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क्या भागलपुर के अतीत से कभी मुक्त हो पाएंंगे बिहार के नए डीजीपी

आज अपनी कड़क छवि के लिए जाने जाने वाले के एस द्विवेदी का अतीत हमेशा उनके साथ रहेगा

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Mar 01, 2018 03:37 PM IST

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क्या भागलपुर के अतीत से कभी मुक्त हो पाएंंगे बिहार के नए डीजीपी

1984 बैच के आईपीएस अधिकारी केएस द्विवेदी आज बिहार के नए डीजीपी का पदभार संभाल लिया है. केएस द्विवेदी के डीजीपी बनते ही पिछले कई दिनों से बिहार के नए डीजीपी के नाम पर चल रहे सस्पेंस पर से भी पर्दा उठ गया. कृष्ण स्वरूप द्विवेदी का बिहार के पुलिस महानिदेशक के तौर पर कार्यकाल अगले साल 31 जनवरी तक रहेगा.

केएस द्विवेदी की नियुक्ति वर्तमान डीजीपी प्रमोद कुमार ठाकुर के स्थान पर की गई है. पीके ठाकुर बीते बुधवार को ही रिटायर हुए हैं. आपको बता दें 1980 बैच के आईपीएस अधिकारी पीके ठाकुर 24 जून 2014 को बिहार के डीजीपी नियुक्त किए गए थे.

केएस द्विवेदी डीजीपी बनने से पहले पुलिस महानिदेशक (प्रशिक्षण) और कॉन्स्टेबल भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष थे. केएस द्विवेदी उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के रहने वाले हैं. यह महज संयोग ही कहें कि बिहार के नए डीजीपी जहां यूपी के रहने वाले हैं वहीं कुछ दिन पहले ही यूपी के डीजीपी बनाए गए ओपी सिंह बिहार के गया जिले के रहने वाले हैं.

भागलपुर दंगों के समय

bihar police

आपको बता दें कि साल 1989 में देश को हिला कर रख देने वाला भागलपुर सांप्रदायिक दंगाकांड के दौरान जिले के एसपी केएस द्विवेदी ही थे. बाद में वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले गए. काफी सालों के बाद उनकी वापसी बिहार में हुई. केएस द्विवेदी को आईजी (संचालन) और बाद में एडीजी (आधुनिकीकरण और वायरलेस) बनाया गया.

द्विवेदी भागलपुर के एसपी के तौर पर काफी चर्चित हुए थे. कुछ लोगों का कहना है कि बतौर एसपी द्विवेदी ने दंगा के समय हालात को काबू करने के लिए कई पहल किए थे. वहीं कुछ लोग उन पर दंगा को काबू करने में विफल करार देते हैं.

केएस द्विवेदी को करीब से जानने वाले कुछ अधिकारी उनको एक ईमानदार और कठिन अधिकारी के रूप में जानते हैं. डीजीपी बनने के बाद केएस द्विवेदी मीडिया से बात करते हुए कहा है कि उनका मुख्य ध्यान राज्य में लॉ एंड ऑर्डर को कायम रखने में होगी. कानून का पालन और लोगों के विश्वास को जीतने और भ्रष्टाचार के लिए शून्य सहिष्णुता को बनाए रखने पर जोर होगा.

केएस द्विवेदी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और न ही किसी निर्दोष को फंसाया जाएगा. किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है. हम एक सरकारी कर्मचारी हैं और कानून का पालन करना और कराना हमारी जिम्मेदारी है.

बिहार के नए डीजीपी ने कहा है कि कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए पुलिस बल की ताकत धीरे-धीरे बढ़ाकर हर लाख पर 146 पुलिसकर्मियों की राष्ट्रीय औसत तक पहुंचाने की होगी. वर्तमान में बिहार में हर लाख आबादी पर 75 पुलिसवाले ही हैं.

नए डीजीपी द्विवेदी ने कहा है कि विश्वसनीय पुलिस व्यवस्था के जरिए लोगों का विश्वास जीतना सफलता की मूलकुंजी होगी. नए डीजीपी ने राज्य में बढ़ती ट्रैफिक समस्या पर चिंता व्यक्त की और प्रत्येक जिले में एक अच्छी तरह से योजनाबद्ध यातायात प्रबंधन प्रणाली को कड़ाई से लागू करने की भी बात कही.

जूनियर होकर भी मिली तरजीह

आपको बता दें कि बिहार में आईपीएस अधिकारियों की सीनियरिटी लिस्ट में द्विवेदी से ऊपर राजेश रंजन और एसके सिन्हा थे. ऐसा कहा जा रहा है कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात दोनों वरिष्ठ अधिकारी बिहार लौटना नहीं चाहते थे, जिसके बाद ही नीतीश कुमार ने केएस द्विवेदी का नाम फाइनल कर दिया.

पिछले कई दिनों से पीके ठाकुर के बाद बिहार कैडर के चार आईपीएस अधिकारी का नाम डीजीपी रेस में चल रहा था. पीके ठाकुर के बाद सिर्फ चार ही ऐसे आईपीएस अधिकारी थे, जो डीजी रैंक के थे. केएस द्विवेदी और रविंद्र कुमार 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और सुनील कुमार और गुप्तेश्वर पांडेय 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं. केएस द्विवेदी का दावा शुरू से ही काफी मजबूत इसलिए था क्योंकि वे इन सबों में सबसे वरिष्ठ थे. साथ में मधेपुरा, मुजफ्फरपुर और भागलपुर जिले के एसपी भी रह चुके थे.

इन सब के बावजूद सरकार के अंदर इस बात की चर्चा चल रही थी कि द्विवेदी की सेवा अवधि एक साल से भी कम बची हुई है. सरकार नहीं चाहती थी कि फिर एक साल बाद डीजीपी के लिए मगजमारी करनी पड़े, लेकिन आखिर में द्विवेदी का अनुभव और उनकी छवि को देखते हुए सरकार ने उन पर एक दाव लगाया.

अब देखना यह है कि बिहार में क्राइम का ग्राफ कम करने के लिए केएस द्विवेदी क्या-क्या कदम उठाएंगे? आने वाले दिनों में राज्य में दो-दो चुनाव होने हैं, जिसमें राज्य में कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी होगी.

विपक्ष का विरोध

Lalu Prasad Yadav in CBI Court in Ranchi

दूसरी तरफ बिहार के नए पुलिस प्रमुख की नियुक्ति पर राजनीति पर चरम पर पहुंच गई है. आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने फस्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहा, ‘केएस द्विवेदी की नियुक्ति नीतीश कुमार या उनकी सरकार ने नहीं बल्कि संघ ने की है. हमारी पार्टी पहले से ही कहती आ रही है कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार में कोई भूमिका बची नहीं रह गई है.’

मनोज झा आगे कहते हैं, ‘नीतीश कुमार को अब वही करना पड़ रहा है जो नागपुर की इच्छा होती है. केएस द्विवेदी की 1989 भागलपुर दंगों के दौरान क्या भूमिका थी यह किसी से छिपी हुई नहीं है. उस समय के मीडिया रिपोर्ट्स को देखने से साफ पता चलता है कि केएस द्विवेदी तटस्थ नहीं थे. देश के उस समय के तात्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें वहां से हटाने का निर्णय किया था, लेकिन कुछ लोग इस फैसले के विरोध में सड़क पर उतर गए. बाद में यह फैसला टालना पड़ा था. मेरा साफ कहना है कि इनकी नियुक्ति से बिहार के अल्पसंख्यकों और दलित वंचितों को डर में जीना पड़ेगा और वे आतंकित रहेंगे’

जेडीयू का तर्क

Nitish

वहीं जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार फर्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘अगर ऐसी बात थी तो भागलपुर घटना के तुरंत बाद में बिहार में आरजेडी की सरकार बन गई थी. क्यों नहीं उन पर कार्रवाई की गई? देखिए विपक्ष एक राजनीतिक साजिश के तहत इसे दंगों से जोड़कर देख रही है. हमारी सरकार सांप्रदायिक ताकतों और क़ानून तोड़ने वालों के खिलाफ हमेशा सख्ती से पेश आती रही है और आगे भी आती रहेगी. इस पर कभी भी किसी तरह का समझौता करने का कोई सवाल ही नही है.’

