S M L

बस्तर पार्ट 5: टॉप माओवादी नेताओं के लिए क्रांति बनी कारोबार, विचारधारा से लोगों का हुआ मोहभंग

यह युवा आदिवासी जोड़ा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के सशस्त्र कैडर में शामिल था. पति-पत्नी दोनों कुख्यात माओवादी नेता रमन्ना और हिदमा के साथ काम कर चुके हैं. लेकिन जैसे-जैसे क्रांति की सच्चाई इनके सामने आती गई, दोनों का माओवादी विचारधारा से मोहभंग हो गया

Updated On: Jul 17, 2018 07:15 AM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

0
बस्तर पार्ट 5: टॉप माओवादी नेताओं के लिए क्रांति बनी कारोबार, विचारधारा से लोगों का हुआ मोहभंग

(एडिटर्स नोट: इस साल अप्रैल में, गृह मंत्रालय ने वामपंथी अतिवाद से ग्रस्त जिलों में से 44 जिलों के नाम हटा लिए थे. ये इस बात का इशारा था कि देश में माओवादी प्रभाव कम हुआ है. ये एक ऐसी बहुआयामी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा और लगातार विकास के जरिए स्थानीय लोगों को माओवादी विचारधारा से दूर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. हालांकि, ये नक्सल प्रभावित इलाकों में माओवादियों के कब्जे का अंत नहीं है. खतरा अब भी जंगलों में छुपा हुआ है- हारा हुआ, घायल और पलटकर वार करने के लिए बेताब. माओवादियों के गढ़ में घुसकर अतिवादियों की नाक के ठीक नीचे विकास कार्यों को बढ़ाना प्रशासन के सामने असली चुनौती है. तो फिर जमीन पर असल स्थिति क्या है? फ़र्स्टपोस्ट के रिपोर्टर देवव्रत घोष छत्तीसगढ़ में माओवादियों के गढ़ बस्तर में यही देखने जा रहे हैं. बस्तर वामपंथी अतिवाद से सबसे ज्यादा बुरी तरह जकड़ा हुआ है और यहीं माओवादियों ने अपने सबसे बड़े हमलों को अंजाम दिया है. इस सीरीज में हम देखेंगे कि यहां गांवों में कैसे बदलाव आए हैं, गांव वाले इन बदलावों को लेकर कितने उत्सुक हैं और ये भी कि खत्म होने का नाम नहीं लेने वाले माओवादियों के बीच में विकास कार्यों को बढ़ाने की मुहिम में प्रशासन और सुरक्षा बल कितने खतरों का सामना करते हैं.)

नक्सल प्रभावित बस्तर में माओवादी विचारधारा से लोगों का तेजी से मोहभंग हो रहा है. रूस, वियतनाम और नेपाल जैसी क्रांति की तमन्ना में बंदूक उठाने वाले युवाओं को अब माओवादी विचारधारा के पीछे का सच नजर आने लगा है. लिहाजा खून-खराबा छोड़कर वे धीरे-धीरे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं. हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले एक युवा आदिवासी जोड़े ने माओवादी विचारधारा की आड़ में चल रहे गोरखधंधे और टॉप माओवादी नेताओं की करतूतों की पोल खोलकर रख दी.

फ़र्स्टपोस्ट के साथ विशेष इंटरव्यू में इस युवा आदिवासी जोड़े ने माओवादियों से जुड़े कई अनकहे तथ्यों का खुलासा किया. वहीं दंडकारण्य वन में गुजारे गए कठिन वक्त और अपनी जिंदगी के विभिन्न पहलुओं से भी अवगत कराया. इस युवा आदिवासी जोड़े ने माओवादियों का साथ छोड़कर साल 2016 में आत्मसमर्पण किया था. पति-पत्नी दोनों छत्तीसगढ़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) की सैन्य बटालियन के सदस्य थे. पति की उम्र इस वक्त 28 साल है. यह युवा जोड़ा नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले के एक गांव का रहने वाला है. दोनों ही अपने इलाके में माओवाद के जबरदस्त उत्थान और पतन के गवाह रहे हैं.

यह युवा आदिवासी जोड़ा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के सशस्त्र कैडर में शामिल था. पति-पत्नी दोनों कुख्यात माओवादी नेता रमन्ना और हिदमा के साथ काम कर चुके हैं. लेकिन जैसे-जैसे क्रांति की सच्चाई इनके सामने आती गई, दोनों का माओवादी विचारधारा से मोहभंग हो गया. जिसके बाद इन्होंने हिंसा और नफरत का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया. फिलहाल दोनों एक नई पहचान के साथ राज्य में एक अज्ञात स्थान पर रह रहे हैं.

पति के साथ आत्मसमर्पण करने वाली महिला को हिंदी बोलनी नहीं आती है. वह गोंडी के अलावा कोई और भाषा नहीं जानती. इसलिए इंटरव्यू सिर्फ पति का ही लिया जा सका. यह इंटरव्यू एक अज्ञात स्थान पर आयोजित किया गया था. चूंकि यह जोड़ा माओवादियों के रडार पर है, लिहाजा सुरक्षा कारणों से दोनों की पहचान गुप्त रखी गई है.

इंटरव्यू के कुछ अंश:

आपने अपनी पत्नी के साथ आत्मसमर्पण कब किया?

हमने 20 सितंबर 2016 को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण किया था. उस वक्त मैं सीपीआई (माओवादी) की सैन्य बटालियन का हिस्सा हुआ करता था.

आप माओवादी कैडर में कब और क्यों शामिल हुए?

मैं साल 2006 में माओवादी कैडर में शामिल हुआ था. उस वक्त मैं बीजापुर जिले में स्थित अपने गांव के स्कूल में कक्षा 8 में पढ़ रहा था. लेकिन मैं अपनी मर्जी से माओवादी कैडर में शामिल नहीं हुआ था. दरअसल साल 2005 में इलाके के गांववालों ने माओवाद विरोधी आंदोलन सलवा जुडूम शुरू किया था. वह बहुत मुश्किल समय था. सलवा जुडूम के सदस्यों ने कई गांवों को खाली करा लिया था.

गांव खाली कराने के बाद ग्रामीणों को शिविरों में रखा गया था. ऐसा माओवादियों को निशाना बनाने के मकसद से किया गया था. उन दिनों माओवादी कैडर का एक सदस्य पप्पा राव अक्सर हमारे गांव आया करता था. उसने हमसे कहा कि सलवा जुडूम के सदस्य गांववालों के दुश्मन हैं. वे हमारा गला काट देंगे और हमें मार डालेंगे. इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए हमें माओवादियों के साथ जुड़ जाना चाहिए. हम लोग डरे हुए थे लिहाजा पप्पा राव के बहकावे में आ गए. इसके बाद हम में से कई स्कूली छात्र और युवा माओवादियों से जुड़ गए. वे जहां भी जाते हम भी उनके साथ-साथ रहते. वह संगठन में हमारी शुरुआत थी.

कैडर में आपकी भूमिका क्या थी?

शुरुआत में हम 'दलम' (माओवादी इकाई) के हिस्से के तौर पर काम करते थे. हम एक गांव से दूसरे गांव जाकर ग्रामीणों से कैडर के लिए चावल इकट्ठा किया करते थे. उस वक्त स्कूल की वर्दी के बजाए मुझे माओवादी कैडर वाली गहरे हरे रंग (मिलिट्री ग्रीन) की वर्दी पहनने को दी गई थी. हमें सुरक्षा बलों से लड़ने, घात लगाकर हमला करने, हथियार चलाने, गुरिल्ला रणनीति इत्यादि का प्रशिक्षण दिया जाता था.

