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स्टार्टअप्स: सिर्फ पैसा काफी नहीं पैशन भी हो, तभी बनेगी बात

स्टार्टअप की कामयाबी के किस्से कम हैं और नाकाम होने के ज्यादा

Sulekha Nair Updated On: Apr 02, 2017 09:00 AM IST

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स्टार्टअप्स: सिर्फ पैसा काफी नहीं पैशन भी हो, तभी बनेगी बात

बुधवार के दिन फोर्ब्स इंडिया वीमेन पावर के जलसे में कुछ स्टार्टअप्स के संस्थापकों की कामयाबी का सम्मान किया गया. लेकिन स्टार्टअप के सफल होने के किस्से हैं तो नाकाम होने के भी.

यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि स्टार्टअप की कामयाबी के किस्से कम हैं और नाकामी के ज्यादा.

ऐसे बहुत से स्टार्टअप हैं जो शुरुआती तौर पर खूब कामयाब रहे, बड़ी लोकप्रियता बटोरी और इनका नाम हमें आज भी झट से याद आ जाता है, लेकिन ऐसे स्टार्टअप भी अपने सफर के एक ना एक मुकाम पर दौड़ से बाहर हो गए.

मिसाल की आप चाहें तो थिंक स्टेजिला, टाइनी ऑऊल, पेप्पर टैप, जबांग जैसे नामों को याद कर सकते हैं.

बात फंडिंग और कोलाबोरेशन की हो या फिर व्यावसायिक हित की, स्टार्टअप के मामले में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी सफलता की कहानी लिखी है.

स्टार्टअप के रूप में कोई एक विचार किसी ना किसी अहम समस्या के समाधान में वैश्विक स्तर पर कामयाब साबित हुआ है. भारत के ऐसे कुछ स्टार्टअप यूनिकार्न कहलाने वाले इलीट क्लब में भी शामिल हुए हैं.

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स्टार्टअप बिजनेस में बढ़ रही है गिरावट 

2016 की ग्लोबल 107 फर्म की सूची में भारत के आठ यूनिकार्न शामिल हैं. एक विशेषज्ञ की मानें तो इन आठ कंपनियों में कुछ अभी अपने व्यावसायिक सफर में संघर्ष करते हुए किसी तरह टिके हुए हैं, जबकि कुछ दौड़ से बाहर हो गए हैं.

स्टार्टअप बिजनेस में जो कंपनियां मोल के हिसाब से 1 अरब डॉलर की सीमा तक पहुंच जाती हैं उन्हें यूनिकार्न का खिताब हासिल होता है. इस सफर में स्टार्टअप के संस्थापक या सह-संस्थापक को लगातार अपना मुनाफा बनाए रखना पड़ता है वर्ना इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद गिरावट भी बहुत तेज हो सकती है.

कुछ सालों तक कामयाबी की बुलंदी छूने के बाद इस इंडस्ट्री की बढ़वार मंद पड़ी और बीते दो सालों में मामला एकदम उतार पर आ गया है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में डेटा एनालिटिक्स की कंपनी ट्रैक्सन के हवाले से कहा गया है कि 2016 में 212 स्टार्टअप्स बंद हुए, यह बीते साल के मुकाबले 50 फीसद ज्यादा है.

स्टेनफोर्ड एंजेल्स की सह-संस्थापक और सीडफंड की साझीदार पॉउला मारीवाला बताती है कि किसी स्टार्टअप के लिहाज से तीन चीजें बहुत अहम होती हैं.

कामयाबी के लिए बिजनेस मॉडल, टीम और संचालन है अहम  

स्टार्टअप की कामयाबी के लिए बिजनेस मॉडल, व्यवसाय का संचालन और इस काम में लगी टीम, तीनों बहुत महत्वपूर्ण हैं.

मारीवाला बताती हैं, 'बिजनेस मॉडल ठीक ना हो, जो सेवा या सामान मुहैया कराए जा रहे हैं उन्हें उपभोक्ता ना खरीदे, जब बिक्री से होने वाली आमदनी लागत से कम हो या व्यापार का काम संभालने वाली टीम की सोच स्टार्टअप्स के संस्थापक के विजन से मेल ना खाये तो स्टार्टअप्स बंद हो जाते हैं.'

आप बिजनेस मॉडल पर जोर लगा सकते हैं, उसे गति देने की लगातार कोशिश कर सकते हैं लेकिन आपका खर्च किया पैसा अगर इस मॉडल से वसूल नहीं होता तो उसे बंद कर देना ही बेहतर है.

स्टार्टअप्स के एक विशेषज्ञ का कहना है कि 'जब आपको लगे कि ये धंधा नहीं चलेगा तो और ज्यादा नुकसान सहने की जगह धंधे से हाथ खींच लेना ही ठीक कहलाएगा.'

ऐसे फैसले लेना आसान नहीं होता. लेकिन नुकसान से बचाव जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा. ग्रेहाऊंड रिसर्च के संस्थापक और चीफ एनालिस्ट संचित वीर गोगिया जोर देकर कहते हैं, ‘आप यह कहकर स्टार्टअप की दुनिया से मुंह नहीं मोड़ सकते कि चलो, हमने एक सबक सीखा. दरअसल आप लोगों की जीविका से खेल रहे होते हैं.'

