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नाभा जेलब्रेक: नए जमाने के जेलर और जेल में सुरंग

पीएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में 200 कैदी जेल से फरार हुए.

Updated On: Nov 28, 2016 01:31 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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नाभा जेलब्रेक: नए जमाने के जेलर और जेल में सुरंग

हम अपनी गलतियों से कब सीखेंगे. आतंकी हमले होते रहे, ट्रेन हादसे होते रहे या फिर जेल तोड़कर कैदी भागते रहें. कितने ही लोग अपनी जान गंवा दें. हमें फर्क नहीं पड़ता. हम अगले हादसे के इतंजार में अपनी जिन्दगी में मस्त रहते हैं.

यह हंसी मजाक का मुद्दा नहीं है. लेकिन जिस तरह से नाभा जेलकांड हुआ है ये बेहद अफसोसनाक बात है. कैसे एक अतिसंवेदनशील जेल से खालिस्तानी आतंकी हरमिंदर सिंह मिंटू समेत पांच लोगों को बंदूक की नोक पर भगा लिया गया. हैरानी की बात है.

भोपाल जेल तोड़कर सिमी गुर्गों को भागे अभी एक महीना भी नहीं हुआ है. ऐसे में नाभा की घटना बेहद गंभीर है. भोपाल की जेल तो आईएसओ सर्टिफाइड थी.

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की प्रीजन स्टैटिसटिक्स इंडिया (पीएसआई) की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में 200 कैदी जेल से फरार हुए. इनमें आतंकी, उपद्रवी, गैंगस्टर और खूंखार अपराधी शामिल हैं. यह आंकड़ा देश के छह राज्यों की हाई सेक्यूरिटी जेल से एक साल के अंदर भागे कैदियों का है.

उत्तरप्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह के मुताबिक भारतीय जेलों की हालत खस्ता है. वो कहते है.’ जेलों को काफी हल्के में लिया जाता है. जबकि यहां आतंकवादी, अपराधी, गैंगस्टर और देश के दुश्मनों को रखा जाता है. उनकी हर एक हरकत पर जेल प्रशासन की नजर होनी चाहिए. लेकिन यहां माहौल उल्टा होता है.‘

सीएजी ने भी उठाए सवाल

पीएसआई की रिपोर्ट पर नजर डालें तो 2011 से 2015 के बीच देशभर में 83 जेलब्रेक की वारदात दर्ज की गईं. इनमें सबसे ज्यादा 28 बार 2011 में और उसके बाद 26 बार 2015 में हुईं. इन पांच सालों के दौरान जेल में सेंधमारी की कुल 83 घटनाओं में सर्वाधिक 41 राजस्थान में हुईं. उत्तरप्रदेश में 14 जबकि मध्यप्रदेश में 5 घटनाएं हुईं.

इन्हीं पांच सालों में जेल की अंदर कैदियों की बीच झड़प की 836 घटनाएं भी दर्ज की गईं. इनमें से लगभग 60 फीसदी यानि 506 झड़पें केवल दिल्ली की जेलों में दर्ज की गईं.

2013 की सीएजी रिपोर्ट में भी 2007 से 2012 के बीच कैदियों के जेल से भागने की 91 घटनाओं का जिक्र मिलता है. इस रिपोर्ट में सीएजी ने जेल प्रशासन के ढुलमुल रवैये को लताड़ लगाई है. सीएजी ने जेलों में खराब पड़े वायरलेस सेट और सीसीटीवी कैमरों पर भी अपनी चिंता जाहिर की थी.

हाल ही में भोपाल जेल कांड के बाद भी यह पाया गया था कि वहां के सीसीटीवी बंद पड़े हैं. भोपाल जेल की 28 फीट ऊंची दीवार लांघकर भागे सिमी गुर्गे इसके पहले अक्टूबर 2013 में भी खंडवा जेल से फरार हो चुके थे.

सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रह चुके प्रकाश सिंह जेलों में सुधार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिख चुके हैं. लेकिन अभी तक उनकी स्मार्ट पुलिस के प्रस्ताव पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है. प्रकाश सिंह जानते हैं कि पुलिस राज्य का विषय है. राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने पुलिस विभाग को बदलते वक्त से साथ चुस्त दुरुस्त रखे.

