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महाराष्ट्र सरकार की नजर शहरी नक्सलवाद पर, जंगलों से शहरों तक फैला माओवादी एजेंडा

गृह मंत्रालय का मानना है कि माओवादियों के द्वारा शहरी और अर्ध शहरी इलाकों में कई फ्रंट ऑर्गनाइजेशंस बनाई गई हैं

Updated On: Aug 30, 2018 11:50 AM IST

Yatish Yadav

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महाराष्ट्र सरकार की नजर शहरी नक्सलवाद पर, जंगलों से शहरों तक फैला माओवादी एजेंडा

महाराष्ट्र पुलिस ने संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हुए मंगलवार को देश के अलग अलग भागों से वामपंथी रुझान वाले एक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार किया है. देश के प्रमुख शहरों से इन लेफ्ट विंग एक्टिविस्ट्स की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर से ‘शहरी नक्सलवाद’ की चर्चा गरमा गई है.

‘शहरी नक्सलवाद’ एक ऐसी परिभाषा है जो कि सरकार के द्वारा गढ़ी गई है. इस परिभाषा के मुताबिक, अपने गढ़ में मात खाने के बाद माओवादी शहर में अपनी जड़े जमाने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार को आशंका है कि माओवादियों के इलाके में सुरक्षाबलों की कार्रवाई और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से माओवादियों के पांव उखड़ रहे हैं, ऐसे में माओवादी अपनी जमीन तलाशने के लिए शहरी क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं और इसके लिए वो शहर में रहने वाले, और अपने प्रति सहानुभूति रखने वाले एक्टविस्ट्स और कार्यकर्ताओं का सहारा ले रहे हैं.

सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ दिन पहले ही की थी शहरी नक्सलवाद पर चर्चा

पुलिस की इस बड़ी कार्रवाई के बाद बवाल मच गया है और विपक्षी राजनीतिक दल, एक्टिविस्ट और लेखकों ने इस पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है. कुछ ने तो एक कदम और बढ़ते हुए वामपंथी रुझान वाले एक्टिविस्ट के घर पर छापे और गिरफ्तारी की तुलना आपातकाल की घोषणा से कर दी है.

पुलिस ने इन एक्टिविस्ट्स की गिरफ्तारी से पहले इनके घरों में छापेमारी की थी. पुलिस ने इनके घरों पर छापे पिछले साल 31 दिसंबर को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा की साजिश को लेकर मारे थे. ये अभी पता नहीं चल सका है कि गिरफ्तार किए गए लोगों के घरों पर मारे गए छापे में पुलिस के हाथ क्या-क्या लगा है और क्या ये सुबूत उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पर्याप्त है? हालांकि पुलिस महकमे से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस मामले में जांच में तेजी इस साल जून की शुरुआत से आनी शुरू हुई जब पुलिस ने पांच एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया था. उच्चस्तरीय सूत्रों के मुताबिक, भीमा कोरेगांव हिंसा के महज कुछ ही दिनों पहले सुरक्षा एजेंसियों की बैठक में ‘शहरी नक्सलवाद’ के मुद्दे पर चर्चा की गयी थी. ‘अर्बन नक्सलिज्म ग्रोइंग मीनेस एंड रेमेडीज’ शीर्षक वाले एक इंटेलीजेंस रिपोर्ट पर भी राज्य के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के बीच विचार विमर्श किया गया था.

गृह मंत्रालय अलग सेक्शन बनाने पर विचार कर रहा है

फ़र्स्टपोस्ट ने गृह मंत्रालय के उस नोट को देखा है जिसमें लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिस्ट से मिलने वाली चुनौती से निपटने की सलाह दी गई है. मंत्रालय की इस सलाह में कहा गया है कि इनसे निपटने के लिए बनाई जाने वाली रणनीति में ‘अर्बन नक्सलिज्म’ से निपटने वाली रणनीति को शामिल किए जाने की जरूरत है. इसके लिए अलग से वित्तीय बजट का भी प्रावधान किया गया है जिससे कि शहरों में आधार बनाने की कोशिश कर रहे नक्सलियों की योजना को रोका जा सके.

गृह मंत्रालय के नोट में ये स्पष्ट रूप से ये लिखा है कि 'गृह मंत्रालय की योजना में अर्बन नक्सलिज्म से भी जुड़ा हुआ एक सेक्शन जरूर होना चाहिए और सुरक्षा से जुड़े खर्चों में अलग से इस संबंध में शहरी इलाकों में किए जा रहे इंतजामों के लिए भी व्यवस्था की जानी चाहिए.'

गृह मंत्रालय का मानना है कि माओवादियों के द्वारा शहरी और अर्ध शहरी इलाकों में कई फ्रंट ऑर्गनाइजेशंस बनाई गई हैं. इन संस्थाओं का काम है कि वो वहां पर लोगों को बड़ी संख्या में एकजुट करने कि कोशिश करे और वो भी जाहिरा तौर पर प्रजातांत्रिक अधिकारों के साथ करे. खास बात ये है कि इन सभी संस्थानों की कमान अच्छे खासे पढ़े-लिखे उन बुद्धिजीवियों के हाथ में है जिनका माओवादी विद्रोह सिद्धांत पर अटूट विश्वास है.

ये विचारक सीपीआई (माओवादी) विचारधारा की हिंसक प्रकृति को ढंकने के लिए एक मास्क के रूप में काम करते हैं. इनका काम पार्टी की झूठ और प्रोपेगेंडा फैलाने वाली मशीनरी को संभालना होता है. ये फ्रंट ऑर्गनाइजेशंस अपनी योग्यता से राज्य की व्यवस्था और कानूनी सहायता के माध्यम से माओवादी एजेंडा को फैलाते हैं और राज्य की शासन व्यवस्था को कमजोर करने का काम करते हैं. इस संगठनों के महत्वपूर्ण कार्यों में पेशेवर विद्रोहियों की नियुक्ति भी शामिल है. इसके अलावा इनका काम विद्रोह के लिए धन जुटाना, पुलिस से भाग रहे अंडरग्रांउंड कैडरों को शहरों में छिपाने का कार्य करना और गिरफ्तार किए गए जा चुके कैडरों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है.

इसके अलावा मौके का फायदा उठाकर अलग-अलग विषयों पर सरकार के खिलाफ लोगों को इकट्ठा कर उसके खिलाफ माहौल बनाने का भी काम इसी तरह की संस्थाएं करती हैं. इन फ्रंट ऑर्गनाइजेशंस का उद्देश्य माओवादी विचारधारा की हिंसक और दमनकारी चेहरे को छिपाकर उसे वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा होने का छलावा करना होता है जो कि केवल अल्पकालिक ही होती है.

ह्यूमन राइट्स संस्थाओं के जरिए काम करती हैं ये संस्थाएं

इस साल जून में एक्टिविस्ट सुधीर धवाले, महेश राउत, शोमा सेन, रोना विल्सन और मानवाधिकार अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की गिरफ्तारी हुई थी. इनकी गिरफ्तारी के बाद एक इंटेलीजेंस रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि शहरी इलाकों में सीपीआई (माओवादी) की गतिविधियां ‘मास ऑर्गनाइजेशंस’ या उन संस्थाओं के माध्यम से चलती हैं जो कि ह्यूमन राइट्स और सिविल राइट्स ऑर्गनाइजेशंस के नाम पर काम करती हैं.

इंटेलीजेंस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आतंकी संगठन की भयावह योजना होती है कि वो समाज के एक लक्षित वर्ग के दिमाग को प्रोपेगेंडा के द्वारा भ्रमित कर दे. इसके लिए विश्विद्यालयों और कालेजों में स्टूडेंट्स को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए ऐसी संस्थाओं और माओवादी विचारकों की सहायता ली जाती है. सीपीआई (माओवादी) की ‘अर्बन पर्सपेक्टिव प्लान’ में इस योजना का जिक्र खास रूप से किया गया है. इस प्लान को संगठन ने 2007 में, बिहार के जमुई जिले के जंगलों में आयोजित अपने नौवें कांग्रेस में स्वीकार कर लिया था.

इन दस्तावेजों के मुताबिक, शहरी इलाकों में काम कर रहे सीपीआई (माओवादी) से जुड़े सभी लोगों को कथित रूप से सत्ता के द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ मास मोबिलाइजेशन में लगने की अपील की गई थी. मजेदार बात ये है कि इसके बाद संगठन इस बात पर भी जोर देता है कि शहरी इलाकों में काम कर रहे लोगों का प्रारंभिक उद्देश्य लक्षित लोगों को ही एकत्रित करना है. इसके साथ ही एक ‘टेक्टिकल यूनाइटेड फ्रंट’ का भी गठन किया जाना है जिसके माध्यम से मुद्दों से जुड़े समान विचारधारा के संगठन एकत्रित हो सकें. ये फ्रंट जरूरी चीजों की सप्लाई लाइन को चालू रखने के अलावा पढ़े-लिखे युवाओं की भी नियुक्ति करें जो कि जंगलों में सरकार के खिलाफ चल रहे सशस्त्र संघर्ष को जारी रख सके.

जून में पांच एक्टिविस्टों की दिल्ली, मुंबई और नागपुर से गिरफ्तारियां हुई थीं. इंटेलीजेंस नोट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि ‘अर्बन नक्सलिज्म’ को समर्थन देने वाले संगठन देश के कई शहरों में एक्टिव हैं जिनमें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़, रांची, हैदराबाद, विशाखापत्तनम, मदुरै, पुणे, तिरुअनंतपुरम और नागपुर शामिल हैं. इस नोट में ये भी लिखा है कि ये संगठन अलग अलग फ्रंट पर भी काम कर रहे हैं. ये कृषि, स्टूडेंट, लीगल, श्रमिक, सांस्कृतिक और सिविल लिबर्टीज के क्षेत्र में भी अपने काम में जुटे हुए हैं.

इंटेलीजेंस नोट में एक और महत्वपूर्ण बात लिखी हुई है, 'सीपीआई (माओवादी) की सेंट्रल कमिटी ने फ्रंट आर्गनाइजेशंस को ये निर्देश दिया है कि वो अपनी गतिविधियों को और बढ़ाएं और लोगों को दलित और अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर जोड़ने का काम करें. सेंट्रल कमिटी सीपीआई (माओवादी) की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है. ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिसमें सीपीआई (माओवादी) के शहरी संगठनों ने विरोध कर रहे लोगों को समर्थन दिया है और उनके आंदोलन और लोगों को बरगला कर अपने माओवादी एजेंडे की तरफ मोड़ दिया है.'

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