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एजुकेशन में बड़े बदलाव की जरूरत: सिर्फ कौशल विकास से नहीं होगा छात्रों का भला

भविष्य में एक अच्छी और शिक्षित पीढ़ी चाहिए तो हमें सख्त कदम उठाने ही होंगे. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार कर के हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों के भारत को साकार कर सकते हैं

MK Raghavendra Updated On: Nov 07, 2017 02:58 PM IST

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एजुकेशन में बड़े बदलाव की जरूरत: सिर्फ कौशल विकास से नहीं होगा छात्रों का भला

भारत में फिलहाल शिक्षा की जो पद्धति है, उसमें छात्रों को तरह-तरह के हुनर यानी कौशल सिखाने पर जोर दिया जाता है, ताकि शिक्षा पूरी करने के बाद छात्र रोजगार पा सकें और अपनी रोजी-रोटी कमा सकें. एक नजरिए से शिक्षा की इस पद्धति में कोई खामी नहीं है, क्योंकि इस बात में कोई शक नहीं कि, कौशल विकास शिक्षा की पहली प्राथमिकता और उद्देश्य है. लेकिन सवाल यह उठता है कि, क्या अपने नागरिकों को सिर्फ रोजगार परक शिक्षा देने के बाद एक राष्ट्र का कर्तव्य पूरा हो जाता है. क्या एक इंसान को सिर्फ इसीलिए शिक्षित किया जाना चाहिए कि वो अपनी रोजी-रोटी कमा सके? क्या एक राष्ट्र में ऐसी शिक्षा नीति विकसित नहीं होना चाहिए कि, उसके नागरिक अपनी दैनिक जरूरतों से आगे की सोच सकें, और अपने देश के बड़े उद्देश्यों में भागीदार बन सकें?

1960 और 1970 के दशक में शिक्षा का उद्देश्य अलग हुआ करता था. उस वक्त शिक्षा का उद्देश्य लोगों को अगली पीढ़ी के लिए बेहतर नागरिक बनाना था. तब लोगों को ऐसे शिक्षित किया जाता था कि, वो देश की दीर्घकालिक समस्याओं को बुनियादी मानव कुशलताओं के जरिए हल कर सकें. लेकिन 1991 में आर्थिक उदारीकरण और शिक्षा के निजीकरण में तेज उछाल से शिक्षा के नैतिक और सामाजिक उद्देश्य हाशिए पर चले गए. उस वक्त शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की आपाधापी में यह बात भुला दी गई कि, महंगी शिक्षा का मतलब उच्च ज्ञान और बेहतर कौशल नहीं होता. उस वक्त की भूल का खामियाजा आज की पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

सर्वे में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले भारतीय छात्र आखिरी पायदान पर आए थे

वर्ष 2012 में ग्लोबल एजुकेशन रैंकिंग के तहत 73 देशों में किए गए एक सर्वे में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले भारतीय छात्र आखिरी पायदान पर आए थे. उस सर्वे के मुताबिक किर्गिस्तान जैसे छोटे और गरीब देश के शिक्षा का स्तर भारत के बराबर था. यह सर्वे पीआईएसए यानी प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट नाम की संस्था ने कराया था. स्तरहीन शिक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी होने के बाद बीते तीन साल से भारत ने पीआईएसए के सर्वे में हिस्सा लेने से इनकार कर रखा है.

निजी शिक्षा दिन-ब-दिन बहुत महंगी होती जा रही है. नामी निजी स्कूलों के पास बड़े-बड़े मैदान, भव्य इमारतें और हाई-फाई गैजेट्स से लैस क्लास रूम हैं. लेकिन यह नामी और महंगे स्कूल बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर भरोसेमंद साबित नहीं हुए हैं. निजी स्कूलों में बच्चों से छेड़छाड़, यौन शोषण यहां तक कि हत्या की खबरें आए दिन सुनने को मिलती हैं. दरअसल, इन 'अंतरराष्ट्रीय' स्कूलों के कई प्रमोटर बड़े रियल स्टेट कारोबारी और भू-माफिया हैं, जो कीमती और महत्वपूर्ण जगहों पर नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं. और फिर सरकार और प्रशासन से सांठगांठ कर के स्कूल बनाने के नाम पर उस जमीन पर कब्जा कर लेते हैं.

दलील यह दी जाती है कि उनके निजी स्कूल में गरीब छात्रों को मुफ्त शिक्षा दी जाएगी, लेकिन निजी स्कूलों में गरीब छात्रों के दाखिले के नाम पर कितना गोलमाल होता है, इस बात से हर कोई अच्छी तरह से वाकिफ है. वहीं अमीर घरानों के छात्रों के अभिवावकों से डोनेशन के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है.

असल में निजी स्कूलों के कर्ताधर्ताओं के निशाने पर ज्यादातर वो अभिभावक रहते हैं, जो पिछले कुछ दशकों के दौरान अमीर बने हैं. यह वो नवधनाढ्य लोग हैं, जिन्होंने हिंदी मीडियम से पढ़ाई की थी, लेकिन अब यह चाहते हैं कि उनके बच्चे महंगे से महंगे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाई करें. यह लोग चाहते हैं कि, बच्चे उनकी तरह चंपक और चंदा मामा की बजाए आर्चीज की कॉमिक्स पढ़ें और उनके स्कूल का नाम 'रिवर डेल हाई स्कूल' जैसा कुछ भारी-भरकम और दमदार हो.स्कूलों के इस झांसे में आकर अभिभावक खुशी-खुशी अपनी चेकबुक लेकर स्कूल पहुंच जाते हैं

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गुड़गांव स्थित रायन इंटरनेशनल स्कूल इसी साल गलत वजहों से काफी सुर्खियों में रहा था

स्कूलों के झांसे में आकर अभिभावक अपनी चेकबुक लेकर स्कूल पहुंच जाते हैं

नामी निजी स्कूल तरह-तरह के प्रलोभन देकर अभिभावकों को लुभाते हैं, ताकि वो अपने बच्चों का दाखिला उनके ही स्कूल में कराएं. निजी स्कूलों के इस झांसे में आकर अभिभावक खुशी-खुशी अपनी चेकबुक लेकर स्कूल पहुंच जाते हैं, और अपने बच्चे के दाखिले के एवज में मुंहमांगा डोनेशन देकर लौटते हैं.

एक नजर डालते हैं कि, प्रतियोगी संसार के मुताबिक छात्रों को तैयार करने के नाम पर निजी स्कूल कैसे-कैसे प्रलोभन देते हैं. ज्यादातर निजी स्कूलों में 10 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए क्रिएटिव राइटिंग (रचनात्मक लेखन) और फिल्म मेकिंग के कोर्स चलाए जाते हैं. जबकि इस आयु वर्ग के बच्चों के लिए इन कोर्स का कोई महत्व ही नहीं है. निजी बोर्डिंग स्कूल अपने यहां छात्रों को फाइव स्टार सुख-सुविधाएं देने का वादा करते हैं. साथ ही सुबह मनपसंद नाश्ता, दोपहर को शानदार लंच और रात को बेहतरीन डिनर का भी प्रलोभन दिया जाता है.

स्कूल की साज-सज्जा और स्कूल के गार्डन के देखरेख के नाम पर खासी रकम लुटाई जाती है, जो जाहिर है बच्चों के अभिभावकों की जेब से ही वसूली जाती है. स्कूलों की इमारतें ब्रिटिश और अमेरिकन शैली के स्कूलों के मुताबिक बनाई जाती हैं. अभिभावकों पर रौब जमाने के लिए स्कूलों में विदेशी शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है, लेकिन इस बात का जरा भी ख्याल नहीं रखा जाता है कि, नियुक्त शिक्षक छात्रों को पढ़ाने के काबिल है भी या नहीं. ज्यादातर निजी स्कूलों के बीच खुद को किसी विदेशी संस्थान से संबद्ध दिखाने की होड़ लगी होती है. छात्रों को तीरंदाजी, घुड़सवारी, स्विमिंग, बिलियर्ड जैसे महंगे खेल सिखाने का प्रलोभन दिया जाता है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि छात्रों को ऐसे-ऐसे बेतुके हुनर और खेलों का लालच दिया जाता है, जिनका उनकी पढ़ाई से कोई वास्ता नहीं होता. निजी स्कूल ये सारा तामझाम सिर्फ और सिर्फ मोटी कमाई करने के लिए करते हैं. लिहाजा सरकार को चाहिए कि, वो शिक्षा को लेकर गंभीर हो और निजी स्कूलों की लूटमार पर लगाम लगाए.

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स्कूलों और उनके प्रमोटरों के जरिए मां-बाप को गुमराह किया जा रहा है

मौजूदा परिदृश्य में निजी शिक्षा के क्षेत्र की सच्चाई के दो पहलू सामने आते हैं. पहला यह कि, स्कूलों और उनके प्रमोटरों के जरिए मां-बाप को गुमराह किया जा रहा है, साथ ही बच्चों पर हद से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ रहा है. कोई स्कूल कितना सुसज्जित और हाईटेक है इससे वहां की शिक्षा का स्तर तय नहीं होता है. लेकिन अब इस बात पर कोई गौर नहीं करता है. हालांकि ज्यादातर यह देखा गया है कि नामी निजी स्कूलों में कई बड़े उद्योगपति घरानों के बच्चे पढ़ते है. ऐसे छात्रों का ध्यान पढ़ाई पर कम और डिग्री पाने पर ज्यादा होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि अमीर घरानों के इन छात्रों को पढ़ाई के बाद रोजगार की चिंता नहीं होता, उन्हें तो पढ़ाई के बाद अपने परिवार के कारोबार को संभालना होता है.

दूसरा पहलू यह है कि, नामी निजी स्कूलों में छात्रों को मिलने वाली सुख-सुविधाएं और दुलार भविष्य में समाज के लिए समस्या पैदा कर सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि, लोकतांत्रिक देश में शिक्षा का सामाजिक लक्ष्य लोगों के बीच समानता की भावना पैदा करना है. यही वजह है कि, स्कूलों में छात्रों को एक समान ड्रेस (यूनीफार्म) पहनना अनिवार्य किया गया था. लेकिन अब निजी स्कूलों के छात्रों को मिल रहे विशेषाधिकार से समाज पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है. स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति इसलिए की जाती है कि वो अपने छात्रों को पढ़ाएं और उन्हें नैतिक और सामाजिक रूप में तैयार करें. लेकिन निजी स्कूलों के शिक्षक अपने छात्रों के साथ किसी हद तक 'ग्राहक' जैसा बर्ताव कर रहे हैं. ऐसे में शिक्षा का मूल उद्देश्य ही खत्म होता जा रहा है.

छात्रों के अभिभावक और शिक्षक के बीच संबंध में शक्ति का संतुलन बनाने की सख्त जरूरत है. अगर महंगे निजी स्कूलों की तरह अभिभावकों के हाथ में ज्यादा अधिकार होंगे, तो शिक्षक अपना उद्देश्य और अधिकार खो देता है. ऐसी स्थिति में शिक्षक अपने छात्रों को ढंग की शिक्षा प्रदान नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसे में उसका ध्यान शिक्षा से ज्यादा छात्रों की सेवा में होता है. वहीं अगर सरकारी स्कूलों की बात करें तो, वहां शिक्षक के हाथ में ज्यादा अधिकार होते हैं, जबकि छात्रों के अभिभावक बेहद गरीब. ऐसे ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों की जरूरी और जायज मांग भी पूरी नहीं कर पाते हैं. ऐसी परिस्थिति में सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी मनमानी पर उतर आते हैं, और उनका ध्यान बच्चों को पढ़ाने पर कम ही होता है.

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कामयाबी और शोहरत के झंडे गाड़ने वाले कई भारतीयों ने किसी नामी या बड़े निजी स्कूल से शिक्षा हासिल नहीं की

ऐसे में स्तरीय शिक्षा और अच्छे माहौल के लिए मध्यम फीस वाले निजी स्कूल उभर कर सामने आते हैं. इन स्कूलों में छात्रों को न सिर्फ अच्छी शिक्षा मिलती है बल्कि वहां अभिभावकों और शिक्षकों के बीच शक्ति का अच्छा संतुलन भी होता है. यानी वहां न अभिभावकों की मनमानी चलती है और शिक्षकों की. इसकी अहम वजह यह है कि ऐसे निजी स्कूलों के शिक्षक और स्कूलों के छात्रों के अभिभावक दोनों मध्यम वर्ग से संबंध रखते हैं. ऐसे निजी स्कूलों में अमीरी-गरीबी का फर्क देखने को नहीं मिलता है. लेकिन ऐसे स्कूल छात्रों को 'उच्च स्तर की शिक्षा' देने और व्यावसायिक रूप से बड़े निजी स्कूलों से स्पर्धा करने की होड़ में पिछड़ रहे हैं. हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि, बीते दो दशकों में दुनियाभर में कामयाबी और शोहरत के झंडे गाड़ने वाले कई भारतीयों ने किसी नामी या बड़े निजी स्कूल से शिक्षा हासिल नहीं की.