वे आगे कहते हैं, 'स्टार्टअप आंत्रेप्रेन्योर के रुप में संस्थापक और सह-संस्थापकों को यह बात समझनी होती है कि धंधे में सचमुच का पैसा लगा है और इससे कुछ लोगों की जिंदगी और जीविका जुड़ी हुई है. सारा खेल इस बात का है कि आपने जो उम्मीदें पाल रखी हैं, जैसा मैनेजमेंट और प्लानिंग किया है वह जमीनी सच्चाई से मेल में है या नहीं.'

सफल लोगों की सफलता का क्या है राज?

रीतू डालमिया

रीतू डालमिया

किसी स्टार्टअप के साथ कौन सी गड़बड़ पेश आ सकती है इसको लेकर लेख में नीचे तीन आंत्रेप्रेन्योर के विचार दर्ज किए गए हैं. इन तीन आंत्रेप्रेन्योर्स के नाम हैं रीतू डालमिया, साइरी चहल और रेवती रॉय.

रीतू डालमिया दिवा रेस्टोरेंट की शेफ और रेस्तरां की मालिक हैं. साइरी शीरोज की संस्थापक हैं. एक प्लेटफॉर्म के रुप में शीरोज महिलाओं को अपनी दिनचर्या और जरूरत के हिसाब से कैरियर चुनने में मदद करता है.

रेवती रॉय ‘हे दीदी’ नाम के एक हायपर लोकल डिलीवरी स्टार्टअप की सीईओ हैं जिसमें मालिक से लेकर कर्मचारी तक सभी महिलाएं हैं.

रीतू डालमिया कुकबुक की लेखिका और टेलीविजन शो की होस्ट रही हैं. दिव्या ब्रांड के तहत उनके कई इटैलियन रेस्तरां चलते हैं. वे शेफ भी हैं. ढेर सारे रेस्टोरेंट स्टार्टअप्स के बंद होते जाने के सवाल पर रीतू डालमिया का कहना है कि वजह की ठीक-ठीक पहचान करके ही रेस्तरां खोलना चाहिए.

बिजनेस के लिए पैशन जरूरी 

वे बताती हैं, 'सिर्फ इसलिए रेस्तरां मत खोल डालिए कि यह काम ग्लैमरस है. आपके पास रेस्तरां खोलने की सही वजह होनी चाहिए. अगर खाना बनाने-खिलाने या मेहमानबाजी को लेकर आपके मन में राग है तो रेस्तरां खोलना ठीक है.'

वे आगे कहती हैं, 'इस काम में बहुत समय खपाना पड़ता है. लोग सोचते हैं कि यह बहुत ग्लैमरस है लेकिन ऐसी बात नहीं है. अगर आप शादीशुदा हैं तो आपका तलाक हो सकता है, आपके मां-बाप आपको घर से निकाल सकते हैं या आपके बच्चे आपसे नफरत कर सकते हैं और उनके मन पर जख्म लग सकते हैं. हो सकता है आपको लगे कि बात बढ़ा-चढ़ाकर कही जा रही है लेकिन आपके साथ रेस्तरां चलाने के क्रम में कुछ इस किस्म के वाकये पेश आ सकते हैं.'

डालमिया आगाह करने के अंदाज में बताती हैं कि जो बात आपके लिए अनजानी है उसमें हाथ डालना ठीक नहीं. वजह यह है कि एक आंत्रेप्रेन्योर के रूप में आपको अपने व्यवसाय के बारे में जानकारी ना हो तो किसी और के भरोसे रहना होगा.

हॉस्पिटालिटी के धंधे में इस बात का खास ख्याल रखना पड़ता है क्योंकि इस धंधे में स्टाफ का नौकरी पर आना और नौकरी छोड़ना बहुत तेज गति से होता है. ऐसे में आप नहीं चाहेंगे कि आपका बिजनेस मॉडल किसी एक शेफ या धंधे के किसी एक हिस्से पर अधिक से अधिक निर्भर होता जाए.

एक साथ न झोंके सारी पूंजी 

डालमिया का कहना है कि आपको अपनी सारी पूंजी किसी एक सपने को पूरा करने पर नहीं खर्च करनी चाहिए क्योंकि इसमें पूंजी के डूबने का खतरा है.

वे चेतावनी के स्वर में कहती हैं, 'पूंजी के निवेश के मामले में सावधान रहिए. रेस्तरां के धंधे को एसेट (संपदा) नहीं माना जा सकता. बहुत सारी रकम इंटीरियर्स, फर्नीचर, क्राकरी, कटलरी, किराया और डिपॉजिट के नाम पर खर्च होती है. खुदा ना करे मगर धंधा कामयाब ना हुआ तो आपको इन चीजों को कूड़े के भाव बेचना होगा. आपके हाथ शायद ही कुछ आए. बात तब एकदम ही आपके हाथ से निकल जायेगी.

