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ग्राउंड रिपोर्ट: क्या यूपी में दलितों की भीम आर्मी कुछ बड़ा ‘प्लान’ करने में लगी है

इस बात में कोई शक नहीं है कि यूपी में भीम आर्मी जैसे बिल्कुल नए संगठन ने बड़ी जल्दी ही पॉपुलैरिटी हासिल की है

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Apr 27, 2018 03:51 PM IST

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ग्राउंड रिपोर्ट: क्या यूपी में दलितों की भीम आर्मी कुछ बड़ा ‘प्लान’ करने में लगी है

सेंट्रल यूपी के एक जिले औरैया में आप नेशनल हाइवे पर निकलेंगे तो सड़क किनारे के कुछ गांवों के बाहर लगा बोर्ड आपका ध्यान अचानक ही अपनी ओर खींच लेगा. ब्लू रंग के इस बोर्ड पर लिखी इबारत को पढ़कर आप बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे. इन बोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है- द ग्रेट...(जातिसूचक शब्द). दलितों की एक जाति विशेष के लिए बेहद अपमानजनक तरीके से इस्तेमाल होने वाले इस शब्द के आगे द ग्रेट लगा होना कौतुहल पैदा करता है. लेकिन ये कोई नई बात नहीं है. नया है ऐसे ब्लू रंग के बोर्ड का पश्चिमी यूपी से सेंट्रल यूपी तक का सफर और इसके पीछे बुनी जा रही दलित आंदोलन की कहानी. थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं...

ब्लू रंग के ऐसे बोर्ड सबसे पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के इलाके में कुछ महीने पहले मशहूर हुए थे और इसी के साथ पॉपुलर हुई थी नीले गमछे और काले चश्मे में अपने मूंछों पर ताव देते उस शख्स की तस्वीर. बोर्ड पर लिखा था द ग्रेट .... (जातिसूचक शब्द) और तस्वीर के नीचे नाम लिखा था चंद्रशेखर ‘रावण’. जिस जातिसूचक शब्द को इतना अपमानजनक मान लिया गया था कि उसे बोल या लिख देने भर से किसी के खिलाफ एससी एसटी एक्ट में मुकदमा दर्ज हो जाए उसे ‘द ग्रेट...’ कहके सम्मान के भाव से प्रचारित करने वाला बोर्ड रातोंरात मीडिया की नजरों में चढ़ गया. उतनी ही फुटेज उस युवा को भी मिली जिसने खुद के साथ रावण का नाम जोड़ने का दुस्साहस किया था. ये क्रांतिकारी था, बहुत क्रांतिकारी...

चंद्रशेखर रावण की तस्वीर

चंद्रशेखर रावण की तस्वीर

पता चला कि चंद्रशेखर रावण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी नाम से दलितों का संगठन चला रहा है. जिसका काम है- दलितों के हक में आवाज उठाना, उन्हें सामाजिक-आर्थिक और राजनैतिक रूप से मजबूत बनाने के लिए जनजागृति लाना. मई 2017 में सहारनपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच हुए झगड़े में भीम आर्मी का नाम सामने आया. इसमें एक दलित और एक ठाकुर जाति के शख्स की मौत हो गई थी. चंद्रशेखर रावण पर पुलिस ने रासुका के तहत मुकदमा दर्ज करके जेल में ठूंस दिया. तब से लेकर अब तक भीम आर्मी के सदस्यों की लगातार धर पकड़ चल रही है. 23 अप्रैल को भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

क्या दलितों के आंदोलन में बड़े बदलाव की कहानी लिखी जा रही है

अब उस बोर्ड की कहानी पर आते हैं, जिस पर द ग्रेट... लिखा है. बोर्ड लगाने वाले एक-एक करके जेल चले गए. लेकिन वो ब्लू रंग का बोर्ड अब भी वहां लगा है. वहां ही नहीं अब वैसे बोर्ड कई गांवों के बाहर लगने शुरू हो गए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर सेंट्रल यूपी तक उस ब्लू रंग के बोर्ड का विस्तार हो चुका है. सेंट्रल यूपी के औरैया में कई गांवों के बाहर ऐसे बोर्ड दिख जाते हैं. औरैया के अजीतमल विधानसभा क्षेत्र के 5-7 गांवों के बाहर ऐसे बोर्ड लगे हैं. सबके ऊपर वही लिखा है— द ग्रेट... (जातिसूचक शब्द). पश्चिमी उत्तर प्रदेश से दलितों के लिए लिखे गए इस तरह के शब्द, संदेश या नारे के सेंट्रल यूपी तक पहुंचने के कई मायने हैं. इस तरह के बोर्ड के विस्तार को दलित आंदोलन के फैलाव के बतौर देखा जा रहा है.

भीम आर्मी से जुड़े युवा

भीम आर्मी से जुड़े युवा

औरेया के स्थानीय नागरिक बताते हैं कि पिछले 4-6 महीनों में ऐसे बोर्ड लगाने का चलन बढ़ा है. पिछले 2 अप्रैल को हुए भारत बंद के दौरान यहां हिंसा भी हुई थी. जिसमें 5 दलित युवकों को जेल भेजा गया था. अजीतमल बीहड़ पट्टी वाला इलाका है जो एक ओर बुंदेलखंड से जुड़ता है तो दूसरी ओर रुहेलखंड से.

नेशनल हाइवे-2 के किनारे बसे जगदीशपुर गांव के लोगों ने ऐसे बोर्ड लगा रखे हैं तो रोड के दूसरी तरफ कोठी, नैबरपुर, टकपुरा और मित्रपुरा में भी ऐसे ही बोर्ड लगे हुए हैं. इलाके के लोग बताते हैं कि कुछ बड़े-बुजुर्गों ने बोर्ड में लिखे जातिसूचक शब्द को मिटाने के मकसद से उस पर पेंट पोत दिया. लेकिन कुछ दिनों बाद वही शब्द दोबारा लिख दिए गए.

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इस बारे में पूछे जाने पर स्थानीय पत्रकार हरेन्द्र राठौर कहते हैं, ‘यहां पिछले 6 महीने से ऐसे बोर्ड लग रहे हैं. रात में गुपचुप बैठकों का दौर चलता है और दूसरे दिन एक नया बोर्ड दिख जाता है. यहां के दलित उग्र हो रहे हैं. माहौल बिगाड़ने की कोशिश चल रही है. इसके पीछे कौन सी ताकतें लगी हैं ये जांच का विषय है.’

सहारनपुर से लेकर औरैया तक भीम आर्मी के विस्तार के पीछे क्या वजह है?

औरैया जिला दलित बहुल है. करीब साठ फीसदी आबादी दलितों की है. राजनीतिक और आर्थिक तौर पर यहां के दलित संपन्न नहीं तो अच्छी स्थिति में जरूर हैं. उनकी यही स्थिति दलित पहचान को बदल देने की नीयत से गढ़े गए नए नारे को अपना रही है. और इन सबके पीछे भीम आर्मी के नेताओं का दिमाग चल रहा है. स्थानीय पत्रकार हरेन्द्र राठौर कहते हैं, ‘यहां भीम आर्मी अपने साथ संपन्न दलितों को जोड़ रही है. भीम आर्मी ठीक उसी तरह का संगठन बनता जा रहा है, जैसे कभी कांशीराम की बनाई बामसेफ हुआ करती थी. कांशीराम ने 1979 में अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों का कर्मचारी महासंघ बामसेफ बनाया था.’

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भीम आर्मी के इस ब्लू बोर्ड की चर्चा हर जगह है. स्थानीय बीजेपी विधायक रमेश दिवाकर इस बात को स्वीकार करते हैं कि उनके इलाके में ऐसे बोर्ड लगने में तेजी आई है. लेकिन साथ में वो ये भी जोड़ते हैं कि इसके पीछे विपक्ष की साजिश है. समाजवादी पार्टी और बीएसपी की कारस्तानी बताकर वो मामले को गोलमोल घुमा जाते हैं. दलित जाति से ताल्लुक रखने वाले लोग इसके बारे में कुछ साफ-साफ नहीं बताते लेकिन उन्हें ये मानने में गुरेज नहीं कि उनकी मर्जी से ही ये बोर्ड लगाए गए हैं.

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ऐसे बोर्ड को लेकर सवाल कई उठते हैं. मसलन- एक आपत्तिजनक शब्द को उठाकर इतना बवाल क्यों हो रहा है? क्या इसे दलित आंदोलन से जोड़कर देखना जायज है? क्या इसके जरिए पिछले दिनों यूपी की दलित राजनीति में आए बदलाव को समझा जा सकता है? इन सवालों को बारी-बारी से समझने की कोशिश करते हैं.

आखिर एक शब्द को लेकर इतना बवाल क्यों है?

पहला और बड़ा सवाल ये है कि आखिर दलित अपने लिए गाली की तरह इस्तेमाल होने वाले एक शब्द को लेकर इतने मुखर क्यों हो रहे हैं? जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर और लंबे समय से दलित मुद्दों पर काम कर रहे डॉ. गंगा सहाय मीणा कहते हैं, ‘शब्दों का वैसे कोई अर्थ नहीं होता. अर्थ संदर्भों से आता है. किसी भी शब्द में जो सकारात्मक या नकारात्मक अर्थ पाते हैं, वो इतिहास के एक खास कालखंड में अलग-अलग समाज, जिस अर्थ में उसका प्रयोग करते हैं, उसी से निकल सामने आता है द ग्रेट (....). इस खास शब्द में जो अपमान का भाव दिखता है, वो भी दरअसल इतिहास में उसके भीतर भरा गया है. जैसे दलित कहने में एक दमन का भाव है. दलित मतलब जो दबा-कुचला है. लेकिन अब दलित कहना एक गर्व का सूचक बन गया है. गर्व का सूचक इसलिए बना क्योंकि ये आंदोलन से जुड़ गया. इसके साथ डिग्निटी का सवाल जुड़ गया. एक बैनर तले आकर लोगों ने डिग्निटी के सवाल पर संघर्ष किया. शायद ये लोग भी शब्दों के संदर्भ को बदलकर एक हीनता के बोध से मुक्ति पाने की कोशिश कर रहे हैं.’

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ये प्रतीकात्मक बात हो सकती है लेकिन प्रतीकों के जरिए शुरुआती बदलाव की कवायद कोई बुरी बात नहीं है, बशर्ते इसकी दिशा सही हो. 1857 की क्रांति की शुरुआत विदेशी राइफल के कारतूस से हुई थी. छोटी मालूम पड़ने वाली चीज को बड़े मकसद में इस्तेमाल होते देर नहीं लगती. डॉ. गंगा सहाय मीणा कहते हैं, ‘बाबा साहेब अंबेडकर कहते थे कि जातीय व्यवस्था एक ऐसी बहुमंजिला इमारत है, जिसमें सीढ़ियां नहीं बनाई गईं. ये भारतीय समाज का सच है. इसे बदल नहीं सकते. अगर बदल नहीं सकते तो उसी के अंदर डिग्निटी का भाव, सम्मान का भाव क्यों न भरें? शायद इसी सोच के साथ ऐसे बोर्ड के जरिए एक बदलाव की कोशिश शुरू हुई है.’

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सहारनपुर में ऐसे बोर्ड लगाने की वजह से भीम आर्मी के संस्थापक माने जाने वाले चंद्रशेखर रावण ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं. सहारनपुर के बाहर उनकी शुरुआती पॉपुलैरिटी इसी वजह से हुई थी. द ग्रेट... शब्द के साथ उनके नाम में लगा ‘रावण’ एक आक्रामक विरोध को बयां करने वाला था. हिंदुत्व की ब्राह्मणवादी अवधारणा का विरोध करने वाला. शायद इसकी सफलता ने ही इसे सहारनपुर से लेकर औरैया तक फैलने में मदद की है. और इसकी आक्रामकता की वजह से दलितों के मुखर आंदोलन की बू आ रही है.

क्या दलितों के भीतर एक गुस्सा पनप रहा है?

मशहूर लेखक और दलित मुद्दों पर लंबे समय से लिखते रहने वाले सुभाष गताड़े कहते हैं, ‘बोर्ड तो एक प्रतीक है. ये दलितों की दृढ़ता को दिखाता है. दलितों के एक बड़े वर्ग में सत्ता की राजनीति को लेकर गुस्सा है. बीएसपी जैसी पार्टियों की राजनीति में जो बदलाव आया है, वो भी एक वजह है. बीएसपी जैसी पार्टियां बहुजन से सर्वजन की राजनीति की तरफ मुड़ी हैं. सत्ता में आने के लिए इन्होंने जो समीकरण बनाए हैं, उसके प्रति दलितों में एक गुस्सा दिखता है. अंबडेकर ने दो महत्वपूर्ण बात कही थी. उन्होंने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद से संघर्ष की बात की थी. इसको लेकर पूरे दलित आंदोलन, पूरे अंबेडकर आंदोलन में एक बदलाव दिख रहा है. लोग नए तरीके से अंबेडकर को पढ़ रहे हैं. भीम आर्मी जैसे संगठन भी इस बारे में काम कर रही है. ये उसी का रिफ्लेक्शन है’

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जंतर-मंतर पर भीम आर्मी के समर्थक कुछ इस अंदाज में दिखे (तस्वीर: फेसबुक से)

इसके साथ सुभाष गाताड़े एक और बात जोड़ते हैं वो कहते हैं कि एक बात ये भी है कि शहरों और कस्बों में अगर ऊंची जाति के लोग धरना दें, प्रदर्शन करें तो ज्यादा चर्चा नहीं होती. जबकि दलित और पिछड़े समुदाय के लोग एक बोर्ड भी लगा दें तो ये चर्चा का विषय बन जाता है. ये मीडिया की नजरों में आ जाता है. हालांकि ये उतना जरूरी सवाल नहीं है जितना ये जानना कि क्या इसके जरिए दलितों की राजनीति में आए बदलाव और किसी नए आंदोलन की आहट के बतौर समझा जा सकता है.

इस बात में कोई शक नहीं है कि यूपी में भीम आर्मी जैसे बिल्कुल नए संगठन ने बड़ी जल्दी ही पॉपुलैरिटी हासिल की है. बीएसपी की चुनावी हार के बाद इस संगठन को दलित समुदाय ने हाथोंहाथ लिया है. पिछले साल मई में हुए दलित-ठाकुरों के झगड़े और उसके बाद पिछले 2 अप्रैल को हुए दलित आंदोलन के बाद इस संगठन का नाम तेजी से ऊपर उठा है. भीम आर्मी के नेताओं को चुन-चुनकर जेलों के भीतर ठूंसा गया है. लेकिन इन सबने दलितों के भीतर उनके लिए एक सहानुभूति ही पैदा की है. एक संदेश जो निकलकर सामने आ रहा है वो है कि ये लोग सिस्टम से टकराने का नतीजा भुगत रहे हैं.

भीम आर्मी के विस्तार के पीछे कौन सी ताकतें काम कर रही हैं?

डॉ. गंगा सहाय मीणा कहते हैं, ‘दलित राजनेताओं को अब सजग हो जाना चाहिए. क्योंकि ये नया उभार है. दलित समुदाय पारंपरिक नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर रहा है. वो मानता है कि बाबा साहेब अंबेडकर ने जो लड़ाई शुरू की थी, वो कहीं भटक गई है और अब हमें खुद ये जिम्मेदारी उठानी होगी. ये समाज में बदलाव का काम कर रहे हैं. इसमें नार्थ इंडिया के आदिवासी समाज भी शामिल हो रहा है. आदिवासी अब से पहले बिरसा को भगवान मानते थे. पहले उनमें अंबेडकर पर ज्यादा भरोसा नहीं था. पिछले कुछ साल से अंबेडकर के विचारों की स्वीकारोक्ति बढ़ी है.’

एक बात ये भी है कि पिछले दिनों जाति को लेकर बहसें तेज हुई है. दलितों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में लोग खुलकर सामने आ रहे हैं. आरक्षण के सवाल पर लोग फिर से बहस चाहने लगे हैं. एक तनाव का माहौल बना है. इस वजह से भविष्य में जातिगत टकराव से भी इनकार नहीं किया जा सकता. जिग्नेश मेवाणी, चंद्रशेखर रावण जैसे नए दलित युवा सामने आए हैं. उन्होंने दलितों के मुद्दों को नए तरीके से पारिभाषित करना शुरू किया है. दलित जितने जागरुक हुए हैं उतने ही उग्र भी. एक बोर्ड का विस्तार एक नए बदलाव की ओर इशारा कर रहा है.

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