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धार्मिक कट्टरपंथी थे टीपू, मुस्लिमों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने किया महिमामंडन

भारत को आजादी मिलने के दो दशक बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को लगने लगा था कि अगर मुस्लिम समुदाय का पिछड़ापन बना रहता है, तो इससे पार्टी को फायदा होगा

Tuhin A Sinha Updated On: May 10, 2018 11:42 AM IST

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धार्मिक कट्टरपंथी थे टीपू, मुस्लिमों को लुभाने के लिए कांग्रेस ने किया महिमामंडन

भारत को आजादी मिलने के दो दशक बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी को लगने लगा था कि अगर मुस्लिम समुदाय का पिछड़ापन बना रहता है, तो इससे पार्टी को फायदा होगा. लिहाजा, कांग्रेस की अगुवाई वाले देश के निजाम ने इस समुदाय के लिए शिक्षा में निवेश करने के बजाय पहचान की राजनीति के पुरातनपंथी और प्रतिगामी तरीके का सहारा लिया.

मुसलमान समुदाय के वोटरों को आकर्षित करने के लिए बाकी तिकड़मों के अलावा सरकार और पार्टी ने इसी प्लान के तहत टीपू सुल्तान की विरासत को पुनर्जीवित किया. केंद्र में मौजूद कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने टीपू सुल्तान की याद में 1974 में डाक टिकट जारी किया. तकरीबन एक दशक बाद इतिहासकार बनने की चाहत रखने वाले शख्स, भगवान एस गिडवानी ने 'द सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान '(टीपू सुल्तान की तलवार) नाम से किताब लिखी. बाद में इसी नाम से इस किताब पर टेलीविजन सीरियल भी बनाया गया, जो काफी लोकप्रिय हुआ.

टीपू की तलवार पर गैर-मुसलमानों के खिलाफ लिखी हैं आपत्तिजनक बातें

अब विडंबना यह है कि टीपू सुल्तान की जिस तलवार का आसानी से इस्तेमाल करते हुए उन्हें देशभक्त बनाया गया था, वही तलवार उस वक्त के 'काफिरों' या हिंदुओं या ईसाइयों के लिए जहर उगलती है. यह काफिरों के खिलाफ जंग छेड़ने का प्रण करती है. तलवार पर अंकित चंद शुरुआती वाक्य कुछ इस तरह हैः 'मेरी विजयी तलवार काफिरों का सफाया करने के लिए चमक रही है. हैदर, खुदा का बंदा विजय के लिए मेरे पक्ष में खड़ा है. और इसके अलावा, उसने काफिरों की नामुराद नस्ल का सफाया कर दिया.'

टीपू सुल्तान ने 1788 ईस्वी में सैयद अब्दुल दुलाई और अपने अधिकारी बुदरज जमान खान को लिखी चिट्ठियों में कुछ इस तरह की बातें कही थीः पैगंबर मोहम्मद और अल्लाह की दया से कालीकट के तकरीबन सभी हिंदूओं को इस्लाम के अनुयायियों में बदल दिया गया. सिर्फ कोचीन रियासत की सीमा के पास रहने वाले कुछ हिंदुओं का इस्लाम में धर्मांतरण नहीं कराया गया है. मैं उन लोगों का भी इस्लाम में जल्द धर्मांतरण कराने को लेकर प्रतिबद्ध हूं. मैं इस मकसद को हासिल करने से जुड़े काम को जेहाद मानता हूं.

धर्म के नाम पर टीपू के उत्पातों को भुलाया नहीं जा सकता

टीपू सुल्तान द्वारा अंग्रेजों के सामने समर्पण करने का दृश्य, टीपू अंग्रेजों को अपने दो बेटों को सौंप रहे हैं

टीपू सुल्तान द्वारा अंग्रेजों के सामने समर्पण करने का दृश्य, टीपू अंग्रेजों को अपने दो बेटों को सौंप रहे हैं

अगर इस शुरुआती सबूत पर गौर फरमाएं, तो जाहिर तौर पर टीपू सुल्तान खुद से ही जेहादी होने की बात स्वीकार करते हैं. इसके अलावा, निश्चित तौर पर उनकी निर्मम हरकतों के और कारनामे हैं. इनमें कुर्ग और मालाबार के लोगों पर टीपू सुल्तान द्वारा किए गए अत्याचार का मामला शामिल है, जिसे उनके सबसे बुरे आक्रमणों में शुमार किया जाता है. कुर्ग में उन्होंने संधि की बात कर लोगों से धोखा किया. उन्होंने वहां के लोगों को पहले यह भरोसा दिलाया कि युद्ध का खतरा खत्म हो गया है.

उसके बाद युद्ध की आशंका से बेपरवाह आबादी पर टीपू ने जोरदार हमला किया, कइयों का सिर कलम कर दिया और कुर्ग के 40,000 निवासियों को बंदी बना लिया. अगवा किए गए कुर्ग के इन लोगों को टीपू की राजधानी लाया गया. उन्हें 'इस्लाम का खिताब' दिया गया. बड़ी संख्या में लोगों का सार्वजनिक तौर पर खतना किया गया. जिन लोगों ने इसका विरोध किया, उन्हें पीड़ा और यंत्रणा के सबसे बुरे दौर से गुजरना पड़ा. यह कुछ-कुछ औरंगजेब के निजाम की गतिविधियों और सीरिया में आजकल आईएसआईएस द्वारा की जा रही हरकतों जैसा था.

लिहाजा, जब कांग्रेस पार्टी जानबूझकर सबूतों के प्रमुख स्रोत को नजरअंदाज करना या तोड़ना-मरोड़ना शुरू करती है (जिसमें उस वक्त के ब्रिटिश और इस्लामी इतिहासकारों की राय शामिल है) और टीपू को कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने में जरूरत से ज्यादा उत्साहित हो जाती है, तो इसकी शरारतपूर्ण नीयत का पर्दाफाश होता है.

बहरहाल, इस बात में कोई शक नहीं है कि टीपू एक बहादुर योद्धा थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी और परेशानी में रखा. हालांकि, इसके साथ उनका इरादा ताकत और जोर-जबरदस्ती से इस्लामी निजाम भी स्थापित करना था.

मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए भी दिया था चंदा

बहरहाल, यह बात भी सच है कि टीपू सुल्तान ने श्रृंगेरी मठ के जीर्णोद्धार के अलावा कुछ मंदिरों को भी इस मकसद के लिए चंदा दिया था. हालांकि, इस तरह की गतिविधियों का मुख्य मकसद अपनी छवि को संतुलित बनाना था, ताकि अपनी निर्मम ज्यादतियों पर पर्दा डाला जा सके.

इसके अलावा, ये तमाम पहल उनकी राजनीतिक मजबूरियों का भी नतीजा थे. टीपू सुल्तान के शासन संभालने के कुछ साल बाद उनके (टीपू) खिलाफ नाराजगी और शंका इस कदर बढ़ गई थी कि उनके भरोसेमंद सहयोगी भी उनसे नफरत करने लगे थे. ऐसे में टीपू हिंदुओं से जुड़े इस तरह के पहल के जरिए शांति खरीदना चाहते थे.

टीपू सुल्तान ने अपने पीछे ऐसी गड़बड़ विरासत छोड़ी, जिसमें द्वेष, नफरत और डर भरे हुए थे. कुर्ग और मालाबार इलाके के उन परिवारों के वंशजों में अब भी इन चीजों की झलक मिलती है, जो इस प्रताड़ना का शिकार हुए थे. जब कांग्रेस ने पिछले साल 10 नवंबर को टीपू सुल्तान की जयंती के मौके पर इसे राजकीय समारोह का दर्जा देने का फैसला किया, तो यह टीपू की विरासत से पीड़ित होने वाले लोगों से धोखे जैसा था.

इसके अलावा, टीपू की विरासत एक बेहद प्रासंगिक सवाल उठाती हैः क्या कोई धर्मांध या धार्मिक रूप से कट्टरपंथी शख्स देशभक्त हो सकता है? अगर ऐसा है, तो प्रवीण तोगड़िया या बजरंग दल देशभक्त होने की योग्यता क्यों नहीं रखते हैं? टीपू सुल्तान की विरासत को लेकर चल रही लड़ाई भारतीय उदारवादियों के बौद्धिक फर्जीवाड़े को उजागर करती है.

कर्नाटक की बहादुर महिलाओं के योगदान को भी बताने की जरूरत

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टीपू सुल्तान. (फोटो. विकीकॉमन्स)

ऐसे वक्त में जब हम टीपू सुल्तान की विरासत और अतीत को लेकर वाद-विवाद में जुटे हैं, इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि कर्नाटक ने पिछली कुछ सदियों में काफी बहादुर महिला योद्धाओं को भी पैदा किया है. इस सिलसिले में तुरंत जो नाम आता है, वह ओनेका ओबाव्वा का है, जो चित्रदुर्ग के किले के टावर के मुख्य संतरी की पत्नी थीं. टीपू सुल्तान के पिता हैदर अली की सेना को किले की घेराबंदी करते देख ओबाव्वा ने खुद से दुश्मन के कई सैनिकों को मार गिराया और इस घेराबंदी को रोक दिया.

ओबाव्वा की बहादुरी उस दौर की महिलाओं के लिए बड़ी प्रेरणा थी. बाद में आसपास के इलाकों में ऐसी महिलाओं को टीपू सुल्तान की अगुवाई में भयंकर प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा. इन महिलाओं ने ओबाव्वा के कारनामों से हिम्मत हासिल करते हुए टीपू सुल्तान के सैन्य बलों द्वारा जबरन धर्मांतरण का जमकर विरोध किया.

कर्नाटक के इतिहास में तीन और महिलाओं का योगदान भी उतना ही शानदार हैः अब्बक्का रानी, कित्तूर चेन्नमा और केलडी चेन्नमा. अब्बक्का रानी उल्लाल की पहली तुलू महारानी थीं, जिन्होंने 16वीं सदी में आक्रमणकारी पुर्तगालियों के खिलाफ जोरदार लड़ाई लड़ी. केलडी चेन्नमा ने 17वीं सदी के उत्तरार्ध में केलडी साम्राज्य पर 25 साल से भी ज्यादा तक शानदार तरह से शासन किया था. यह वह दौर था, जब उत्तर भारत में औरंगजेब की शैतानी गतिविधियां चरम पर थीं. चेन्नमा ने आक्रमणकारी औरंगजेब के खिलाफ बहादुरी से युद्ध लड़ा और इस मामले का खात्मा संधि के साथ हुआ. उन्होंने शिवाजी के बेटे राजाराम को भी शरण मुहैया कराई थी.

बाद में सन 1824 ईस्वी में इस इलाके की एक और रियासत कित्तूर की रानी कित्तूर चेन्नमा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत की अगुवाई की. हालांकि, आखिरकार उन्हें पकड़ लिया गया और उनकी हत्या कर दी गई.

कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि कर्नाटक में ऐसे बहादुर देशभक्तों की कमी नहीं है, जिन्होंने निःस्वार्थ अपने देश के लिए संघर्ष किया. निश्चित तौर पर टीपू ने भी ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, लेकिन उनकी इस लड़ाई में सांप्रदायिक नीयत की परतें थीं. उनकी धार्मिक कट्टरता जितनी ब्रिटिशों के खिलाफ थी, उतनी ही हिंदुओं के विरुद्ध भी थी.

धार्मिक कट्टरता के प्रतिनिधि टीपू सुल्तान की सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के तौर पर री-पैकेजिंग कर कांग्रेस ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए सांप्रदायिक झगड़े का बीज बोने का काम किया है. टीपू के 'भूत' को काफी हद तक भगा दिया गया है. अब वक्त कर्नाटक की बहादुर महिलाओं की विरासतों को पेश करने और उसके बारे में बताने का है.

(लेखक ब्लॉगर और युवा बीजेपी नेता हैं.)

ये कहानी खुद तुहिन सिन्हा से सुनने के लिए नीचे वीडियो देखें-

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