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बीएचयू: 'दादागिरी' का नया गढ़ तो नहीं बन रहा...

कबीर होते तो काशी फिर से छोड़कर चले जाते

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Sep 05, 2017 10:19 PM IST

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बीएचयू: 'दादागिरी' का नया गढ़ तो नहीं बन रहा...

बनारस और बीएचयू हिंदी पट्टी के लिए किस्सों और रंगीनियों से भरा शहर है. एक अलग ही नॉस्टैल्जिया में डूबा हुआ. मगर यही वो शहर है जिसे कबीर अंत समय में छोड़कर चले गए थे. तुलसी को जहां इतना परेशान किया गया कि वो लिख गए, ‘धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जोलहा कहौ कोऊ.

पिछले कुछ समय से ऐसा लगने लगा है कि बीएचयू प्रशासन और वहां के शिक्षक कुछ भी करके वो समय वापस लाना चाहते हैं, जहां पढ़ने-लिखने के लिए अच्छा माहौल न हो. खास तौर पर लड़कियों को लेकर पिछले कुछ सालों में बीएचयू प्रशासन का रवैया देखकर लगता है कि वो ऐसा माहौल बना देना चाहते हैं कि लड़कियां महामना की स्थापित की हुई इस यूनिवर्सिटी में पढ़ने ही न आएं.

ग्रैजुएशन पहले साल में पढ़ने वाली एक छात्रा को बीएचयू के हॉस्टल से बाहर कर दिया गया है. इसका कारण लड़की के अंदर होमोसेक्सुअल प्रवृत्तियों का होना बताया जा रहा है. लड़की विश्वविद्यालय में पढ़ती रहेगी मगर हॉस्टल में नहीं रह पाएगी.

हॉस्टल से जुड़े अलग-अलग अधिकारियों के इसपर अलग-अलग बयान हैं. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, संस्थान की डिसिप्लिनरी कमेटी के एक सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, 'बीए ऑनर्स प्रथम वर्ष की उस लड़की के अंदर लेज़्बियन होने की प्रवृत्ति थी. हॉस्टल में शांति बनाए रखने के लिए उसे बाहर कर दिया गया है.'

वहीं ये कारवाई करने वाली पांच हॉस्टल की चीफ कोऑर्डिनेटर नीलम अत्री के मुताबिक ये उनको सोलह शिकायतें लिखित में मिलीं थीं. हालांकि अत्री 'समलैंगिकता' वाले आरोप पर कुछ बोलने से मना कर देती हैं. उनके मुताबिक ये अंदरूनी मामला है और इस तरह के आरोप लगाने का मकसद विश्वविद्यालय को बदनाम करना है. जबकि विश्वविद्यालय से आ रही खबरों के अनुसार एक हफ्ते पहले ही लड़की के मां बाप को कॉलेज बुलाकर सलाह दी गई थी कि वो अपनी बेटी की 'बीमारी' का इलाज करवाएं.

इसी बारे में एक दूसरे प्रोफेसर का कहना है कि लड़की के व्यवहार से ऐसा स्पष्ट नहीं था कि वो लेज़्बियन है, लेकिन हॉस्टल में अनुशासन बनाए रखने के लिए उसे बाहर करना ज़रूरी था. हमें पिछले कई दिनों से शिकायतें मिल रही थीं.

कई सवाल खड़े होते हैं इन दावों के बाद

अगर बीएचयू की कमेटी की बात को सही भी मान लिया जाए तो भी इस फैसले पर कई सवाल खड़े होते हैं. पहला सवाल यही है कि बिना सही से जांच किए किसी को भी हॉस्टल से ऐसे ही बाहर किया जा सकता है.

अगर 16 लड़कियों ने शिकायत की तो क्या लड़की को अपना पक्ष रखने और सुधरने का मौका दिया गया? अगर मामला सिर्फ अनुशासनहीनता का था तो उसने ऐसी कौन सी बड़ी भूल कर दी थी जिसके चलते तुरंत फैसला तो ले लिया गया मगर उसका ज़िक्र जनता और मीडिय के सामने नहीं किया जा रहा है.

यदि कथित तौर पर लड़की लेज़्बियन है तो भी क्या हॉस्टल में छात्राओं के ‘सेक्सुअल प्रिफरेंस’ के आधार पर ऐडमीशन देने या न देने के नियम हैं. यदि नहीं हैं तो किस तरह नियम के तहत कमेटी ने ये फैसला लिया.

इन सबसे ज़्यादा चिंताजनक बात ये है कि लड़की के होमोसेक्सुअल होने की बात कैसे फैलने दी गई. क्या कमेटी के सदस्य नहीं जानते थे कि ये एक सेंसटिव मुद्दा है और छात्रा को कम से कम 3 साल उसी जगह पढ़ना है. ऐसे में तानों, और हूट करने जैसी घटनाओं की ज़िम्मेदारी कौन लेगा.

लड़कियों को लेकर यही रवैया रहा है

इस मामले में बीएचयू प्रशासन की मंशा पर सवाल इसलिए उठ भी उठ रहे हैं क्योंकि पिछले कुछ समय में विश्वविद्यालय में लड़कियों को लेकर ऐसी कई खबरे आ चुकी हैं. इसी साल यूपी चुनाव के दौरान कुछ चैनलों ने इन हॉस्टलों में रहने वाली लड़कियों से बात की थी जिसमें चौंकाने वाली बातें सामने आईं थीं. इन छात्राओं की मानें तो बीएचयू के हॉस्टल में रहने वाली लड़कियां-

किसी तरह के धरना प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले सकती हैं. हॉस्टल में आते समय ही उनसे ये बात लिखित में ले ली जाती है. जबकि लड़कों पर ऐसा कोई नियम लागू नहीं है.

मेस में खाना खाने के लिए पूरे कपड़े पहनना जरूरी है.

महिला महाविद्यालयों में नॉनवेज खाने पर पाबंदी है. अनाधिकारिक रूप से तर्क दिया जाता है कि संस्कारी लड़कियां शाकाहारी होती हैं. विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की प्रिंसिपल संध्या सिंह कौशिक कहती हैं कि मालवीय जी के संस्थान में प्याज, लहसुन भी नहीं होना चाहिए, मीट कैसे खाया जा सकता है. मगर ये बात लड़कों पर लागू नहीं होती.

लड़कियों को फ्रेंच और स्पैनिश जैसी भाषाएं पढ़ने की इजाज़त नहीं है.

रात दस बजे के बाद लड़कियां फोन पर दूसरी लड़कियों से बात नहीं कर सकती हैं. घर पर बात करने के लिए स्पीकर ऑन करके बात करनी पड़ती है.

विश्वविद्यालय के कुलपति पहले ही कह चुके हैं कि लड़कियों का 10 बजे के बाद पढ़ना अव्यवहारिक है. इसी लिए 24 घंटे चलने वाली लाइब्रेरी की सुविधा खत्म कर दी गई है.

लड़कियों को लैन इंटरनेट की सुविधा नहीं दी गई है.

लड़कियों को विषय चुनने की भी पूरी आजादी नहीं हैं.

लड़कियां विश्विद्यालय में 8 बजे के बाद होने वाले किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले सकती हैं.

महिला विश्वविद्यालय से जुड़ी इस तरह के तुगलकी फरमानों की लंबी लिस्ट है. जिसके चलते इस बार भी विश्वविद्यालय सवालों के घेरे में है. इससे पहले भी लड़कियों के पेट में दर्द होने पर प्रेगनेंसी टेस्ट और टू फिंगर टेस्ट करने की खबरें आती रही हैं.

कुछ महीनों पहले केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस तरह के फैसलों की वकालत करते हुए कहा था कि 16-17 साल की लड़कियों को अक्सर रात में हार्मोनल आउटबर्स्ट होता है. उन्हें ‘बचाने’ के लिए ऐसे नियम बनाए गए हैं.

ये एक विश्वविद्यालय का मामला नहीं देश की आने वाली आधी आबादी के भविष्य को सीमत करने वाली घटनाओंं में एक नई कड़ी है. करने की बात है. इसपर देश भर जिम्मेदार संस्थाएं क्यों चुप्पी साधे हैं, सवाल पूछा जाना चाहिए.

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