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भिखारियों के पुनर्वास और 'पर्सन इन डेस्टिटूशन बिल 2016' पर बात करने की जरूरत

एक ऐसे राष्ट्रव्यापी कानून की जरूरत है, जो सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी की वजह से निराश्रितों की समस्या पर ध्यान दे

Updated On: Aug 11, 2018 11:26 AM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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भिखारियों के पुनर्वास और 'पर्सन इन डेस्टिटूशन बिल 2016' पर बात करने की जरूरत

1908 में महात्मा गांधी ने जॉन रस्किन के अनटू दिस लास्ट का गुजराती भाषा में एक संक्षिप्त अनुवाद किया. पुस्तक का नाम सर्वोदय था. सर्वोदय का अर्थ है, अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति समेत सबका उत्थान. गांधी का सर्वोदय, अंत्योदय की अवधारणा का विस्तार था, जिसकी बात पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने की थी. उनके अनुसार, अंत्योदय आखिरी व्यक्ति को ऊपर उठाने की बात करता है. महात्मा की कल्पना और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सपना, दोनों भारतीय संविधान के उस प्रावधान की वजह से असफल रहा, जो भीख मांगने को अपराध मानता है. यह प्रावधान कम से कम 20 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है. इस सप्ताह, दिल्ली उच्च न्यायालय ने भीख मांगने को अपराध मानने से इनकार कर दिया.

भिक्षाटन आदत नहीं, जीने का जरिया मात्र है

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी हरि शंकर की एक खंडपीठ ने कहा कि इस फैसले का अपरिहार्य परिणाम यह होगा कि बांबे प्रीवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट 1959 के तहत भिक्षाटन के अपराध के आरोप में किसी व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन नहीं चलाया जा सकेगा. इससे किसी भी तरह की मिसाल स्थापित नहीं की जा रही है और न ही यह सामाजिक सुरक्षा से बाहर हुए व्यक्तियों के लिए संवैधानिक प्रावधान के जरिए सहानुभूति दिखाने की कोशिश है. यह गंभीरता से इस बात की स्वीकारोक्ति है कि ऐसे लोगों के लिए भिक्षाटन कोई आदत नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक जरिया मात्र है क्योंकि राज्य उन्हें बुनियादी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में असफल रहा है. नया निर्णय जीवन निर्वाह के लिए अंतिम उपाय के रूप में भिक्षाटन को देखता है.

अदालत के आदेश में कहा गया है कि सरकार सभी नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए बाध्य है. सरकार को यह सुनिश्चित करना है कि सभी नागरिकों के पास बुनियादी सुविधाएं हों. समाज में भिखारियों की मौजूदगी इस बात का सबूत है कि राज्य अपने सभी नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में असफल रहा है. यह निर्णय सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी द्वारा दायर पीआईएल की सुनवाई के बाद आया है. इस पीआईएल में राजधानी दिल्ली में भिक्षाटन को वैध (अपराध न मानने) करने की मांग की गई थी. पीआईएल में तर्क दिया गया था कि गरीबी कभी अपराध नहीं हो सकती है.

दिल्ली में भी द बॉम्बे प्रीवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1959 लागू किया गया था. यह एक्ट एक औपनिवेशिक कृत्य था और इसलिए अपनी प्रकृति में दमनकारी था. इसमें एक भिखारी को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया है, 'जिसके पास गुजारे का कोई साधन नहीं है. वह इधर-उधर भटकता रहा है या किसी सार्वजनिक स्थान पर रहता है और किसी की दया या खैरात पर जीवन गुजारता है.'

कानून के और अधिक स्पष्ट किए जाने से पहले इसकी जद में वृद्ध और मानसिक रूप से बीमार लोगों तक के आने की संभावना बनी हुई थी. राष्ट्रीय राजधानी में 17 लाख से अधिक वरिष्ठ नागरिकों के लिए केवल दो राज्य-वित्त पोषित ओल्ड एज होम्स हैं. ये राष्ट्रीय राजधानी के दूरस्थ इलाके बिंदापुर और लामपुर में स्थित है. यह कानून मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 के खिलाफ भी जाता है, जो मानसिक बीमारी को अपराध नहीं मानता है और बेघर लोगों के लिए मुफ्त, गुणवत्तापूर्ण उपचार का आश्वासन देता है.

फोटो- रॉयटर्स.

फोटो- रॉयटर्स.

भिखारी बोझ नहीं हैं

हर्ष मंदर ने इस बारे में फ़र्स्टपोस्ट से विस्तृत बातचीत की. उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें इस केस के लिए बेंच दर बेंच जाना पड़ा. उन्होंने बताया कि कैसे भारत सरकार भिखारियों को आलसी और अयोग्य मानते हुए उन्हें अपने सीमित वित्तीय संसाधनों के लिए बोझ समझती है. मंदर बताते हैं, 'भिक्षा कानून सबसे अन्यायपूर्ण कानूनों में से एक हैं. भिक्षाटन को भी इतने व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, जिससे सड़क पर कुछ बेचना या कोई परफॉर्मेंस करना आदि इस दंडनीय कानून के तहत आ जाता है.' मंदर ने भारत सरकार को अखिल भारतीय स्तर पर एक निराश्रयता विरोधी (एंटी डेस्टिटूशन) कानून अपनाने का सुझाव दिया था. वो बताते हैं, '2015 में, भारत सरकार द्वारा एक सामाजिक सुरक्षा ढांचा बनाया जा रहा था, लेकिन ड्राफ्ट बिल को गिरा दिया गया और सरकार ने सीधे अदालत में इसकी जानकारी दी.'

उन्होंने आगे कहा कि ड्राफ्ट बेघर व्यक्तियों, भिखारी, शारीरिक और मानसिक विकलांग व्यक्तियों, पुरानी बीमारियों से ग्रसित व्यक्तियों और अन्य ऐसे व्यक्ति जो गरीबी और अभाव में हैं, को परिभाषित किया था. लगभग 3 साल पहले, भारत सरकार के सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय ने एक समिति गठित की थी, जिसने वैकल्पिक कानून के लिए विधेयक का मसौदा तैयार किया था. इसकी सिफारिशों में एक आउटरीच और मोबिलाइजेशन यूनिट की स्थापना की बात थी, जो राज्य को निराधार लोगों को पहचानने में सक्षम बनाता. इसने पुनर्वास केंद्र को परिभाषित करते हुए कहा, 'राज्य सरकार, स्वैच्छिक संगठनों, या किसी अन्य कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा स्थापित और रखरखाव किए जाने वाली कोई संस्था या गैर-हिरासती घर पुनर्वास केंद्र कहलाएंगे. इन संस्थाओं को रजिस्टर्ड किया जाएगा और राज्य सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान करने के लिए निर्धारित तरीके के हिसाब से पंजीकृत किया जाएगा. ये संस्थाएं निराश्रितों की देखभाल करेंगे, उनके व्यावसायिक प्रशिक्षण/कौशल विकास के लिए काम करेंगे और अन्य आवश्यक पुनर्वास सेवा प्रदान करेंगे.’ मसौदे में उल्लिखित कार्यान्वयन एजेंसियां निराश्रित व्यक्तियों की आवश्यकताओं का आकलन करने के लिए रेफरल इकाइयां थीं और उन्हें उचित सेवाओं के साथ लिंक करना था. साथ ही काउंसेलिंग इकाइयों को भी पुनर्वास केन्द्रों पर परामर्श सहायता प्रदान करना था.

(प्रस्तावित पर्सन इन डेस्टिटूशन (प्रोटेक्शन, केयर एंड रिहैबिलिटेशन) बिल, 2015 में विस्तृत पुनर्वास उपाय थे, लेकिन यह कभी लागू नहीं हो सका.) यह मसौदा ऐसे व्यक्तियों की पहचान करता है, जो राज्य के समर्थन के बिना गरिमापूर्ण जीवन जीने में असमर्थ हैं. मंदर बताते है कि 'भारत के कुछ बेगर्स होम्स (भिक्षुक गृह) जेलों से भी बदतर हैं. मैंने दिल्ली, चेन्नई और हैदराबाद में भिक्षु गृहों का दौरा किया है.' मंदर का विरोध भिक्षाटन या निराश्रित होने के आरोप में किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने को ले कर था.

