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भीमा-कोरेगांव हिंसा: रिपोर्ट जमा करने की तारीख निकली लेकिन पुलिसिया नकारापन जारी

जांच कमीशन को बने छ महीने हो गए हैं लेकिन अभी तक रिपोर्ट तैयार नहीं हुई है, न ही पुलिस ने किसी तरह की संवेदनशीलता दिखाई है

Updated On: Jul 19, 2018 11:03 AM IST

Parth MN

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भीमा-कोरेगांव हिंसा: रिपोर्ट जमा करने की तारीख निकली लेकिन पुलिसिया नकारापन जारी

महाराष्ट्र सरकार ने इस साल 9 फरवरी को उस दो सदस्यीय आयोग बनाने का नोटिफिकेशन जारी किया था, जिसे कोरेगांव भीमा में हुए दंगों की जांच करनी थी. इस आयोग के अध्यक्ष हाइकोर्ट के पूर्व जज जे एन पटेल हैं. नोटिफिकेशन में बहुत साफ लिखा हुआ है कि ये जांच आयोग नोटीफिकेशन की तारीख के चार महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देगा. बहरहाल, रिपोर्ट अब तक तैयार नहीं हो पाई है.

लेकिन चश्मदीदों और पीड़ितों के बयान लेने की आखिरी तारीख, इस 16 जुलाई को शाम 5 बजे बीत गई. दरअसल इस तारीख को आगे इसलिए बढ़ाया गया था क्योंकि घटना के पीड़ितों से बयान देने की अपील आधिकारिक तौर पर कमीशन बनने के तीन महीने बाद की गई. अजीब हाल है कि पहले महीने में सिर्फ 170 लोगों के बयान रिकॉर्ड किए गए. ऐसा इसलिए कि पीड़ितों को इस बारे में सूचना ही नहीं दी गई थी कि उन्हें बयान देने हैं. 1 जून को रिपब्लिकन मोर्चा के कार्यकर्ता राहुल दम्बाले, जो दंगों के चश्मदीद रहे हैं, ने अपना बयान रिकॉर्ड करवाया. दम्बाले कहते हैं, 'हमला करने वालों और भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने वालों को हमने पहचान लिया है, हमने सरकार से अपील की कि गवाही की आखिरी तारीख को आगे बढ़ा दिया जाए. नतीजतन सोमवार तक कमीशन के पास 343 लोगों की गवाहियां रिकॉर्ड की गईं, इनमें से 100 लोग तो पुलिस और प्रशासन से जुड़े हैं.'

दंगों से प्रभावित लोगों की संख्या हज़ारों में है

हर साल 1 जनवरी को पूरे महाराष्ट्र से हज़ारों लोग, पुणे से 40 किलोमीटर दूर कोरेगांव भीमा में बने युद्ध स्मारक पर इकट्ठा होते हैं. विजय का समारोह उस लड़ाई में हुई जीत के लिए मनाया जाता है, जिसमें अंग्रेज़ो की सेना ने पेशवा की सेना को हराया था. अंग्रेज़ों की सेना में इस इलाके के दलितों की संख्या खूब थी. चूंकि इस साल कोरेगांव भीमा युद्ध के 200 साल पूरे हो रहे थे, इसलिए इस बार भीड़ कुछ ज़्यादा ही थी. इस भीड़ पर ऊंची जातियों के कुछ हिंदुत्ववादी लोगों ने भीड़ की शक्ल में हमला किया, जिससे एक शख्स की मौत हो गई और कुछ लोग घायल हो गए.

इस मामले की बड़ी बारीकी से निगरानी करने वाले राहुल दम्बाले का कहना है कि उन्होंने 1 जनवरी की रात अंबेडकर सांस्कृतिक भवन में 1340 लोगों के रुकने की व्यवस्था की थी. उनका सवाल है, 'हम इस कमीशन पर भरोसा कैसे करें जबकि अभी दंगों से प्रभावित 10 फीसदी लोगों के बयान भी रिकॉर्ड नहीं किए जा सके हैं. लोग गवाही के लिए इसलिए सामने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उनको कमीशन के ऊपर यकीन ही नहीं है. पीड़ितों का पुनर्वास, उनको मुआवज़ा देने का काम और दोषियों की गिरफ्तारी समय पर की जानी चाहिए थी. पुलिस सिर्फ मामले को दबाने का काम कर रही है. वक्त पर न्याय नहीं मिला तो फिर कोई मतलब नहीं.'

प्रकाश अंबेडकर को जांच से उम्मीद नहीं

कमीशन के जो दूसरे सदस्य है सुमित मलिक, उनका कहना है कि वे इस मामले में अभी पत्रकारों से बात नहीं कर सकते. उधर महाराष्ट्र के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) सुनील पोरवाल ने पहले तो इस मामले में सोमवार को बयान देने से मना किया, फिर मंगलवार को उन्होंने कहा कि अब मैं गुरुवार को उन्हें कॉल करूं तो वे बताएंगे. यानी वे टालने की कोशिश कर रहे हैं.

एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दरअसल प्रक्रिया संबंधी समस्याओं की वजह से देरी हो रही है. इस अधिकारी ने बताया कि अब सारे बयानों का पहले परीक्षण होगा, फिर सबूतों को रिकॉर्ड पर लिया जाएगा. प्रकाश अम्बेडकर का कहना है कि उन्हें इस जांच से कोई उम्मीद नहीं है, 'कोई अधिकारी पीड़ितों के लिए एफिडेविट तक देने को तैयार नहीं. ये एफिडेविट एक शपथपत्र जैसा है. इस पर उस अधिकारी के दस्तखत होते हैं, जो शपथ दिलाने का अधिकारी होता है. जो अधिकारी था, वो यहां से हट गया है. सरकार, दंगों की वजहों में दरअसल जाना ही नहीं चाहती क्योंकि दंगों में सरकार की मिलीभगत है.'

जांच आयोग, दंगों में सिलसिलेवार घटनाओं का क्रम तैयार करेगा और ये देखेगा कि क्या कोई शख्स या कोई खास वर्ग इसके लिए ज़िम्मेदार है. जांच का विषय ये भी होगा कि क्या प्रशासन और पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से निपटाया. लेकिन दंगों के पीड़ित और शिकार लोगों का आरोप है कि इस मामले में पुलिस ने दरअसल कुछ किया ही नहीं. लिहाज़ा एक जनवरी के दंगे अगले दिन फिर हुए. जो भी सबूत हाथ लगे हैं, उनके मुताबिक दलितों पर ये हमला जानबूझ कर सवर्णों की ओर से हुआ था, जिन्होंने उसी रोज़ बंद का आह्वान कर दिया था. फ़र्स्टपोस्ट के हाथ कुछ ऐसे कागज़ात लगे हैं, जिनमें दंगा पीड़ितों के बयान दर्ज किए गए हैं. और वे पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं.

पुलिस प्रशासन की हद दर्जे की लापरवाही और निकम्मापन

55 बरस की मंगल कांबले, जो पुणे के शिरूर तालुका स्थित कोरेगांव भीमा के बाशिंदे हैं, ने बयान दिया है कि उनकी खाने-पीने की दुकान भीड़ ने जला दी क्योंकि उन्होंने इस समारोह में दूर-दूर से आने वालों के लिए चाय-पान की व्यवस्था की थी. उन्होंने बताया, '31 दिसंबर 2017 को जब मेरा बेटा दुकान के सामने वाली जगह को सजा रहा था, एक पूर्व सरपंच और ग्राम सभा का एक सदस्य गणेश फड़तारे, दोनों रात साढ़े ग्यारह बजे आ पहुंचे. उन्होंने कहा कि हम लोगों ने कल एक ‘बंद’ का आह्वान किया है. तुमने ‘अपने लोगों‘ के लिए जो सजावट और व्यवस्था यहां की है, उसे तुरंत हटा लो और कल दुकान बंद रखना, खोलना मत. मेरे बेटे ने उनकी बात मानने से मना कर दिया और अपना काम करता रहा. फड़तारे ने उस रात हमें गालियां दीं और धमकी भी दी. अगली सुबह जब समारोह में आने वाले लोग मेरी दुकान पर चाय-नाश्ता कर रहे थे, करीब 20 लोगों की एक भीड़ वहां आ पहुंची और हम सब की पिटाई करने लगी. मुझे बहुत चोटें आईं और मेरी दुकान पर आए लोगों को वहां से भगा दिया गया. दुकान और बड़ी मेहनत से बनाया गया मंडप तोड़ दिया गया. मरहम पट्टी के लिए मुझे पास के ही एक अस्पताल ले जाया गया. अगले दिन 2 जनवरी को जब मैं उस व्यक्ति को पैसे देने गई, जिसने हमारी दुकान की सजावट की थी, करीब 2000 लोगों की एक भीड़ फिर वहां आ गई और हमारे घर को तहस-नहस कर दिया और आग लगा दी. ये सब सुबह 11 बजे दिन की रोशनी में हुआ. हमारा करीब 5 लाख रुपयों का नुकसान हुआ. पुलिस ने अब तक इन दोनों घटनाओं को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की.'

