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भोपाल गैस कांड के 33 साल: सिर्फ बरसी पर ही याद आती है पीड़ितों की समस्या

पिछले 33 सालों में हर साल दोषी को सजा दिलाने और अतिरिक्त मुआवजा दिलाने के तमाम वादे किए जाते हैं. गैस कांड की बरसी बीत जाने के बाद इन वादों को घटना की तरह दफन कर दिया जाता है.

Dinesh Gupta Updated On: Dec 02, 2017 09:19 AM IST

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भोपाल गैस कांड के 33 साल: सिर्फ बरसी पर ही याद आती है पीड़ितों की समस्या

भोपाल गैस कांड के बाद सरकार की ओर से बनाए गए गैस राहत विभाग में हर माह दर्जन भर आवेदन ऐसे आते हैं, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए आर्थिक सहायता की मांग की जाती है. दुनिया के सबसे बड़े रासायनिक हादसे में भोपाल के साढ़े पांच लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे. हजारों लोग की मौत तो मौके पर ही हो गई थी. जिंदा बचे लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं. सरकार अपने खर्चे पर इन मरीजों का इलाज करा रही है. कैंसर के इलाज पर खर्च की जाने वाली राशि भी बजट में बढ़ा दी गई है.

संचालक गैस राहत कृष्ण गोपाल तिवारी कहते हैं कि इस वर्ष हमने गैस पीड़ितों के कैंसर के इलाज के लिए दस करोड़ रुपए की राशि का प्रावधान बजट में किया है. कैंसर एक अकेली बीमारी नहीं है, जिससे गैस प्रभावित लोग जूझ रहे हैं, सैकड़ों बीमारियां हैं. घटना के तैंतीस साल बाद भी गैस कांड के दुष्प्रभाव खत्म नहीं हो रहे हैं. पिछले 33 सालों में हर साल दोषी को सजा दिलाने और अतिरिक्त मुआवजा दिलाने के तमाम वादे किए जाते हैं. गैस कांड की बरसी बीत जाने के बाद इन वादों को घटना की तरह दफन कर दिया जाता है.

राजीव गांधी के आदेश पर एंडरसन को मिली थी भारत छोड़ने की छूट

भोपाल के जिस यूनियन कार्बाइड कारखाने से मिक गैस का रिसाव हुआ था, उसकी स्थापना साठ के दशक में हुई थी. कारखाने में गैस के रिसाव से होने वाले हादसे निरंतर होते रहते थे. गैस रिसाव का बड़ा हादसा दो और तीन दिसंबर 1984 की मध्य रात्रि में हुआ था. हादसा इतना बड़ा था कि सरकार किसी भी सूरत में इसे छुपा नहीं सकती थी. शहर में जगह-जगह लाशें पड़ी हुईं थीं. हर कोई जान बचाने के लिए इन्हें अनदेखा कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचने की जल्दी में था.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

तीन दिसंबर 1984 का दिन ऐसा था, जिसमें लोगों के घरों में ताले नहीं लगे थे. जान है तो जहान है. यही सोचकर लोग अपने घर खुले छोड़कर निकल आए थे. घर से निकलने के बाद भी मौत ने कई लोगों का पीछा नहीं छोड़ा. सड़क पर ही लोगों की जान चली गई. मौत का मंजर इतना भयावह था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह भी रो पड़े थे. वे संवेदना व्यक्त करने की स्थिति में भी नहीं थे.

हादसे की जानकारी मिलने के बाद कारखाने के मालिक वारेन एंडरसन भोपाल आए. उनके भोपाल आने की खबर सुनकर जिला प्रशासन सकते में आ गया. भोपाल गुस्से में था. वारेन एंडरसन की पहुंच तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक थी. प्रशासन ने राजीव गांधी को दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे एंडरसन को सुरक्षा नहीं दे सकते.

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मजबूरन राजीव गांधी के निर्देश पर तत्कालीन गृह मंत्री एवं पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव ने अर्जुन सिंह सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि एंडरसन को सुरक्षित रवाना किया जाए. तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह ने इस घटना के बारे में लिखी किताब भोपाल गैस त्रासदी का सच में एंडरसन की रिहाई का सच भी लिखा है. इस सच को उजागर करने के कारण उनके खिलाफ आरोपी को भगाने का मुकदमा भी दर्ज किया गया है.

हालांकि जांच आयोग तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह के साथ-साथ पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी को भी क्लीन चिट दे चुका है. एंडरसन की सुरक्षित रिहाई के बाद कभी भी सरकार उसे मुकदमा चलाने के लिए भारत वापस नहीं ला सकी. एंडरसन की मौत हो चुकी है.

प्रधानमंत्री कार्यालय अथवा गृह मंत्रालय में भी ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि एंडरसन की रिहाई के लिए मध्यप्रदेश सरकार पद दबाव राजीव गांधी द्वारा डाला गया था. घटना के लगभग एक माह पूर्व ही राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने थे. उनके कार्यकाल की यह पहली बड़ी त्रासदी दी थी. भोपाल में हर साल गैस की कांड की बरसी पर एंडरसन के साथ-साथ राजीव गांधी को भी घटना के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

कार्बाइड कारखाने के आसपास की मिट्टी में मौजूद है जहर

कार्बाइड के जिस कारखाने से जहरीली गैस का रिसाव हुआ था, उसे स्मारक के रूप में बदलने की घोषणा सरकार ने की थी. तैंतीस साल बाद भी यहां स्मारक नहीं बन सका है. बड़ी मात्रा में केमिकल वेस्ट अभी कारखाना परिसर में पड़ा हुआ है. इस वेस्ट के कारण कारखाने के आसपास की मिट्टी भी जहरीली हो चुकी है. हैंडपंप से निकलने वाला पानी भी पीने योग्य नहीं होता. मध्यप्रदेश प्रदूषण निवारण मंडल ने भी यह मान लिया है कि यहां की मिट्टी का उपचार नहीं किया जा सकता है.

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भोपाल के एक लाख से अधिक गैस पीड़ितों ने एक बार तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को एक याचिका भेजकर न्याय की गुहार लगाई थी. भारत सरकार आरोपियों को अब तक अदालत में पेश नहीं कर सकी है. भोपाल की पूरी एक पीढ़ी इस गैस कांड ने बेकार कर दी है. गैस कांड से प्रभावित हुए साढ़े पांच लाख लोगों में ढाई लाख से अधिक युवा थे.

गैस प्रभावित होने का दुष्प्रभाव उनकी कार्य क्षमता पर पड़ा था. लोगों ने गैस प्रभावितों को काम देना बंद कर दिया. सरकार द्वारा खोले गए पुर्नवास एवं रोजगार केंद्र भी कोई ज्यादा मदद नहीं कर सके. गैस कांड के वक्त भोपाल की आबादी लगभग नौ लाख थी. लेकिन, गैस प्रभावित साढ़े पांच लाख लोगों को ही माना गया. मरने वालों की सही संख्या भी सरकार नहीं बता पाती है.

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इस हादसे के कारण इक्कीस हजार लोग मरना स्वीकार किया जाता है. भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार के अनुसार 35 हजार से अधिक लोग इस घटना के शिकार हुए हैं. गैस पीड़ितों का इलाज एक बड़ी समस्या है. इलाज के नाम पर कई ड्रग ट्रायल भी दवा कंपनियों द्वारा किया गया. मामला उजागर होने के बाद भी सरकार ने डॉक्टरों और कंपनियों पर कोई कार्यवाही नहीं की.

मुआवजा बढ़ाने का सिर्फ आश्वासन ही मिलता है

यूनियन कार्बाइड कारखाने का स्वामित्व अमेरिका की कंपनी का होने के कारण हमेशा यह मांग उठती रही है कि गैस पीड़ितों को मुआवजे की मांग डॉलर के वर्तमान मूल्य पर की जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2012 में लंबित याचिका का अंतिम निपटारा कर दिया था. इस याचिका में दिए गए निर्देश अभी भी सरकारी फाइलों में ही बंद हैं. अब्दुल जब्बार के अनुसार भारत सरकार ने मुआवजा बढ़ाने के लिए वर्ष 2010 में एक क्यूरेटिव पिटिशन सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की थी.

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इस पीटिशन में 7728 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग की गई थी. कंपनी से वर्ष 1989 में जो समझौता हुआ था, उसके तहत 705 करोड़ रुपए मिले हैं. सरकार का तर्क है कि गैस कांड से प्रभावित और मृतकों की संख्या बढ़ी है, इस कारण मुआवजा भी बढ़ाना चाहिए. वर्ष 1989 में जब समझौता हुआ था, उस वक्त मृतकों की संख्या तीन हजार एवं प्रभावितों की संख्या एक लाख दो हजार बताई गई थी.

गैस अदालतों में मुआवजे के जो मामले सामने आए उसमें प्रभावित संख्या पांच लाख चौहत्तर हजार से अधिक आंकी गई है. जबकि मृतकों की संख्या पंद्रह हजार 274 आंकी गई है. गैस कांड के एक प्रभावित को औसतन पचास हजार रुपए तथा मृतक को आठ लाख रुपए का मुआवजा मिला है.

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