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NRC: राजीव गांधी की याद दिलाकर, अमित शाह ने कांग्रेस को उनके ही घरेलू मैदान में मात दी !

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को विपक्षी पार्टी कांग्रेस को ये कह कर घेरने की कोशिश की कि देश में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी शरणार्थियों की पहचान करने का फ़ैसला पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का ही था.

Kangkan Acharyya Updated On: Aug 01, 2018 10:48 PM IST

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NRC: राजीव गांधी की याद दिलाकर, अमित शाह ने कांग्रेस को उनके ही घरेलू मैदान में मात दी !

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को विपक्षी पार्टी कांग्रेस को ये कह कर घेरने की कोशिश की कि देश में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी शरणार्थियों की पहचान करने का फ़ैसला पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का ही था. ज़ाहिर है बीजेपी की इस चाल से कांग्रेस पार्टी असहज स्थिति में आ गई है. खासकर, तब जब लंबे समय से पार्टी की पहचान अल्पसंख्यकों की हितैषी को रूप में होती रही है. ये खुलासा या फिर इस चाल ने भारत की इस सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी को अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक और असम की उस आबादी के सामने बेचैन हालत में खड़ा कर दिया है, जो भाषा के आधार पर राज्य में बहुसंख्यक कहे जाते हैं.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का ये बयान, असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजेन्स (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) द्वारा चलाई जा रही गणना का कांग्रेस पार्टी द्वारा विरोध करने के बाद जवाब में आया है. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का हवाला देते हुए कहा कि असल में ये राजीव गांधी का सुझाव था कि असम में ग़ैरकानूनी रूप से रह रहे अवैध बांग्लादेशियों की पहचान की जाए.

राज्यसभा में चल रही कार्यवाही के दौरान बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पार्टी पर तीख़ा हमला करते हुए कहा कि, ‘एनआरसी उस असम समझौते की आत्मा है, जिसपर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हस्ताक्षर किया था. और जिसकी ये शर्त थी कि असम में रहने वाले एक-एक अवैध बांग्लादेशी नागरिक की पहचान कर उसका नाम वोटिंग लिस्ट से बाहर किया जाएगा.’

rajiv gandhi

असम में चल रहे एनआरसी ड्राफ्ट पर दोनों पार्टियों के बीच एक नया राजनीतिक युद्ध शुरू हो गया है, और बीजेपी अध्यक्ष के इस बयान से ज़ाहिर तौर पर कांग्रेस पार्टी की उस कोशिश को काफ़ी धक्का लगा है जिसमें वो लोगों के मन में एक तरह से ये कहकर डर बिठाने की कोशिश कर रही थी कि, इस ड्राफ्ट में कई लोगों के नाम या तो छूट जाएंगे या फ़िर छोड़ दिए जाएंगे.

कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने इससे पहले राज्यसभा में ही बहस के दौरान इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा था कि, ‘एक विपक्ष के नाते इस मुद्दे पर चिंता ज़ाहिर करना बहुत ज़रूरी है. हमारे लिए ये चिंता की बात है कि एनआरसी के इस ड्राफ्ट के बहाने हमारे अपने ही लोगों को नाम वोटर लिस्ट से बाहर किया जा रहा है, ये वो लोग हैं जो या तो दूसरे राज्यों से यहां आकर बसे हैं या फ़िर असम के ही बाशिंदे हैं, जिन्हें इस कदम के ज़रिये अपने ही देश में शरणार्थी करार दिया जा रहा है. ये इस प्रक्रिया का एक मानवीय पहलू है.’

महत्वपूर्ण बात ये है कि असम में रह रहे इन अवैध बांग्लादेशी अप्रवासियों की पहचान करने का सुझाव और मांग दोनों ही ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण संग्राम परिषद की तरफ़ से आया था. ये दोनों हीं संगठन वे हैं, जिन्होंने छह सालों तक ऐतिहासिक असम आंदोलन का नेतृत्व किया था और जिसका अंत 1985 की असम संधि के साथ हुआ था.

असम संधि पर हस्ताक्षर दो पक्षों ने किया था, जिसमें से एक भारत सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे और दूसरा पक्ष आंदोलनकारी पार्टियां थीं. इस संधिपत्र पर हस्ताक्षर करने के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी बिना किसी ऐतराज़ के इस बात के लिए तैयार हो गए थे कि असम में रहने वाले अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें वापिस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा.

इस संधिपत्र के सेक्शन 5.8 में ये साफ़ लिखा है कि, ‘जो भी विदेशी नागरिक 25 मार्च 1971 को या उसके बाद असम में रहने आए हैं, उन्हें ढूंढ कर, उनकी पहचान करवा कर, कानूनी तौर पर उन्हें राज्य की नागरिकता से बेदख़ल किया जाएगा. ऐसे विदेशी नागरिकों को देश से बाहर करने के लिए जल्द से जल्द ज़रूरी और व्यवहारिक कदम उठाए जाने चाहिए.’

इस समय एनआरसी यानि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर द्वारा अपडेशन का जो काम किया जा रहा है उसे असम संधि के नियम के अनुरूप माना जा रहा है. लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे पर लगातार संसद में हंगामा कर रहे हैं. जबकि, केंद्र और राज्य सरकार उन्हें लगातार इस बात का आश्वासन दे रही है कि, इस गणना में राज्य का कोई भी मूल या वास्तविक नागरिक अंतिम ड्राफ्ट में नहीं छूटेगा. लेकिन, कांग्रेस और अन्य पार्टियां जिस तरह से लगातार सरकार के इस कदम का विरोध कर रहें हैं, उससे ये संदेश जा रहा है कि वे नहीं चाहते कि राज्य में रह रहे अवैध बांग्लादेशियों की पहचान हो.

BJP's Amit Shah speaks during a news conference in the northern Indian city of Lucknow

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य की जनता का मूड इस संबंद्ध में जल्दी ही भांप लिया और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बयान दिया कि, ‘कांग्रेस पार्टी अपनी वोट बैंक की राजनीति के कारण ही राज्य में असम समझौता को लागू करने में नाकाम रही है. कांग्रेस पार्टी न सिर्फ़ अल्पसंख्यकों खुश करने में लगी है बल्कि ऐसा करते हुए उसने देश की आंतरिक सुरक्षा और भारतीय नागरिकों की हित को लेकर भी उदासीन रही है.’

असम संधिपत्र को हमेशा ही एक संकट प्रबंधन उपाय के तौर पर देखा गया है न कि राज्य के लोगों को दिए गए एक वादे के रूप में. क्योंकि पिछले कई सालों के कांग्रेस शासन के दौरान कभी भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया जब ईमानदारी पूर्वक इस समझौते को लागू करने का कोई समुचित कदम उठाया गया हो.

हालांकि, इस समझौते पर साल 1985 में ही हस्ताक्षर कर दिए गए थे, लेकिन केंद्र ने इस को अपडेट करने का औपचारिक फ़ैसला साल 1999 में एनडीए शासन के दौरान ही लिया था. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे. उस समय की केंद्र सरकार ने 20 लाख रुपये का अनुदान भी पास किया था जिसमें से पांच लाख रुपये राज्य सरकार को जारी किया गया था ताकि राज्य सरकार उस राशि का इस्तेमाल एनआरसी अपडेट करने में कर सके. लेकिन, उस राशि का कोई इस्तेमाल नहीं किया गया.

द सेंटिनल अख़बार में छपे एक ख़बर के अनुसार साल 2004 में वहां की छात्र संगठन आसू (AASU) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की असम यात्रा का बहिष्कार किया था, ये बहिष्कार केंद्र द्वारा एनआरसी के अपडेट में की जाने वाली देरी के कारण किया गया था. मनमोहन सिंह तब वहां इंडो-एशियन कार रैली में शामिल होने के लिए गए थे. इस बहिष्कार के कारण मजबूर होकर तब की सरकार ने आसू (AASU) के साथ त्रिपक्षीय बातचीत भी की थी लेकिन उस बातचीत का भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला.

जुलाई 2009 में असम पब्लिक वर्क्स ने सुप्रीम कोर्ट में एक केस दायर कर एनआरसी को अपडेट करने की मांग की. साल 2010 में केंद्रीय गृहसचिव ने एक त्रिपक्षीय वार्ता में ये तय किया कि चायगांव और बारपेटा इलाके से एनआरसी अपडेट के पायलट प्रोजेक्ट का काम शुरू किया जाए. लेकिन इसके विरोध में बारपेटा में हिंसात्मक प्रदर्शन शुरू हो गया था जिसमें चार लोगों की जान चली गई थी और इस प्रोजेक्ट को वहीं बंद कर दिया गया था.

उसके बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया, तभी एनआरसी अपडेशन का काम दोबारा साल 2015 में शुरू हो सका.राज्य की कांग्रेस सरकार जिस तरह से इस मसले पर कभी हां-कभी ना करती रही है, उससे ये संदेश जाता रहा है कि वो एनआरसी अपडेट को लागू करने में गंभीर नहीं है. जो उसकी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति के तहत फिट बैठता है.

असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कई बार दोहराया था कि, असम में कोई भी बांग्लादेशी घुसपैठिया नहीं है लेकिन, ऐसा कहने का उन्हें काफी बड़ा ख़ामियाज़ा चुकाना पड़ा. बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के राज्य विधानसभा चुनाव में इसी नारे और वादे के साथ बहुसंख्यक असमिया आबादी को अपनी तरफ़ किया था कि वे बांग्लादेशियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर कर देंगे.

2014 के लोकसभा चुनावों में, बीजेपी को अप्रत्याशित तौर पर असम के 14 में 07 लोकसभी सीटों पर जीत हासिल हुई थी, और 2014 के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर उसने पहली बार राज्य में सरकार बनाई थी. बीजेपी की इस बड़ी जीत ने कांग्रेस पार्टी को बड़ी शिकस्त दी थी, इतनी की वे वहां के लोगों के वोट के लिए तरसते रह गए थे.

कांग्रेस पार्टी के ये याद दिलाकर कि, असल में वो कांग्रेस की ही सरकार थी जो एनआरसी का अपडेट करने को राज़ी हुई थी, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए अपने वादे से पीछे हट गई थी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने एक तरह से कांग्रेस पार्टी को उनके अपने ही घर में मात दे दी है. इतना कि वे न तो राज्य की बहुसंख्यक आबादी को अपना चेहरा दिखा सकती है न ही अल्पसंख्यक आबादी को.

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