इस गांव के, 30 बरस के विलास इंगले ने अपने बयान में कहा है कि उनके खिलाफ पुलिस ने दंगा भड़काने का एक झूठा मामला दर्ज कर लिया है. उन्होंने बताया, 'सुबह 7 बजे से 11 बजे तक मैं कोरेगांव भीमा में युद्ध-स्मारक पर ही था. मेरे पास इस बात का सबूत भी है कि मैं उस वक्त वहीं मौजूद था. इसके बावजूद हमारे गांव के कुछ जातिवादी लोगों ने मेरे खिलाफ पुलिस में दंगा भड़काने की रिपोर्ट लिखवा दी. मेरे गांव का माहौल आज भी बहुत तनावपूर्ण है, जिन लोगों ने मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखाई है , उनसे मुझे जान का खतरा है.'

25 बरस की अंजना गायकवाड़ ने बयान दिया है कि उसने 1 जनवरी को करीब 25 लोगों की एक भीड़ देखी, जिसमें लोगों के हाथ में डंडे और केसरिया झंडे थे. वे नीले झंडे लगी सभी गाड़ियों में आग लगा रहे थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये गाड़ियां उन्हीं लोगों की थीं, जो इस समारोह में हिस्सा लेने आए थे.

मानो कार्रवाई ही नहीं करना चाहती है पुलिस

लेकिन सबसे खराब मामला तो सुरेश साकेत का था, जो हमेशा कोरेगांव भीमा में यहां के उग्र हिंदुत्ववादियों के खिलाफ खड़े रहे. जब साकेत ने बंद के खिलाफ आवाज़ उठाई, तो अगले दिन, 2 जनवरी को करीब 150 लोगों ने उनके घर को आग के हवाले कर दिया. उनके मुताबिक, 'इसको लेकर मैंने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई और उसमें उन लोगों के साफ-साफ नाम भी लिखवाए जिन्होंने ये सब किया था. 1 और 2 जनवरी को दलितों पर हुए हमले योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे और उसका मकसद दलितों में भय पैदा करना था.'

साकेत की बेटी पूजा भी इस दंगे की चश्मदीद गवाह थी. जब उनका घर जला दिया गया तो उनके परिवार को धमकियां आने लगीं. बेशक पुलिस ने उस इलाके में सड़कों पर फ्लैग मार्च किया लेकिन कोई कार्रवाई कभी की ही नहीं. इस तरह एक चश्मदीद की ज़िंदगी खतरे में थी. चार महीने बाद 19 बरस की पूजा अचानक एक दिन गायब हो गई और हफ्ते भर बाद उसकी लाश उसके घर के पास के एक कुंए में पड़ी मिली.

पुलिस की ऐसी बेरूखी देखकर, जिन लोगों ने भीमा कोरेगांव यात्रा का आयोजन किया था, उन्होंने अपने ही लोगों की एक जांच कमेटी बैठा दी. कमेटी बताती है कि पुलिस ने उस इलाके की, उस जगह की पड़ताल तक नहीं की थी, जहां पूजा की लाश पाई गई थी. पुलिस वालों ने इसे खुदकुशी का मामला बनाकर हाथ झाड़ लिए, बगैर ये जांच किए कि खुदकुशी से पहले क्या कोई नोट भी उसने लिख छोड़ा है? पूजा का शरीर फूला हुआ नहीं पाया गया था, जिसका मतलब है कि लाश बहुत दिनों से कुंए में नहीं पड़ी थी. लेकिन उसकी नाक से खून बह रहा था. सुरेश का दावा है कि उनकी बेटी की हत्या की गई है. टेलीफोन से बातचीत में सुरेश ने बताया कि वे अब पुणे शहर में रहते हैं. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी के चेहरे पर चोट के 16 निशान थे. खैर, इस मामले में पुलिस ने केवल दो लोगों को गिरफ्तार किया और वे दोनों भी अब ज़मानत पर बाहर हैं.

जांच आयोग को दिए अपने बयान में सुरेश ने बताया, 'मई के महीने में मैं जब गांव गया तो गांव वालों ने मुझे गांव से भगाने की बहुत कोशिश की. ये जान कर कि मेरी ज़िंदगी सचमुच खतरे में है, पुलिस ने अब जा कर मुझे सुरक्षा मुहैया करवाई है.'

इस दंगे से पहले भी सुरेश को, उसकी संपत्ति को लेकर बहुत परेशान किया गया. हालाकि इस जगह वह पिछले 15 साल से रह रहे थे. नवंबर, 2017 में उन्होंने स्थानीय पुलिस को इस बाबत शिकायत लिखकर दी थी, लेकिन पुलिस वालों ने ध्यान ही नहीं दिया. उनका कहना है, 'अगर पुलिस ने मेरी शिकायत पर गंभीरता दिखाई होती, तो मेरा घर जलाया न गया होता और मेरी बेटी आज ज़िंदा होती.'

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