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बस्तर पार्ट 8: माओवादी हिंसा घटने के बावजूद बारूद की ढेर पर बैठा है बस्तर

बारूदी सुरंग में इस्तेमाल किए जाने वाले आमफहम विस्फोटक जैसे अमोनियम नाइट्रेट, जिलेटिन की छड़, डेटोनेटर आदि नक्सलियों को बड़ी मात्रा में हासिल हैं

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Jul 23, 2018 09:28 PM IST

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बस्तर पार्ट 8: माओवादी हिंसा घटने के बावजूद बारूद की ढेर पर बैठा है बस्तर

(एडिटर्स नोट: इस साल अप्रैल में, गृह मंत्रालय ने वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त जिलों में से 44 जिलों के नाम हटा लिए थे. ये इस बात का इशारा था कि देश में माओवादी प्रभाव कम हुआ है. ये एक ऐसी बहुआयामी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा और लगातार विकास के जरिए स्थानीय लोगों को माओवादी विचारधारा से दूर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, ये नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों के कब्जे का अंत नहीं है. खतरा अब भी जंगलों में छुपा हुआ है- हारा हुआ, घायल और पलटकर वार करने के लिए बेताब. माओवादियों के गढ़ में घुसकर अतिवादियों की नाक के ठीक नीचे विकास कार्यों को बढ़ाना प्रशासन के सामने असली चुनौती है. तो फिर जमीन पर असल स्थिति क्या है? फ़र्स्टपोस्ट के रिपोर्टर देवव्रत घोष छत्तीसगढ़ में माओवादियों के गढ़ बस्तर में यही देखने जा रहे हैं. बस्तर वामपंथी अतिवाद से सबसे ज्यादा बुरी तरह जकड़ा हुआ है और यहीं माओवादियों ने अपने सबसे बड़े हमलों को अंजाम दिया है. इस सीरीज में हम देखेंगे कि यहां गांवों में कैसे बदलाव आए हैं, गांव वाले इन बदलावों को लेकर कितने उत्सुक हैं और ये भी कि खत्म होने का नाम नहीं लेने वाले माओवादियों के बीच में विकास कार्यों को बढ़ाने की मुहिम में प्रशासन और सुरक्षा बल कितने खतरों का सामना करते हैं.)

छत्तीसगढ़ के बस्तर डिविजन के ज्यादातर इलाकों में माहौल वैसे तो अमन-चैन का है. रोजमर्रा की शांति लौट आई है लेकिन इसके बावजूद लोगों के बीच यह समझ बनी चली आ रही है कि खतरा अभी टला नहीं है और पूरा इलाका एक तरह से बारूद की ढेर पर बैठा हुआ है. बस्तर में ही नहीं यही बातें लोग सूबे की राजधानी रायपुर में भी कहते हैं.

माओवादियों के दबदबे वाले इलाके में तकरीबन हर माह ही लैंडमाइन के विस्फोट होते हैं. आज तक जो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई है उसे देखते हुए इसमें कोई शक नहीं है कि इलाके में विस्फोटकों की मौजूदगी कम नहीं है. सूबे की पुलिस तथा सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स, बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स तथा इंडो तिब्बतन बॉर्डर पुलिस जैसे केंद्रीय बल इलाके में तैनात हैं. सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी खतरे के अहसास को कम करने के लिए ही है ताकि लोगों में किसी किस्म की अफरा-तफरी ना मचे.

बस्तर डिविजन के सभी सात जिलों में हुई विस्फोट की घटनाओं तथा लैंडमाइन और इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) की शक्ल में बरामद हुई विस्फोटक सामग्री से इलाके के बारे में किसी भयावह युद्धक्षेत्र जैसी तस्वीर उभरती है.

हर तरफ पसरा है विस्फोट का सामान

ऐसा लगता है मानों पूरे दंडकारण्य की पट्टी में जगह-जगह जमीन के ऊपर या नीचे लैंडमाइन तथा IED बिछाए हुए हैं ताकि वामपंथी अतिवादी अपनी मर्जी से जब चाहे, जहां चाहे विस्फोट करा सकें. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद की बरामदगी के अलावे सूबे की पुलिस तथा सीआरपीएफ ने 1580 IED और लैंडमाइन पिछले पांच सालों में पकड़े हैं. इतनी सामग्री कई टन विस्फोटक के बराबर है.

हाउ स्टफ्स वर्क्स के मुताबिक, 'लैंडमाइन (बारूदी सुरंग) दरअसल विस्फोट के औजार होते हैं. इनमें ट्रिपवायर या दबाव से ट्रिगर करके धमाका किया जा सकता है. विस्फोट के ये औजार धरती की सतह पर या उसके एकदम नजदीक नीचे दबाकर रखे जाते हैं. बारूदी सुरंग का मकसद इसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति या वाहन को विस्फोट या धमाके से निकलने वाली चीजों के जरिए मार गिराना होता है.'

लैंडमाइन से अलग IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) एक बम होता है. यह रोजमर्रा की इस्तेमाल की चीजों जैसे प्रेशर कुकर या स्टील के डब्बे में विस्फोटक भरके बना होता है. साथ ही इसमें दूर से धमाका करने के लिए एक डिनोटिंग मैकेनिज्म लगी होती है. आईईडी का इस्तेमाल अतिवादी और विद्रोही करते हैं. बस्तर के माओवादी विस्फोट करने के लिए आईईडी का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. नक्सल-प्रभावित इलाके में बारूदी सुरंग (लैंडमाइन) से ज्यादा IED मिले हैं.

फ़र्स्टपोस्ट को हासिल एक रिपोर्ट से पता चलता है कि माओवादियों के पास आईईडी के रूप में बड़ी मात्रा में विस्फोटक मौजूद हैं. प्रेशर कुकर, टिफिन बॉक्स, स्टील के डिब्बे, ढोल , धातु की नली आदि के रूप में ये विस्फोटक माओवादी जमीन के नीचे, कोलतार मढ़ी सड़क के अंदर और पुल-पुलैयों पर छुपाकर रखते हैं और मौका देखकर इनमें धमाका कर देते हैं..

विस्फोटकों की बरामदगी का एक ब्योरा

-2 जुलाई 2006: एक तलाशी अभियान के दौरान पुलिस को 80 किलोग्राम बारूदी सुरंग, डिटोनेटर, वायर आदि मिले. इस नारायणपुर जिले के फरसागढ़ गांव में सड़क के किनारे छिपाया गया था.

- 31 मार्च 2010: सुकमा जिले के चिंतागुफा से 2.5 किलोमीटर दूर टाइमलवाडा में 50 किलोग्राम IED बरामद हुआ.

- 21 मई 2011: बीजापुर जिले के पोंजरनाला गांव में पुलिस ने विस्फोटकों से भरे दो डिब्बे बरामद किए. हर डिब्बे में 50 किलोग्राम विस्फोटक था.

- 31 जुलाई 2016: बस्तर जिले के कोडेनर गांव में स्टील के एक डिब्बे में 40 किलोग्राम विस्फोटक मिला.

बरामद विस्फोटकों की यह फेहरिश्त इशारा करती है कि मामला संगीन है. जितना विस्फोटक पकड़ा गया है उससे कई गुणा ज्यादा विस्फोटक मौजूद है. धमाका करने के इरादे से बिछाया गया यह विस्फोटक हर साल पकड़े जा रहे हैं.

कहां-कहां है विस्फोटक?

छुपाए गए IED को खोजने के लिए बस्तर की सभी सड़कों को चार फीट नीचे तक खोदना होगा. ऐसा करना तकरीबन नामुमकिन है क्योंकि बहुत सी पुरानी सड़कें अब कच्ची नहीं रहीं, उनपर अब कोलतार बिछ गया है. अब इसे संयोग ही कहा जाएगा कि कोई नई सड़क बन रही होती है तो खुदाई के दौरान छुपाकर रखी गए विस्फोटक पकड़े जाते हैं.

बीजापुर-भोपालपत्तनम के ब्लैकटॉप रोड पर माओवादियों द्वारा आईईडी विस्फोट के कारण हुई एक बड़ी क्रेटर, फोटो देवव्रत घोष की है.

बीजापुर-भोपालपत्तनम के ब्लैकटॉप रोड पर माओवादियों द्वारा आईईडी विस्फोट के कारण हुई एक बड़ी क्रेटर, फोटो देवव्रत घोष की है.

बस्तर के इलाके में काम कर चुके छत्तीसगढ़ सरकार के एक वरिष्ठ नौकरशाह ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'पांच-छह साल पहले माओवादियों ने IED की शक्ल में बड़ी मात्रा में विस्फोटक जमीन के नीचे छुपाए. कहीं-कहीं तो विस्फोटकों को दस साल पहले छुपाया गया है. हो सकता है यह पीपल्स वार ग्रुप के कारकुनों का काम हो. अब विस्फोटकों के ऊपर से सड़क बन चुकी है. मैं एक ऐसी खुफिया रिपोर्ट का साक्षी रहा हूं जिसमें कहा गया है कि नक्सलियों ने बस्तर में 300 से 400 जगहों पर विस्फोटक छिपा रखे हैं.'

नौकरशाह ने अपना नाम जाहिर ना करने की शर्त पर बताया, 'नक्सल नेताओं के पास पूरे इलाके और उन ठिकानों का मानचित्र है जहां IED रखे गए हैं, उन्होंने ऐसे ठिकानों की पहचान कर रखी है. माओवादियों के जत्थे अब इन ठिकानों का इस्तेमाल विस्फोट करने में करते हैं.

IED का इस्तेमाल: गुरिल्ला लड़ाई का एक सुरक्षित दांव

छापामार लड़ाई की टेक पर माओवादियों ने साल दर साल विस्फोट किए हैं. ये विस्फोट तथा बरामद बारूदी सुरंगों, IED और अन्य असलहों की तस्वीरें तथा ब्योरे लिट्टे के कारिंदों की याद दिलाते हैं जिन्होंने श्रीलंका की सत्ता को अपने निशाने पर ले रखा था या फिर माओवादियों की घातक कार्रवाइयां हमें इराक और अफगानिस्तान की याद दिलाती हैं जहां छापामार लड़ाई के दांव इफरात से इस्तेमाल किए जाते हैं.

सुरक्षाबलों, उनके वाहनों, सड़क बनाने में लगे मजदूरों तथा बस्तर डिवीजन में हालात के लिहाज से नाजुक माने जाने वाले इलाकों में बनी सड़कों को निशाना बनाने के लिए वाममार्गी चरमपंथी IED का इस्तेमाल कर रहे हैं.

IED के जरिए विस्फोट करना माओवादियों को सुरक्षित लगता है. वे घात लगाकर हमला करने या आमने-सामने की मुठभेड़ की जगह IED के जरिए विस्फोट करने को कहीं ज्यादा तरजीह देते हैं. पीपल्स वार ग्रुप बस्तर के इलाके में 1980 के दशक से सक्रिय है और इस वक्त से 2004 में सीपीआई (माओवादी) के वजूद में आने तक लिट्टे के उग्रवादियों ने विद्रोहियों को छापामार लड़ाई का प्रशिक्षण दिया. इन लोगों ने जगह-जगह बारूदी सुरंगे बिछाई और IED छुपाये. ये सारे असलहे अब माओवादियों के काम आ रहे हैं.

बारूदी सुरंग में इस्तेमाल किए जाने वाले आमफहम विस्फोटक जैसे अमोनियम नाइट्रेट, जिलेटिन की छड़, डेटोनेटर आदि नक्सलियों को बड़ी मात्रा में हासिल हैं. बीते वक्त में ऐसे कई मामले प्रकाश में आए हैं जब माओवादियों ने भारी तादाद में विस्फोटक लूटे. विस्फोटकों से लदे पूरे ट्रक को अपने कब्जे में लिया या फिर सुरंग बिछाने वाले ठेकेदारों को धमकाकर उनसे जरूरत की चीजें हासिल कर लीं.

हाल ही में एक IED विस्फोट 20 मई को दंतेवाड़ा जिले में चोलनार-किरानडुल रोड पर हुआ. इसमें निजी वाहन से जा रहे सात पुलिसकर्मी मारे गए. इससे पहले 13 मार्च को सुकमा जिले में किस्ताराम-पेलोंडी सड़क पर एक माइन प्रोटेक्टेड ह्वीकल पर हमला हुआ था. इसमें सीआरपीएफ के नौ जवान मारे गए थे. ये दोनों घटनाएं इशारा करती हैं कि माओवादी अपने निशाने पर वार करने के लिए किस सीमा तक आईईडी और विस्फोटकों का इस्तेमाल करते हैं.

सीआरपीएफ छत्तीसगढ़ के इंस्पेक्टर जेनरल संजय अरोड़ा ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'एंटी-माइन ह्वीकल को धमाके से उड़ाने के लिए कम से कम 30 किलोग्राम विस्फोटक चाहिए. माओवादियों के छुपने के ठिकानों पर छापामारी करने पर सीआरपीएफ को भारी मात्रा में विस्फोटकों से भरे IED मिले हैं.”

सड़क सुरक्षा: सुरक्षाबलों पर सबसे बड़ा खतरा

हालात के लिहाज से नाजुक माने जाने वाले इलाकों में हो रहे सड़क-निर्माण की हिफाजत करना सुरक्षाबलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. पुलिस और सुरक्षाबलों के अतिरिक्त माओवादियों के लिए सबसे बड़ा दुश्मन है उनके दबदबे वाले इलाके में सड़क का बनना. छत्तीसगढ़ ऐसी घटनाओं का साक्षी रहा है जब वाममार्गी चरमपंथियों ने सड़क की हिफाजत में लगे सीआरपीएफ के जवानों को मार दिया या फिर IED ब्लास्ट करके बन रही सड़क को ही उड़ा दिया.

नारायणपुर के जंगलों से आईईडी और डिटोनेटर्स बरामद करती पुलिस और अन्य सुरक्षाकर्म /फोटो देवव्रत घोष की है.

नारायणपुर के जंगलों से आईईडी और डिटोनेटर्स बरामद करती पुलिस और अन्य सुरक्षाकर्म /फोटो देवव्रत घोष की है.

बीते कुछ सालों में सीआरपीएफ के सबसे ज्यादा जवान सड़क-निर्माण के काम की हिफाजत की ड्यूटी निभाते हुए शहीद हुए हैं. इंजेराम-भेज्जी रोड, डोरनापल-जगरगुण्डा रोड़ और बीजापुर-बासागुडा रोड जैसी कई सड़कें हैं जिन्हें खूनी सड़क कहा जाता है. इन सड़कों के निर्माण के दौरान बड़ी संख्या में मजदूर और सुरक्षाबल के जवान मारे गए.

सुकमा जिले के डोरनापल-जगरगुंडा सड़क के निर्माण के दौरान सबसे ज्यादा संख्या में मजदूर और जवान हताहत हुए हैं. बीजापुर-बासागुडा रोड के निर्माण के दौरान इसकी हिफाजत में लगे सीआरपीएफ की 158वीं बटालियन के दो दर्जन से ज्यादा जवान शहीद हुए. इन जवानों की याद में सड़क पर एक ‘शहीद स्मृति द्वार’ बनाया गया है.

छत्तीसगढ़ पुलिस के बस्तर रेंज के इस्पेक्टर जनरल विवेकानंद ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया, 'इंजराम-भेज्जी रोड के 20 किलोमीटर के विस्तार में केंद्रीय सुरक्षाबल और सूबे की पुलिस के कई जवान शहीद हुए हैं. सुकमा से कोंडा तक बनाई जाने वाली 76 किलोमीटर लंबी सीमेंट-कंक्रीट की रोड का निर्माण-कार्य दशकों से अधूरा पड़ा हुआ था लेकिन इस सड़क के निर्माण का काम इस जुलाई महीने में पूरा कर लिया जाएगा.'

सड़क की सुरक्षा मुश्किल काम 

आईजीपी अरोड़ा ने बताया कि अतिवाद से प्रभावित इलाकों में काम करने के लिए SOP यानी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम का पालन करना होता है. यह सुरक्षाबलों के लिए एक दिशानिर्देश की तरह होता है. SOP का पालन करने के बावजूद हमारे जवान अतिवादियों के बिछाए फंदे में फंस जाते हैं. जहां तक सड़क-निर्माण का सवाल है, जितनी लंबी पट्टी पर सड़क बनाई जानी है, उसे रोड ऑपनिंग पार्टी (आरओपी) पहले साफ-सुथरा करती है. इसके बाद ही सड़क बनाने का असली काम शुरू होता है. पट्टी को साफ-सुथरा करने के क्रम में आशंका लगी रहती है कि कहीं आरओपी IED विस्फोट का शिकार ना हो जाए.

आईजीपी अरोड़ा ने कहा, 'किसी जमीनी अभियान के विपरीत सड़क-निर्माण के हिफाजत के काम में जवानों के पास विकल्प बहुत कम होते हैं. हिफाजत की जगह एकदम तय होती है. आने-जाने का मार्ग भी तयशुदा होता है और समय भी. फिर ठेकेदार तथा मजदूरों की जरूरतों से जुड़ी भी कुछ सीमाएं होती हैं जिनके भीतर रहते हुए जवानों को हिफाजत का काम करना होता है.'

जमीन के अंदर बड़ी मात्रा में विस्फोटक दबाए गए हैं और इसे खोज पाना मुश्किल साबित हो रहा है. यह बात सूबे के एक वरिष्ठ नौकरशाह ने कही और राज्य की पुलिस भी इस बात से सहमत है. अब यह संयोग की बात है कि सड़क-निर्माण के दौरान कभी विस्फोटक नजर में आ जाते हैं और उन्हें निष्क्रिय कर दिया जाता है अन्यथा नजरों से ओझल रहे विस्फोटकों से आने वाले दिनों में धमाका होने की आशंका बनी रहती है. ऐसा कई बार हो चुका है.

सड़क-निर्माण के काम की हिफाजत में लगे सीआरपीएफ के एक जवान ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि सड़क बनते वक्त IED खोजने और उसपर नजर रखने के काम में हताहत होने के वाकये ज्यादा हुए हैं. अमूमन सड़क निर्माण के काम का वक्त तयशुदा होता इस कारण जवान और मजदूरों को माओवादी आसानी से निशाने पर ले लेते हैं. आरओपी सड़क-निर्माण से पहले पूरी पट्टी की साफ-सफाई का काम करती है और ऐसे में उसपर हमला होने की आशंका ज्यादा रहती है.'

जगरगुंडा पर नक्सलियों का कहर 

दंडकारण्य में माओवादियों के दबदबे वाले सुकमा के जगरगुंडा जैसे इलाके में सड़क निर्माण का काम बहुत कठिन है. जगरगुंडा आदिवासी आबादी के लिए व्यावसायिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र हुआ करता था. यहां फलता-फूलता एक बाजार था. लेकिन गुजरते वक्त के साथ पूरा इलाका माओवादियों की पकड़ में आ गया. यहां की सड़कें माओवादियों ने तोड़-फोड़ दीं और विस्फोट करके इलाके में ढेर सारी बाधाएं खड़ी कर दीं.

हालात के लिहाज से नाजुक माने जाने वाले कुछ इलाकों में ज्यादा जोखिम की वजह से ठेकेदार सड़क निर्माण का काम हाथ में लेने से कतराते हैं. इसी वजह से सीआरपीएफ तथा छत्तीसगढ़ पुलिस हाउसिंग कॉरपोरेशन को सड़क निर्माण का काम अपने हाथ में लेना पड़ा है.

आईजीपी अरोड़ा ने बताया, 'सीआरपीएफ की 199वीं बटालियन ने बीजापुर जिले में भैरमगढ़-केशकुतल रोड के निर्माण का काम अपने हाथ में लिया है क्योंकि इस पट्टी में कोई भी ठेकेदार इस काम के लिए आगे नहीं आया. ऐसे में सीआरपीएफ को ठेका लेना पड़ा. जिला प्रशासन ने हमें सड़क बनाने के लिए फंड मुहैया कराया है. यह अपने आप में अनोखा मामला है.

छत्तीसगढ़ के एंटी-नक्सल ऑपरेशन के मुखिया डीएम अवस्थी का कहना है, 'सीपीएचसी सुकमा जिले में दो सड़कों का निर्माण कर रही है क्योंकि टेंडर जारी होने पर इस प्रक्रिया में शिरकत करने के लिए कोई ठेकेदार आगे नहीं आया. वे डरे हुए थे.'

बहरहाल, केंद्रीय सुरक्षाबलों और सूबे की पुलिस ने आक्रामक तेवर अख्तियार किए हैं और माओवादी जंगलों के भीतर भागने के लिए मजबूर हुए हैं. विस्फोट की घटनाओं में भी कमी आई है. लेकिन विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि विस्फोट की घटनाओं में कमी और अस्थायी किस्म की शांति का मतलब यह नहीं कि नक्सली हिंसा पर काबू कर लिया गया है. अतिवादी किसी भी वक्त पहले से ज्यादा ताकत के साथ हमलावर हो सकते हैं क्योंकि उनके वापस भारी मात्रा में गोला-बारूद और असलहे मौजूद हैं. हो सकता है, वे मौके की ताक में बैठे हों.

Next up: सीआरपीएफ(छत्तीसगढ़) के इंस्पेक्टर जेनरल संजय अरोड़ा का साक्षात्कार

माओवादियों के असर वाले जिलों में सड़क निर्माण का काम घने जंगलों के भीतर करना होता है. कोई नहीं जानता कि सड़क निर्माण वाले इलाके में IED कहां छुपाकर रखे गए हैं और उनमें कब विस्फोट हो जाएगा. सीआरपीएफ का काम सड़क निर्माण के काम की हिफाजत करना और नाजुक माने जाने वाले इलाकों में सड़क बनाने का काम अपने हाथ में लेना है. इस कारण जवान हमेशा खतरे की जद में होते हैं. सड़कों पर होने वाले विस्फोट, अभियान चलाने में पेश आने वाली दिक्कत, आरओपी के एसओपी पर अमल आदि के बारे में विशेष जानकारी करने के लिए मैंने सीआरपीएफ के इंस्पेक्टर जेनरल संजय अरोड़ा से मिलने का फैसला किया क्योंकि वे सुरक्षाबलों को पेश आ रहे इन अनजान खतरों के बारे में सबसे बेहतर तरीके से बता सकने की स्थिति में हैं.

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