अगर नई पीढ़ी को राष्ट्रीय मूल्यों के अनुरूप देश हित के लिए तैयार करना है, तो उस राष्ट्र को अपनी शिक्षा नीति में हस्तक्षेप करना ही होगा. साल 1991 के उदारीकरण के बाद, ऐसी धारणा बन गई कि निजी स्कूलों के निजीकरण से छात्रों को फायदा होगा और वो सभी मोर्चों पर अच्छा प्रदर्शन करेंगे. अब सरकार को उस धारणा से छुटकारा पाना होगा. भारत में शिक्षा के प्राथमिक सामाजिक उद्देश्यों में से एक यह है कि, बच्चों में ऐसी भावना पैदा की जाए कि समाज से असमानता खत्म हो. क्योंकि इस वक्त देश को एक एक न्यायसंगत समाज की सख्त जरूरत है. लेकिन निजी स्कूल इसके उलट काम कर रहे हैं. ऐसे में देश हित के लिए निजी स्कूलों पर नकेल कसने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है. इस काम में तगड़ा प्रतिरोध सामने आएगा लिहाजा इसके लिए राज्य की पूरी मशीनरी को जुटना होगा. जाहिर है, देश के भविष्य के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने ही होंगे.

New Delhi: Students celebrate their success in CBSE class 12th examination at their school in New Delhi on Sunday.PTI Photo by Manvender Vashist(PTI5_28_2017_000099B)

भारतीय लोग अपने बच्चों से बेहद प्यार करते है, वो उन्हें हर सुख-सहूलियतें मुहैया कराने की कोशिश करते हैं, ताकि उनके बच्चों को कोई दिक्कत न हो. 2009 का आरटीई एक्ट भारत के लिए एक ऐतिहासिक घटना होना चाहिए था. अगर यह कानून सही से लागू किया गया होता तो देश में आज शिक्षा की स्थिति अलग ही होती. लेकिन बहुत से कानूनों की तरह, यह कानून भी केवल कागज पर दर्ज होकर ही रह गया. 1947 में जब देश आजाद हुआ था, तब सरकार को शिक्षा के क्षेत्र के लिए एक सख्त नीति बनानी थी. तब सरकार को चाहिए था कि वो ऐसा नियम बनाती कि, 18 साल से ज्यादा उम्र के हर युवा को कुछ समय तक सशस्त्र बलों में सेवा करना अनिवार्य होता. या फिर सरकार को कोई ऐसा कानून बनाना था कि, देश निर्माण के लिए समाज के हर वर्ग के लोगों को कुछ साल के लिए एक साथ काम करना अनिवार्य होता.

कड़ा फैसला लिया होता, तो आज समाज में इतनी विषमता, भेदभाव न होता

अगर उस वक्त सरकार ने ऐसा कोई फैसला लिया होता, तो आज समाज में इतनी विषमता और भेदभाव न होता. लेकिन प्रभावशाली उच्च वर्ग के प्रभाव के चलते ऐसा नहीं हो पाया. लिहाजा आज की पीढ़ी को उसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. हालात यह है कि इस समय सरकारी डॉक्टरों को गांव में तैनात करना तक मुश्किल हो गया है, जबकि नियम के तहत उनका गांव में सेवा देना अनिवार्य है. ज्यादातर मेडिकल ग्रेजुएट गांव में तैनाती से बचते हैं, और इसके एवज में जुर्माना भुगताने को खुशी-खुशी तैयार हो जाते हैं. डायरेक्टरेट ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन एक वक्त बहुत शक्तिशाली संस्था हुआ करती थी, लेकिन आज वो कहीं नजर नहीं आती. संस्थाओं को मिली स्वायत्तता ने उन पर नियंत्रण रखने वाले तंत्र के औचित्य को ही खत्म कर दिया है.

हालांकि, हमें यह सच भी स्वीकार करना होगा कि, अब सरकारें इतनी मजबूत इच्छाशक्ति वाली नहीं होती हैं कि, वो निजी शिक्षा को नियंत्रित या विनियमित कर सकें. लेकिन इसके बावजूद अभी भी ऐसे उपाय हैं, जिनसे सामाजिक जरूरतों को निजी शिक्षा के जरिए पूरा किया जा सकता है. यहां मैं कुछ ऐसे सुझाव देना चाहूंगा, जिनसे राष्ट्रीय उद्देश्यों को पूरा करने, सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने, राष्ट्रीय संस्कृति पर गौरव करने, असमानताओं को कम करने और भारतीय समाज को समझने में मदद मिल सकती है. मेरे कुछ सुझावों को कट्टरपंथी माना जा सकता है, लेकिन आधे-अधूरे उपाय और कमजोर इरादों के साथ हम देश को दुर्दशा से नहीं बचा सकते हैं.

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बेहतर शिक्षा तंत्र के लिए कुछ सुझाव

1- आरटीई एक्ट के कार्यान्वयन से सामने आए लाभों का मूल्यांकन:

अगर शिक्षा तंत्र को मजबूत बनाना है और भविष्य की पीढ़ी को देश हित में तैयार करना है तो, सरकार को आरटीई एक्ट को सख्ती के साथ लागू करना होगा. अगर ऐसा करना संभव नहीं है तो फिर सुधारात्मक उपाय किए जाने चाहिए.

2-जागरूकता का परीक्षण:

देश के सभी स्कूलों में तीन स्तरों पर दो पेपर अनिवार्य किए जाने चाहिए. यह पेपर कक्षा 7, 10 और 12 के छात्रों के लिए तैयार किए जाने चाहिए. पहला पेपर 'भारत और उसकी संस्कृति' और दूसरा पेपर 'सामाजिक और नागरिक मुद्दों' पर होना चाहिए. लेकिन हमें इस बात का पूरा ख्याल रखना होगा कि छात्रों के पाठ्यक्रम (सिलेबस) में किसी भी संप्रदाय, वर्ग, धर्म और राजनीतिक विचारधारा के वैचारिक पूर्वाग्रह को जगह न मिले.

इसके अलावा देश के सभी स्कूलों में एक ही तरह की शिक्षा और परीक्षा संचालित की जानी चाहिए, हालांकि इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं के विकल्पों की इजाजत दी जा सकती है. समाज की असमानताओं के मद्देनजर हर छात्र के लिए अलग-अलग परीक्षा पास करना अनिवार्य होना चाहिए. लेकिन छात्रों के प्रदर्शन के आधार पर स्कूलों की ग्रेडिंग होना चाहिए. इस उपाय का उद्देश्य शैक्षणिक असमानताओं को कम करना है, ताकि सभी वर्गों में सामाजिक/सांस्कृतिक जागरूकता के स्तर का अनुमान लगाया जा सके.

3- छात्रों के सिर से बोझ कम करने की भी सख्त जरूरत है, ताकि वो स्कूल और अभिभावकों के दबाव के बीच पिसने से बच सकें. छात्रों को कोई खेल या शारीरिक प्रशिक्षण (पीटी) में से कोई एक चीज चुनने की इजाजत होना चाहिए. जबकि स्कूलों में शारीरिक प्रशिक्षण (पीटी) अनिवार्य है, जिससे छात्रों को बहुत परेशानी होती है. वहीं छात्रों को एक्स्ट्रा करीकुलर एक्टिविटीज (खेल-कूद और शारीरिक गतिविधियों) को भी मनमुताबिक चुनने की आजादी होना चाहिए.

छात्र अगर केवल एक या दो गतिविधियों का चयन करेगा तो वो उसमें माहिर बन सकता है, साथ ही वो अपनी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान लगा पाएगा. स्कूलों में तरह-तरह के विषयों की पढ़ाई, खेल-कूद और कौशल की गतिविधियों की गुंजाइश होना चाहिए, ताकि छात्र मनमाफिक विषय और खेल चुन सकें. केवल अनिवार्य/वैकल्पिक विषयों के समय-समय पर टेस्ट होना चाहिए. जबकि स्वेच्छा से चुने गए विषय और अतिरिक्त गतिविधियों का कोई टेस्ट नहीं होना चाहिए.

