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प्रेम, शादी और शारीरिक संबंधों पर कोर्ट के ये दो अहम फैसले क्या कहते हैं?

कोर्ट ने अपने फैसले में भले ही युवक योगेश का साथ दिया है लेकिन वो कहीं भी युवती को लेकर जजमेंटल नहीं हुई है. कोर्ट ने कहीं नहीं कहा कि प्रेम में शारीरिक संबंध स्थापित करना गलत है, न ही उसने लड़की के चरित्र या सोच और समझ पर उंगली उठाई

Updated On: Apr 03, 2018 04:23 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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प्रेम, शादी और शारीरिक संबंधों पर कोर्ट के ये दो अहम फैसले क्या कहते हैं?

बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा ब्रांच ने हाल ही में रेप के एक पांच साल पुराने मुकदमे के सिलसले में बिल्कुल ही अलग तरह का फैसला सुनाया है. अपने फैसले में कोर्ट ने कहा है कि अगर दो लोगों के बीच शादी से पहले, प्रेम संबंध के दौरान आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनते हैं तो उसे किसी भी कारणवश रिश्ता टूटने पर रेप या बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है.

कोर्ट ने ये भी कहा कि गलत सबूतों का हवाला देकर किसी भी पुरुष को सजा नहीं दी जा सकती है, जब इस बात के पक्के सबूत मौजूद हों कि स्त्री और पुरुष के बीच गहरे आत्मीय संबंध थे, दोनों एक दूसरे से प्यार और एक दूसरे की परवाह किया करते थे. हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए न सिर्फ अभियुक्त को दोषमुक्त किया बल्कि एक ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे दी गई सात साल कैद और 10 हजार रुपए जुर्माने की सजा को भी माफ कर दिया.

क्या था मामला?

मामला तकरीबन सात साल पुराना है जब आरोपी योगेश पालेकल गोवा के एक कसीनो में शेफ की नौकरी करने के दौरान महिला के संपर्क में आए और दोनों के बीच पहले दोस्ती फिर प्रेम संबंध बने. लड़की के मुताबिक, योगेश ने उससे शादी का वायदा किया था और उसे अपने घरवालों से मिलवाने के लिए अपने घर भी लेकर गया था, जहां दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने जो अगले कुछ महीनों तक जारी रहा. लेकिन युवक के घरवालों के मना करने के बाद उसने लड़की से शादी करने से मना कर दिया. ऐसा लड़की के अलग (नीची) जाति की होने के कारण हुआ. जिसके बाद लड़की ने लड़के पर बलात्कार का केस कर दिया. उसके मुताबिक वो लड़के के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी तभी हुई जब लड़के ने उससे शादी करने का भरोसा दिया था.

लेकिन मामले की जांच के दौरान ये पाया गया कि लड़की ने रिश्ते के दौरान न सिर्फ लड़के के मानसिक और भावनात्मक तौर पर जुड़ी थी बल्कि वो उसे लगातार आर्थिक तौर पर भी मदद कर रही थी. केस की सुनवाई कर रहे जज सी वी भदांग ने फैसला सुनाते वक्त दो-तीन बातों को खासतौर पर चिन्हित किया.

पहला ये कि लड़की का ये कहना कि वो सिर्फ शादी के वायदे के कारण शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार हुई गलत है- क्योंकि उन दोनों के बीच भावनात्मक प्रेम संबंध थे, ये बार-बार केस की जांच के दौरान साबित हुए हैं. दूसरी बात जो सामने आई वो ये कि दोनों के बीच ये सेक्सुअल रिलेशन एक नहीं बल्कि कई बार और लड़के के घर पर हुए, जहां लड़की अपनी मर्जी से जाती थी, जो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता. वो लगातार लड़के की जरुरतों का ध्यान रखती थी और उसे पैसों की भी मदद करती थी. तीसरी और सबसे अहम बात जो कोर्ट ने संज्ञान में लिया वो ये कि केस के बाद जब आरोपी युवक मानसिक तौर पर परेशान रहने लगा और उसे अपने डिप्रेशन के इलाज के लिए मनोचिकित्सकों की मदद लेनी पड़ी तब लड़की ने एक एफिडेविट फाइल कर अपनी शिकायत भी वापिस ले ली, उसने ऐसा करने के पीछे का कारण निजी और भावनात्मक बताया.

कोर्ट ने दोनों के संबंधों के उतार-चढ़ाव और परेशानियों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद अपने फैसले में कहा कि ये साबित होता है कि दोनों के बीच गहरे और आत्मीय संबंध थे. लड़का आर्थिक तौर पर कमजोर था इसलिए लड़की ने उसकी मदद की और वो किसी भी हालत में उसका शोषण करने की स्थिति में नहीं था. हालांकि, उसने पारिवारिक कारणों के कारण लड़की से शादी नहीं की, जिससे लड़की आहत हुई.

दो पहलूओं से फैसले को देखा जा सकता है

अगर मानवीय तौर पर, स्त्रीवादी तरीके से देखा जाए तो बॉम्बे हाईकोर्ट का ये फैसला औरतों और लड़कियों को लिए भविष्य में कई मुसीबतें खड़ी कर सकता है. आखिरकार, किसी भी व्यक्ति को ये अधिकार नहीं है कि शादी का लालच देकर किसी लड़की के साथ पहले संबंध बनाए फिर परिवार और समाज का रोना रोकर उससे किनारा कर ले, लेकिन इसके साथ ये भी गलत होगा कि लड़कियां अपनी मर्ज़ी से अपने जीवन से जुड़े फैसले लें और जब वो फैसला गलत हो जाए तब वे विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर दें.

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हम ये भूल रहे हैं कि हमारे समाज में लगातार बदलाव हो रहे हैं, रिश्तों की रंगत-बुनावट के साथ-साथ उससे जुड़े तंतु भी बदल रहे हैं और इसकी मांग जितना पुरुष कर रहे हैं लगभग उतनी ही लड़कियां भी. शादी से पहले संबंध बनाना या रखना, लिव-इन रिलेशनशिप में रहना, ब्रेक-अप होना, संबंध विच्छेद करना, किसी दूसरे समाज का सच भर नहीं है. थोड़े और आंशिक पैमाने पर ही सही अब ये सब हमारी ज़िंदगी का भी अहम् हिस्सा हैं. हालांकि, छोटे और कस्बाई समाज में इसको लेकर अभी भी काफी दबाव महसूस किया जा सकता है लेकिन पढ़े-लिखे और शहरी वातावरण धीरे-धीरे ही सही इन बातों को लेकर स्वीकार्यता बढ़ रही है.

लेकिन, क्या हम इस तस्वीर को दूसरी तरह से भी देख सकते हैं? सोमवार को गुजरात हाईकोर्ट के जज जेपी परडीवाला ने एक शादीशुदा जोड़े के मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि अगर एक पति अपनी पत्नी के साथ बिना उसकी मर्जी के यौन संबंध कायम करता है तो उसे रेप नहीं माना जा सकता है क्योंकि आईपीसी की धारा- 376 के तहत मैरिटल रेप का केस दर्ज ही नहीं हो सकता है क्योंकि आईपीसी की धारा 375 के मुताबिक, अगर कोई पति अपनी 18 साल और उससे बड़ी उम्र की पत्नी के साथ संभोग करता है तो वो रेप की श्रेणी में नहीं आता है. लेकिन पत्नी चाहे तो पति के खिलाफ धारा 377 के तहत अप्राकृतिक सेक्स का केस दर्ज कर सकती है.

इस तरह के पहले के मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने ये भी कहा कि हर पति को अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने का कानूनी हक होता है, हालांकि ये उसकी मर्जी के अनुसार ही होनी चाहिए क्योंकि पत्नी पति की निजी संपत्ति नहीं होती. यानी यहां बलात्कार को तो आईपीसी की धारा में शामिल किया गया है. बिना रजामंदी के सेक्स को शादी की परिधि से दूर रखा गया है और उस पर विचार ही नहीं हुआ है.

जस्टिस जेपी परडीवाला ने ये फैसला आरोपी पति द्वारा पत्नी के आरोपों को खारिज करने के लिए की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया है. उन्होंने पीड़ित युवती द्वारा अपने सास-ससुर पर किए केस को भी निरस्त कर दिया.

ऐसे में ये सवाल खड़ा होता है कि जब हमारी अदालतें लिव-इन रिलशनशिप और प्रेम-संबंधों को शादी जितनी अहमियत देने की कोशिश कर रही हैं तब इन दो तरह के मामलों में फैसले अलग-अलग क्यों होने चाहिए? हालांकि- इस विषय पर अभी लंबी कानूनी बहस होनी बाकी है.

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बॉम्बे HC का फैसला प्रगतिशील कहा जाना चाहिए

नया समाज रोज नए बदलाव की ओर बढ़ रहा है, वो अपने रिश्ते-नातों में भी एक्सपेरिमेंट्स कर रहा है. वो चाहता है कि चहारदीवारी के उस ओर बैठे लोग नए तौर-तरीकों पर टीका-टिप्पणी कम करें और उसका साथ दें. ऐसे में क्या बॉम्बे हाईकोर्ट का ये फैसला इसी दिशा में उठाया गया एक प्रगतिशील कदम नहीं कहलाएगा?

कोर्ट ने अपने फैसले भले ही युवक योगेश का साथ दिया है लेकिन वो कहीं भी युवती को लेकर जजमेंटल नहीं हुई है. कोर्ट ने बार-बार कहा कि लड़की शादी न होने से आहत थी लेकिन वो लड़के के साथ गहरे प्रेम में थी और गहरे प्रेम में लड़के के साथ उसने संबंध स्थापित किए. कोर्ट ने कहीं नहीं कहा कि प्रेम में शारीरिक संबंध स्थापित करना गलत है, न ही उसने लड़की के चरित्र या सोच-समझ पर उंगली उठाई. इसलिए हम सबको कोर्ट के इस फैसले को एक नज़ीर की तरह लेना चाहिए. जहां भारत की न्यायव्यवस्था धीरे-धीरे ही सही समाज में बसे एक रूढ़िवादी सोच को धीरे-धीरे पलट रही है. कोई भी टूटता हुआ रिश्ता उसमें गुंथे लोगों को तकलीफ़ ही देगा लेकिन जब दो लोग किसी भावनात्मक रिश्ते में होते हैं तो उसे सही-गलत और किसी दायरे में बांधने की समाज की सदियों पुरानी सोच पर धीमा लेकिन कड़ा प्रहार है ये फैसला.

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