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फोटो: पीटीआई

सिंह के इस स्मार्ट पुलिस का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 नवंबर 2014 को गुवाहाटी में आयोजित डीजीपी कांफ्रेंस में किया था. स्मार्ट पुलिस की अवधारणा में पुलिस को सख्त और संवदेनशील, आधुनिक और चपल, जिम्मेदार और सतर्क, भरोसेमंद और विश्वसनीय बनाने के साथ साथ आधुनिक तकनीक के  इस्तेमाल में प्रशिक्षित करने पर जोर दिया गया है.

इस बीच नाभा की घटना के बाद पंजाब की बादल सरकार विरोधियों के निशाने पर है.

आतंक लौटने का खतरा

पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस जेलकांड के लिए सीधे बादल सरकार को जिम्मेदार ठहराया है. उनका आरोप है कि एक खालिस्तानी आतंकी का इस तरह से फरार होना बताता है कि पंजाब में कानून व्यवस्था की हालत कितनी खराब हो गई है. कैप्टन ने जेल की लापरवाही को सरकार की सोच से जोड़ दिया. उनका आरोप है कि सरकार की लापरवाही के कारण पंजाब एक बार फिर आतंकवाद के गर्त में जा सकता है.

सुरक्षा मामलों के जानकार भी अमरिंदर के इस आरोप से पूरी तरह असहमत नहीं हैं. इनकी मुख्य चिंता पंजाब की जेलों में सुरक्षा के लचर इंतजाम को लेकर है. जहां खूंखार आतंकी और अपराधी सजा काट रहे हैं. इनका मानना है कि पाकिस्तान समर्थित खालिस्तानी अभियान यहीं से पंजाब में एक बार फिर जड़ें जमा सकता है.

सुरक्षा विशेषज्ञ अनिल कंबोज कहते हैं कि पाकिस्तान अपना काम ठीक से कर रहा है.

वह पंजाब चुनाव से पहले गुरदासपुर और पठानकोट जैसी वारदातों को अंजाम देने में सफल रहता है. लेकिन हमें जो करना चाहिए वह हम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं. जेल में सेंध लगाने की बढ़ती वारदातों से साफ है कि हम सुरक्षा के तय मानकों का पालन ठीक ढंग से नही कर रहे हैं. हम कब अपनी जेलों को पूरी तरह सुरक्षित बना पाएंगे. हम अपनी गलतियों से आखिर कब सीखेंगे?

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तस्वीर: PTI

पिछले दो दशकों में भारतीय जेलों में सेंधमारी की बड़ी वारदातें:

1995: लिट्टे के 43 दुर्दांत कार्यकर्ता वेल्लोर फोर्ट के टीपू महल से 153 फीट लंबी सुरंग खोद कर भागे.

1998: निजामाबाद जेल से अधिकारियों की लापरवाही और अराजक भीड़ का फायदा उठाकर 78 कैदी भागे.

2000: हरियाणा की महेंद्रगढ़ जेल से 15 कैदी फरार.

2001: भुज भूंकप का फायदा उठाकर 270 कैदी भागने में कामयाब हुए.

2002: बिहार के पश्चिम चंपारन जिले की बेतिया संभागीय जेल से उम्र कैद की सजा काट रहे आठ कैदी दीवार फांद कर भागे.

2005: माओवादियों ने बिहार की जहानाबाद जेल पर हमला किया. इस मौके का फायदा उठाकर 137 कैदी फरार.

2013: मध्यप्रदेश की खंडवा जेल से सांप्रदायिक हिंसा, डकैती और हत्या के आरोपी छह सिमी कार्यकर्ता फरार.

2015: देश की सबसे सुरक्षित माने जाने वाली तिहाड़ जेल से हत्या के दो विचाराधीन कैदी हुए फरार.

2016:  आतंक फैलाने का आरोप झेल रहे सिमी के आठ विचारधीन कैदी भोपाल जेल से फरार. कुछ घंटो बाद इन्हें मार गिराया गया.

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