विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

बोफोर्स घोटाला: जांच फिर शुरू, अगले चुनाव हो सकते हैं प्रभावित

बोफोर्स घोटाले ने 1989 में मतदाताओं को इसलिए अधिक झकझोरा था क्योंकि यह सीधे देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला था

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Oct 03, 2017 08:42 AM IST

0
बोफोर्स घोटाला: जांच फिर शुरू, अगले चुनाव हो सकते हैं प्रभावित

बोफोर्स तोप खरीद घोटाला सन 2019 के लोकसभा चुनाव को भी एक हद तक प्रभावित कर सकता है. उसने 1989 के लोकसभा चुनाव को पूरी तरह प्रभावित किया था. जब बोफोर्स घोटाले को लेकर उठे कुछ सवालों का संतोषजनक जवाब कांग्रेसी सरकार नहीं दे सकी तो लोगों ने राजीव सरकार को 1989 के चुनाव में अपदस्थ कर दिया. इन सवालों का जवाब अभी भी नहीं मिला है.

अब बोफोर्स घोटाला मुकदमे के फिर से खुलने की संभावना बलवती हो गई है. यदि मुकदमा फिर से खुला तो इस बार एक-एक कर अगले एक साल में उन सवालों के जवाब सामने आने लगेंगे. उन सवालों के जवाब कांग्रेस को परेशान करेंगे.

याद रहे कि हाल में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह बोफोर्स घोटाला मामले की फिर से जांच करने को तैयार है. सीबीआई के अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ वह 2005 में सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल करना चाहती थी, पर तत्कालीन यूपीए सरकार ने उसे ऐसा करने से रोक दिया. याद रहे कि उससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बोफोर्स केस को समाप्त कर देने का निर्णय कर दिया था.

क्यों बांधे गए थे सीबीआई के हाथ, मिलेगा इसका भी जवाब 

बोफोर्स मामले के जानकार लोगों ने कहा था कि हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ अपील के लिए अच्छा केस बनता था. यदि यह मामला इस बार आगे बढ़ा तो इस बात का भी जवाब आएगा कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने सीबीआई के हाथ तब क्यों बांध दिए थे?

याद रहे कि भारत सरकार के ही आयकर न्यायाधिकरण ने 2010 में यह कह दिया था कि ‘क्वात्रोच्चि और बिन चड्ढा को बोफोर्स की दलाली के 41 करोड़ रुपए मिले थे. ऐसी आय पर भारत में उन पर टैक्स की देनदारी बनती है.’ इस सवाल का जवाब आना बाकी है कि यूपीए सरकार ने उनसे टैक्स क्यों नहीं वसूला?

बोफोर्स सौदे की संक्षिप्त कहानी कुछ इस प्रकार है-

तत्कालीन सेनाध्यक्ष सुंदरजी ने फ्रांस की सोफ्मा कंपनी की तोपों की खरीद की सिफारिश की थी. सुंदर जी के अनुसार वे तोपें बोफोर्स तोपों से भी बढि़या थीं.

याद रहे कि सोफ्मा दलाली में पैसे देने को तैयार नहीं था. रक्षा राज्यमंत्री अरूण सिंह ने तब सुंदरजी को यह समझाया था कि ऊपरी इशारा है कि बोफोर्स तोपें ही खरीदी जाएं. हमेशा ऊपर की बात ही मानी जानी चाहिए.

BoforsHowitzerGun

क्यों नहीं खरीदा गया था बोफोर्स से बेहतर तोप?

इस सवाल का भी जवाब आना है कि बोफोर्स से बेहतर तोप को नहीं खरीद कर बोफोर्स ही क्यों खरीदा गया? आखिर किसके आदेश पर? क्या ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सोफ्मा वाला कोई कमीशन देने को तैयार नहीं था?

संसद की लोक लेखा समिति की उप समिति ने पिछले दिनों सीबीआई से कहा है कि वह बोफोर्स तोप सौदा घोटाले से संबधित मुकदमे को फिर से शुरू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील करे.

सवाल है कि जब सुप्रीम कोर्ट बाबरी मस्जिद विध्वंस मुकदमे को फिर से शुरू करवा सकती है तो बोफोर्स केस को क्यों नहीं?

इस मामले में इस सवाल का भी जवाब सामने आ सकता है कि गत साल 18 अगस्त को मुलायम सिंह यादव ने यह क्यों कहा कि ‘जब मैं रक्षा मंत्री था तो मैंने बोफोर्स से संबंधित फाइल को गायब करवा दिया था?

याद रहे कि मुलायम सिंह यादव उस संयुक्त मोर्चा सरकार के रक्षा मंत्री थे जिस सरकार को कांग्रेस बाहर से समर्थन कर रही थी. इस बात के सबूत मिले थे कि क्वात्रोच्चि ने दलाली के पैसे स्विस बैंक की लंदन शाखा में जमा करवाए थे. कांग्रेस सरकार ने पहले क्वात्रोच्चि को भारत से भाग जाने दिया, और बाद में लंदन के स्विस बैंक के उस बंद खाते को खुलवा कर क्वोत्रोचि को पैसे निकाल लेने की सुविधा प्रदान कर दी.

कांग्रेस और कांग्रेस समर्थित सरकारों ने इसे दबाने की कोशिश की 

ऐसा किसके आदेश पर किया गया? इस सवाल का जवाब भी आ सकता है. इस सवाल के जवाब अगले चुनाव में कांग्रेस को परेशान कर सकते हैं.

याद रहे कि बोफोर्स घोटाला 1987 में उजागर हुआ. उसको लेकर राजीव सरकार के कदमों और कांग्रेसी नेताओं के बयानों से आम लोगों को यह लग गया था कि सरकार दोषियों को बचाने की कोशिश में है इसीलिए लोगों ने 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केंद्र की सत्ता से हटा दिया. तब चुनाव का मुख्य मुद्दा ही बोफोर्स था.

वीपी सिंह की सरकार के कार्यकाल में जनवरी, 1990 में इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गई. उसी महीने स्विस खाते फ्रीज करवा दिए गए. वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में 1999 में बोफोर्स मामले में अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया गया.

पर इस बीच जब-जब कांग्रेसी या कांग्रेस समर्थित सरकार बनी, उसने इस मामले को दबाने की कोशिश की. कांग्रेस के समर्थन से बनी चंद्रशेखर सरकार ने तो कोर्ट में कह दिया कि ‘कोई केस नहीं बन रहा है.’

विदेश मंत्री माधव सिंह सोलंकी को देना पड़ा था इस्तीफा 

नरसिंह राव सरकार के विदेश मंत्री माधव सिंह सोलंकी ने दावोस में स्विस विदेश मंत्री को कह दिया कि बोफोर्स केस राजनीति से प्रेरित है. इस पर इस देश में जब भारी हंगामा हुआ तो सोलंकी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. मनमोहन सरकार के कार्यकाल में 2005 में सीबीआई. ने प्रयास करके क्वात्रोच्चि के लंदन स्थित बंद बैंक खाते को चालू करवा दिया.

सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि यदि राजीव गांधी ने बोफोर्स की दलाली के पैसे खुद नहीं लिए तो भी तब की उनकी सरकार और बाद की अन्य कांग्रेसी सरकारों ने क्वात्रोच्चि को बचाने के लिए एड़ी चोटी का पसीना एक क्यों किया? इस सवाल का जवाब आ सकता है.

इतना ही नहीं, केंद्र सरकार के निर्देश पर सीबीआई ने दिल्ली की एक अदालत में जनवरी, 2011 में बोफोर्स मामले में आयकर अपीली न्यायाधीकरण के आदेश को पूरी तरह अप्रासंगिक बता दिया और कहा कि इतालवी व्यापारी क्वात्रोच्चि के खिलाफ मामला वापस लेने के सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है.

बोफोर्स घोटाले ने 1989 में भी मतदाताओं के मानस को इसलिए अधिक झकझोरा था क्योंकि यह सीधे देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला था. देखना है कि यह मामला 2019 के लोक सभा चुनाव को किस हद प्रभावित करता है. याद रहे कि यदि बोफोर्स घोटाले की फिर से जांच हुई तो अगले एक साल में उन सारे चुभते सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं जिनकी चर्चा ऊपर की गई है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi