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बिहार: शराबबंदी के खिलाफ मानव-श्रृंखला, बदलाव की नई बयार

शराबबंदी के साथ अच्छाई के सफर की शुरुआत हो चली है

Harivansh Updated On: Jan 21, 2017 08:55 PM IST

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बिहार: शराबबंदी के खिलाफ मानव-श्रृंखला, बदलाव की नई बयार

दो दशक से भी ज्यादा का अरसा बीतने के बाद बिहार के अपने गांव सिताबदियारा में इतने लंबे समय तक रहने का मौका हाथ लगा है.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की शराबबंदी की नीति के समर्थन में बनायी मानव-श्रृंखला की अगुवाई करने और उसमें भाग लेने की जिम्मेदारी निभाने के लिए मैं यहां बीते 13 जनवरी से ही हूं.

बहुत से लोग चाहते थे कि राज्य के बड़े शहर में ही रहें लेकिन मैं यहां रहना चाहता था, अपने गांव में. यहां हो रहे बदलाव को अपनी आंखों से देखना चाहता था. मानव-श्रृंखला के लिए मुझे तीन जिलों गोपालगंज, छपरा और सीवान का प्रभारी बनाया गया था.

मानव-श्रृंखला बनाने का मकसद शराबबंदी की सफलता को सुनिश्चत करना है, यह पक्का करना कि हमारा समाज नशाखोरी के चंगुल से आजाद हो.

साफ दिखा कि इस गांव में बदलाव की बयार बहने लगी है. आखिर यह जयप्रकाश नारायण का गांव है. यूपी और बिहार की सीमा से लगता हुआ गांव है यह.

यहां की हवा में घुला है महान नेताओं का असर 

यहां से कुछ ही दूरी पर सीवान जिले में भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद का गांव है. मैं बदलाव को देखना चाहता था, उसका हिस्सा बनने की इच्छा जोर मार थी. हम सब एक नया समाज बनाना चाहते हैं, ऐसा समाज जहां नशाखोरी बीते जमाने की बात हो. ऐसा समाज जहां नशाखोरी के चंगुल में लाखों लोगों के भविष्य के मटियामेट होने की रत्ती भर आशंका ना हो.

इस पूरे इलाके पर महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, राजेन्द्र प्रसाद और राम मनोहर लोहिया सरीखे महान नेताओं का असर रहा है. यहां की हवा में इन नेताओं का असर घुला हुआ है.

बीते एक हफ्ते से डेरा डालकर लोगों से बातचीत करते हुए मुझे महसूस हुआ कि लोगों की जिंदगी को बेहतरी के लिए बदलना ही राजनीति का बुनियादी स्वभाव और असल मकसद है. महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की राजनीति में आप यह बात साफ-साफ देखते हैं.

इन्हें सत्ता का कोई लोभ-लालच ना था. ये तनिक भी सत्ता के आकर्षण में नहीं पड़े. सत्ता को इन नेताओं ने साधन माना, ऐसा साधन जिसके भीतर समाज को बेहतरी के लिए बदलने की ताकत है.

कई साल बाद बदलाव का एक बड़ा कदम 

Patna: Citizens make a state level human chain to support liquor prohibition called by CM Nitish Kumar in Patna on Saturday. PTI Photo(PTI1_21_2017_000063B)

पटना में मानव श्रृंखला बनाते लोग

मुझे महसूस हुआ कि गुजरे 30-35 सालों में किसी भी सरकार ने समाज में इस तरह के बदलाव का कोई बड़ा कदम नहीं उठाया. और, मुझे पूरी शिद्दत से लग रहा है कि नीतीश कुमार का शराबबंदी का फैसला इस दिशा में उठा एक निर्णायक कदम है.

यह मानव-श्रृंखला सामाजिक बदलाव का पता देती है. इससे झलकता है कि लोगों में अच्छा कर दिखाने की बड़ी संभावनाएं हैं. मजबूत कानून बना देना एक बात है लेकिन कानून को कामयाब बनाने के लिए लोगों को शिक्षित करना पड़ता है.

लोगों के बीच संदेश फैलाने की जरूरत होती है, उन्हें यह बताना होता है कि कानून किस वजह से लाया गया, इसके पीछे कौन सी मंशा है. लोगों के बीच जाकर उन्हें यह बताने की जरूरत पड़ती है कि ऐसा करना समाज के लिए क्योंकर अच्छा है. इस मानव-श्रृंखला के जरिए लोगों को नशामुक्त समाज के फायदे बताने की कोशिश की गई है.

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नीतीश कुमार ने ठीक ही ध्यान दिलाया कि 1949 में चीन में जब नई आर्थिक-प्रणाली की शुरुआत हुई तो यह देश हिरोइन के नशे की गिरफ्त में था. चीन के करोड़ों लोग नशेड़ी बन चले थे.

इस बुराई को खत्म करने के लिए चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने कड़े कानून बनाये और पार्टी के कार्यकर्ता लोगों के बीच गए, उन्हें नशा छोड़ने की प्रेरणा दी.

हर उम्र, जाति और वर्ग के लोग बने बदलाव के सामूहिक गवाह

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तस्वीर: पीटीआई

इसी तरह मानव-श्रृंखला लोगों को इस बदलाव में शामिल करने की कोशिश है, लोग आयें और एक बड़े प्रयोग के भागीदार बने. किसी लोकतंत्र के लिए यह एक यादगार दृश्य है.

हर उम्र, जाति और वर्ग के स्त्री-पुरुष को सड़क पर आकर इस आंदोलन का हिस्सा बनते देख दिल हुलास से भर उठा है. लोगों के मन पर निश्चित ही इसका गहरा और सकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ेगा.

जहां मानव-श्रृंखला बनी वहां खड़े होकर आज मैंने महसूस किया कि यह वही ‘क्रांति मैदान’ है, जहां 1974 में जयप्रकाश नारायण ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया था. उस वक्त इंदिरा गांधी से जयप्रकाश नारायण की बातचीत नाकाम रही और वे दिल्ली से लौट आये थे.

मुझे याद है, यही वह जगह है जहां 2009 में लालकृष्ण आडवाणी का प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ऐलान हुआ. उस घड़ी नीतीश कुमार उनके साथ खड़े थे और इस जगह से कालेधन के खात्मे का नारा दिया गया. आज उसी जगह से नशाखोरी को खत्म करने का आह्वान किया गया है.

आज बनी मानव-श्रृंखला में तकरीबन 2 करोड़ लोग पूरी उम्मीद के साथ शामिल हुए है, यह उम्मीद बेहतर भविष्य की है.

ये वे लोग हैं जो बदलाव को साफ-साफ महसूस कर रहे हैं. बदलाव की गवाही देती अनगिनत कहानियां हर तरफ सुनाई दे रही हैं. यहां लोग बता रहे हैं कि शराबबंदी के बाद कैसे नशे के झोंक में किए जाने वाले अपराधों पर तकरीबन ब्रेक सा लग गया है.

शराबबंदी से कमजोर लोग प्रगति की राह पर 

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तस्वीर: पीटीआई

समाज के आर्थिक रुप से कमजोर लोग प्रगति की राह पर हैं. जो पैसे वे नशे की लत पर लुटाते थे उसे भोजन और शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं.

शराबबंदी के बाद महिलाओं की खुशी देखते ही बनती है, अब उनके लिए दुर्दशा की वह पहले वाली हालत नहीं रही. घरेलू हिंसा के मामले कम से कमतर हो चले हैं. बदलाव दिख रहा है और लोग इस बदलाव की खुशी में मगन हैं.

आज नशाखोरी के खिलाफ यह आंदोलन अपने दूसरे चरण में पहुंचा है. अब शराबबंदी के फायदे का संदेश ज्यादा जोर-शोर से फैलाया जायेगा. पंचायतों को इस काम में शामिल किया जायेगा. संदेश को घर-घर पहुंचाने का काम होगा.

लोगों की भागीदारी पक्की करने के लिए दीवार-लेखन (वॉल पेंटिंग) और नारा-लेखन जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. कोशिश होगी कि आंदोलन में ज्यादा से ज्यादा लोगों की आवाज गूंजे.

यादगार नजारा 

मुख्य सड़क की लंबाई 3700 किलोमीटर और इसपर 56 लाख लोगों की मानव-श्रृंखला, मुख्य सड़क से निकलती सहायक सड़कों पर 1.5 करोड़ लोगों की लंबी कतार और सबका संदेश बस एक- नशामुक्त बिहार ! कितना अनोखा है यह नजारा!

इसमें एक जरुरी राजनीतिक संदेश भी है. यह सामाजिक बदलाव का संदेश है. याद रहे कि जयप्रकाश नारायण ने 1952 में 42 दिनों के उपवास के बाद एक लंबा लेख लिखा था. शीर्षक था- ‘अच्छाई की प्रेरणा’. लेख में यह मार्मिक सवाल पूछा गया कि बेहतर इंसान बनने के हमारे पास कौन से उपाय हैं.

नशे की लत से छुटकारा पाना ऐसे ही उपायों में एक है. मुझे लगता है कि शराबबंदी के साथ अच्छाई के सफर की शुरुआत हो चली है.

( ये लेख प्रभात खबर के पूर्व संपादक, बिहार से राज्यसभा सांसद और जेडीयू के प्रवक्ता हरिवंश से बातचीत पर आधारित है )

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