एक बार उन्होंने मुझे एक ग्रेनेड दिया और उसे एक लक्ष्य पर फेंकने के लिए कहा. मैंने वैसा ही किया. इस तरह मैंने सशस्त्र कैडर में शामिल होने की शुरुआत की. जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ, मुझे नए रंगरूटों (नए भर्तियों) को पार्टी (सीपीआई-माओवादी) की विचारधारा सिखाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई. उस दौरान मेरा नियमित शिक्षण और प्रशिक्षण भी जारी रहा. कुछ अरसे बाद मुझे 'गुरुजी' के तौर पर नामित किया गया. मुझे 'मोपोस' यानी चलते-फिरते राजनीतिक स्कूल (मोबाइल पॉलिटिकल स्कूल) का हिस्सा भी बनाया गया था.

क्या आप कभी पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ हुई किसी मुठभेड़ में शामिल हुए थे?

हां, मैंने तीन-चार मुठभेड़ों में हिस्सा लिया था. दलम के सदस्य के तौर पर यूनिट में लगभग हर किसी को सशस्त्र संघर्ष में हिस्सा लेना पड़ता है. कैडर के लिए यह अनिवार्य है.

माओवादी कैडर में आप किसके साथ काम कर चुके हैं?

धीरे-धीरे मुझे सेक्शन कमांडर के तौर पर पदोन्नत किया गया. साल 2013 मेरी तैनाती प्लाटून हेडक्वार्टर में की गई थी. जब मैंने आत्मसमर्पण किया तब मैं बटालियन नंबर 1 का सदस्य था. उस वक्त मैं बटालियन कमांडर हिदमा के साथ काम करता था. हिदमा पार्टी की केंद्रीय समिति (सेंट्रल कमेटी) का सदस्य भी है. हालांकि पुलिस और खुफिया सूत्रों का दावा है कि हिदमा सेंट्रल कमेटी का सदस्य नहीं है.

साल 2007 से पहले मुझे वरिष्ठ माओवादी नेता रमन्ना का बॉडीगार्ड और गनमैन बनाया गया था. मैंने बतौर बॉडीगार्ड तीन साल रमन्ना के साथ बिताए. वह तब दंडकारण्य में सीपीआई (माओवादी) का सचिव हुआ करता था. रमन्ना पीपुल्स वार ग्रुप के संस्थापकों में से एक है. इस साल 9 फरवरी को वह महाराष्ट्र पुलिस के हाथों गिरफ्तार किया जा चुका है.

कैडर में आपकी पत्नी की भूमिका क्या थी?

साल 2008 में मेरी पत्नी भी मेरी तरह बहुत कम उम्र में दलम में शामिल हो गई थी. शुरुआत में वह पार्टी के कल्चरल विंग का हिस्सा हुआ करती थी. मेरी पत्नी और उसके साथी पार्टी की विचारधारा फैलाने के लिए गांवों में जाकर सांस्कृतिक कार्यक्रम किया करते थे. बाद में वह बटालियन का सदस्य बन गईं. माओवादियों की वजह से बस्तर में हमारी मूल बैगा संस्कृति दबकर रह गई है. त्यौहारों पर अक्सर हमें हमारे सांस्कृतिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक तरीकों के मुताबिक जश्न मनाने की इजाजत नहीं दी जाती है.

शादी से पहले अपनी पत्नी से आपकी मुलाकात कहां हुई थी और क्या शादी के लिए आपको पार्टी से इजाजत लेना पड़ी?

मैं अपनी पत्नी से बटालियन में मिला था. वह भी मेरी तरह बीजापुर जिले की ही रहने वाली है. लेकिन उसका गांव अलग है और मेरा गांव अलग.

हां, हमने पार्टी कमेटी से शादी करने की इजाजत मांगी थी. क्योंकि हमें पार्टी के नियमों का पालन हर हाल में करना था. पार्टी के नेताओं ने कमेटी में हमारी शादी के मुद्दे पर चर्चा की. इसके बाद अलग से हम दोनों के साथ भी चर्चा की गई. और फिर हमें शादी करने की इजाजत दे दी गई.

माओवादी अपने कैडर में शामिल होने के लिए स्थानीय युवाओं को कैसे राजी करते हैं?

माओवादी नेता सघन और अंदरूनी इलाकों के गांवों का दौरा करते हैं. जहां वे ग्राम पंचायत स्तर पर अपनी एक कमेटी बनाते हैं. इसके बाद स्थानीय युवाओं से कहा जाता है कि सीपीआई (माओवादी) के बिना उनका कोई अस्तित्व नहीं है. अगर लोगों को गांव में रहना है, तो हर महिला और पुरुष को पार्टी की बात सुनना होगी.

वे हमें तरह-तरह के सब्जबाग दिखाकर मनाने और संतुष्ट करने में लगे रहते हैं. वे कहते हैं कि, नक्सली भारत में 'नव जनवादी क्रांति' (नियो-पीपुल्स रेवोल्यूशन) लाएंगे. आदर्श से भरा समाजवादी समाज (यूटोपियन सोशलिस्ट सोसाइटी) बनाया जाएगा. वे 'जल-जंगल-ज़मीन' और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने का दावा करते हैं. वे बताते हैं कि, बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों को लूटा जा रहा है. सरकार और निजी खनिक कंपनियां दोनों ही आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं. वे प्रशासन और ग्रामीणों के बीच विश्वास और भरोसे के रिश्ते को खत्म कर रहे हैं. इसके अलावा वे पुलिस और सुरक्षा बलों के खिलाफ नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं.

आप दोनों ने संगठन छोड़कर आत्मसमर्पण क्यों किया?

पिछले कुछ सालों में हमने महसूस किया कि सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष बेमानी है. 'क्रांति के जरिए बदलाव' लाने के जुनून में हम बेवजह जंगल के अंदर युद्ध लड़ते रहे. सरकार के खिलाफ हमारा युद्ध एक मारीचिका का अंतहीन पीछा करने जैसा है. हम भ्रम और संशय के साथ जूझ रहे थे.

धीरे-धीरे मुझे लगा कि जिस बदलाव का वादा किया गया था वह कभी नहीं होने वाला है. हम अभी भी वहीं खड़े थे जहां से हमने शुरू किया था. हम सिर्फ एक जिले से दूसरे जिले के चक्कर लगाने की कवायद भर कर रहे थे. हमारी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया था. जिस दिन से मैं पार्टी में शामिल हुआ था, तब से मैं बार-बार वही किताबें और पार्टी साहित्य पढ़ता आ रहा था.

पार्टी ने रूस, चीन, वियतनाम, नेपाल इत्यादि के उदाहरणों का हवाला दिया, लेकिन बस्तर में जमीनी हकीकत अलग है. वे हमें गुमराह कर रहे थे. पुलिस का मुखबिर बताकर माओवादियों ने अनगिनत लोगों की हत्या की. उनमें से कई लोग निर्दोष थे.

जिस क्रांति की वे बात करते थे वह कहां है?

जंगलों में हमारी जिंदगी बेहद मुश्किल हो गई थी. हमें गर्मी, ठंड, बारिश, मलेरिया और क्या-क्या सहन नहीं करना पड़ा. पुलिस और सीआरपीएफ का खतरा भी हर वक्त सिर पर मंडराता रहता था.

दरअसल कैडर में शामिल होने वाले हमारे जैसे आदिवासी युवा दंडकारण्य के जंगलों के बाहर होने वाले बड़े बदलावों से पूरी तरह से अनजान हैं. यही वजह है कि हम आसानी से माओवादियों के झांसे में आ जाते हैं. टॉप माओवादी नेताओं के बच्चे तो अच्छी जिंदगी के मजे ले रहे हैं. वे अन्य राज्यों या विदेशों में अच्छी शिक्षा पा रहे हैं. जबकि हम स्थानीय लोग दुरूह जंगलों में मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं. मुझे अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने तक की इजाजत नहीं दी गई थी. धीरे-धीरे मुझे और मेरी पत्नी को महसूस हुआ कि किसी मुठभेड़ में मारे जाने के अलावा हमारा कोई और भविष्य नहीं है. हम गंभीर रूप से निराश थे. लिहाजा हमने संगठन छोड़ने का फैसला किया. इसके बाद हम दोनों खेती करने के लिए हमारे गांव वापस लौट आए.