फोटो- रॉयटर्स

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5 रुपये में पुनर्वास!

टीआईएसएस फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट कोशिश के निदेशक और उस समिति के सदस्य, जिसने पर्सन इन डेस्टिटूशन बिल बनाया था, प्रोफेसर मोहम्मद तारिक ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि महाराष्ट्र के भिक्षु गृह (नागपुर, पुणे, मुंबई जैसे शहरों में 14 हैं) एक महीने में 5 रुपये के वजीफे का भुगतान करते हैं. वे पूछते है कि कैसे इतने रुपए में ऐसे लोगों का पुनर्वास करने की उम्मीद की जा सकती है?

कोशिश, बिहार सरकार की मुख्यमंत्री भिक्षावृति निवारण योजना के साथ एक ज्ञान भागीदार (नॉलेज पार्टनर) के रूप में काम करती है, जो न सिर्फ देखभाल और संरक्षण बल्कि 'विकास, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक सशक्तिकरण' का वादा करती है. वे कहते हैं, 'बिहार सरकार ने सराहनीय काम किया है. सरकार ने अपने एंटी बिगिंग कानून को अस्वीकार दिया है. इसने 14 जिलों (गया, नालंदा, दरभंगा, भागलपुर समेत) में पुनर्वास केंद्र बनाए हैं, जहां निराश्रितों को औद्योगिक सिलाई, हाउस कीपिंग, सुरक्षा गार्ड, गेटकीपिंग आदि का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है.' प्रोफेसर मोहम्मद तारिक ने कहा कि राजस्थान ने भी अपने कानून को रद्द कर दिया है और समुदाय आधारित गैर-दंडनीय प्रणाली के लिए एक योजना का संचालन करने जा रहा है, जो जयपुर और उदयपुर से शुरू होगी.

23 सितंबर, 2013 को भारत सरकार के आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय (एमएचयूपीए) की ओर से शुरू किए गए राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (एनयूएलएम) का मकसद चरणबद्ध तरीके से शहरी बेघरों को आवश्यक सेवाओं के साथ स्थायी आश्रय प्रदान करने के लिए शेल्टर फॉर अर्बन होमलेस (एसयूएच) योजना शुरू करना था. 2017 की एक रिपोर्ट 'सिचुएशनल एनालिसिस ऑफ द नेशनल अर्बन लाइवलीहुड मिशन एंड स्टडी ऑफ कम्युनिटी एंगेजमेंट प्लेटफॉर्म' ने इस बात की पहचान की है कि एनयूएलएम के तहत कौशल प्रशिक्षण और प्लेसमेंट के माध्यम से मिल सकने वाले रोजगार में ऐसे कौशल शामिल है, जिसमें कम से कम 100 घंटे और अधिकतम 200 घंटे के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है.

फील्ड से मिले निष्कर्ष बताते हैं कि 'अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले और जिनमें शिक्षा का स्तर कम है, उनके लिए 3 से 4 घंटे की कक्षा-आधारित प्रशिक्षण मुश्किल है. उन लोगों के लिए जो शैक्षणिक प्रणाली का हिस्सा हैं, जब वे प्रशिक्षण के लिए आते हैं या प्रशिक्षण के लिए आने वाले ऐसे लोगों, जिनके लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण के कुछ घंटे शामिल होते हैं, तो क्लासरूम-आधारित पाठ्यक्रमों में आना आसान होता है. प्रशिक्षण के लिए नियमित रूप से आने वाले प्रशिक्षुओं की उपलब्धता दूसरी चुनौती है.

हिनू सिंह चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन के दिल्ली प्रमुख हैं. 1996 में, चाइल्डलाइन ने संकट में आए बच्चों के लिए देश की पहली टोल-फ्री टेली-हेल्पलाइन शुरू की. सिंह ने नए ऑपरेटिंग प्रथाओं की आवश्यकता पर बल दिया, क्योंकि इसमें पूरा परिवार शामिल होता हैं. वो कहती हैं, 'यह एक पूरे परिवार के सुधार की बात है. द गोवा, दमन एंड दीव प्रीवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट 1972 परिवार पुनर्वास की बात करता है. अन्य राज्यों को भी इस आवश्यकता के अनुरूप काम करने की जरूरत हैं.'

फोटो-रॉयटर्स.

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पुनर्वास केंद्र: सफल या विफल

2015 के अपने बजट भाषण में मनोहर पर्रिकर ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार 'भिखारी और निराश्रितों के लिए एक पूर्ण पुनर्वास केंद्र' बनाने पर विचार करेगी. पर्रिकर ने कहा था कि द गोवा, दमन एंड दीव प्रीवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट 1972 के बावजूद, भिखारियों की संख्या वास्तव में दिन प्रति दिन बढ़ रही थी. नई पहल की बात करते हुए पर्रिकर ने कहा था कि इसका उद्देश्य गरीबों के लिए पुनर्वास केंद्र स्थापित कर गोवा को पहला भिखारी मुक्त राज्य बनाना था. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की ओएसडी शिलीन मित्रा ने फ़र्स्टपोस्ट से कहा था कि पूरे परिवार का पुनर्वास एक समस्या है, क्योंकि शेल्टर होम्स में नशीली दवाओं की लत और चोरी की घटनाएं आम है. समस्या के विभिन्न पहलुओं को देखते हुए, विशिष्ट समस्या की पहचान कर एक विशेष कार्रवाई बल बनाने की आवश्यकता है. साथ ही, तत्काल सुधार उपायों का सुझाव भी दिया जा सकता है. नेशनल अर्बल लाइवलीहुड मिशन एंड स्टडी ऑफ कम्युनिटी इंगेजमेंट पर आई रिपोर्ट ने शहरी स्थानीय निकायों के अतिक्रमण विभाग के सहयोग की आवश्यकता के बारे में बताया था.

एक और समस्या यह है कि व्यावसायिक प्रशिक्षण, जिससे नौकरी मिलने की संभावना है, की लालच में ऐसे लोग भी भिक्षु गृह तक आ सकते हैं, जो बेघर नहीं है. इस साल के शुरू में, फ़र्स्टपोस्ट ने एक स्टोरी की थी. इस स्टोरी में दंडनीय भिक्षा कानून को खत्म करने की आवश्यकता बताई गई थी. दिल्ली सरकार के सूत्रों ने कहा था कि राष्ट्रीय कौशल विकास आयोग ने बेकिंग और कुकरी, मोबाइल मरम्मत और खुदरा बिक्री क्षेत्र में भिखारियों के कौशल प्रशिक्षण के लिए 1100 स्लॉट मंजूर किए हैं और प्रशिक्षण सेवा कुटिर में शुरू होने जा रहा है. सूत्र ने बताया था कि अगर यह सब केवल बेघर लोगों के लिए नहीं होगा तो समाज के एक विशेष वर्ग के लिए की जा रही उनकी कोशिशें फेल हो जाएंगी.

स्वतंत्रता के सत्तर साल बाद, बंगाल वैग्रेंसी एक्ट अभी भी कुष्ठ रोगी को हिरासत में लेने का प्रावधान देता है. कर्नाटक और असम जैसे राज्यों में बेगिंग एक्ट कुछ अपवाद भी प्रस्तुत करता है, जहां धार्मिक दायित्वों को पूरा करने के लिए भिक्षाटन की अनुमति है. फिलहाल, ऐसे क्रूर कानून को निरस्त करना एक स्वागत योग्य कदम है. साथ ही एक ऐसे राष्ट्रव्यापी कानून की आवश्यकता है, जो सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी की वजह से निराश्रितों की समस्या पर ध्यान दे.

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