In association with
S M L

यूपी में रोमियो से पहले मजनुओं पर लग चुका है पहरा!

ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी राजनीतिक पार्टी ने इसे अपने मेनिफेस्टो में जगह दी

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Mar 28, 2017 09:11 AM IST

0
यूपी में रोमियो से पहले मजनुओं पर लग चुका है पहरा!

'एंटी रोमियो स्क्वाड' को बीजेपी ने यूपी चुनाव के पहले मेनिफेस्टो में शामिल किया था. चुनाव जीतने के बाद योगी सरकार ने सबसे कड़ाई से इसी निर्णय को लागू करने में दिलचस्पी दिखाई है.

मीडिया के बीच इसे खूब करवरेज भी मिल रही है. खूब आलोचना भी हो रही है लेकिन शायद ये कम लोगों को जानकारी हो कि यूपी में इससे पहले भी शोहदों को पकड़ने के मजनू पिंजड़ा के नाम से कार्रवाई होती रही है.

समय-समय पर पुलिस प्रशासन के जरिए बख्तरबंद गाड़ियों को मजनू पिंजड़ा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है.

2001 की बात है. इलाहाबाद जिले में मजनू पिंजड़ा गाड़ियों को गर्ल्स कॉलेजों के बाहर लगाया गया था. तब अक्सर किशोर उम्र के लड़कों को ये हिदायत भी परिवार वालों की तरफ से दी जाती थी कि जिन इलाकों में ये गाड़ियां हों, वहां मत जाना.

एसपी सरकार लाई थी मजनू पिंजड़ा

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भी एसपी सरकार द्वारा यूपी में मजनू पिंजड़ा की व्यवस्था की गई थी. इसके तहत कॉलेज जाने वाली लड़कियों पर फब्तियां कसने वालों को पुलिस पकड़ती थी.

उस समय मेरठ के डीएम निखिल चंद शुक्ला ने पुलिस को निर्देश दिए थे कि वे उन जगहों को खासकर गर्ल्स स्कूल और कॉलेज को चिह्नित करें जहां छेड़छाड़ की घटनाएं अक्सर होती हैं.

romeo juliet

रोमियो और जूलियट की प्रतीकात्मक तस्वीर

इन जगहों पर ड्यूटी कर रहे पुलिस वालों को ‘मजनू का पिंजड़ा’ दिया गया था. जैसे ही कोई मनचला किसी लड़की या महिला से बदतमीजी करता था तो उसे तुरंत उस पिंजड़े में बंद कर लोगों के बीच रख दिया जाता था.

इसके अलावा भी यूपी के अलग-अलग जिलों में पुलिस प्रशासन इस तरह की कार्रवाई करता रहा है. हालांकि, ऐसे लड़कों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने या चालान काटने से पुलिस अक्सर बचती रही है क्योंकि ऐसे में उन लड़कों को आगे करियर में मुश्किलें आ सकती हैं.

कब से हुई इसकी शुरुआत

यूपी पुलिस के पूर्व आईजी रहे श्रीधर पाठक बताते हैं कि इस बार अंतर इतना है कि मजनू का नाम बदलकर रोमियो कर दिया गया है. वो बताते हैं कि यूपी में ठीक इसी स्वरूप में तो नहीं लेकिन कुछ सिपाही और अधिकारी इस तरह की एहतियातन कार्रवाई तो सत्तर के दशक से शुरू कर चुके थे.

यूपी में आग़ा मोइनुद्दीन शाह नामक एक अफसर बड़े मशहूर हुए. वो सत्तर के दशक में शायद एटा जिले के एसपी थे. उनके बारे में कहा जाता है कि वो खुद बुर्का पहनकर चौराहों पर तैनात होते थे. अगर कोई लड़का कमेंट करता था तो वो खुद ही उसे पकड़कर थाने ही पहुंचा देते थे.

बाद में नब्बे के दशक में ये प्रक्रिया जिला स्तरों पर और मजबूत हुई. साल 2000 के बाद से यूपी में मजनू पिंजड़ों की कहानियां आसानी से सुनने को मिल सकती हैं.

सिर्फ पुलिस के भरोसे यह संभव नहीं

Yogi-1

यूपी के एक थाने का निरीक्षण करते योगी आदित्यनाथ

ये भी पढ़ें: योगी जी दिल द मामला है, कुछ ते रहम करो

हालांकि, श्रीधर पाठक का मानना है कि ऐसे निर्णय लेते समय सरकार इस बात का भी ख्याल रख सकती है कि इसमें सिर्फ पुलिस वाले ही न रखे जाएं. क्योंकि पुलिस के काम करने की बंधी-बंधाई प्रक्रिया होती है जिस पर वह काम करती है.

उनका कहना है आपको फब्तियां कसने वाले या परेशान करने वाले लड़कों को सिर्फ पकड़ना भर नहीं है, आगे वे ऐसा न करें इसका भी ख्याल होगा. इस काम में अध्यापकों, समाजशास्त्रियों की भी मदद ली जा सकती है.

कोशिश ये भी होनी चाहिए कि आपसी रजामंदी से बैठे लोग या विवाहित लोग इसकी गिरफ्त में न आएं. क्योंकि अगर ऐसा होगा तो ईव टीजिंग जैसी परेशानियों के रोकथाम के लिए चलने वाली ये योजना बदनाम होने लगेगी और अपने रास्ते से भटक भी सकती है.

पहली बार बीजेपी ने बनाया राजनीतिक एजेंडा 

प्रशासन की व्यवस्था बनाए रखने के लिए समय-समय पर यूपी में ऐसी कार्रवाइयां होती रही हैं लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी राजनीतिक पार्टी ने इसे अपने मेनिफेस्टो में जगह दी.

बीजेपी ने अपने मेनिफेस्टो में यह घोषणा की थी कि सरकार आने पर जो पहली कार्रवाई होगी उसमें एंटी रोमियो स्क्वाड रहेगा. दरअसल सितंबर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से ही बीजेपी ने इस मुद्दे अपने चुनावी प्रचार का मुद्दा बनाया हुआ था.

इस आग में घी तब और डली जब बीजेपी के सांसद हुकुम सिंह ने हिंदुओं के पलायन का मसला उठाया था. उसके बाद से बीजेपी ने इस मुद्दे को और मजबूती से उठाने की कोशिश की है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
गणतंंत्र दिवस पर बेटियां दिखाएंगी कमाल!

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi