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अब भीमसेन के लिए वीरता पुरस्कार 'कूड़े' से ज्यादा कुछ नहीं

भीमसेन को उस की बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया

FP Staff Updated On: Jan 25, 2018 05:33 PM IST

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अब भीमसेन के लिए वीरता पुरस्कार 'कूड़े' से ज्यादा कुछ नहीं

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बहादुर बेटे भीमसेन की बेबसी देखने के बाद वाकई शर्मिंदगी महसूस होती है. महज 12 साल की उम्र में भीमसेन ने घाघरा नदी में नाव पलटने पर 14 लोगों की जान बचाई थी. उसके इस बहादुरी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था. लेकिन जिला प्रशासन की लापरवाही से आज बहादुर बेटे का परिवार और उसके गांव वाले खानाबदोशों का जीवन जीने को मजबूर हैं. जिले और गांव का नाम रोशन करने वाले भीमसेन आज मुफलिसी की जिंदगी जी रहा है.

कलवारी थाना क्षेत्र के डकही गांव के भीमसेन उर्फ सोनू ने अपनी बहादुरी के दम पर जनपद और अपने गांव का नाम रोशन किया. भीमसेन को उस की बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया. अपनी जान पर खेल कर भीमसेन ने नवम्बर 2014 में घाघरा नदी में नांव पलटने पर 14 लोगों की जान बचाई थी. भीमसेन की उस वक्त उम्र महज 12 साल थी.

जिसके लिए उसे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. लेकिन आज भीमसेन की उपेक्षा हो रही है. भीमसेन का परिवार आज भी गरीबी की वजह से छप्पर के मकान में रहने को मजबूर है. पात्र होने के बावजूद भी उसे सरकारी आवास तक नहीं दिया गया. आवास और अन्य सुविधाओं के लिए बहादुर भीमसेन पिछले दो सालों से अधिकारियों का चक्कर लगा रहा है. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है.

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अधिकारियों के चक्कर लगाते-लगाते बहादुर भीमसेन का दिल टूट चुका है. भीमसेन गरीबी की वजह से पढाई तक नहीं कर पा रहा है. परिवार वाले मेहनत मजदूरी कर किसी तरह भीमसेन की पढ़ाई करवा रहे हैं.  भीमसेन के छप्पर के मकान में चंद मिट्टी के बरतन हैं, जिनमें खाने के लिए कुछ अनाज रखा जाता है. खाना बनाने के लिए घर में दो चार बर्तन हैं. गैस चूल्हा न होने की वजह से लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने को परिवार मजबूर हैं.

भीमसेन के परिजनों का कहना है जब बेटे को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो बहुत से अधिकारी गांव में आए और घर, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए आश्वासन भी दिया. लेकिन आज तक बहादुर भीमसेन को कोई सरकारी लाभ नहीं मिला.

भीमसेन का कहना है की राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार का उसे कोई लाभ नहीं मिल रहा है. यह उसके लिए किसी कूड़े से कम नहीं. जब सुविधा ही नहीं मिल रही तो वह इसे लेकर क्या करे.

बीजेपी सांसद हरीश द्विवेदी भी दो साल पहले भीमसेन के घर गए थे. तब उन्होंने गांव में बिजली और शुद्ध जल के लिए नल लगवाने का वादा किया था. लेकिन वक्त बीतता गया और सभी वादे सिर्फ वादे बन कर रह गए. भीमसेन के गांव में आज भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. ज्यादातर लोगों के घर छप्पर के बने हुए हैं. आजादी के बाद से आज तक गांव में बिजली नहीं पहुंची. शुद्ध जल के लिए सरकारी हैण्ड पम्प तक लोगों को मुहैया नहीं है. लोग दूषित जल पीने को मजबूर हैं.

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गांव वालों का आरोप है की कोटेदार एक महीने का राशन देता है और एक महीने का राशन ब्लैक कर देता है. गांव में लोगों के पास शौचालय तक नहीं है. लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं. वहीं गांव में गरीबी की वजह से ज्यादातर लोग मजदूरी करके अपना जीवन यापन करते हैं. कुछ लोगों के घाघरा नदी के किनारे थोड़े बहुत खेत हैं ,जिसमें खेती बाड़ी की जाती है. बाढ़ आने से लगाई गई फसल भी बर्बाद हो जाती है.

भीमसेन और उसके गांव वाले दशकों से विस्थापित जिंदगी जी रहे हैं. दशकों पहले घाघरा नदी में बाढ़ आने पर इनका गांव नदी में विलीन हो गया था. जिसके बाद भीमसेन के गांव वाले डकही गांव में बंधे के किनारे जीवन गुजारने को मजबूर हैं.

भीमसेन ने सरकार से मांग करते हुए कहा कि “हम लोग जहां रहते हैं, वहां से एनएच रोड निकल रहा है. जिससे रहने की समस्या हो रही है. सरकार से हमारी मांग है कि हम लोगों को कहीं और बसाया जाए.  हमारे गांव में बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं. हमारे गांव में बिजली पानी जैसी मूलभीत सुविधाएं होनी चाहिए.

वहीं परियोजना निदेशक आरपी सिंह का कहना है कि भीमसेन को लोहिया आवास देने के लिए पूर्व जिलाधिकारी द्वारा अनुमोदन किया गया था. विकास खण्ड से रिपोर्ट मंगाकर दो तीन दिन में भीमसेन को आवासीय सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी. अब देखने वाली बात होगी की दो साल से अधिकारियों का चक्कर लगा रहे भीमसेन को घर मिलेगा या नहीं.

(न्यूज18 के लिए हिफ्ज़ुर रहमान की रिपोर्ट)

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