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अरे घबराइए नहीं... बस बोर्ड परीक्षा ही तो है!

नतीजे जो भी हो, ये आपकी जिंदगी का आखिरी एग्जाम नहीं है

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Mar 15, 2017 03:55 PM IST

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अरे घबराइए नहीं... बस बोर्ड परीक्षा ही तो है!

यकीन मानिए आपकी ये बोर्ड परीक्षा आपकी जिंदगी का आखिरी फैसला नहीं करने वाली. पढ़ना जरूरी है, पास होना भी लेकिन जिंदगी का मकसद सिर्फ बोर्ड की मार्कशीट में 99 प्रतिशत लाना नहीं है.

10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं देश भर में शुरू हो गर्इ हैं. बच्चों के साथ-साथ मां-बाप के लिए भी ये बात समझना बेहद जरूरी है कि ये परीक्षा जिंदगी और मौत का फैसला नहीं है.

3 इडियट्स में रैंचो का वो डॉयलाग तो आपको याद ही होगा, बच्चा काबिल बनो! कामयाबी झक मार के पीछे आएगी. ये सिर्फ एक डायलॉग नहीं है, बल्कि गुरू मंत्र है.

हमारे देश में बोर्ड का एग्जाम बच्चा अकेला नहीं देता, पूरा परिवार, पूरा खानदान, पूरा मोहल्ला मिलकर देता है. और यही वजह है बच्चों पर बढ़ते दबाव का. वर्मा जी के बेटे के 95 प्रतिशत आए थे और शर्मा जी के बेटे को डीयू में एडमिशन मिल गया था.

अपने बच्चे से उम्मीद होना लाजमी है लेकिन जरा ध्यान दीजिए, कहीं आपकी ये उम्मीदें बच्चे के लिए प्रेशर न बन जाए. ना चाहते हुए भी मां बाप, समाज में बच्चे की छवि बना देते हैं और फिर सारा भार आ जाता है बच्चे के कंधे पर...उस छवि को बनाए रखने के लिए. और ऐसा करने में जब वो नाकाम हो जाता है तो आत्महत्या एक आसान रास्ता लगता है.

साल 2013 में, 2,471 छात्रों ने सिर्फ एग्जाम में फेल होने के कारण आत्महत्या कर ली. और ये नंबर साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है.

जिस दिन आप ये मान लेंगे कि ये अकेला एग्जाम आपकी जिंदगी का फैसला नहीं करेगा, उस दिन से न सिर्फ आप खुद पर यकीन करने लगेंगे बल्कि आप अच्छा प्रर्दशन भी करेंगे.

किसी और दोस्त ने सुल्तान चंद के साथ आर एस अग्रवाल भी पढ़ ली है तो घबराने की कोई जरूरत नहीं. अपनी तैयारी और खुद पर भरोसा रखिए. शायद आपने जो एनसीआरटी और आर डी शर्मा पढ़ी है, वो आपके दोस्त ने ना पढ़ी हो. आखिरी वक्त में चार किताबें खरीदने और टटोलने का कोई मतलब नहीं. बस जितना पढ़ा है उसपर ही मेहनत करिए.

पूरा दिन खुद को कमरे में बंद कर, किताबों से घेरकर बोर्ड का एग्जाम नहीं दिया जाता. खुद को थोड़ा हल्का कीजिए, कुछ वक्त दोस्तों के साथ भी बिताइए, भाई बहनों से बात कीजिए, 5-10 मिनट अपना मनपसंद गाना सुन लीजिए, थोड़ी एक्सरसाइज कीजिए.

असफलताओं को अपनाने और फिर खड़े होने की कला भी बच्चा अपने माता-पिता से ही सीखता है. उसे हौसला दीजिए, भरोसा दीजिए. यकीन दिलाइए कि आप हर हाल में उसके साथ हैं.

आॅल द बेस्ट! अपनी पूरी कोशिश कीजिए. नतीजे जो भी हो, ये आपकी जिंदगी का आखिरी एग्जाम नहीं है.

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