S M L

भीमा कोरेगांव हिंसा: हिंदुत्ववादी नेताओं के खिलाफ जांच में देरी, उठ रहे हैं सवाल

भीमा-कोरेगांव दंगे के चश्मदीद और रिपब्लिकन युवा मोर्चा के अध्यक्ष राहुल दंबाले का कहना है कि हिंदुत्ववादी नेताओं से जुड़े जांच-कार्य को जानबूझकर किनारे-किनारे किया जा रहा है

Updated On: Sep 01, 2018 03:08 PM IST

Parth MN

0
भीमा कोरेगांव हिंसा: हिंदुत्ववादी नेताओं के खिलाफ जांच में देरी, उठ रहे हैं सवाल
Loading...

जून के पहले हफ्ते में जब पुणे पुलिस ने पांच कार्यकर्ताओं को माओवादियों से तथाकथित रिश्ते के आरोप में गिरफ्तार किया उस वक्त पुणे की ग्रामीण पुलिस ने सिटी पुलिस को चिट्ठी लिखकर पूछा था कि क्या गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं का भीमा कोरेगांव के हिंसा में सीधा हाथ है. और अब, अगस्त माह के आखिरी हफ्ते में जब सिटी पुलिस ने पांच और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया है तो ग्रामीण पुलिस फिर से वही सवाल पूछ रही है. ग्रामीण पुलिस के एसपी संदीप पाटिल का कहना है- ‘हमें अभी तक किसी तरह का कोई जवाब नहीं मिला है, अगर वे जवाब देते हैं तो उसके हिसाब से हम भी अपनी तरफ से तफ्तीश करेंगे.’

भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा को लेकर मामले के सरगर्म होने के साथ जांच की दो एजेंसियों की तरफ से दो तरह की कहानी सुनने को मिल रही है. सिटी पुलिस ने अभी तक 10 मशहूर कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया है. सिटी पुलिस का दावा है कि इन कार्यकर्ताओं के माओवादियों से रिश्ते हैं और इसी रिश्ते के आधार पर 31 दिसंबर के रोज हुए यलगार परिषद में माओवादियों की घुसपैठ हुई और नतीजतन 1 जनवरी के दिन हिंसा का वाकया पेश आया.

सिटी पुलिस केवल एक एफआईआर के आधार पर अपनी जांच कर रही है. यह एफआईआर पुणे शहर के मुख्य इलाके के एक थाने में तुषार दमगुडे नाम के एक व्यापारी ने दर्ज करवाई. तुषार को आरएसएस का नजदीकी बताया जाता है. हिंसा की घटना जिस जगह पर पेश आई वो ग्रामीण पुलिस के क्षेत्राधिकार में आता है और ग्रामीण पुलिस पूरे 22 एफआईआर को आधार बनाकर हिंदुत्ववादी खेमे के दो नेताओं मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिडे की भूमिका की जांच कर रही है. ग्रामीण पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज किए हैं उनमें सामाजिक कार्यकर्ता अनिता साल्वे और सुरेश सकट की लिखवाई एफआईआर भी शामिल है. सुरेश सकट हिंसा के शिकार हुए थे. उनकी बेटी, 19 वर्षीया पूजा हिंसा के वाकये की मुख्य चश्मदीद गवाह थी लेकिन रहस्ममय परिस्थितियों में उसकी मौत हो गई.

ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र सरकार की नजर शहरी नक्सलवाद पर, जंगलों से शहरों तक फैला माओवादी एजेंडा

सिटी पुलिस और ग्रामीण पुलिस की कार्रवाइयों में अंतर

सिटी पुलिस ने कुछ जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी में तेजी दिखाई है. उनपर माओवादियों से संबंध रखने का आरोप लगाया है और आतंकवाद निरोधी कानूनों के तहत उनपर शिकंजा कसा है. लेकिन मामले में हिंदुत्ववादी खेमे के नेताओं की भूमिका की जांच कर रही ग्रामीण पुलिस ने लगभग आठ माह बीत जाने के बाद भी कोई आरोप-पत्र दाखिल नहीं किया है. ग्रामीण पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज किए हैं उनमें ज्यादा एससी/एसटी अत्याचार निवारक कानून से जुड़े हैं. इस कानून के तहत 30 दिनों के भीतर आरोप-पत्र दाखिल करना जरूरी है. पाटिल का कहना है कि आरोप-पत्र अगले एक महीने के भीतर दाखिल कर दिया जाएगा. उन्होंने बताया कि 'हमने अभी तक 110 लोगों को गिरफ्तार किया है और मिलिंद एकबोटे एक मुख्य अभियुक्त है. हम नहीं कह सकते कि गिरफ्तार किए गए ये 110 लोग किन लोगों के नजदीकी हैं. हम अभी जांच कर रहे हैं कि इनका नक्सलियों से संबंध है या नहीं. इसी वजह से हमने सिटी पुलिस को चिट्ठी लिखी है लेकिन हमें अभी तक जवाब नहीं मिला है.'

ये भी पढ़ें: UAPA कानून के अस्पष्ट प्रावधान इसे दमनकारी बनाते हैं

ज्वायंट कमीशनर ऑफ पुलिस, शिवाजी बोडाखे ने कहा कि उन्हें ग्रामीण पुलिस की लिखी ऐसी किसी चिट्ठी के बारे में जानकारी नहीं है. बोडाखे ने कहा कि 'मैं यहां अगस्त में आया, मुझे देखना होगा.'

क्या हिंदुत्ववादी नेताओं के खिलाफ जांच से बच रही है पुलिस?

लेकिन मामले को लेकर जो बातें उठ रही हैं उनसे जांच-कार्य की ईमानदारी पर संदेह हो रहा है. संभाजी भिडे पर गंभीर आरोप हैं लेकिन उनसे अभी पूछताछ नहीं की गई है. पाटिल ने कहा कि हम लोगों ने इस बात की जांच की है कि वो घटनास्थल पर मौजूद था या नहीं और उसके दंगाइयों से संबंध हैं या नहीं. लेकिन पाटिल ने माना कि भिडे से 'आमने-सामने की पूछताछ नहीं हुई है.' यह पूछने पर कि ऐसा क्यों हुआ, पाटिल का जवाब था कि वो 'और ज्यादा जानकारी जुटाकर इस सवाल का जवाब देंगे.'

भीमा-कोरेगांव दंगे के चश्मदीद और रिपब्लिकन युवा मोर्चा के अध्यक्ष राहुल दंबाले का कहना है कि हिंदुत्ववादी नेताओं से जुड़े जांच-कार्य को जानबूझकर किनारे-किनारे किया जा रहा है. दंबाले ने कहा कि 'हमने पुणे कोर्ट में उसके खिलाफ एक निजी परिवाद दायर (प्रायवेट कंपलेंट) किया है कि भीमा-कोरेगांव दंगे में उसकी भूमिका की जांच हो. कोर्ट ने उसे अभी तक चार नोटिस भेजे हैं लेकिन वह एक बार भी हाजिर नहीं हुआ. आखिर उसे कानून के शिकंजे से इतनी छूट कैसे हासिल है?'

एक बात यह भी है कि महाराष्ट्र सरकार ने जो जांच आयोग बैठाया था उसका कामकाज अब भी मुंबई के बाहर से हो रहा है जबकि दंगे से प्रभावित हुए लोग या तो पुणे के हैं या फिर पुणे के आसपास के.

ये भी पढ़ें: एक्टिविस्ट्स की गिरफ्तारी: कांग्रेस का दोमुंहा व्यवहार और मीडिया का वामपंथी शोरगुल

मुर्बद के रहने वाले रवीन्द्र चंदाने 45 साल के हैं और उन्होंने जांच आयोग के सामने गवाही दी थी. रवीन्द्र चंदाने का सवाल है कि क्या जांच-कार्य को पटरी से उतारने की साजिश की जा रही है. चंदाने ने कहा कि 'मैं तो खैर 5 सितंबर के दिन अपनी बात कहने के लिए मुंबई जाऊंगा लेकिन यह हरेक के बस की बात नहीं कि वो काम से छुट्टी लेकर मुंबई पहुंचे.'

चंदान पर घातक हमला हुआ था और उन्होंने जांच आयोग के सौंपे अपने हलफनामे में एकबोटे और भिडे पर दंगाइयों को उकसावा देने का आरोप लगाया है. उन्होंने हलफनामे में बताया है कि कैसे 1500-2000 लोगों की उत्पाती भीड़ हाथ में भगवा झंडा लिए मिलिंद एकबोटे जिंदाबाद और संभाजी भिडे जिंदाबाद के नारे लगा रही थी. इस भीड़ में शामिल लोग दलित जन को गालियां दे रहे थे.

पुलिस ने उसी रात रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं की?

दाम्बले का कहना है कि ये अपने आप में बड़ी दिलचस्प बात है कि वास्तविक दंगे को लेकर सिटी पुलिस में एक भी एफआईआर दर्ज नहीं है फिर उसने इसमें नक्सलियों से रिश्ते की बात खोज निकाली जबकि जिस ग्रामीण पुलिस की देखरेख में पड़ने वाले इलाके में दंगे हुए उसे सात महीनों में ऐसे किसी रिश्ते की बात नजर नहीं आई. दांबले ने कहा कि 'यलगार परिषद को अनुमति पुलिस ने दी थी. पुलिस जानती थी कि कौन-कौन आएंगे और परिषद ने पुलिस की मौजूदगी में अपनी कार्यवाही पूरी की. आयोजन 31 दिसंबर की रात लगभग साढ़े नौ बजे खत्म हुआ. अगर आयोजन के दौरान कोई आपत्तिजनक बात हुई थी तो पुलिस ने उसी रात इसके बाबत कोई रिपोर्ट क्यों नहीं दर्ज की?'

सिटी पुलिस की जांच से कुछ बुनियादी सवाल उभरे हैं. प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश के बारे में जो बातें कही जा रही हैं उसका कोई जिक्र जून महीने में गिरफ्तार किए गए पांच कार्यकर्ताओं के रिमांड नोट में नहीं है. हाल में गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं के रिमांड नोट में भी यह जिक्र नहीं है. सरकारी वकील का दावा है कि गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं के कश्मीरी आतंकवादियों से रिश्ते हैं और यह भी कहा जा रहा है कि गिरफ्तार कार्यकर्ताओं से कुछ पेन ड्राइव और हार्ड ड्राइव्स बरामद हुए हैं. इनमें मौजूद डेटा को लेकर अभी शंका बरकरार है लेकिन बीते रोज हुए एक प्रेस सम्मेलन में पुलिस ने कहा कि उसके पास पर्याप्त सबूत हैं और इन सबूतों में एक हथियारों की खरीददारी से भी जुड़ा है जिसे कोर्ट में पेश किया जाएगा.

बोडाखे का मानना है कि कार्यकर्ताओं के सीपीआई (माओवादी) से रिश्ते हैं और सीपीआई (माओवादी) ने ही यलगार परिषद को भीमा कोरेगांव में दंगे के लिए उकसाया.

ये भी पढ़ें: यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था- ‘गुरिल्ला नक्सलियों से भी खतरनाक है शहरी नक्सलवाद’

यलगार परिषद से जुड़े तीन अग्रणी लोगों में एक हैं हाईकोर्ट के पूर्व जज बीजी कोलसे पाटिल, दूसरे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीबी सावंत और तीसरे व्यक्ति प्रकाश आंबेडकर हैं. कोलसे पाटिल ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया है कि उन्होंने यलगार परिषद का आयोजन किस तरह किया.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन तीन लोगों पर हाथ डालना मुश्किल है क्योंकि एक तो उनका सामाजिक रुतबा बड़ा है दूसरे महाराष्ट्र में उन्हें जन-समर्थन भी खूब है. यह पूछने पर कि इन तीन लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछे जा रहे बोडाखे का जवाब था कि 'बीजी कोलसे पाटिल, पीबी सावंत तथा प्रकाश जावेडकर ने यलगार परिषद का आयोजन नहीं किया, उन्हें परिषद में बोलने के लिए न्यौता दिया गया था.' दूसरे शब्दों में कहें तो सिटी पुलिस इस बात को मान ही नहीं रही कि कोलसे पाटिल ने यलगार परिषद् का आयोजन किया था जबकि कोलसे पाटिल खुद अपने मुंह से यह बात कह चुके हैं.

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi