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बनारस डायरी: माफिया की दहशत, गैंगवार के खून से सना एक शहर

बदमाश कंपनी का सीधा सौदा था या तो हमें रंगदारी दो नहीं तो हमारी गोली खाओ

Tabassum Kausar Updated On: May 25, 2017 09:21 AM IST

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बनारस डायरी: माफिया की दहशत, गैंगवार के खून से सना एक शहर

हर शहर की तरह बनारस की भी एक कहानी है और इसी कहानी का एक किरदार है 'माफिया'. यूपी को बिहार और पश्चिम बंगाल से जोड़ने वाले शहर में गोलियों की इतनी तड़तड़ाहट हुई कि लोगों की चीख दब गई.

वर्चस्व की लड़ाई में बहे खून से ये शहर सना हुआ है. भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो यहां हर वो सुविधा है जो व्यापार को बढ़ा सकता है. यही वजह है कि बनारस आज पूर्वांचल के बड़े बाजार के तौर पर जाना जाता है. बावजूद इसके ये शहर माफियाराज के चलते औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ता चला गया.

पूर्वांचल की आर्थिक राजधानी में आने से व्यापारी-उद्यमी कतराने लगे. लाखों की रंगदारी देने के डर से व्यापारियों का धंधा मंदा पड़ने लगा तो कई रईस उद्यमी दूसरे शहरों में शिफ्ट हो गए. माफियाराज का जख्म ऐसा नासूर बना जो आज तक इस शहर को दुखता है.

दौर 1980 का था जब पूर्वी उत्तर प्रदेश में गैंगवार और माफियाराज की शुरूआत हो रही थी. करीब 35 साल पहले बनारस शहर में दूसरे शहरों के मुकाबले आर्थिक पूंजी निवेश, ठेकेदारी, प्रॉपर्टी डीलिंग और जमीन कारोबार तेजी से उभर रहा था.

बिहार में राजनैतिक संरक्षण के चलते गैंग आम-आदमी से लेकर करोड़पति-अरबपति उद्यमियों को अपना टारगेट बना रहे थे. जान बचाने और व्यापार करने के लिए बिहार के अरबपति घरानों ने बनारस का रुख किया. उधर इसमें कई नेता और कारोबारी भी अपना हाथ जमाने की कोशिशें कर रहे थे.

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वाराणसी शहर की प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स

राजनीति में अपराधी

उस वक्त एक ओर प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का उदय और अपराधियों की राजनीति में घुसपैठ भी तेजी से शुरू हो चुकी थी. वहीं ये भू-माफियाओं, पेशेवर अपराधियों और शूटरों का बड़ा गढ़ भी बन रहा था.

अचानक शहर में अमीरों की संख्या बढ़ने लगी थी. सेठ-महाजन तो पहले से थे ही. छोटे-मोटे अपराध तो हर शहरों की तरह यहां भी थे लेकिन संगठित नहीं हुए थे. बिहार से व्यापारी आए तो फिर पीछे-पीछे माफियाराज भी आया.

पूर्वांचल के इन रईस परिवारों पर बदमाशों की नजर पड़ चुकी थी. यहीं से बनना शुरू हुआ गैंग और शुरू हुआ गैंगवार जो आज तक पूरे पूर्वांचल में एक कॉरपोरेट बिजनेस की शक्ल ले चुका है.

जौनपुर का मुन्ना बजरंगी, मऊ के मुख्तार अंसारी की नजर इन धनकुबेरों पर पड़ी लेकिन सबसे बड़ा नाम था चौबेपुर के ब्रजेश सिंह का. शुरूआत छोटी-छोटी रंगदारी से हुई थी. कभी 5 या 10 हजार धमका कर बदमाश ले लिया करते थे.

रंगदारी का संगठित रूप सबसे पहले देखने को मिला बनारस की सप्तसागर मंडी में. यहां दवाइयों के बड़े कारोबारियों की दुकानें हैं. उनके बीच दहशत पैदा की विश्वास नेपाली ने. बनारस के इस बदमाश ने रंगदारी नहीं देने पर जब पहली हत्या की तो पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी. उसके बाद जिसने भी रूपये देने से इंकार किया उसे जान से मार दिया गया.

विश्वास नेपाली का बड़ा गैंग शहर में खड़ा हो गया था. जौनपुर के माफिया मुन्ना बजरंगी ने भी अपने गैंग के साथ बनारस का रुख किया. यहां उसको कड़ी चुनौती मिली स्थानीय गैंग से.

बाहरी शख्स का रंगदारी वसूलना स्थानीय बदमाश कंपनी को नागवार गुजरा था लेकिन मुन्ना बजरंगी ने अपने गैंग के बल पर एक के बाद एक ताबड़तोड़ वारदातों से दहशत का नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया था.

बदमाश कंपनी का सीधा सौदा था या तो हमें रंगदारी दो नहीं तो हमारी गोली खाओ. अब गैंग-व्यापारी से रंगदारी के बदले उनको सुरक्षा का भरोसा देने लगे थे. एक तरह से पुलिस गैंग के बीच बस दर्शक की भूमिका में आ गई थी. यहीं से शुरू हुई थी सुपारी किलर की नई खौफनाक परंपरा.

ऐसे शार्प शूटर जो महज कुछ रुपये की खातिर किसी की जान ले लेते थे. सनी सिंह, हनी सिंह, हेमंत मौर्या इसी तरह के खतरनाक शूटर थे. गैंग अपनी दहशत बरकरार रखने के लिए एक-दूसरे को मारने पर आमादा हो गए थे.

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मणिकर्णिका घाट

वाराणसी शहर की प्रतीकात्मक तस्वीर: रॉयटर्स

शार्प शूटर और सुपारी किलर

अभय सिंह की धनंजय सिंह से दुश्मनी में खूब खूनखराबा हुआ था. इसी तरह मुख्तार और ब्रजेश गैंग की अदावत में कई बार गैंगवार हुआ. कृष्णानंद राय की हत्या इसी माफियाराज के वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम था. बनारस पर बाहुबली धनंजय सिंह की भी हुकूमत चली.

ऐसा नहीं था कि इन्हें ख़त्म करने की कोशिश नहीं की गई. 1990 के बाद कल्याण सिंह ने एसटीएफ का गठन कर कई शूटरों का एनकाउंटर करवा दिया. साल 2000 के बाद पुलिस ने भी अपना स्टाइल बदल दिया था.

पुलिस ने पूर्वांचल में बदमाशों के सफाए का अभियान चलाया. एसएसपी एसएन सावंत के समय चले अभियान में 33 बदमाशों का एनकाउंटर किया गया. इससे माफियाराज की कमर तो टूट गई लेकिन जड़ें बरकरार रहीं. इसी दौरान पूरी बादशाहत के साथ जेलों का इस्तेमाल भी तेजी से शुरू हुआ.

कई जेल अधीक्षकों की हत्याएं हुईं. हालांकि उस समय तक माफिया, गुंडाराज के चलते शहर से कई उद्यमियों का पलायन हो गया था. उसका असर छोटे दुकानदारों, कामगारों पर पड़ा. कोई बाहरी उद्यमी यहां कारोबार करने का साहस ही नहीं जुटा पाता था.

इसका असर ये हुआ कि बेरोजगारी बढ़ी और फिर लूट, छिनैती जैसे अपराध भी बढ़ने लगे. खाकी से बचने के लिए बदमाश कंपनी के आका खादी की शरण में आ गए. कई चर्चित आरोपियों ने अलग-अलग राजनैतिक पार्टियों का दामन पकड़ लिया.

पूर्वांचल में गैंगवार और माफिया राज पर लगाम लगाने की कोशिशों में राजनीतिक दखल आड़े आ जाती है. इसलिए न प्रशासन कुछ कर पाता है और न पुलिस.

बनारस में गैंगवार तो करीब-करीब खत्म हो गया लेकिन संगठित अपराध जस का तस बना हुआ है.

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