वे आगे कहती हैं, 'आप जो भी काम करें उसमें इस बात का ध्यान रखें कि पूंजी का निवेश कम मात्रा में रहे. अपनी सारी की सारी जमापूंजी सिर्फ इसी एक काम में मत उड़ेल दीजिए. आपको हिफाजती इंतजाम के तौर पर अपने पास कुछ बचत रखनी चाहिए क्योंकि रेस्तरां के धंधे में चालू पूंजी की बहुत ज्यादा जरूरत पड़ती है. छह महीने तक आपका रेस्टोरंट नहीं चला तो आपकी सारी की सारी जमापूंजी डूब जायेगी.'

बिजनेस से प्यार जरूरी 

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रेवती रॉय

‘हे दीदी’ की सीईओ रेवती रॉय को ड्राइविंग से प्यार है और इस प्यार को उन्होंने अपना कैरियर बना लिया फिर महिलाओं को हुनर सिखाकर इसे रोजगार के एक अवसर में तब्दील किया. 'हे दीदी' रेवती रॉय की तीसरी व्यावसायिक कोशिश है.

रेवती के मुताबिक आंत्रेप्रेन्योर के मन में अपने काम के प्रति पैशन का होना बहुत जरूरी है.

वे कहती हैं, 'काम के प्रति पैशन का होना बहुत अहम साबित होता है, काम को लेकर मन में राग ना हो तो कुछ भी करना असंभव है, आपके मन में बहुत धीरज भी होना चाहिए, यह कोई मैगी पकाने का खेल नहीं है कि बस दो मिनट में हो जाये. काम से खुशी और संतोष दो मिनट में तो क्या कभी-कभी एक साल में भी हासिल नहीं होते.'

वे आगे कहती हैं, 'ऐसी कोई समय-सीमा नहीं बताई जा सकती कि इतने समय के बाद तो कामयाबी हासिल हो ही जायेगी. आपके लगे रहना होता है. अच्छा आइडिया, अच्छे प्रोजेक्ट, ईमानदारी और निष्ठा, इन सबका फायदा होता है. मेरा अनुभव यही कहता है.'

लोग अक्सर कहते हैं कि सपना हमेशा बड़ा होना चाहिए. रेवती रॉय भी इस पर विश्वास करती हैं. रेवती ने अपने साधारण से जान पड़ते सपने को एक बड़े बिजनेस में तब्दील किया है और आज उनके बिजनेस की पहचान पूरी दुनिया में है.

सपने देखने में हर्ज नहीं 

'हे दीदी' एकमात्र ऐसा प्लेटफार्म है जो महिलाओं को टैक्सी ड्राईवर या टू व्हीलर राइडर बनने का हुनर सिखाता है और उनके लिए रोजगार के अवसर जुटाता है. रेवती इसी आधार पर कहती हैं कि सपना हमेशा बड़ा होना चाहिए.

रेवती कहती हैं, 'मैंने हमेशा कहा है कि सपना देखने में कोई दाम नहीं लगता. अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो इसका कोई रास्ता होना चाहिए. ड्राईविंग से मुझे प्यार है इसलिए मैंने ड्राईविंग और कार को कुछ कर दिखाने का जरिया बनाया.'

जिन महिलाओं को पारिवारिक कारणों से अपना कैरियर छोड़ना पड़ता है उनके लिए साइरी चहल का 'शीरोज' एक मददगार हाथ साबित हो सकता है. शीरोज एक प्लेटफॉर्म के रुप में महिलाओं को उनकी दिनचर्या और जरुरत के मुताबिक रोजगार ढूंढ़ने में मदद करता है.

साइरी चहल

साइरी चहल

चलन नहीं प्रेरणा जरूरी 

चहल कहती हैं कि ‘स्टार्टअप का अभी चलन है, मात्र यही सोचकर स्टार्टअप की शुरुआत कर देना ठीक नहीं.'

वे आगाह करने के स्वर में कहती हैं कि किसी चीज का आज चलन है तो कल वह चलन से बाहर भी हो सकती है इसलिए 'स्टार्टअप की शुरुआत के लिए अपने मन में कोई प्रेरणा होनी चाहिए.'

चहल का मानना है कि अगर आप धन कमाने की लालसा से स्टार्टअप शुरु करना चाहते हैं तो मत कीजिए क्योंकि धन कमाने के लिए नौकरी करना एक बेहतर विकल्प है.

चहल कहती हैं कि 'स्टार्टअप में एक खास वक्त तक आपको इंतजार करना होता है और इसकी अपनी चुनौतियां हैं. आप धनी हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको अभी के अभी स्टार्टअप का काम शुरु कर देना चाहिए. यह गलत फार्मूला है. अगर आपको किसी काम से प्यार है या आप कुछ कर दिखाना चाहते हैं या आपकी शख्शियत कारपोरेटी दुनिया के मिजाज से मेल नहीं खाती तभी आपको स्टार्टअप का विकल्प चुनना चाहिए.'

तो यह हुई बात अपने धंधे में कामयाब रहे आंत्रप्रेन्योर्स के अनुभवों की. इसके आधार पर अपने कारोबारी सफर में जो चीज आपसे छूट गई हो, उसे खोज निकालिए और उस चीज के दम पर अपने सफर पर डटे रहिए.

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