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टॉयलेट एक मजबूरी: ट्रांसजेंडर जाएं तो जाएं कहां

रविवार को भोपाल में देश के पहले ट्रांसजेंडर टॉयलेट का मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने फीता काटकर उद्घाटन किया

Dinesh Gupta Updated On: Oct 02, 2017 06:34 PM IST

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टॉयलेट एक मजबूरी: ट्रांसजेंडर जाएं तो जाएं कहां

ट्रांसजेंडर सुरैया के लिए सुबह सात बजे घर से निकलना मजबूरी हैं. घर से निकलकर उन्हें मोहल्ले और कॉलोनियों में जाकर उन्हें यह पता लगाना होता कि किस घर में शुभ कार्य जैसे विवाह अथवा संतान का जन्म हुआ है. इसके बाद ट्रांसजेंडर की पूरी टोली उस घर में जाकर बधाईयां गाती है. ट्रांसजेंडर की जीविका का यही एक मात्र साधन है. पूरा दिन इसी काम में गुजर जाता है. इस दौरान उनके समाने सबसे बड़ी समस्या टॉयलेट को लेकर आती है.

सुरैया कहती हैं कि हम ट्रांसजेंडर महिला और पुरुषों की तरह सड़क के किनारे मूत्र विसर्जन नहीं कर सकते हैं. कारण ट्रांसजेंडर को लेकर इंसान की स्वभाविक जिज्ञासाएं हैं. ट्रांसजेंडर को लेकर अभी भी कौतूहल बना रहता है.

कई शहरों में स्थानीय निकायों ने पब्लिक टॉयलेट का निजीकरण कर दिया है. ऐसे टॉयलेट में भी ट्रांसजेंडर को जाने की इजाजत नहीं मिलती. महिला और पुरूष का सवाल यहां भी खड़ा होता है. पब्लिक टॉयलेट में सिर्फ दो ही लोगों के लिए इंतजाम किए जाते हैं, महिला और पुरूष. ट्रांसजेंडर को मजबूरन सूनसान जगह ढूंढनी पड़ती है.

भोपाल में ट्रांसजेंडर का अलग टॉयलेट शुरू होने के बाद इस वर्ग को उम्मीद है कि उनकी परेशानी को समझकर हर शहर में इस तरह की पहल होगी.

कोर्ट ने कहा पुरुष हैं, पर ट्रांसजेंडर खुद को महिला मानते हैं

कुछ साल पहले मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का एक फैसला आया था, जिसमें ट्रांसजेंडर को पुरुष वर्ग में रखने का आदेश दिया गया था. ट्रांसजेंडर अपने आपको को महिला वर्ग में रखना ही बेहतर समझते हैं. उनका पहनावा भी महिलाओं का ही होता है. महिलाओं जैसी वेशभूषा के कारण ट्रांसजेंडर को अपनी जीविका चलाने में आसानी होती है. उनकी वेशभूषा ही सार्वजनिक टॉयलेट के उपयोग में समस्या बन जाती है.

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ट्रांसजेंडर की लाइफ स्टाइल को नजदीक से देखने वाले ओसाफशामी खुर्रम कहते हैं कि सभ्रांत समाज इस वर्ग को स्त्री-पुरूष किसी भी श्रेणी में मान्यता देने की मानसिकता में नहीं है. घर के बाहर टॉयलेट जाना चुनौती भरा काम होता है.

खुर्रम कहते हैं कि कई घटनाएं ऐसी सामने आ चुकी हैं, जिनमें महिलाओं ने ही ट्रांसजेंडर को महिला टॉयलेट में नहीं घुसने दिया. ट्रांसजेंडर में स्त्री-पुरूष दोनों ही वर्ग होते हैं. इस कारण भी विवाद होता है. आधार कार्ड में ट्रांसजेंडर लिंग का उपयोग भी देखा गया है.

देश का पहला ट्रांसजेंडर टॉयलेट

भोपाल में देश के पहले ट्रांसजेंडर टॉयलेट का मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने  फीता काटकर  उद्घाटन किया. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार किन्नरों का उपयोग सफाई दूत के तौर पर करेगी. इसका भुगतान स्थानीय निकायों के द्वारा किया जाएगा.

किन्नर घर-घर जाकर उसी तरह स्वच्छता के लिए काम करेंगे, जिस तरह वे शुभ कार्य होने पर घर-घर जाकर बधाई के गीत गाते हैं. भोपाल के मंगलवार क्षेत्र में नगर निगम भोपाल द्वारा बनाया गया यह टॉयलेट आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है. इस टॉयलेट में किन्नरों के नहाने के अलावा उनके डे्रसअप होने की व्यवस्था भी की गई है. इस सर्वसुविधायुक्त केंद्र में कुल वॉशरूम और मेकअप रूम भी है. मेकअप रूप में क्रीम-पाऊडर,लिपिस्टक आदि भी रखे गए हैं.

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भोपाल में है सबसे ज्यादा किन्नर

देश में ट्रांसजेंडर की गणना का काम पहली बार वर्ष 2011 की जनगणना में किया गया. पूरे देश में लगभग पांच लाख ट्रांसजेंडर हैं. जनगणना के आकंडे के अनुसार मध्यप्रदेश में लगभग तीस हजार ट्रांसजेंडर हैं. भोपाल में सबसे ज्यादा लगभग तीन हजार ट्रांसजेंडर हैं. भोपाल के मंगलवारा क्षेत्र में सबसे ज्यादा ट्रांसजेंडर निवास करते हैं. देवास और सागर जिले में भी ट्रांसजेंडर बड़ी संख्या में हैं.

ट्रांसजेंडर में हिंदू और मुस्लिम दो समुदाय होते हैं. इनके गुट भी अलग-अलग होते हैं. मंगलवारा क्षेत्र में सोमवार से शुरू हुए टॉयलेट से ट्रांसजेंडर बेहद खुश हैं. ट्रांसजेंडर आबादी की सदर सुरैया नायक कहतीं हैं कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें भी मिलना चाहिए.

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प्रधानमंत्री आवास मुहैया कराने की मांग भी सुरैया ने की. ट्रांसजेंडर के लिए यह टॉयलेट सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुसार बनाया गया है. सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार ट्रांसजेंडर के लिए अलग स्कूल भी खोला जाना है. सालों तक सामाजिक न्याय विभाग में पदस्थ रहे रिटायर्ड आईएएस अधिकारी

वी.के.बाथम कहते हैं कि केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के अनुसार सरकारी नौकरी में ट्रांसजेंडर को एक प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का प्रस्ताव दिया था. बाथम कहते हैं कि ट्रांसजेंडर की अंतिम संस्कार की व्यवस्था को भी मानवीय मूल्यों पर आधारित करने का प्रस्ताव था.

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विधायक और महापौर के तौर चुने गए हैं ट्रांसजेंडर

मध्यप्रदेश में ट्रांसजेंडर को जनता अपना प्रतिनिधि चुन चुकी है. वर्ष 1998 में ट्रांसजेंडर शबनम मौसी पहली बार विधायक चुनी गईं. उन्होंने शहडोल जिले की सुहागपुर विधानसभा सीट से चुनाव जीता था. शबनम मौसी की जीत को तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी के तौर पर देखा गया. शबनम मौसी ने विधानसभा का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था.

वर्ष 2004 में सागर की जनता ने ट्रांसजेंडर कमला को अपना महापौर चुना था. कटनी नगर निगम की महापौर भी ट्रांसजेंडर चुनी गईं थी. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के रायगढ़ नगर निगम की महापौर ट्रांसजेंडर मधुबाई हैं.

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर कहते हैं कि जनता जब राजनीति दलों के प्रतिनिधियों से निराश और नाराज होती हैं तो ट्रांसजेंडर के रूप में अपना प्रतिनिधि चुन नाराजगी जाहिर करती है.

राजनीति का शिकार ट्रांसजेंडर बोर्ड

मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने ट्रांसजेंडर के लिए एक बोर्ड गठित करने का विचार लगभग दो साल पूर्व किया था. अध्यक्ष नियुक्त किए जाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई थी.

बताया जाता है कि बोर्ड के अध्यक्ष के नाम पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सामाजिक न्याय विभाग के मंत्री गोपाल भार्गव के बीच नाम पर सहमति न बन पाने के कारण प्रस्ताव ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. मुख्यमंत्री चौहान शबनम मौसी को बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त करना चाहते थे. भार्गव कमला बुआ को अध्यक्ष बनाना चाहते थे.

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