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4-छात्रों को किसी एक भारतीय भाषा को पढ़ने-लिखने में प्रवीण बनाया जाना चाहिए. इसके लिए भाषा का चुनाव खुद अपनी पसंद से कर सकते हैं. लेकिन इस बात का ख्याल रखा जाए कि छात्रों को वो भाषा पढ़ाई जाए, जिसका रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल किया जाता है. छात्रों को प्रवीण बनाने के लिए उनकी चुनी गई भाषा को उच्च स्तर तक पढ़ाया जाना चाहिए. वहीं छात्रों के लिए हिंदी बोलना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. गैर-हिंदी क्षेत्रों में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए फिल्मों और दूसरे मनोरंजक माध्यमो का इस्तेमाल किया जा सकता है.

5-जो निजी शिक्षण संस्थान आकर्षक उच्च/व्यावसायिक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, उन्हें सरकारी स्कूलों को अपने संरक्षण में लेना चाहिए. साथ ही आरटीई एक्ट के तहत प्राथमिक/माध्यमिक शिक्षा प्रदान करने वाले सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारना चाहिए. निजी शिक्षण संस्थानों में किसी विशेष कोर्ट में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या सीमित होना चाहिए, साथ ही उन्हें गरीब छात्रों की शिक्षा की जिम्मेदारी उठाने के लिए बाध्य करना चाहिए. उदाहरण के लिए, मेडिकल स्कूल को सरकारी स्कूल के 10 छात्रों की शिक्षा के लिए अनुदान देना चाहिए. इस तरह से शिक्षा के व्यावसायिक संस्थान अपने व्यावसायिक लाभों का कुछ हिस्सा समाज की भलाई के लिए खर्च करेंगे.

6-11वीं और 12वीं कक्षा के सभी छात्रों का एक महीने के राष्ट्रीय शिविर में हिस्सा लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए. यह राष्ट्रीय शिविर देश के किसी पिछड़े इलाके में आयोजित किया जाना चाहिए, ताकि छात्र सामाजिक विकास को नजदीक से देख सकें और उसमें अपना योगदान दे सकें. इस शिविर का खर्च सरकार को उठाना चाहिए, लेकिन यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र अपने श्रम के जरिए उस खर्चे की भरपाई करें.

राष्ट्रीय शिविर छात्रों के स्कूल से काफी दूर जगह पर लगाए जाने चाहिए. साथ ही एक शिविर में अलग-अलग स्कूलों के अलद-अलग छात्रों को शामिल किया जाना चाहिए. इस सारी कवायद का मकसद इतना है कि, अलग वर्ग, क्षेत्र और भाषा बोलने वाले छात्र एक-दूसरे के नजदीक आ सकें और समाजिक असमानता दूर हो सकें. इस कवायद से हम एक बेहतर भारत की नींव रख सकते हैं.

7-सभी स्कूलों को यह अनिवार्य करना चाहिए कि छात्र हफ्ते में एक-दो घंटे के लिए लाइब्रेरी में जरूर रहें. इस मामले में छात्रों का कोई टेस्ट नहीं होना चाहिए. सिर्फ इतना सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र बिना मोबाइल के लाइब्रेरी में अपनी पसंद की किताबों के साथ वक्त बिताएं.

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8-'नो-फ्रिल' शिक्षा को बढ़ावा:

छोटे स्कूलों के मॉडल के विकास पर जोर देना चाहिए. यानी ऐसे छोटे स्कूल बनाए जाने चाहिए जिसकी हर कक्षा में 30 से ज्यादा छात्र न हों. इन स्कूलों में छात्रों को पीटी और कुछ अन्य खेलों की सुविधाएं मुहैया कराई जानी चाहिए. इसके अलावा छात्रों को कम खर्चे वाली कलात्मक गतिविधियों जैसे पेंटिंग और नाटक की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.

मेरे कुछ सुझाव ऐसे हैं, जिन्हें लागू करने में संसाधनों की दिक्कत आ सकती है, लेकिन एक अच्छी शिक्षा नीति और नैतिक मूल्यों वाले समाज के लिए यह कवायद करना ही होगी. अगर हमें भविष्य में एक अच्छी और शिक्षित पीढ़ी चाहिए तो हमें सख्त कदम उठाने ही होंगे. शिक्षा के क्षेत्र में सुधार कर के हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों के भारत को साकार कर सकते हैं.

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