दरअसल आपको बता दें कि साल 1989 में जब बिहार के भागलपुर में दंगा हुआ था उस समय राज्य के सीएम सत्येंद्र नरायण सिन्हा थे. इस दंगे के कारण ही सत्येंद्र नरायण सिन्हा की मुख्यमंत्री पद चली गई थी. कांग्रेस ने डॉ जगन्नाथ मिश्रा को मुख्यमंत्री पद की बागडोर सौंपी थी. उस समय के मुख्यमंत्री जग्गनाथ मिश्रा ने भागलपुर दंगे की जांच के लिए एक सदस्यीए आयोग का गठन किया था. रामानंद प्रसाद को इस एक सदस्यीए आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था.

साल 1989 में ही राज्य में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी . लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही एक सदस्यीए जांच आयोग में दो और सदस्यों की नियुक्ति कर दी. जस्टिस शम्सुल हसन और आरसीपी सिन्हा आयोग के सदस्य बनाए गए.

इस तीन सदस्यीए आयोग ने साल 1995 में राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी, जिसे कुछ दिन बाद ही लालू प्रसाद यादव ने इसे विधानसभा में पेश किया. ऐसा कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव ने अपनी सरकार के द्वारा नियुक्त दो सदस्यों वाली रिपोर्ट को ही स्वीकार किया.

जस्टिस शम्सुल हसन और आरसीपी सिन्हा की रिपोर्ट में तत्कालीन एसपी को भी दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था. जिसके बाद से लालू प्रसाद यादव या राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री काल में केएस द्विवेदी की नियुक्ति या तो राज्य से बाहर ही रही या फिर सेंट्रल पोस्टिंग में रहे.

साल 2005 में नीतीश कुमार की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने भागलपुर दंगे की जांच नए सिरे से कराने का फैसला लिया. नीतीश कुमार ने 26 फरवरी 2006 को एनएन सिंह आयोग का गठन किया. इस आयोग ने लगभग एक साल जांच करने के बाद 28 अगस्त 2007 को अंतरिम रिपोर्ट बिहार सरकार को सौंपी.

7 अगस्त 2015 को नीतीश कुमार ने आयोग की रिपोर्ट को सदन में रखा. इस रिपोर्ट में आयोग ने राज्य के कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दोषी पाया और उनकी जवाबदेही भी तय की,लेकिन इस रिपोर्ट में केएस द्विवेदी के बारे में कुछ नहीं था. इसी रिपोर्ट के आधार पर ही नीतीश कुमार दिल्ली में 84 सिख दंगों की तर्ज पर भागलपुर दंगे में मारे गए लोगों के आश्रितों के लिए एक पेंशन योजना शुरू करने की बात की गई.

लगभग 29 साल बीत जाने के बाद वही केएस द्विवेदी को लेकर राज्य की राजनीति में भूचाल आया हुआ है. जानकारों का मानना है कि क्योंकि अब नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव की राहें अलग हैं तो इसलिए इस पर राजनीति की जा रही है.

केएस द्विवेदी की आज की छवि हमेशा उनके कल के अतीत से नजरे चुराएंगी जबतक वे पुलिस महकमे में बने रहेंगे. जब-जब इस देश में भागलपुर दंगे की बात की जाएगी केएस द्विवेदी का भी नाम लिया जाएगा. इसमें कोई शक नहीं है कि वह एक ईमानदार और कड़क अफसर रहे हैं और अपना काम ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से भी करते आए हैं. बिहार में पुलिस बहाली प्रक्रिया को काफी पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना इनकी कुछ बड़ी उपलब्धियों में से एक है.

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