वहीं प्रणब मुखर्जी का कहना है कि सोनिया गांधी ने यूपीए 1 के समय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुन कर समझदारी दिखाई. एक निजी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में प्रणब ने बताया कि जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह का चुनाव किया, तो मैं तनिक भी निराश नहीं हुआ. मुझे लगा था कि उस समय मैं भारत का प्रधानमंत्री बनने के योग्य नहीं हूं. पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, 'मेरी इस अयोग्यता की सबसे बड़ी वजह यह भी थी कि मैं ज्यादा समय राज्य सभा का सदस्य रहा हूं. सिर्फ वर्ष 2004 में लोकसभा सीट जीती थी. मैं हिंदी नहीं जानता था. ऐसे में बिना हिंदी जाने किसी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए.

सोनिया गांधी के निर्णय से आहत थे प्रणब मुखर्जी

आज प्रणब मुखर्जी भले ही सोनिया गांधी के फैसले को सही बोल रहे हैं लेकिन जब पहली बार मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री के रूप में आया था तब मुखर्जी काफी दुखी थे. हालांकि उस समय वो शांत हो गए थे. 2004 में जब यूपीए की सरकार बन रही थी, तो प्रणब मुखर्जी को गृहमंत्री बनाने की बात थी, जो प्रोटोकॉल में दूसरे नंबर पर आता है. लेकिन, बाद में उन्हें रक्षा मंत्रालय मिला, इससे उनके करीबी आहत हो गये थे, लेकिन कुछ ही क्षणों में प्रणब मुखर्जी ने खुद को इस पद के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया.

मनमोहन सिंह के बॉस प्रणब मुखर्जी

किसी जमाने में मनमोहन सिंह के बॉस प्रणब मुखर्जी हुआ करते थे. मनमोहन सिंह प्रणब मुखर्जी के राजनीतिक जूनियर रहे हैं. 80-90 के दशक में जब प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के एक कद्दावर राजनीतिक शख्स और प्रभावी मंत्री के रूप में काम करते थे, तब मनमोहन सिंह नौकरशाह व अर्थशास्त्री के रूप में सरकार में अलग-अलग जिम्मेवारियां संभाला करते थे.

फोटो सोर्स- पीटीआई फोटो सोर्स- पीटीआई

इस स्थिति के कारण मनमोहन सिंह के मन में हमेशा प्रणब मुखर्जी के प्रति गहरा सम्मान रहा. मनमोहन सिंह राजनीतिक दल में होते हुए भी एक गैर राजनीतिक शख्स रहे. इस नाते उन्हें जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए एक अनुभवी राजनीतिक शख्स की जरूरत होती थी और सिंह की इस कमी को प्रणब पूरा कर दिया करते थे.

अन्ना आंदोलन के दौरान वार्ता के लिए बनायी गयी मंत्रियों की तीन सदस्यों वाली कमेटी जब विफल हो गयी थी, तो मामला प्रणब को सौंपा गया था. प्रणब उस दौर में कांग्रेस पार्टी की समस्याओं को भी सुलझाते थे. एसएम कृष्णा और शशि थरूर के महंगे होटल में टिके होने की खबर को जब मीडिया ने मुद्दा बनाया तो प्रणब ने उन्हें सार्वजनिक रूप से फटकार लगायी और होटल छोड़ने की नसीहत दी. प्रणब मनमोहन सरकार के दर्जनों जीओएम के प्रमुख थे.

एक और किस्सा

दिसंबर, 2008 में आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला कर दिया था, जिसमें 170 से ज्यादा लोग मारे गए थे. इस घटना से नाराज कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी की कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाई और कुछ मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाने का मार्ग प्रशस्त किया, ताकि एक कड़ा संदेश जा सके.

सीडब्ल्यूसी के वरिष्ठ सदस्यों ने एक-एक करके यह मांग उठानी शुरू कर दी कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए उस पर हमला बोल दिया जाए. लेकिन जब कश्मीर के वरिष्ठ नेता कर्ण सिंह ने भी ऐसी मांग कर डाली तो मुखर्जी ने हस्तक्षेप किया.

मुखर्जी ने कड़े लहजे में कहा, 'आप समझते हैं कि आप लोग क्या कह रहे हैं? यदि हम ऐसा (पाकिस्तान पर हमला) करते हैं, तो अगले दिन ही विदेशी बल कश्मीर में घुस आएंगे. हमने उन्हें कश्मीर से बाहर किया है और आप चाहते हैं कि हम उन्हें उस इलाके में घुसने के लिए आमंत्रित करें? 'प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह फौरन मुखर्जी के समर्थन में आए और तनाव को शांत किया.

नरम गरम रिश्ते

राजीव गांधी के जमाने में प्रणब मुखर्जी जब वित्त मंत्री थे उस दौरान चश्मा पहनने वाला एक शर्मीला अर्थशास्त्री भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर था. उस समय से लेकर वर्ष 2004 तक डॉ. मनमोहन सिंह मुखर्जी को 'सर' बुलाया करते थे. लेकिन इसके बाद हालात बदल गए थे. सिंह प्रधानमंत्री बन गए और मुखर्जी उनके रक्षा मंत्री. लेकिन सिंह की विनम्रता देखिए, देश का प्रधानमंत्री बनने के बावजूद उन्होनें मुखर्जी को 'सर' बुलाना बंद नहीं किया. लेकिन मुखर्जी सिंह को 'सर' नहीं बुलाते हैं. फोन पर कहते थे, 'प्रणब बोल रहा हूं', जबकि कैबिनेट या सार्वजनिक बैठकों वह सिंह को प्रधानमंत्री बुलाते थे.

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कांग्रेस के नेता भी इस बात को मानते हैं कि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के ऊपर मनमोहन सिंह का ज्यादा बस नहीं चलता था. वे किसी की नहीं सुनते थे. पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अपना समर्थन या मतभेद व्यक्त करने में इतने पारदर्शी कभी नहीं रहे. वाशिंगटन डीसी से एक महत्वपूर्ण मीटिंग से लौटने के बाद प्रणब ने तीन दिन तक प्रधानमंत्री से दौरे के बारे में बात करने की जरूरत नहीं समझी. वो सोनिया गांधी से मिलने गए लेकिन डॉ. मनमोहन से मिलने का समय नहीं मांगा. इसी तरह प्रणब वामपंथी दलों के साथ मुलाकातों-बैठकों का ब्यौरा प्रधानमंत्री को देना भी ‘भूल’ जाते थे.

पुस्तक विमोचन के मौके पर मनमोहन सिंह ने प्रणब मुखर्जी की खूब तारीफ भी की. उनके साथ अपने संबंध को याद करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि प्रणब मुखर्जी ने उन्हें हर मौके पर सहयोग दिया.

‘द कोलिशन ईयर्स 1996 – 2012’ शीर्षक से लिखी गई इस किताब में प्रणब मुखर्जी ने 1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार से लेकर यूपीए-2 कार्यकाल तक के राजनीतिक इतिहास के बारे में लिखा है. किताब में 1996 से 2012 तक की राजनीति, घटनाओं के जरिए समझाने की कोशिश की गई है.

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