प्यादे के तौर पर माओवादी कैडर में शामिल होने वाले स्थानीय आदिवासी युवाओं को क्या कभी संगठन में नेतृत्व का मौका मिलता है?

संगठन के लगभग सभी टॉप नेता बस्तर के रहने वाले नहीं हैं. ज्यादातर शीर्ष माओवादी नेता तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के हैं. स्थानीय युवा तो महज प्यादे भर हैं. उन्हें पदोन्नत करके ज्यादा से ज्यादा लोकल कमेटी या यूनिट का सदस्य बना दिया जाता है. इसका जीता-जागता उदाहरण मैं खुद हूं. इस मामले में सिर्फ हिदमा ही एक अपवाद है. वह बटालियन का नेतृत्व कर रहा है. वरना संगठन में हम आदिवासी युवाओं की औकात हुक्म के गुलामों की तरह है, जो टॉप नेताओं के इशारों पर हर वक्त अपनी जिंदगी दांव पर लगाए रहते हैं. लेकिन बदले में उन्हें क्रांति के सब्जबाग के सिवाए और कुछ नहीं मिलता है.

जब आपने कैडर छोड़ने का फैसला सुनाया तब क्या पार्टी ने आपको धमकाया था?

उन्होंने हमें यह समझाने की कोशिश की कि, अगर हमने पार्टी छोड़ी तो पुलिस हमें परेशान करेगी. जिससे बड़ी समस्या पैदा हो सकती है. उन्होंने हमें अपनी छत्रछाया में गांव की एक कमेटी में रहने का विकल्प दिया, जैसे जनतन सरकार (पीपुल्स काउंसिल ऑफ द माओइस्ट)- जो कि एक राज्य के भीतर एक राज्य है. संगठन के नेताओं के तमाम समझाने-बुझाने के बावजूद भी जब मेरा इरादा नहीं बदला, तब मुझे डराया-धमकाया गया. एक रात अपने हथियार छोड़कर मैं और मेरी पत्नी वहां से निकल भागे.

विकास के चलते बस्तर में आ रहे बदलाव पर सीपीआई (माओवादी) का क्या कहना है?

माओवादियों का कहना है कि बस्तर में बदलाव उन्हीं की वजह से देखने को मिल रहा है. माओवादियों की दलील है कि, जब वे बस्तर में मौजूद नहीं थे, तब विकास नहीं हुआ था. ऐसा क्यों था? उनके मुताबिक, ग्रामीणों का दिल जीतने के लिए सरकार इलाके में विकास कर रही है, ताकि आदिवासियों से उनकी जमीन छीनकर खनिजों पर कब्जा किया जा सके. यह सरकार की साजिश है. सरकार विकास के बहाने कॉर्पोरेट को बस्तर के खनिज भंडार को लूटने की सुविधा प्रदान कर रही है. इसलिए ग्रामीणों को अपने संसाधनों को लुटने से रोकने के लिए माओवादियों का साथ देना चाहिए.

क्या पांच साल पहले की तुलना में माओवादी गतिविधियों में कोई गिरावट आई है?

अतीत की तुलना में माओवादी घटनाओं में निश्चित रूप से गिरावट आई है. उनके प्रभुत्व का क्षेत्र घट गया है. पहले माओवादी जिला मुख्यालयों और कस्बों पर हमले किया करते थे. लेकिन अब सिर्फ अस्थिर और अशांत इलाकों और जंगलों से होकर गुजरने वाले हाईवे और सड़कों पर ही हमले और विस्फोट होते हैं.

क्या आपको लगता है कि नक्सली विचारधारा नाकाम साबित हो रही है?

मुझे लगता है कि, लोग धीरे-धीरे क्रांति की माओवादी विचारधारा में निहित झूठ को महसूस करने लगे हैं. बदलाव के लिए क्रांति की सनक में केवल निर्दोष लोगों का विनाश और हत्या हो रही है. हमारी आदिवासी आबादी को नक्सली आंदोलन से कुछ भी हासिल नहीं हो रहा है. हम सिर्फ टॉप माओवादी नेताओं के परोक्ष और व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं. वे बस्तर के पैसों से अपने घर भर रहे हैं.

क्रांति अब सीपीआई (माओवादी) के लिए एक तरह का कारोबार बन चुकी है. रूस या नेपाल जैसी क्रांति भारत में संभव कैसे हो सकती है?

रूस, वियतनाम या नेपाल में जमीन हालात बस्तर से बिल्कुल अलग थे. इसके अलावा स्थानीय लोग विकास से लाभान्वित हो रहे हैं. इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि, पुलिस ने आदिवासियों के साथ गलत बर्ताव और अन्याय किया. जिसका फायदा माओवादियों ने उठाया और वे इलाके में फैलते चले गए.

अक्सर यह आरोप लगता है कि पुलिस 'फर्जी आत्मसमर्पण' कराती है और आदिवासी युवाओं को 'माओवादियों' के रूप में आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर करती है. आपके मामले में यह कितना सच है?

हमने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण किया था. पुलिस ने हम पर ऐसा कोई दबाव नहीं बनाया था. एक बार जब हमने पक्के तौर पर संगठन से बाहर निकलने का फैसला किया, तब हमने एक स्थानीय सूत्र के माध्यम से पुलिस अधिकारियों से संपर्क किया. फिर हमने पुलिस को अपनी योजना के बारे में बताया.

आत्मसमर्पण करने वालों के लिए संगठन बेहद क्रूर है. जब कोई सदस्य पार्टी छोड़ देता है, तो उसके परिजनों के लिए गांव में रहना लगभग असंभव हो जाता है. गांव में या तो उन्हें अलग-थलग कर दिया जाता है या मारकर गायब कर दिया जाता है. यहां के ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं. ऐसे में लोगों के लिए जिंदा रहना बहुत मुश्किल हो जाता है. आज गांव में मेरा कोई भी सगा रिश्तेदार नहीं बचा है.

फिलहाल आप एक नई पहचान के साथ गुप्त जिंदगी जी रहे हैं. अगर इस नई जिंदगी में आपके सामने कठिनाइयां आईं, तो क्या आप अपने पुराने संगठन में वापस लौटे सकते हैं?

कभी नहीं. चाहे कुछ हो जाए लेकिन अब मैं दोबारा संगठन का हिस्सा नहीं बनूंगा. जब हम कैडर का हिस्सा थे, तब हमने बहुत कठिनाइयों और खतरों का सामना किया था. जिसके नतीजे में हमें एक अनिश्चित और अंधकारमय भविष्य मिला. हम जिंदगी को फिर से शुरू करना चाहते हैं और समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनना चाहते हैं.

सीरीज का आगामी पार्ट: आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी के साथ लंबे इंटरव्यू के बाद, मैं बस्तर में नक्सलवाद की वास्तुकला के बारे में और जानने को बेताब गया. मैंने प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) की राजनीतिक संगठन के रूप में और एक सैन्य कैडर के रूप में कार्यप्रणाली को समझने की कोशिश की. मैंने यह भी जानने की कोशिश की कि दंडकारण्य के लिबरेटेड जोन में अपना प्रभुत्व सुनिश्चित करने के लिए और अपनी विचारधारा फैलाने के लिए वामपंथ का चरमपंथी गुट कैसे काम करता है.

यह भी पढ़ें: पार्ट 1: बस्तर में रंग ला रही है प्रधानमंत्री की योजना, दिखने लगा है विकास

यह भी पढ़ें: बस्तर पार्ट 2: कभी माओवादियों का गढ़ था, आज पलनार गांव डिजिटल हब है

यह भी पढ़ें: बस्तर पार्ट 3: माओवाद के गढ़ से एजुकेशन हब बन रहे दंतेवाड़ा के कई इलाके

यह भी पढ़ें: बस्तर पार्ट-4: स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के सहारे माओवाद से लड़ता दंतेवाड़ा का तकनीक-प्रेमी कलेक्टर

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi